Department of Public Relation:Government of Madhya Pradesh
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आधा दर्जन से ज्यादा मामले पकड़ाऐ
खातों की छानबीन अब भी जारी

चुनाव लड़ने का हक सभी को है लेकिन इसके पीछे के असली मकसद को तलाशा जाना भी मौजूदा दौर में जरूरी हो गया है। चुनावी खामियों को दूर कर इस क्षेत्र में अब निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी व्यवस्था की माँग जोर पकड़ चुकी है। चुनाव आयोग को पता लगा था कि प्रमुख उम्मीदवार अपने चुनावी खर्च की अधिकतम सीमा को लाँघने से बचने के लिए एक जुगत यह लगाते हैं कि अपने डमी उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतार कर उसके नाम पर अपने हक में अलग से पैसा खर्च कर लिया जाए।
आयोग ने चुनावी प्रक्रिया की खामियों को दूर करने का बीड़ा उठाया हुआ है। इस बार के चुनाव में उसके विभिन्न नए सुधारात्मक उपायों में डमी उम्मीदवारों की पड़ताल भी खासतौर पर शामिल थी। शक बेबुनियाद भी नहीं निकला जबकि मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में ऐसे आधा दर्जन से ज्यादा मामले पकड़े जा चुके हैं। कुछ में डमी उम्मीदवारों की गिरफ्तारियाँ हुईं और कुछ के पुलिस में मामले अब तक दर्ज किए गए। प्रमुख उम्मीदवारों के लिए इन डमी उम्मीदवारों द्वारा इस्तेमाल की जा रही गाड़ियाँ और प्रचार सामग्री जप्त की गई है। अभी पड़ताल का सिलसिला थमा इसलिए नहीं है कि ऐसे डमी उम्मीदवारों के खातों को खंगाला जा रहा है और यह पुख्ता किया जा रहा है कि उनके द्वारा तैयार हिसाब की हकीकत क्या है।
चुनाव आयोग ने यह काम सीधे तौर पर संबंधित क्षेत्र के रिटर्निंग अफसर, प्रेक्षक और जिला निर्वाचन अधिकारियों के जिम्मे किया था। उनसे कहा गया था कि किसी भी निर्दलीय डमी उम्मीदवार पर शक की सुई गहरा जाने के बाद बाकायदा पीछा कर उसकी गतिविधियों को वीडियो कैमरे में कैद करवा लिया जाए। ऐसा करवाने पर वीडियो ट्रैकिंग में आधा दर्जन से ज्यादा मामले तो तत्काल ही पकड़ में आ गए। इनमें गाड़ियों की अनुमति रद्द करने के साथ ही जरूरी कानूनी कार्रवाई भी अंजाम दी गई। चुनावी खर्च के हिसाब में ऐसे डमी उम्मीदवारों की और गहराई से पड़ताल चल रही है। इसमें देखा यह भी जा रहा है कि इन उम्मीदवारों ने कितने पोस्टर और पर्चे छपवाए, प्रचार के और कितने साधनों के इस्तेमाल पर कितनी धनराशि खर्च की और इनके केन्द्र में सबसे उपर यह भी कि यह सारा तामझाम उसने खुद के लिए किया या अपने नाम पर किसी अन्य प्रमुख उम्मीदवार के लिए।
चुनाव आयोग देश की स्वच्छ और स्वस्थ प्रजातांत्रिक व्यवस्था तथा परंपरा को बेदाग रखने का पक्षधर है। इसी सच्चाई की रोशनी में उसने चुनाव प्रक्रिया में सुधार के नित नए प्रयोग किए हैं। इस बार के विधानसभा चुनाव में ऐसे प्रयोगों की बड़ी श्रृंखला थी और इनके नतीजे भी सामने आए। निर्दलीय उम्मीदवारों में छुपे डमी को खोजना भी उसके नए प्रयोगों का ही एक अहम हिस्सा था। आयोग को इनके बारे में पहले से खबर हो जाना और वक्त रहते इसके लिए रणनीति तैयार कर अमल करवाना खाली नहीं गया।
निर्दलीय उम्मीदवारों की बड़ी तादाद का चुनावी मैदान में उतरना और हार जाना तथा कई का अत्यंत कम वोट हासिल कर पाना शक के गहराने के लिए पर्याप्त होता है। वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव की ही बात करें तो उस वक्त कुल 879 निर्दलीय मैदान में उतरे थे जिनमें से 869 जमानत बचाने लायक वोट भी नहीं जुटा सके। हाँ, जिन्होंने मन, संकल्प और मजबूत इरादे से चुनाव लड़ा उन्हें जीत भी मिली। लेकिन उनकी बड़ी भीड़ में चुनाव जीतने वाले ऐसे सिर्फ 2 उम्मीदवार ही शामिल थे। इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों की तादाद 1371 है।

योगेश शर्मा