| اردو خبریں | संस्कृत समाचारः मुख्य पृष्ठ | संपर्क करें | साईट मेप
You Tube
अपराधों की रोकथाम हुई आसान
52,454 लोग आए घेरे में
सुरक्षा की बुनियाद हुई मजबूत
बढ़ा मतदान का प्रतिशत
चुनाव आयोग की कार्रवाई

मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव ने रोज़मर्रा की कानून और व्यवस्था के लिए भी एक मजबूत बुनियाद खड़ी कर दी है। प्रशासन के लिए यह राह चुनाव आयोग के जरिए इसलिए आसान हो गई है कि वल्नरेबल मैपिंग के नाम से धन और बाहुबलियों की पहचान का काम अंजाम दिया चुका है। ऐसे 52 हजार 454 लोग अब उसके घेरे में हैं। मतदान की दृष्टि से कमजोर और असुरक्षित माने जाने वाले 12 हजार 764 इलाकों की ताज़ा पड़ताल भी प्रशासन के लिए मददगार हो गई है। इस कवायद का सबसे पहला नतीजा तो यह आया है कि बाहुबलियों से भयभीत रहने वाले मतदाताओं ने इस बार पूरी आज़ादी से अपने मताधिकार का प्रयोग कर मतदान का भारी भरकम 69.35 प्रतिशत मौजूदा चुनाव में दर्ज कराने में अहम योगदान दिया है।
चुनाव आयोग ने नए प्रयोगों की अपनी रणनीति पर काम करते हुए इस बार विभिन्न सुधारात्मक उपाय अंजाम दिए थे। वल्नरेबल मैपिंग का जो उसने फैसला पहले कर दिया था वह इत्तेफाकन ही आज देश के मौजूदा हालात में बहुत निर्णायक और कारगर हो गया है। वैसे तो आचार संहिता लगने के फौरन बाद ही प्रदेश में असामाजिक तत्वों की धरपकड़, वारंटों की तामीली, लायसेंसशुदा हथियारों के जमा कराने और गैरकानूनी हथियार तथा विस्फोटकों की बरामदगी का काम शुरू कर दिया गया था। लेकिन इस सबके बीच बिल्कुल नई सोच और अवधारणा के साथ चुनाव आयोग ने यह फैसला भी किया कि स्वतंत्र चुनाव में रोड़ा बनते रहे धन और बाहुबलियों का पूरा चिट्ठा तैयार कर उन पर कानूनी शिकंजा कसा जाए।
आयोग की इस मंशा को पूरी तरह जामा पहनाने के लिए उसके ही निर्देश पर प्रदेश में 8 नवंबर को तो बाकायदा पूरे दिन का एक सघन अभियान चलाया गया। धन और बाहुबल के जरिए कमजोर तबकों के रिहायशी इलाकों में लोगों को डरा-धमका कर उन्हें मतदान से वंचित करने या किसी उम्मीदवार विशेष को वोट देने और अन्य उम्मीदवार को वोट न देने की जो दुष्परंपरा चली आ रही थी उस पर विराम लगाने के लिए इस अभियान को चलाया गया था। चुनाव आयोग का यह स्पष्ट मत था कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों में धन और बाहुबल घातक रोड़ा बनते रहे हैं।
सबसे प्रभावी तथ्य इस मुहिम का यह भी था कि इसमें मजरे, टोले, पारे और बस्तियों से लेकर शहरी इलाकों के वार्ड और मोहल्ले तक खंगाल लिए गए हैं। मतदान के उद्देश्य से असुरक्षित समझे जाने वाले 12 हजार 764 इलाकों की पहचान इस मुहिम में की गई। यह भी पता लगा लिया गया कि ऐसे इलाकों की ज़द में 9 हजार 535 मतदान केन्द्र पड़ते हैं। अगला कदम उन लोगों की खोजबीन का था जो चुनाव के दौरान इन इलाकों को वल्नरेबल (कमजोर या असुरक्षित) बनाने के लिए जिम्मेदार रहे हैं। यह काम अत्यंत नाजुक प्रकृति और संवेदनशील स्वरूप का था, लिहाजा इसमें भारी ऐहतियात तो बरती ही गई, उन ढेर सारे लोगों की मदद भी ली गई जो प्रभावी संवाद सेतु बन सकते थे। यह कवायद खाली नहीं गई जबकि दबंग कहे जाने वाले 52 हजार 454 लोगों की पहचान पुख्ता कर ली गई।
इस मुहिम में पटवारियों और कोटवारों से लेकर पुलिसकर्मी, ग्राम सेवक अन्य सरकारी कर्मचारी और संबंधित इलाकों में रहने वाले भरोसेमंद लोगों को भी शामिल किया गया था। काम को अत्यंत गोपनीय ढंग से अंजाम तक पहुँचाया गया। अत्यंत सुखद और उपलब्धिपूर्ण बात यह है कि ऐसे कोई 52 हजार बाहुबलियों के खिलाफ ताबड़तोड़ कानूनी और प्रतिबंधात्मक कार्रवाई भी कर दी गई। ऐसे लोगों से भयभीत रहने वाले मतदाताओं को इस कार्रवाई के चलते खुल कर और पूरी निष्पक्षता से अपने मतदान के लिए बाहर आने का मौका मिला। इन इलाकों में सुरक्षा के तगड़े बंदोबस्त किए गए थे। अगर तथ्यों पर गौर करें तो संबंधित क्षेत्रों में भारी मतदान हुआ और इन मतदाताओं की भागीदारी के चलते भी कुल मतदान का प्रतिशत 69.35 के बड़े स्तर तक पहुँच गया। अगर दूसरे तथ्यों पर गौर करें तो पिछले चुनाव में हिंसापूर्ण घटनाओं के चलते जहाँ 67 जगहों पर पुनर्मतदान और 6 केन्द्रों पर मतदान रोकने की नौबत आई थी वहाँ इस बार केवल 31 जगहों पर पुनर्मतदान करवाया गया है और मतदान रूकने की तो एक भी घटना नहीं हुई है।
वल्नरेबिलिटी मैपिंग ने प्रशासन के लिए ऐसे दबंगियों, बाहुबलियों का एक ऐसा ताजा चिट्ठा तैयार कर दिया है जो विभिन्न घटनाओं और दुर्घटनाओं के दौरान अपराधों पर नियत्रण के लिए उसका मददगार बना रहेगा। इन लोगों का रिकार्ड उस मकसद से भी उपयोगी साबित होगा जबकि कोई खतरनाक अपराधी ऐसे लोगों के पास अपनी सुरक्षित पनाह खोजते पहुँच जाएं क्योंकि ऐसे लोग अब प्रशासन की मुकम्मल निगरानी में रहेंगे। इनमें तमाम शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में की गई सघन पड़ताल में पाये गये सभी बाहुबलियों और दबंगियों का रिकार्ड अब प्रशासन पास मौजूद है। चुनाव आयोग की इस कवायद ने न सिर्फ चुनावों के दौरान बल्कि आम दिनों में कानून और शांति व्यवस्था बनाए रखने और लोगों को सुरक्षित जीवन जीने का एहसास कराने के लिए प्रशासन की राह आसान कर दी है।

योगेश शर्मा;