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विशेष पशु प्रजनन कार्यक्रम संकर जर्सी मादा वत्स पालन योजना
(योजना सभी वर्ग के हितग्राहियों के लिये)

उद्देश्य- लघु#सीमान्त कृषक#भूमिहीन कृषि मजदूर की आर्थिक स्थिति में सुधार लाना। दुग्ध उत्पादन में वृध्दि। नस्ल सुधार। संकर बछिया के उचित परिपालन के लिए संतुलित आहार उपलब्ध कराकर गरीब हितग्राहियों में संकर वत्स पालन के प्रति रूचि उत्पन्न करना है।

योजना- योजना में ऐसे लघु#सीमान्त कृषकों तथा भूमि हीन कृषि मजदूरों का चुनाव किया जाता है जिनके पास स्वयं की मादा जर्सी संकर बछिया हो। बछिया के भरण पोषण के लिए चार से 32 माह की आयु तक संतुलित पशु आहार प्रदाय किया जाता है। योजना को प्रदेश के सभी जिलों में विस्तारित किया गया है।

हितग्राही- लघु कृषक, सीमान्त कृषक, भूमिहीन कृषि मजदूर।
योजना इकाई- पात्र हितग्राही के पास उपलब्ध जर्सी संकर बछिया।

इकाई लागत- रुपये 8100-00
(नाबार्ड क्रेडिट प्लान 1999-2000 के अनुसार)

पशु आहार 17 क्विंटल
(रु. 4.50 प्रति किलो की दर से)

 

7650.00

 

औषधि हेतु

 

175.00

 

तीन वर्ष हेतु बीमा राशि

 

284.00

 

अनुदान

 

सामान्य वर्ग के लिये अधिकतम सीमा

 

3000.00

 

अनुसूचित जाति वर्ग के लिये

 

5000.00

 

अधिकतम सीमा अनुसूचित जनजाति वर्ग के
लिये अधिकतम सीमा

 

5000.00

 

संपर्क- संबंधित जिले के निकटतम पशु चिकित्सा अधिकारी#पशु औषधालय के प्रभारी से।

अनुदान के आधार पर बकरों का प्रदाय
(यह योजना केवल अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के हितग्राहियों के लिये)

उद्देश्य

  • देशी बकरियों की नस्ल में सुधार लाना।
  • हितग्राहियों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाना।
  • मांस तथा दुग्ध उत्पादन में वृध्दि करना।

योजना

  • योजना में अनुसूचित जाति#जनजाति के हितग्राही को उन्नत नस्ल का जमनापारी बकरा अनुदान के आधार पर प्रदाय किया जाता है।

हितग्राही- अनुसूचित जाति#अनुसूचित जनजाति के बकरी पालक।
योजना इकाई- एक उन्नत नस्ल का प्रजनन योग्य बकरा।
इकाई लागत - लगभग रुपये 3475.00
अनुदान - अनुसूचित जाति#अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिये 90 प्रतिशत।
संपर्क- निकट पशु चिकित्सा संस्था से।

अनुदान के आधार पर सूकर प्रदाय
(यह योजना केवल अनुसूचित जाति के हितग्राहियों के लिये)

उद्देश्य

  • देशी#स्थानीय सूकरों की नस्ल सुधार लाना।
  • हितग्राहियों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाना।
  • मांस उत्पादन में वृध्दि करना।

योजना

  • योजना में केवल अनुसूचित जाति के सूकर पालक को उन्नत नस्ल का एक नर सूकर अनुदान के आधार पर प्रदाय करने का प्रावधान है।
  • योजना प्रदेश के अनुसूचित जाति बाहुल्य जिलों में क्रियान्वित।

हितग्राही- अनुसूचित जाति के सूकर पालक।
योजना इकाई- एक उन्नत नस्ल का प्रजनन योग्य नर सूकर।
इकाई लागत- लगभग रुपये 2650.00
अनुदान- अनुसूचित जाति के सूकर पालकों के लिये 90 प्रतिशत अनुदान के आधार पर।
संपर्क- निकट पशु चिकित्सा संस्था से।

अनुदान के आधार पर सूकर त्रयी का प्रदाय
(यह योजना केवल अनुसूचित जन जाति के हितग्राहियों के लिये)

उद्देश्य

  • देशी#स्थानीय सूकरों की नस्ल में सुधार लाना।
  • हितग्राहियों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाना।
  • मांस उत्पादन में वृध्दि करना।

योजना

  • योजना में केवल अनुसूचित जन जाति के सूकर पालक को उन्नत नस्ल का एक नर सूकर एवं दो मादा सूकर अनुदान के आधार पर प्रदाय करने का प्रावधान है।
  • योजना प्रदेश के अनुसूचित जन जाति बाहुल्य जिलों में क्रियान्वित।

हितग्राही- अनुसूचित जनजाति के सूकर पालक।
योजना इकाई- एक उन्नत नस्ल का प्रजनन योग्य नर सूकर, दो उन्नत नस्ल की मादा सूकर।
इकाई लागत- लगभग रुपये 7100.00
अनुदान- अनुसूचित जनजाति के सूकर पालकों के लिये 90 प्रतिशत अनुदान के आधार पर।
संपर्क- निकट पशु चिकित्सा संस्था से।

गो-सेवक योजना
(यह योजना सभी वर्ग के हितग्राहियों के लिये)

उद्देश्य

  • ग्रामीण अंचलों में पशु चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना।
  • शिक्षित बेरोजगार युवकों को रोजगार उपलब्ध कराना।
  • कार्यक्षेत्र- संपूर्ण प्रदेश
  • अहर्ता- उसी गांव का निवासी हो जहां उसे कार्य करना है, हाईस्कूल (दसवीं) पास होना अनिवार्य।
  • आयु सीमा- 18 से 35 वर्ष के बीच।
  • चयन प्रक्रिया- आवेदन पत्र ग्राम पंचायतों के माध्यम से जनपद द्वारा अनुशंसित जिला पंचायत द्वारा अंतिम चयन।
  • प्रशिक्षण केन्द्र- प्रदेश के सभी जिला मुख्यालय।
  • प्रशिक्षण अवधि- 6 माह जिनमें से तीन माह सैध्दांतिक प्रशिक्षण केन्द्रों पर तथा तीन माह का व्यवहारिक प्रशिक्षण पशु चिकित्सा संस्थाओं पर दिया जाता है।

हितग्राही- शिक्षित बेरोजगार ग्रामीण युवक। (सभी वर्ग के पात्र युवक)
योजना इकाई- प्रत्येक ग्राम पंचायत में कम से कम एक गो-सेवक।
इकाई लागत- प्रशिक्षणार्थी को प्रशिक्षण स्वयं के व्यय पर।

ग्रामीण स्तर पर समुन्नत पशु प्रजनन
(अनुदान पर प्रजनन योग्य सांड प्रदाय)
(यह योजना सभी वर्ग के हितग्राहियों के लिये)

उद्देश्य- 1. सुदूर अंचलों में जहां कृत्रिम गर्भाधान सेवा उपलब्ध नहीं है ऐसे क्षेत्रों में नस्ल सुधार हेतु उन्नत नस्ल के सांडों द्वारा प्राकृतिक गर्भाधान की सुविधा उपलब्ध कराना। 2. प्रशिक्षित गो-सेवकों को प्राथमिकता के आधार पर अनुदान पर सांड उपलब्ध कराकर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना। 3. सुदूर अंचलों में कृत्रिम गर्भाधान की अपेक्षा प्राकृतिक गर्भाधान की ओर ग्रामीणों में ज्यादा रूचि होने से उनको प्राकृतिक पशु प्रजनन सुविधा उपलब्ध कराना। 4. नस्ल सुधार।

योजना

1. इस योजना के अंतर्गत प्रगतिशील पशुपालक अथवा प्रशिक्षित गो-सेवक को उन्नत नस्ल का एक सांड, अनुदान पर प्रदाय करना।
2. योजना प्रदेश के सभी जिलों में लागू।
3. योजना, समाज के सभी वर्गों के लिये।

हितग्राही- अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं सामान्य वर्ग के पशुपालक।
योजना इकाई- एक उन्नत नस्ल का प्रजनन योग्य सांड।
इकाई लागत- रुपये 10000.00
अनुदान- सामान्य वर्ग के लिये 85 प्रतिशत
अनुसूचित जाति#जनजाति वर्ग के लिये 90 प्रतिशत
संपर्क- निकट पशु चिकित्सालय#पशु औषधालय।

मुक्त परिसर प्रणाली में कुक्कुट इकाई का वितरण
(यह योजना केवल अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के हितग्राहियों के लिये)

उद्देश्य- कुक्कुट पालन के माध्यम से हितग्राहियों की आर्थिक स्थिति में सुधार। मांस उत्पादन में बढ़ोतरी

योजना- यह योजना केवल अनुसूचित जाति#जनजाति वर्ग के हितग्राहियों के लिये लागू हबै। इसमें बिना लिंग भेद के 15 दिवसीय 55 चूजे, खाद्यान्न, औषधि आदि हितग्राही से उपलब्ध कराई जाती है। योजना अनुसूचित जाति#जनजाति बाहुल्य जिलों में ही लागू।

हितग्राही- अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के कुक्कुट पालक।
योजना इकाई- बिना लिंग भेद के 15 दिवसीय 55 रंगीन चूजे।
इकाई लागत
15 दिवसीय 55 चूजों का मूल्य

प्रति इकाई

¯û. 495.00

रु. 205.00

 

औषधि व्यय प्रति इकाई

 

रु. 50.00

 

परिवहन व्यय प्रति इकाई

 

रु. 50.00

 

योग इकाई लागत

 

रु. 800.00

 

अनुदान- अनुसूचित जाति#जनजाति वर्ग के लिये 75 प्रतिशत
संपर्क- निकट पशु चिकित्सालय#पशु औषधालय।

नन्दी शाला योजना

उद्देश्य- ग्रामीण क्षेत्रों की गौ वंशीय पशुओं की नस्ल सुधार के लिये गौवंशीय देशी वर्णित नस्ल के सांडों का प्राकृतिक गर्भाधान सेवाओं के लिये चयनित गौशाला व दुग्ध समिति को अनुदान के आधार पर प्रदाय।

योजना का स्वरूप- ग्राम पंचायत क्षेत्र में 'नन्दी शाला' योजना के तहत पात्र प्रगतिशील पशुपालक, पंजीकृत चयनित गौशाला एवं चिन्हित दुग्ध समिति को अनुदान आधार पर गौवंशीय देशी वर्णित नस्ल के सांड जैसे साहीवाल, थारपारकर, हरियाणा, गिर, गौलव, मालवी, निमाड़ी, केनकथा आदि दिये जायेंगे।

  • योजना प्रदेश के सभी जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों के लिये है।
  • योजना समाज के सभी वर्गों के लिये है।

पात्र हितग्राही

  • पशुपालक जिनके पास पर्याप्त कृषि भूमि के साथ न्यूनतम पांच गोवंशीय पशुधन है या ऐसे पशुपालक, जिनके पास कृषि भूमि नहीं है किन्तु 20 या उससे अधिक पशु हैं।

सम्पर्क- मध्यप्रदेश दुग्ध महासंघ की चयनित दुग्ध समिति पंजीकृत चयनित प्रगतिशील गौशाला
योजना घटक- (अ) उन्नत देशी नस्ल के गो-सांड का प्रदाय एवं पशु बीमा-
(ब) संतुलित पशु आहार-
सांड को प्रथम दो माह की अवधि के लिये संतुलित पशु आहार उपलब्ध कराया जायेगा

इकाई लागत-

(अ)

´ÉÌhÉiÉ xɺ±É Eäò |ÉVÉxÉxÉ ªÉÉäMªÉ ºÉÉÆb÷ EòÉ ¨ÉÚ±ªÉ, {ɇ®ú´É½þxÉ B´ÉÆ ¤ÉÒ¨ÉÉ {É®ú ´ªÉªÉ

(ब)

 

प्रदाय किए गए सांड के प्रथम 60 दिवस के लिये पशु आहार

 

रु. 1,500

 

योग-

 

रु. 14,000

 

अनुदान राशि एवं हितग्राही अंश
प्रति इकाई अनुदान राशि रु. 11,200 (80 प्रतिशत शासकीय अनुदान) प्रति इकाई हितग्राही अंशदान रु. 2800 (20 प्रतिशत)।
सम्पर्क- पशु चिकित्सालय।

शिक्षित ग्रामीण युवक स्वरोजगार योजना
(अनुसूचित जाति#जनजाति के गौसेवकों को कृत्रिम गर्भाधान का प्रशिक्षण)

योजना- शासन के द्वारा नये पशु औषधालय नहीं खोले जाने का निर्णय लिया गया था। इसके स्थान पर शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध कराने हेतु गोसेवक योजना लागू की गई। गोसेवक योजना में ग्राम के शिक्षित बेरोजगार युवकों को प्राथमिक पशु चिकित्सा का सैध्दांतिक एवं प्रायोगिक प्रर्शिक्षण उनके स्वयं के व्यय पर दिया जाता है। गौ सेवकों से चयन कर निजी कृत्रिम गर्भाधान कार्यकर्ता के रूप में 4 माह का कृत्रिम गर्भाधान का प्रशिक्षण इस योजना के तहत दिया जा रहा है।

 

 

उद्देश्य- स्वरोजगार कृत्रिम गर्भाधान सेवाओं का विस्तार एवं पहुंच कृत्रिम गर्भाधान सेवा उपलब्ध कराना।
योजना- स्वरोजगार हेतु युवकों को कृत्रिम गर्भाधान का प्रशिक्षण।
हितग्राही- अनुसूचित जाति#जनजाति के शिक्षित बेरोजगार युवक।
योजना इकाई- स्वरोजगार हेतु युवकों को कृत्रिम गर्भाधान का प्रशिक्षण हेतु अनुदान।
इकाई लागत- रु. 22000#- प्रति युवक।
अनुदान- रु. 4000#- की छात्रवृत्ति एवं रु. 18000#- के कृत्रिम गर्भाधान उपकरण।
संपर्क- निकटस्थ पशु चिकित्सालय#औषधालय#कृत्रिम गर्भाधान हेतु।

वर्ष

2007-08

17.60

 

भौतिक

 

80

 

पशु बीमा योजना
(योजना सभी वर्ग के पशुपालकों के लिए)

उद्देश्य- मध्यप्रदेश के पशुपालकों द्वारा पाले जा रहे दुधारू पशुओं की आकस्मिक या बीमारी से मृत हुए पशुओं से हुई आर्थिक हानि की क्षतिपूर्ति करना।

कार्यक्षेत्र

1. प्रदेश के छ: जिले - शाजापुर, धार, मुरैना, भिण्ड, विदिशा एवं रतलाम।
2. शासकीय योजनाएें, जहां बीमा राशि इकाई लागत में सम्मिलित है को छोड़कर समस्त प्रकार की गाय#भैंस जिनका दुग्ध उत्पादन 1500 लीटर प्रति ब्यात है योजना में सम्मिलित है।
3. योजनांतर्गत 50 प्रतिशत राशि भारत शासन से अनुदान एवं 50 प्रतिशत पशुपालक का अंश होगा।
4. योजना की क्रियान्वयन एजेन्सी मध्यप्रदेश राज्य पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम है।
5. योजनांतर्गत 3 वर्ष का पशु बीमा 12 प्रतिशत एवं 1 वर्ष का पशुबीमा 4.5 प्रतिशत के दर से किया जाता है।

सम्पर्क- निकटस्थ पशु चिकित्सालय।

सहकारी डेयरी कार्यक्रम

उद्देश्य- 1. ग्रामीण दुग्ध उत्पादकों द्वारा उत्पादित दूध का उचित मूल्य पर संकलन करते हुये उन्हें वर्ष पर्यन्त वैकल्पिक रोजगार का साधन उपलब्ध कराना। 2. ग्रामीण दुग्ध उत्पादकों को आवश्यक तकनीकी आदान सेवायें उपलब्ध कराना। 3. शहरी उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर पाश्चुरीकृत दूध तथा दुग्ध पदार्थ उपलब्ध कराना।

योजना का स्वरूप एवं कार्यक्षेत्र- एम.पी. स्टेट को-ऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन और संबध्द 5 दुग्ध संघों के माध्यम से 41 जिलों में यह योजना संचालित है। इसके अंतर्गत हितग्राहियों द्वारा उत्पादित दूध के संकलन की व्यवस्था करते उन्हें तकनीकी आदान सेवायें उपलब्ध कराई जाती हैं।

पात्र हितग्राही और चयन प्रक्रिया- दुग्ध संघों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में डेयरी विकास गतिविधियाँ संचालित कर दुग्ध सहकारी समितियों के माध्यम से दुग्ध संकलित किया जाता है। कोई भी ग्रामीण दुग्ध उत्पादक, दुग्ध सहकारी समिति का सदस्य बन सकता है।

योजना क्रियान्वयन की प्रक्रिया- एम.पी. स्टेट को-ऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन लिमिटेड, भोपाल और संबध्द दुग्ध संघों द्वारा।

एकीकृत डेयरी विकास परियोजना

उद्देश्य- 1. ग्रामीण दुग्ध उत्पादकों द्वारा उत्पादित दूध का उचित मूल्य पर संकलन करते हुये उन्हें वर्ष पर्यन्त वैकल्पिक रोजगार का साधन उपलब्ध कराना। 2. ग्रामीण दुग्ध उत्पादकों को आवश्यक तकनीकी आदान सेवायें उपलब्ध कराना। 3. शहरी उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर पाश्चुरीकृत दूध तथा दुग्ध पदार्थ उपलब्ध कराना।

योजना का स्वरूप एवं कार्यक्षेत्र- यह योजना मूल रूप से पिछड़े तथा पहाड़ी जिलों जिनको ऑपरेशन फ्लड का लाभ नहीं मिल पाया के लिये है। वर्तमान में यह योजना बालाघाट, छिंदवाड़ा, झाबुआ तथा रीवा-सतना जिलों में संचालित है। इसके अंतर्गत ग्रामीण दुग्ध उत्पादकों द्वारा उत्पादित दूध के संकलन की व्यवस्था करते उन्हें तकनीकी आदान सेवायें उपलब्ध कराई जाती हैं।

पात्र हितग्राही और चयन प्रक्रिया- एकीकृत डेयरी विकास परियोजना द्वारा गठित दुग्ध सहकारी समिति का सदस्य होना अनिवार्य है। कोई भी ग्रामीण दुग्ध उत्पादक, दुग्ध सहकारी समिति का सदस्य बन सकता है।

योजना क्रियान्वयन की प्रक्रिया- जिले में कार्यरत दुग्ध संघ और गठित दुग्ध सहकारी समितियों द्वारा।

तकनीकी आदान सेवायें

उद्देश्य- सभी वर्ग के दुग्ध उत्पादकों के दुधारू पशुओं के कृत्रिम गर्भाधान द्वारा नस्ल सुधार और पशु स्वास्थ्य की देखभाल के साथ-साथ संतुलित पशु आहार उपलब्ध कराकर दुग्ध उत्पादन बढ़ाना।

योजना का स्वरूप एवं कार्यक्षेत्र- प्रदेश में गठित समस्त दुग्ध सहकारी समितियों को तकनीकी आदान सेवायें संबंधित दुग्ध संघों द्वारा उपलब्ध कराई जाती हैं। इनमें उचित मूल्य पर पशु आहार प्रदाय तथा कृत्रिम गर्भाधान सुविधा प्रमुख है। हितग्राहियों को समिति तथा संघ स्तर पर विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से उन्नत पशुपालन तकनीकों की जानकारी भी प्रदान की जाती है।

पात्र हितग्राही और चयन प्रक्रिया- दुग्ध संघों द्वारा गठित दुग्ध सहकारी समिति का सदस्य होना और दुग्ध सहकारी समिति को दूध प्रदान करना अनिवार्य है।

योजना क्रियान्वयन की प्रक्रिया- दुग्ध सहकारी समिति के माध्यम से दूध प्रदाय करने वाले सदस्यों को योजना का लाभ मिलता है। क्रियान्वयन दुग्ध संघ और दुग्ध सहकारी समितियों द्वारा किया जाता है।

एकीकृत आदिवासी डेयरी विकास परियोजना

उद्देश्य- प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिलों के गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले आदिवासी परिवारों को सहकारी डेयरी कार्यक्रम के तहत लघु डेयरी इकाई उपलब्ध कराते हुये अतिरिक्त रोजगार उपलब्ध कराना।

योजना का स्वरूप एवं कार्यक्षेत्र- प्रदेश के 11 आदिवासी बाहुल्य जिलों बैतूल, बड़वानी, खरगौन, धार, झाबुआ, खण्डवा, छिंदवाड़ा, बालाघाट, शहडोल, मण्डला एवं सिवनी के चयनित ग्रामों में दुग्ध सहकारी समितियों का गठन#सुदृढ़ीकरण करते हुये सहकारी डेयरी कार्यक्रमों का क्रियान्वयन करना।

पात्र हितग्राही- सम्मिलित ग्रामों में से ऐसे ग्राम जो गोकुल ग्राम प्रकल्प में सम्मिलित है के शत-प्रतिशत एवं अन्य सम्मिलित ग्रामों के चयनित 20 बीपीएल आदिवासी परिवार जो निम्न अर्हतायें पूर्ण करते हैं-

  • पशुपालन एवं डेयरी व्यवसाय में रुचि रखते हो।
  • डेयरी प्रबंधन प्रशिक्षण लेने में सक्षम हो।
  • लघु डेयरी इकाई भी स्थापना हेतु आवश्यक अधोसंरचना जैसे पर्याप्त जगह, पशुओं को पीने के पानी की व्यवस्था आदि उपलब्ध हो।
  • समिति का सदस्य हो। को कार्यक्रम में सम्मिलित किया जाता है।

हितग्राही चयन प्रक्रिया- हितग्राहियों का चयन समिति स्तर पर दुग्ध संघ के अधिकारियों की उपस्थिति में ग्राम सभा आयोजित करते हुये किया जावेगा। हितग्राहियों को दुग्ध समिति का सदस्य होना आवश्यक है।

योजना क्रियान्वयन की प्रक्रिया- सहकारी दुग्ध संघ के कार्यक्षेत्र के जिलों में दुग्ध सहकारी समितियों के माध्यम से कार्यक्रम क्रियान्वित।

स्वच्छ दुग्ध उत्पादन

उद्देश्य- 1. आधुनिक एवं वैज्ञानिक पध्दति से दूध की गुणवत्ता में सुधार। 2. स्वच्छ दुग्ध उत्पादन एवं गुणवत्ता पर जागरुकता हेतु ग्रामीण कृषक एवं डेयरी अमले को सघन प्रशिक्षण।
3. कृषक स्तर पर दुग्ध दोहन प्रक्रिया में सुधार।

योजना का स्वरूप एवं कार्यक्षेत्र- केन्द्रीय परिवर्तित योजनान्तर्गत प्रदेश में दुग्ध संघों के बैतूल (मुलताई), धार, मंदसौर, ग्वालियर, भिण्ड, दतिया, मुरैना तथा बालाघाट जिलों में स्वच्छ दुग्ध उत्पादन कार्यक्रम क्रियान्वयन।

पात्र हितग्राही- ऐसे दुग्ध उत्पादक सदस्य जिनके द्वारा सम्मिलित रूप से दुग्ध सहकारी समिति में औसतन 150 से 200 लीटर दूध प्रतिदिन प्रदाय किया जाता है।

योजना क्रियान्वयन की प्रक्रिया- एमपीसीडीएफ से संबध्द सहकारी दुग्ध संघ के कार्यक्षेत्र के जिलों में कार्यरत दुग्ध संकलन मार्गों पर स्थित दुग्ध सहकारी समितियों के माध्यम से कार्यक्रम क्रियान्वयन।