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मौसम में लगातार आ रहे बदलाव से खेती में अनिश्चिता बढ़ गई है। इससे किसानों में खेती में मौसमी नुकसान की आशंका बनी रहती है। इसके बावजूद रेशम ने खंडवा जिले के किसानों का खेती के प्रति नजरिया बदला है।

ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार का सृजन एक महत्वपूर्ण कार्य है। यदि यह रोजगार कृषि आधारित हो तो यह ग्रामीणों के जीवन में परिवर्तन ला सकता है। खंडवा जिले में मनरेगा के तहत रेशम उप-योजना में रेशम की खेती से किसानों के जीवन में सुखद परिवर्तन आ रहा है।

>खंडवा जिले में वर्ष 2012-13 में रेशम के ककून का उत्पादन नहीं के बराबर था। लेकिन मनरेगा में रेशम की खेती में किसानों की रुचि जागृत होने से यह वर्ष 2014-15 में एक लाख 33 हजार 800 किलोग्राम तक पहुँच गया है। जिले में वर्ष 2013-14 में प्रायोगिक रूप से रेशम उत्पादन की शुरूआत की गई। जिले के पंधाना जनपद पंचायत के 37 किसान एवं पुनासा जनपद पंचायत 14 किसान को रेशम का कृमी पालन शुरू करवाया गया। इन किसानों ने कृमी पालन से 60 लाख रुपये का 24 हजार किलोग्राम रेशम के ककून का उत्पादन किया। वर्ष 2014-15 में पंधाना जनपद के 83, पुनासा जनपद के 39, खालवा जनपद के 23 और बलड़ी जनपद के 18 किसान को मनरेगा में रेशम उप-योजना का लाभ दिलवाया गया। इस वर्ष इन किसानों ने एक लाख 63 हजार रेशम के अण्डों का क्रमी पालन कर 2 करोड़ 44 लाख रुपये लागत के 97 हजार 800 किलोग्राम रेशम का उत्पादन किया। यह रेशम मध्यप्रदेश सिल्क फेडरेशन द्वारा स्थल पर ही खरीदा जा रहा है।

मनरेगा में रेशम केन्द्र के माध्यम से किसानों को करीब एक लाख 30 हजार रुपये लागत से रेशम उत्पादन गृह, सिंचाई सुविधा एवं रेशम उत्पादन के लिये स्टेण्ड प्रदाय किये गये। साथ ही किसानों को एक लाख 87 हजार लागत के शहतूत के पौधे भी दिये गये।

जिले में इस साल इन विकासखंडों में 214 किसान को रेशम पालन के लिये प्रोत्साहित किया जा रहा है। इन किसानों द्वारा इस वर्ष एक लाख 33 हजार 800 किलोग्राम ककून का उत्पादन किया जायेगा, जिसकी बिक्री से इन्हें 3 करोड़ 35 लाख रुपये का मुनाफा होगा। इस प्रकार प्रत्येक किसान लगभग डेढ़ लाख रुपये के ककून का बिक्री करेगा।

मुकेश मोदी