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वानिकी विद्वानों के लिये खरगोन वन-मण्डल का नागलवाड़ी क्षेत्र ताजी हवा के झोंके की तरह आया है। डेढ़ दशक पहले तक छिटपुट झाड़ियों, पेड़-पौधों वाली नागलवाड़ी की पहाड़ियाँ आज वन घनत्व का नया उदाहरण बन रही हैं। पिछले दस साल में यहाँ के वनों के घनत्व में हुई बढ़ोत्तरी लोगों को अचंभे में डालती है। इस क्षेत्र की 4-5 पहाड़ी में वनों का घनत्व इतना ज्यादा बढ़ गया है कि अब उनकी छँटाई कर वैज्ञानिक प्रबंधन की जरूरत महसूस की जाने लगी है। यहाँ के कुल 1046 हेक्टेयर जंगल का संरक्षण नागलवाड़ी, गोलखेड़ा, पाड़ल्या तथा पीपरखेड़ा वन समितियाँ करती हैं।

आगरा-मुम्बई राष्ट्रीय राजमार्ग-3 से 20 किलोमीटर दूरी पर नागलवाड़ी में भीलटदेव का प्रसिद्ध मंदिर भी है। वीरान रही इस क्षेत्र की पहाड़ियों में अदभुत बदलाव की तुलना लोग आन्ध्रप्रदेश के प्रसिद्ध तिरुपति बालाजी मंदिर की तिरुमला पहाड़ियों के वनावरण में आये बदलाव, जितना चमत्कारी मान रहे हैं। क्षेत्र के जंगलों में आमूलचूल बदलाव का सहज अन्दाजा गूगल के उपग्रह चित्रों और मौके के वन घनत्व को देखकर लगाया जा सकता है। नागलवाड़ी में वर्ष 2001 से 2015 के दौरान आये बदलावों को गूगल के पुराने और ताजा उपग्रह चित्रों को एकसाथ रखकर देखने पर अविश्वसनीय सी लगने वाली यह कहानी आश्चर्यमिश्रित विश्वास में बदल जाती है।

इस क्षेत्र के लिये वन प्रबंधन की कार्य आयोजना बनाने वाले डॉ. पंकज श्रीवास्तव, जो आज खण्डवा वन वृत्त के मुख्य वन संरक्षक हैं, ने बताया कि वर्ष 2005 में उन्होंने क्षेत्र का भ्रमण कर खुद फोटो लिये, जिनमें वीरान पहाड़ियाँ साफ दिख रही थी। आज उन्हीं स्थानों पर घने जंगल देख लोग हतप्रभ हैं।

सुनीता दुबे