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पर्व और उत्सव
  1. गणगौर

  2. भाईदूज

  3. आखातीज

  4. संजा

  5. नीरजा

  6. घड़ल्या

  7. रतन्नवा

  8. दशहरा

  9. सुआरा

  1. लारूकाजा

  2. गंगा दशमी

  3. हरेली

  4. गोवरधन पूजा

  5. नवान्न

  6. मेघनाथ

  7. भगोरिया

  8. काकसार

  9. होली

संजा व मामुलिया

संजा अश्विन माह में 16 दिन तक चलने वाला कुआंरी लड़कियों का उत्सव है। लड़कियां प्रति दिन दीवार पर नई-नई आकृतियाँ बनाती हैं और सायं एकत्र होकर गीत गाती हैं। बुन्देलखण्ड क्षेत्र की लड़कियों का ऐसा ही एक पर्व है मामुलिया। किसी वृक्ष की टहनी या झाड़ी (विशेषकर नींबू) को रंगीन कुरता या ओढ़नी पहनाकर उसमें फूलों को उलझाया जाता है। सांझ को लड़कियां इस डाली को गीत गाते हुए किसी नदी या जलाशय में विसर्जित कर देती हैं।

नीरजा

नौ दिन तक चलने वाला महिलाओं का यह उत्सव दशहरे के पूर्व मनाया जाता है। इस अवसर पर स्त्रियाँ मां दुर्गा की पूजा करती हैं। "मालवा" के कुछ क्षेत्रों में गुजरात के "गरबा उत्सव" को कुछ स्थानीय विशेषताओं के साथ इन दिनों मनाते हैं।

घड़ल्या

नीरजा के नौ दिनों में लड़कियां घड़ल्या भी मानती हैं। समूह में लड़कियां, एक लड़की के सिर पर छिद्रयुक्त घड़ा रखती है जिसमें दीपक जल रहा होता है। फिर दरवाजे-दरवाजे जाती हैं और अनाज या पैसा एकत्र करती है। अविवाहित युवक भी इस तरह का एक उत्सव "छला" के रूप में मनाते हैं।

सुआरा

बुंदेलखण्ड क्षेत्र का "सुआरा" पर्व मालवा के घड़ल्या की तरह ही है। दीवार से लगे एक चबूतरे पर एक राक्षस की प्रतिमा बैठाई जाती है। राक्षस के सिर पर शिव-पार्वती की प्रतिमाएं रखी जाती है। दीवार पर सूर्य और चन्द्र बनाए जाते हैं। इसके बाद लड़कियां पूजा करती हैं और गीत गाती हैं।

दशहरा

दशहरा प्रदेश का एक प्रमुख त्यौहार है। इसे विजयादशमी कहते हैं। कुछ क्षेत्रों में इसे विजय के प्रतिक स्वरूप राम की रावण पर विजय के रूप में मनाते हैं। बुन्देलखण्ड क्षेत्र में इस दिन लोग एक-दूसरे से घर-घर जाकर गले मिलते हैं और एक दूसरे को पान खिलाते हैं।