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मध्यप्रदेश की जन - जातियाँ
  1. बैगा (बैगायक क्षेत्र, मंडला जिला)

  2. भारिया (पाताल कोट क्षेत्र, छिन्दवाड़ा जिला)

  3. कोरबा (हिल कोरबा, छत्तीसगढ़)

  4. कमार (मुख्य रूप से रायपुर जिला)

  5. अबूझमाड़िया (बस्तर जिला)

  6. सहरिया (ग्वालियर संभाग)

कमार

1961 और 1971 में की गई कमारों की जनसंख्या का जिलेवार विवरण प्राप्त है। जिसके अनुसार कमार लगभग 10 प्रतिशत ग्रामीण अधिवासी में रहने वाले आदिवासी हैं।

रायपुर जिले के कमार विशेष पिछड़े माने गए हैं। इस जिले में वे बिंद्रावनगढ़ और धमतरी तहसील में पाए जाते हैं। कमार विकास अभिकरण का मुख्यालय गरिमा बंद में है जिसके अंतर्गत घुरा, गरियाबंद, नातारी ओर मैनपुर विकास खंड कमारों की मूलभूमि है जहाँ से वे बाहर गए या मजदूरों के रूप में ले जाए गए।

19वीं सदी तक कमार अत्यंत पिछड़ी हुई अवस्था में थे।उनमें से कुछ विवरण अब संदेहास्पद लगने लगे, जैसे कतिपय अंग्रेजी लेखकों ने इन्हें गुहावासी बतलाया है। आज के समय में मध्यप्रदेश के वनों या पर्वतों में कोई भी आदिवासी समूह गुहावासी नहीं है। लिखे गए उपयुक्त अंशों में वर्तमान में उनके व्यवसायों मेंटोकरी बनाना भी सम्मिलित हैं। जिसमें उन्हें बसोरों से प्रतिस्पर्धा करना पड़ती है। शासकीय सहायता योजना के अंतर्गत उन्हें कम दामों में बांस उपलब्ध कराया जाता है और चटाईयाँ एवं टोकरियाँ की सीधे ही खरीद की जाती हैं। बदलते जमाने में कमारों ने कृषि करना भी सीख लिया है और 1981 में 444 कमार परिवारों के पास स्वयं की छोटी ही सही कृषि भूमि थी। कमारों के दो उप भेद है-बुधरजिया और मांकडिया। बुधरजिया उच्च वर्ग के माने जाते हैं, जबकि मांकडिया निम्न वर्ग के। ये बंदरों का मांस खाते थे। दोनों ही वर्ग कृषि करने लगे हैं।

अबूझमाड़िया

अबूझमाड़िया या हिल माड़िया बस्तर के अबूझमाड़ क्षेत्र में बसे हैं। इनका वर्णन इस पुस्तक में अन्यत्र भी दिया गया है। इनकी अधिकतर जनसंख्या नारायणपुर तहसील में है। इनके गांव अधिकतर नदियों के किनारे अथवा पहाड़ी ढलानों पर पाए जाते हैं। प्रत्येक घर के चारों ओर एक जाड़ी होती है। जिसमें केला, सब्जी और तम्बाकू उगाई जाती है। इनके खेत ढलवा भूमि में होते हैं जिनमें धान उगाया जाता है। जंगली क्षेत्रों को साफ करते समय यह ध्यान रखा जाता है कि क्षेत्र में बांस अधिकता से न पाए जाते हों, क्योंकि बांसों के पुन: अंकुरित होने का खतरा रहता है। अबूझमाड़िया स्थानांतरी कृषि करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को साधारणत: अपनी आवश्यकता की भूमि प्राप्त हो जाती है। जंगलों में कृषि की भूमि का चुनाव करते समय गांव का मुखिया यह निर्णय देता है कि किस व्यक्तित को कितनी भूमि चाहिए और वह कहाँ होगी। जंगल सफाई का काम सामूहिक रूप से किया जाता है। खेतों में अलग-अलग बाड़ नहीं बनाई जाती है तरन पूरे (पेंडा) को घेर लिया जाता है। भेले ही वह 200 या 300 एकड़ का हो। यह बड़ा 'बाड़ा' अत्यधिक मजबूत बनाया जाता है। यहाँ के जंगलों में केवल सुअर ही इन बांड़ों में घुसने का प्रयत्न करते है जिन से रखवाली करने के लिए मचान बनाए जोते हैं। धान के अतिरिक्त चमेली, गटका, कसरा, जोधरा इत्यादि मोटे अनाज उगाए जाते हैं, जिन्हें जंगली सुअरों से विशेष नुकसान पहुँचता है। अबूझमाड़ का "बाइसन होर्न" नृत्य प्रसिद्ध है। हिंदुस्तान में कहीं भी बाइसन नहीं पाया जाता है। दरअसल अबूझ माड़िए गाय या भैंस के सींग लगाकर नाचते हैं। गांव पहाड़ियों की चोटियों पर बसाए जाते हैं। कोशिश की जाती है कि तीन ओर से पर्वत हो और एक ओर से नदी। यद्यपि अब इस प्रकार की स्थिति में कुछ परिवर्तन आ रहा है। अबूझमाड़ के भौगोलिक क्षेत्र के नामकरण में गांव का महत्वपूर्ण हाथ है। साधारणत: प्रमुख गाँवों का बाहरी हिस्सा 'मड' या बाजार के काम में लाया जाता है। इन बाजारों में निश्चित ग्रामों से अबूझमाड़ी आते हैं। दूसरे शब्दों में ये 'मड' एक सुनिश्चित आर्थिक प्रभाव क्षेत्र को बतलाते हैं।

अबूझमाड़ बस्तर जिले का एक प्राकृतिक विभाग है जिसमें बहुत सी पर्वतीय चोटियाँ गुंथी हुई प्रतीत होती है। इनमें क्रम नहीं दिखाई पड़ता, अपितु चारों तरफ घाटियाँ और पहाड़ियों का क्रम बढ़ता नजर आता है। इन पहाड़ियों के दोनों ओर जल विभाजक मिलते हैं, जिनसे निकलने वाली सैकड़ों नदियाँ क्षेत्र की ओर भी दुर्गम बना देती हैं। पहाड़ियों की ऊँचाई धरा से 1007 मीटर तक हैं कुल मिलाकर 14 पहाड़ियों की चोटियाँ 900 मीटर से अधिक ऊँची हैं। भूगोल की भाषा में इन पहाड़ियों में अरोम प्रणाली है, किंतु यह सब छोटे पैमाने पर है। कुल क्षेत्र की प्रवाह प्रणाली तो पादपाकार ही है। बड़ी नदियों के नाम क्षेत्र के मानचित्रों में मिल जाते हैं, पर छोटी नदियाँ अनामिका हैं। अबूझमाड़ियों ने अपनी बोली में इन छोटी से छोटी नदियों को कुछ न कुछ नाम दे रखे हैं और सभी नामों के पीछे नदी सूचक शब्द मुण्डा जुड़ा रहता है, ठीक वैसे ही, जैसे चीनी भाषा में क्यांग। चीनी भाषा में चांग सी क्यांग और सी क्यांग का अर्थ चांग सी नदी और सी नदी है। कुछ ऐसी ही अबूझमाड़ में। यहाँ कुछ छोटी नदियों के नाम हें, कोरा मुण्डा, ओर मुण्डा, ताल्सि मुण्डा इत्यादि। इन्हें क्रमश: कोरा नदी, ओर नदी तथा तालिन नदी भी कहा जा सकता है। न केवल नदियों के लिए हिम माड़ियाँ की अपनी भाषा में अलग शब्द हैं, बल्कि पर्वतों को भी वे कोट, कोटि या पेप कहते हैं, जैसे धोबी कोटी, कंदर कोटी, क्या कोटी और राघोमेट। उपर्युक्त शब्दां की रचना से प्रतीत होता है कि संस्कृत का पर्वतार्थी शब्द 'कूट' हो न हो, मुड़िया भाषा की ही देन है। कंदर से कंदरा शब्द की उत्पत्तित भी प्रतीत होती है।