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मनरेगा : मजदूरों के हक में एक ऐतिहासिक कानून
 

मनरेगा देश के इतिहास में ऐसा पहला कानून बना है, जो सबसे गरीब तबके को उसके अधिकार की गारंटी देता है। सदियों से चली आ रही बन्धुआ मजदूरी और मजदूरों का दैनिक शोषण जैसी गंभीर विषमताओं को एक झटके में मनरेगा कानून ने खत्म किया है। इस कानून से मजदूर को एक ऐसा हथियार मिला है, जिसे वह सम्मान के साथ जीने के लिये उपयोग कर सकता है। इस कानून के जरिये ग्रामीण परिवारों के मजदूरों को साल में सौ दिन के काम की गारंटी दी गई है। सौ दिन के काम की गारंटी के पीछे यही मकसद रहा है कि यदि मजदूर को साल के सौ दिन के लिये काम की गारंटी दी जाये, तो वह साल भर अपने परिवार का पालन-पोषण सम्मान से कर सकता है। मनरेगा ने श्रमिक वर्ग का शोषण तो रोका ही है, साथ-साथ उन्हें मोलभाव करने लायक बनाया है। श्रमिक वर्ग अब मनरेगा की रोजाना की दर से ज्यादा दर पर ही अन्य जगह काम करने के लिए तैयार होते हैं, जबकि पूर्व में उसके पास काम के अवसर न होने के कारण ठेकेदारों और जमींदारों के हाथों शोषण का शिकार होना पड़ता था। जहां मजदूरी की दर ठेकेदारों और जमींदारों के द्वारा तय होती थी, परन्तु मनरेगा आने के बाद मजदूर स्वयं रोजाना की दर के लिए मोलभाव कर मजदूरी को तय करने लगा है। जो शोषण को रोकने में सबसे ज्यादा कारगर हथियार साबित हुआ है।एक लम्बे समय से देखने में आ रहा था कि ग्रामीण क्षेत्रों से होने वाले पलायन से शहरों में जनसंख्या का निरन्तर दबाव बढ़ रहा था। अस्थाई रूप से झुग्गी बस्तियों, गन्दी बस्तियों और शहरों की सघनता भी बढ़ रही थी। जिसके पीछे का सबसे बड़ा कारण ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीणों के पास काम के अभाव का होना था और यह काम का अभाव भी साल के पूरे दिनों का न होकर कुछ ही दिनों का रहता था, जिसके कारण कुछ समय के लिए ग्रामीण शहरों की ओर पलायन कर अस्थाई रूप से निवास करते थे तथा कुछ समय काम करने के उपरान्त वापस अपने गांव की ओर लौट जाते थे। सरकार की मंशा थी कि ऐसे लोगों को यदि गांव में ही काम उपलब्ध कराया जाये तो उनका पलायन शहरों की ओर से रुक सकता है। इसी के मद्देनजर रोजगार गारंटी कानून बनाया गया। इसका मूल उद्देश्य गांव में ही काम की मांग पर श्रम मूलक काम उपलब्ध कराना था, साथ ही ग्रामीण विकास के लिये आधारभूत संरचनायें तैयार करना भी। रोजगार गारंटी कानून लागू होने के बाद लोगों को गांव में ही काम की उपलब्धता होने से शहरों की ओर होने वाला पलायन काफी हद तक रुका है। ऐसे श्रमिकों को काम के साथ-साथ आजीविकामूलक संसाधनों का भी फायदा मिला है। समाज के कमजोर वर्ग के हितग्राहियों को व्यक्तिमूलक योजनाओं की बदौलत आजीविका के संसाधन बन जाने से अब वे स्वयं के काम में संलग्न होकर मजदूर की बजाय स्वयं मालिक बन गये हैं। मनरेगा से हितग्राहीमूलक कार्यों में ऐसे मजदूर वर्ग के यहां आजीविका के संसाधन तैयार कराये गये हैं, जिससे वे आत्मनिर्भर बन सकें। जिनमें सबसे ज्यादा कारगर साबित हुई है- कपिलधारा उपयोजना। इसके माध्यम से जरूरतमंद हितग्राहियों के यहां सिंचाई की सुविधा के लिये कुएं का निर्माण कराया गया है। मध्यप्रदेश में तीन लाख सत्तावन हजार से अधिक कपिलधारा कुओं का निर्माण कराया जा चुका है, जिससे इन हितग्राहियों को सिंचाई की सुविधा हो जाने से वे अब स्वयं की जमीन पर ही खेती करके मजदूर के बजाय सफल काश्तकार बन गये हैं। खेती से होने वाले उत्पादन और आमदनी बढ़ने से सामाजिक-आर्थिक रूप से संपन्न हुए हैं। हितग्राहीमूलक योजनाओं के अलावा सामुदायिक योजनाओं ने भी ग्रामीण क्षेत्र के आधारभूत ढांचे में आमूलचूल परिवर्तन लाया है फिर चाहे जल संरक्षण व जल संवर्द्धन के काम हों, वृक्षारोपण कार्य होंेे, आवागमन की सुविधा में सड़कों का निर्माण हो, या भवन निर्माण से संबंधित संरचनाएं हों, मनरेगा ने केवल आर्थिक ही नहीं बल्कि सामाजिक पहलू को भी ध्यान में रखा है। शांतिधाम निर्माण इसी का एक उदाहरण है। गांवों में शवदाह के लिए आवश्यक इंतजाम मनरेगा से कराए जा रहे हैं। प्रदेश में अभी तक 13 हजार से अधिक मुक्तिधाम/कब्रिस्तान का निर्माण कराया जा चुका है। इसके अलावा भी ग्राम पंचायत भवन, आंगनवाड़ी भवन, अनाज भण्डारण के लिए गोदाम का निर्माण, खेलकूद के लिए खेल-मैदानों का भी विकास मनरेगा से कराया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में आवागमन की सुविधा के लिए गांव के आंतरिक मार्गों में ‘‘पंच परमेश्वर योजना’’ के कन्वर्जेंस से सीमेंट कांक्रीट मार्ग, खेतों तक पहुंचने के लिए खेत सड़क संपर्क तथा छोटे-छोटे मजरे टोलों को मुख्य मार्गों तक जोड़ने के लिए सुदूर संपर्क सड़कें बनवायी गयी हैं। इन कामों से ग्रामीण लोगों को प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष लाभ हुआ है। ग्रामीणों को गांव में ही काम मिला है तथा उनकी जरूरत की सुविधाओं का विकास भी हुआ है।मनरेगा की हितग्राहीमूलक तथा सामुदायिक योजना का लाभ सीधे कमजोर तबकों को हुआ है, जिनके जॉबकार्ड बने हुये थे। येे अक्सर मजदूरी की तलाश में शहरों की ओर पलायन करते थे और काम के अभाव में बेगारी का सामना करते थे। ऐसे मजदूर वर्ग को काम की गारण्टी के साथ-साथ आजीविका के संसाधनों ने आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से सक्षम व संपन्न बना दिया है। अधिकांश श्रमिक वर्ग तो ऐसे हैं, जिन्होंने हितग्राही मूलक योजनाओं की बदौलत मजदूरी छोड़ दी है। अब वे स्वयं की आजीविका के साथ अन्य को काम देने लगे हैं।मध्यप्रदेश में योजना के प्रारंभ से मनरेगा अंतर्गत दो सौ करोड़ से अधिक दिनों का रोज़गार मजदूरों को उपलब्ध कराया जा चुका है। इन मजदूरों को मजदूरी के रूप में बीस हजार करोड़ रुपये से अधिक राशि का भुगतान किया जा चुका है। इस राशि ने ग्रामीण श्रमिकों की आर्थिक मजबूती में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इस कानून के मार्फत अब मजदूरों द्वारा काम की मांग करने पर उसे श्रममूलक काम उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है। गांव में ही रोज़गार के अवसर उपलब्ध कराकर तथा श्रम का वाजिब दाम तय कर इस कानून ने मजदूरों के हक में अभूतपूर्व व ऐतिहासिक कदम उठाया है।अनिल गुप्ता(लेखक - मध्यप्रदेश राज्य रोजगार गारंटी परिषद, भोपाल में मीडि