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नौसेना दिवस 4 दिसंबर पर विशेष
भारतीय नौसेना : समुद्री सरहद की अभेद्य दीवार
 

किसी भी लोकतान्त्रिक देश के अनवरत विकास और सतत् प्रगति के लिए मौजूदा दौर में सामाजिक और आर्थिक मापदंडों के साथ-साथ सुरक्षा का पहलू भी एक महत्वपूर्ण कारक है, क्योंकि सुरक्षित सीमाओं और मजबूत सरहदों के बिना प्रगति के पथ पर चलना आसान नहीं है। हमारे देश का सुरक्षा ढांचा भूत-वर्तमान और भविष्य की जरूरतों के मद्देनजर तैयार किया गया है, इसलिए इसमें जमीनी सरहद से लेकर हवा और पानी तक में सुरक्षा के लिए अलग-अलग अंगों को दायित्व सौंपे गए हैं। जिन्हें हम मोटे तौर पर थल सेना, वायु सेना और नौ सेना के नाम से पहचानते हैं।

देश के तीन तरफ फैली सामुद्रिक सीमाओं की सुरक्षा का दायित्व भारतीय नौसेना बखूबी संभाल रही है। दरअसल जमीन पर तो रेखाएँ खींचकर और बाड़ इत्यादि लगाकर सरहद की देखभाल की जा सकती है, लेकिन समुद्र में तो आसानी से कोई सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती, इसलिए हमारी नौसेना का काम सबसे चुनौतीपूर्ण माना जाता है। चूँकि दुनियाभर में समुद्री परिवहन और व्यापार में इजाफा हो रहा है और समुद्र अब आर्थिक गतिविधियों के प्रमुख माध्यम बन गये हैं, इसलिए देश के जलीय क्षेत्र और विशेष रूप से हिन्द महासागर क्षेत्र में हमारी नौसेना की जिम्मेदारियाँ पहले से कई गुना बढ़ गयी हैं।

क्यों मनाया जाता है नौसेना दिवस?

भारतीय नौसेना 4 दिसंबर को ही नौसेना दिवस क्यों मनाती है? इसका कारण यह है कि इसी दिन हमारी नौसेना ने 1971 की जंग में पाकिस्तानी नौसेना पर ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। भारतीय सेना ने 3 दिसंबर को पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में पाकिस्तानी सेना के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। वहीं, ‘ऑपरेशन ट्राइडेंट’ के तहत अगले दिन यानी 4 दिसंबर, 1971 को भारतीय नौसेना को पाकिस्तानी नौसेना की लगाम कसने का जिम्मा दिया गया और आदेश मिलते ही भारतीय नौसेना ने पकिस्तान के कराची नौसैनिक अड्डे पर हमला बोल दिया। इस युद्ध में पहली बार जहाज पर मार करने वाली एंटी शिप मिसाइल से हमला किया गया था। हमारी नौसेना ने इस जंग में पाकिस्तान के तीन जहाज नष्ट कर दिए थे।

नौसेना संगठन

भारतीय नौसेना को दुनिया की सशक्त और आधुनिक नौसेना के रूप में जाना जाता है। संख्या और शक्ति के लिहाज से अमेरिका, रूस और चीन की नौसेनायें ही हमारी नौसेना से आगे हैं। भारतीय नौसेना के प्रमुख को एडमिरल कहा जाता है। नौसेनाध्यक्ष के मातहत दिल्ली स्थित मुख्यालय स्तर पर सह नौसेनाध्यक्ष, उप सेनाध्यक्ष, कार्मिक प्रमुख, सामग्री प्रमुख जैसे अन्य पद होते हैं, जबकि ऑपरेशनल स्तर पर नौसेना की तीन प्रमुख कमान-पश्चिमी नौसेना कमान, पूर्वी नौसेना कमान और दक्षिणी नौसेना कमान हैं। इन कमानों के प्रमुख को फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ के पदनाम से जाना जाता है और इन सभी के पास अपने-अपने सामुद्रिक क्षेत्र की सुरक्षा की जिम्मेदारी होती है। इसके अलावा, नौसेना की अंडमान एवं निकोबार कमान जैसी स्वतंत्र कमान भी है।

सामरिक क्षमता

वैसे तो कोई भी सेना कभी भी अपनी सामरिक क्षमताओं की सही-सही जानकारी सुरक्षा कारणों से उपलब्ध नहीं कराती, फिर भी भारतीय नौसेना के सम्बन्ध में सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक हमारी नौसेना के पास बड़ी संख्या में निगरानी विमान, विमानवाहक पोत, परमाणु पनडुब्बी सहित कई  पनडुब्बियाँ, अनेक युद्धपोत तथा अन्य साजो-सामान हैं। इसके अलावा लगभग 10 हजार अधिकारियों के साथ 70 हजार नौसैनिकों का मजबूत बल किसी भी चुनौती से निपटने में सक्षम है।

समुद्री सुरक्षा को समर्पित है नौसेना

वैसे तो सभी नौसेनाओं की मुख्य पहचान उनका सैन्य चरित्र है, लेकिन भारतीय नौसेना युद्ध से लेकर मानवीय सहायता और आपदा राहत कार्यों से लेकर अन्य देशों की सहायता जैसे तमाम कार्यों को पूर्ण गरिमा के साथ अंजाम दे रही है।

भारत के राष्ट्रीय हितों और समुद्री सीमा की रक्षा करने के साथ-साथ हमारी नौसेना विदेशी नीति के कूटनीतिक उद्देश्यों के समर्थन में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने और संभावित प्रतिद्वंद्वियों से निपटने के लिए परस्पर मैत्री अभ्यासों को भी अंजाम देती है। नौसेना की राजनयिक भूमिका का बड़ा उद्देश्य राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के साथ-साथ समुद्री वातावरण को हमारी विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा उद्देश्यों के अनुरूप बनाना भी है। समुद्र में अपराध की बढ़ती घटनाओं ने नौसेना की भूमिका को और भी महत्वपूर्ण बना दिया है। वर्तमान में दुनिया की तमाम नौसेनाओं का एक बड़ा समय समुद्री अपराधों की रोकथाम में निकल जाता है।

मानवीय सहायता

युद्धक क्षमताओं के अलावा, भारतीय नौसेना विश्व भर में अपनी मानवीय सहायता के लिए भी जानी और सराही जाती है। दुनिया के किसी भी हिस्से में फंसे भारतीय लोगों को सहायता प्रदान करनी हो या फिर उन्हें वहाँ से बाहर निकालना हो या फिर किसी अन्य मामले में मानवीय सहायता की जरूरत हो, तो हमारी नौसेना सदैव तत्परता से जुट जाती है। पीड़ितों के बीच भोजन, पानी और राहत सामग्री के वितरण में नौसेना की सबसे सक्रिय भूमिका रहती है। देश में आई भीषण सुनामी से लेकर समंदर में मुसीबत में घिरे अन्य देशों के जहाजों को सुरक्षित ठिकाने तक पहुँचाने और जहाज में मौजूद बीमार लोगों को सकुशल अस्पताल पहुँचाने जैसे तमाम काम बेझिझक करने के कारण ही हमारी नौसेना को दुनिया भर में सराहा जाता है। इस प्रकार के ऑपरेशन के लिये रणनीतिक समझ-बूझ की आवश्यकता होती है और अपनी इन क्षमताओं को हमारी नौसेना ने कई बार साबित किया है। 

प्रमुख संयुक्त सैन्याभ्यास

नौसेना द्वारा अन्य देशों के साथ संयुक्त रूप से किए जाने वाले नौसैन्य अभ्यासों ने भी दुनिया के अन्य देशों के बीच भारतीय नौसेना की साख को नई गरिमा प्रदान की है। इसके परिणामस्वरूप कई देश ऐसे हैं, जिन्होंने हमारी नौसेना के साथ साझा अभ्यासों को नियमित रूप से अंजाम दिया है, जैसे अमेरिका और जापान के साथ मालाबार अभ्यास, फ्राँस के साथ ‘वरुण’, म्यांमार के साथ कोरपेट, सिंगापुर के साथ ‘सिम्बेक्स’ ब्रिटेन के साथ ‘कोंकण’ इत्यादि संयुक्त सैन्याभ्यास समय-समय पर आयोजित किये जाते हैं।

नाविक सागर परिक्रमा

‘नाविक सागर परिक्रमा’ भारतीय नौसेना का एक ऐसा अद्भुद नौ-परिभ्रमण अभियान है, जिसमें सभी सदस्य महिलायें हैं। यह दुनिया में अपनी तरह का पहला रोमांचक नौकायन अभियान है। यह अभियान 165 दिनों में दुनिया भर का चक्कर लगाकर अप्रैल 2018 में गोवा वापस लौटेगा।

स्वर्णिम इतिहास

किसी भी संगठन की ताकत उसका इतिहास और सुनहरी विरासत होती है। खासतौर पर सेनाओं के मामले में इतिहास से जोड़कर वर्तमान को समझने में आसानी होती है। भारतीय नौसेना के इतिहास की कड़ियों को जोड़ा जाए, तो 1612 से इसकी शुरूआत मानी जा सकती है, जब कैप्टन बेस्ट ने पुर्तगालियों को पराजित किया था। यह मुठभेड़ और फिर समुद्री डाकुओं द्वारा आये दिन खड़ी की जाने वाली मुसीबतों  की वजह से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी सूरत (गुजरात) के नजदीक स्वेली में एक छोटे से नौसैन्य बेड़े की स्थापना के लिए मजबूर हो गयी। 5 सितंबर 1612 में लड़ाकू जहाजों के पहले स्क्वाड्रन का निर्माण हुआ, जिसे उस समय  ईस्ट इंडिया कंपनी की समुद्री शाखा (East India Company Marine) कहा जाता था। यह कैम्बे की खाड़ी (Gulf of Cambay) और ताप्ती और नर्मदा नदी के मुहानों पर ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापार को सुरक्षा प्रदान करती थी। 1668 में इसे मुंबई में कंपनी के व्यापार की सुरक्षा का जिम्मा भी सौंप दिया गया। 1686 तक, कंपनी का वाणिज्य-व्यापार मुख्य रूप से बंबई में स्थानांतरित होने के साथ, इस बल का नाम बदलकर ‘बॉम्बे मरीन’ कर दिया गया।

1830 में, फिर बॉम्बे मरीन का नाम बदलकर ‘हर मेजेस्टी की भारतीय नौसेना’ (Her Majesty's Indian Marine) कर दिया गया। उस समय, बॉम्बे मरीन के दो डिवीजन थे, पहला कलकत्ता में पूर्वी डिवीजन, और दूसरा मुंबई में पश्चिमी डिवीजन। 1892 में इसे ‘रॉयल इंडियन मरीन’ नाम दे दिया गया था। रॉयल इंडियन मरीन ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1934 में, रॉयल इंडियन मरीन को न केवल ‘रॉयल भारतीय नौसेना’ का नया नाम मिला, बल्कि इसकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए इसे ‘राज ध्वज’ King's Colour) से सम्मानित भी किया गया। द्वितीय विश्व युद्ध में भी इसकी भूमिका को सर्वत्र सराहा गया।

भारत को स्वतंत्रता मिलने पर, रॉयल भारतीय नौसेना को भारत को सौंप दिया गया। उस वक्त इसके पास तटीय गश्ती के लिए 32 पुराने जहाज और लगभग  11,000 अधिकारी थे। वरिष्ठ अधिकारी रियर एडमिरल आईटीएस हाल को स्वतंत्र भारत का पहला कमांडर-इन-चीफ बनाया गया। 26 जनवरी 1950 को भारतीय गणतंत्र के गठन के साथ ही इसके नाम से ‘रॉयल’ शब्द को हटा दिया गया और यह रॉयल इंडियन नेवी से इंडियन नेवी (भारतीय नौसेना) हो गयी। गणतंत्र बनने के बाद भारतीय नौसेना के पहले कमांडर-इन-चीफ एडमिरल सर एडवर्ड पैरी थे। 22 अप्रैल 1958 को वाइस एडमिरल आर.डी. कटारी ने पहले भारतीय नौसेना प्रमुख के रूप में पद ग्रहण किया। इसके बाद, से भारतीय नौसेना लगातार उपलब्धियाँ हासिल करते हुए अपनी गौरव गाथा लिखती आ रही है और सफलताओं का यह सफर सतत् रूप से जारी है।