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‘केन-डू-स्पिरिट’ के साथ सकारात्मक बन

 ‘उड़ान’ स्तंभ के पिछले अंक में उल्लेखित लिनस पॉलिंग के जीवन से हमें कई प्रेरणाएँ मिलती हैं। उनके जीवन से हमें मुसीबतों के दौर में धैर्य रखने, अपनी क्षमता और योग्यता को विकसित करने, अपनी स्वाभाविक रुचियों से मेल खाने वाले लोगों को अपनी कम्पनी में शामिल करने, आनंद प्राप्त करने के लिए अपनी सर्वाधिक रुचि के क्षेत्र में कैरियर तलाशने, जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए आवश्यक ज्ञान को प्राप्त करने का हरसंभव प्रयास करने, मौलिक सोचने तथा अपने आइडिया को व्यवहारिक धरातल पर उतारने, मानवता के पक्ष में बेखौफ खड़े रहने, अंतर्संबंधों के महत्त्व को पहचानने, नैतिकता को नहीं छोड़ने, मानव जाति के हित के बारे में सदैव सोचने जैसी कई मार्गदर्शी और प्रेरणादायी टिप्स मिलती हैं। उन्होंने अपने अति कमजोर आर्थिक परिवेश से निकल कर दो-दो नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने तक का बेजोड़ सफर तय किया। यहाँ मुझे 2007 में चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार विजेता मारियो रेमबर्ग कैपेक्ची की याद आ रही है। वे 20वीं सदी के अशांत इतिहास के शिकार हुए, जिसके कारण उन्हें अपना बचपन एक यतीम के रूप में बिताना पड़ा। लेकिन, फिर जब मौका मिला, तो उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनके कार्यों ने चिकित्सा के क्षेत्र में क्रांति कर डाली तथा 21वीं सदी के विज्ञान को परिभाषित करने में मदद की। वर्तमान में वे उटाह विश्वविद्यालय के ‘स्कूल ऑफ मेडिसिन में ह्यूमन जेनेटिक्स एवं बॉयोलॉजी’ के विशिष्ट प्रोफेसर हैं।
आइये, ‘उड़ान’ के इस अंक में हम देखते हैं कि किस तरह मारियो कैपेक्ची हमारी प्रेरणा के स्रोत बनते हैं तथा मार्गदर्शन देते हैं, जो जीवन की नयी उड़ान के लिए हमें तैयार करने में सहायक सिद्ध होते हैं।
संघर्ष कर मजबूत बनें और जिंदगी से लड़ने की हिम्मत जुटाएँ
कैपेक्ची अपने माता-पिता की अकेली संतान थे। अतः उनका बचपन लाड़-प्यार और बहुत शानदार तरीके से बीता। वे मात्र 4 वर्ष के ही हुए थे कि ‘द्वितीय विश्वयुद्ध’ आरंभ हो गया। उनके पिता वायु-सैनिक थे, जो लापता हो गये थे। कैपेक्ची माँ के साथ रहने लगे, लेकिन तभी नाजियों की सरकार ने उनकी माँ को ‘डेथ कैम्प’ में भिजवा दिया। इससे वे बहुत कष्ट में आ गए। हालाँकि उनकी माँ को इसका पहले से ही अंदेशा था, क्योंकि वे सरकार विरोधी राजनैतिक विचारधारा से जुड़ी थीं। अतः उन्होंने दूरदृष्टि से अपनी सम्पत्ति बेचकर अपने बेटे की देखभाल की व्यवस्था की जिम्मेदारी एक किसान को सौंप दी थी। लेकिन किसान भी क्या करता, उसकी हालत भी अच्छी नहीं रही थी। कैपेक्ची की देखभाल के लिए दिया गया पैसा एक साल में ही खत्म हो गया। इससे साढ़े चार साल के कैपेक्ची लावारिस हो गए और करीब 4 साल तक कभी अकेले तो कभी अनाथ बच्चों के साथ इटली की सड़कों पर भटकते रहे। इस दौरान उन्हें समुचित और पूरा भोजन न मिलने से वे कुपोषण के शिकार हो गए। सौभाग्य से विश्वयुद्ध के बाद माँ कैम्प से निकल सकने में कामयाब हो गई। अब वह अपने बेटे को खोजने निकली, लेकिन, वह आसानी से नहीं मिल सका। उनकी माँ करीब एक साल तक बदहवास सी उन्हें खोजती रही। आखिरकार वह उसे तेज बुखार और कमजोरी की हालत में एक हॉस्पिटल में मिल गया। अब माँ की ममता और देखभाल से उन्हें स्वस्थ होने में देर नहीं लगी। लेकिन अभी अंधेरा छँटा नहीं था और भविष्य की राहें स्पष्ट नजर नहीं आ रही थीं।
कैपेक्ची की माँ अमरीका की थीं। उनके भाई अमरीका में रहते थे। अतः उन्हें आशा की किरण दिखाई दी। अपने भाई से सम्पर्क कर उन्होंने पैसे मँगवाये और वे दोनों अमरीका पहुँच गये। इस समय उन्होंने अपनी इटली की सड़कों पर बिताए संघर्ष के दिनों को याद किया जिसने उन्हें लगातार मजबूत बनाया और उन्हें जिंदगी से लड़ने की हिम्मत दी थी। अमरीका में आने के बाद कैपेक्ची को खुला आकाश और बेहतर वातावरण मिला, जहाँ वे कुछ करने और बनने के सपने देखने लगे, ताकि अतीत भूल कर जिंदगी की नई शुरुआत कर सकें। हममें से कई लोग ऐसे ही दौर से गुजरते हैं। ऐसे में हम निराशा और अवसाद में डूबने की बजाय संघर्ष करें। हम अपने हर उस अतीत को भूल जाएँ, जो हमें सपने देखने और आगे बढ़ने से रोकता है।
अपने श्याह अतीत को भूलें
सामान्यतः बुरे दिनों में हमारा मन अशांत रहता है तथा हमारी खराब स्थिति के लिए जिम्मेदार दुष्ट लोगों से बदला लेने की योजना बनाने लगते हैं। कैपेक्ची भी ऐसा कर सकते थे। वे बड़े होकर उन दुष्टों से मुकाबला करने के लिए कोई रास्ता चुनना पसंद कर सकते थे या राजनीति के क्षेत्र में जाने के बारे में सोच सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इस समय उन्होंने अपने श्याह अतीत को भूल कर द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान बनी ‘केन-डू-स्पिरिट’ को अपनाया तथा अपने को ‘सकारात्मक ऊर्जा’ से भरते हुए कुछ अलग और नया करने का संकल्प लिया। यह है उनसे मिलने वाली महत्त्वपूर्ण सीख। कई बार हम भी अपने जीवन में संकटों के दौर से गुजरते हैं और ऐसे हालातों से निपटने के बाद बदला लेने की नकारात्मक भावना से भर जाते हैं। लेकिन ऐसे निर्णायक समय में हम कैपेक्ची को याद करें, अपने श्याह अतीत को भूलें तथा सकारात्मक सोच के साथ निर्णय लें। 
लोगों के प्रेरणास्पद कामों को देखें
अमरीका में कैपेक्ची के सामने कई रास्ते थे। लेकिन, रास्ता चुनने में उन्हें विशेष दिक्कत नहीं आई। उनके मामा अमरीका में ‘भौतिकी’ के क्षेत्र में वैज्ञानिक के रूप में कार्य कर रहे थे। उन्होंने प्रिंस्टन विश्वविद्यालय में स्थापित किये गए पहले ‘इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप’ को विकसित करने में मदद की थी। अपने मामा से प्रभावित तथा प्रेरित होकर उन्होंने एम.आई.टी. में प्रवेश लिया. जहाँ उन्होंने अपने अध्ययन के लिए ‘भौतिकी’ और ‘गणित’ विषय चुने। अब उनका आगे का रास्ता स्पष्ट हो गया। इस तरह कैपेक्ची से हम बहुत ही महत्त्वपूर्ण मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं। कई बार हम भी निराशाजनक अतीत से गुजरते हैं। लेकिन, इससे निकलने के बाद जब हमारे सामने रास्ते स्पष्ट नजर नहीं आ रहे हों, तब हम अपने आस-पास रह रहे लोगों के प्रेरणास्पद कामों को देखें तथा फिर जिस किसी क्षेत्र में अपनी सहज रुचि नजर आती हो, उसमें अपने भविष्य की दिशा चुनें।
दूर की सोचें और अवसर को पहचाने
कैपेक्ची ने भौतिकी और गणित विषयों में अपने अध्ययन की शुरुआत की। लेकिन वे जीवन में कुछ नया और अनूठा करना चाहते थे। उस समय ‘डी.एन.ए.’ की खोज हो चुकी थी तथा इस क्षेत्र में कई नयी संभावनाओं के द्वार खुलते नजर आ रहे थे। ‘संभावना’ के इसी व्यापक और चमकदार परिदृश्य ने उन्हें ‘जीव विज्ञान’ की ओर आकृष्ट किया। अब कैपेक्ची ने ‘जीव विज्ञान’ के अंतर्गत ‘जेनेटिक्स’ में अनुसंधान करने का निश्चय किया। आगे चल कर उन्होंने अपनी दूर-दृष्टि का परिचय देते हुए ‘जीन टारगेटिंग टेक्नोलॉजी’ के क्षेत्र को चुना, जिसे कई वैज्ञानिकगण ‘बेदम’ मानते हुए खारिज कर चुके थे। लेकिन, उनके पास इस विषय में शोध के लिए कई आइडिया आ रहे थे, अतः उन्होंने इसी क्षेत्र में शोध करने का निश्चय किया। आगे चल कर उनका निर्णय सही साबित हुआ और उन्हें मिली सफलताओं ने उन्हें इस क्षेत्र का अग्रगामी क्रांतिकारी वैज्ञानिक बना दिया। इस तरह हम कैपेक्ची से अपने कैरियर चयन में दूर-दृष्टि रखने की सलाह पाते हैं। हम अपने कैरियर के किसी भी मोड़ पर हों, हमें प्रचुर संभावना वाले क्षेत्रों पर ध्यान देना चाहिए, ताकि हम कुछ नया व अनूठा कर सकें।  
अपनी बात रखने में कभी
संकोच न करें
एम.आई.टी. में रहते हुए कैपेक्ची ने ‘जीव विज्ञान’ विषय का कोई औपचारिक अध्ययन नहीं किया था। अतः इस विषय में अनुसंधान हेतु अवसर पाना उनके लिए एक समस्या थी। लेकिन उन्होंने ‘संभावित अवसरों’ को तलाशने का निश्चय किया। एम.आई.टी. के पास ही हार्वर्ड विश्व-विद्यालय था, जहाँ डी.एन.ए. की संरचना पर शोध करने वाले नोबेल पुरस्कार से सम्मानित वैज्ञानिक जेम्स वाटसन प्रोफेसर के रूप में कार्य कर रहे थे। संकल्पित कैपेक्ची उनके पास गये तथा चर्चा कर अपनी रुचि से उन्हें अवगत कराया। वाटसन उनसे प्रभावित हुए। चूँकि कैपेक्ची ने इस विषय का कोई औपचारिक अध्ययन नहीं किया था, अतः उन्होंने इसे वाटसन को बताते हुए बड़ी विनम्रता से पूछा कि क्या हार्वर्ड विश्वविद्यालय उन्हें ‘मॉलिक्यूलर बॉयोलॉजी’ विषय में काम करने के लिए स्वीकारेगा? तब कैपेक्ची की प्रतिभा से प्रभावित वाटसन ने उन्हें कहा कि ‘तुम बेकार में ही कहीं और जाने के बारे में सोच रहे हो।’ और, इस तरह उन्हें वाटसन के साथ जुड़ने और ‘आणविक जीव विज्ञान’ में काम करने का अवसर मिल गया। स्वयं वाटसन भौतिकविद् श्रोडिंगर की पुस्तक ‘व्हाट इज लाइफ?’ से प्रेरित होकर इस क्षेत्र में आये थे। इस तरह इस क्षेत्र में उनका काम कर सकना इसलिए संभव हो सका, क्योंकि उन्होंने अपनी बात और रुचि को वाटसन के सामने रखने में संकोच नहीं किया। कई बार हम स्वयं ही किसी काम के न हो सकने के बारे में सोचते हैं। हम कदम नहीं उठाते हैं और हमारी योजना धरी की धरी रह जाती है। ऐसे में कैपेक्ची से सीखते हैं कि जब भी कभी हम किसी असंभव प्रतीत हो रही योजना पर काम करना चाहते हों तो संबंधित मददगार व्यक्ति तक अपनी बात रखने में संकोच नहीं करना चाहिए। हो सकता है कि वह व्यक्ति प्रभावित हो जाए और कोई रास्ता सुझा दे।
अपने आइडिया पर भरोसा हो तो काम के लिए कम दबाव वाली जगह चुनें
हार्वर्ड में कैपेक्ची ने 6 साल काम किया, लेकिन यहाँ शोध-परिणामों को जल्दी लाने का बहुत ‘दबाव’ रहता था। उनका दिमाग ‘जीन टारगेटिंग’ को लेकर जिस आइडिया पर काम करने का तानाबाना बुन रहा था, उससे जुड़े प्रयोगों को करने और अपेक्षित परिणामों को आने में आठ-दस साल का समय लगना था। उनकी दृष्टि में यह कार्य धैर्य की मांग कर रहा था, जिसे हार्वर्ड में कर पाना संभव नहीं था, क्योंकि यहाँ उन प्रोजेक्ट पर ही काम करने की अनुमति मिलती थी, जिनके परिणाम जल्दी मिलते हों। अतः उन्होंने हार्वर्ड छोड़ने का निर्णय लिया। अपने प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए उन्हें ‘उटाह विश्वविद्यालय’ पसंद आया क्योंकि वहाँ ऐसे किसी भी महत्त्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर काम किया जा सकता था, जिसके परिणाम आने में भले ही दस साल का समय लगता हो। इस तरह बिना दबाव के काम करने तथा शांतिपूर्वक शोधकार्य में जुटने के लिए वे हार्वर्ड छोड़कर उटाह आ गए। इस तरह कैपेक्ची से हमें मार्गदर्शन मिलता है कि अगर हम अपने किसी विशेष आइडिया पर काम करना चाहते हैं, जिसमें धैर्य की जरूरत हो तथा अपेक्षित परिणाम आने में देरी होने की संभावना हो, तब हम उस तनाव-रहित ‘कार्य-स्थली’ को चुनें, जहाँ काम करने के लिए समय-सीमा का अनावश्यक दबाव न हो।
प्रोत्साहन न मिले तो
भी हिम्मत न हारें
उटाह विश्वविद्यालय में आने के बाद अपने आइडिया पर कैपेक्ची ने एक प्रोजेक्ट तैयार किया और इसे विज्ञान में शोध को बढ़ावा देने वाली संस्था ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ’ के पास फंडिंग के लिए विचारार्थ प्रस्तुत किया। परियोजना के मूल्यांकन के लिए नियुक्त वैज्ञानिकों का मानना था कि उनका आइडिया आगे बढ़ाने लायक नहीं हैं, क्योंकि इसकी सफलता शंकास्पद है। अतः संस्था ने निर्णायकों की अनुशंसा को मानते हुए उनके प्रोजेक्ट को अमान्य कर फंडिंग करने से इंकार कर दिया तथा उन्हें अपने दूसरे प्रोजेक्ट पर कार्य करने की सलाह दी।
लेकिन कैपेक्ची को अपने आइडिया की सफलता पर बहुत भरोसा था। उनका आइडिया जीन को पहचानना तथा फिर इसमें इच्छित परिवर्तन करने से संबंधित था। वे जानते थे कि किसी भी जंतु की कोशिका में पाये जाने वाले ‘जीन’ वास्तव में ‘डी.एन.ए.’ का हिस्सा होते हैं, जो ‘प्रोटीन’ के ‘कोड’ होते हैं। उन्हें यह भी मालूम था कि विभिन्न ‘जीन’ में वे ‘निर्देश’ कोडित होते हैं, जो उस प्राणी को उसकी अनुवांशिक अथवा चरित्रगत विशेषताएँ प्रदान करते हैं। अतः अगर जंतु की किसी जीन की ‘कोडिंग’ में कोई त्रुटि है तो उसके अनुसार कोई न कोई विसंगति या कमी उस प्राणी में नजर आने लगती है। यह किसी जन्मजात अनुवांशिक बीमारी के रूप में भी प्रकट हो जाती है। उनको इस बात का पक्का भरोसा था कि इस त्रुटिपूर्ण जीन को पहचाना जा सकता है तथा इसमें आवश्यक परिवर्तन किया जा सकता है। इसीलिए उन्होंने हिम्मत नहीं हारी तथा फंडिंग के अभाव में भी वे अपने निजी स्तर पर आरंभिक प्रयोग करते रहे। अंततः उन्हें सफलताएँ मिलने लगीं।
अब उन्होंने अपनी इन आरंभिक सफलताओं का जिक्र करते हुए उसी संस्था को अपना पूर्व प्रस्ताव पुनः भेजा। इस बार संस्था ने इसे फंडिंग के लिए सहर्ष स्वीकार कर लिया। अब परियोजना को आगे बढ़ाने में आने वाली उनकी दिक्कतें समाप्त हो गईं। अपने प्रोजेक्ट पर कार्य करते हुए उन्होंने बॉडी-प्लान को नियंत्रित करने वाली एक विशेष प्रकार की ‘हॉक्स जीन’ (क्तदृन् ढ़ड्ढदड्ढ) के समूह को पहचाना। यह जीन का एक ऐसा समूह है, जो किसी ‘नाटक’ के ‘डायरेक्टर’ की तरह होता है। जिस तरह ‘डायरेक्टर’ नाटक में काम तो नहीं करता है लेकिन ‘पात्रों’ को निर्देशित करता है कि किसे कब और क्या करना है, उसी तरह ‘हॉक्स जीन’ (जो प्रोटीन बनाने वाली जीन से अलग होती हैं), कोशिका को निर्देशित करने मात्र का कार्य करती है। इस तरह कैपेक्ची ने महसूस किया कि ‘हॉक्स जीन’ से किसी भी जीन को पहचान कर टारगेट किया जा सकता है तथा इसमें जैविक विधि द्वारा परिवर्तन कर जीन की पूर्व-निर्दिष्ट गतिविधियों को रोका जा सकता है। उत्साहित कैपेक्ची ने ऐसा करने की सफल विधि खोजी तथा चाही गयी जीन को प्राप्त करने के बाद उन्होंने ‘जेनेटिक इंजीनियरिंग’ और ‘इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन’ की सहायता से ‘नॉक-आउट चूहिया’ को प्रयोगशाला में पैदा कर सबको चौंका दिया। ऐसे जंतुओं को ‘नॉक-आउट जंतु’ कहा जाता है, जिसकी कोई एक टारगेटेड जीन संशोधित होती है। ‘नॉक-आउट जंतु’ उस संशोधित जीन के हिसाब से व्यवहार करता