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विज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के लिये प्रयत्नशील रहे प्रो. यशपाल

सुप्रसिद्ध भौतिकविद्, वैज्ञानिक समाज की स्थापना के प्रबल पक्षधर प्रो. यशपाल  जी का पच्चीस जुलाई को 91 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वे विज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के महत्वाकाँक्षी लक्ष्य के लिये सतत प्रयत्नशील रहे। प्रो. यशपाल वैज्ञानिक समाज की स्थापना के साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव के लिये भी जाने जाते हैं। पद्मविभूषण से सम्मानित प्रो. यशपाल की पहचान एक विलक्षण शिक्षक के रूप में भी थी। उनका विज्ञान को आसानी से समझाने का अपना निराला अन्दाज था। उन्होंने लम्बे समय तक दूरदर्शन पर लोकप्रिय विज्ञान शिक्षण और विज्ञान से जुड़ी जनसामान्य की जिज्ञासाओं के समाधान की श्रृंखला -‘टर्निंग प्वॉइण्ट’ का संचालन किया। देश में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिये उनकी अध्यक्षता में गठित ‘यशपाल समिति’ की अनुशंसाएँ आज भी शिक्षानीति बनाने वालों के लिये नीति निर्देशक दस्तावेज हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने याद किये उनके साथ बिताये क्षण
प्रो. यशपाल के महाप्रयाण पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अपने शोक संदेश में लिखा कि - ‘प्रोफेसर यशपाल के निधन से मैं दुखी हूँ, हमने एक वैज्ञानिक और शिक्षक खो दिया है, जिन्होंने भारतीय शिक्षा में अपना अमूल्य योगदान दिया। प्रधानमंत्री जी ने इस अवसर पर उनके साथ बिताये गये समय और उनसे बातचीत का जिक्र किया। उन्होंने वर्ष 2009 में अहमदाबाद में सम्पन्न राष्ट्रीय बाल विज्ञान काँग्रेस में उनसे बच्चों की शिक्षा, खासतौर पर विज्ञान की शिक्षा पर लम्बी चर्चा को भी याद किया।
अपनी मेधा के बल पर
बनाई पहचान
प्रो. यशपाल का जन्म 26 नवम्बर 1926 में तत्कालीन ब्रिटिश इंडिया में झाँग शहर में हुआ था, जो इस समय पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में है। झाँग से यशपाल हरियाणा के पाई-कैथल में आ गये थे। पंजाब विश्वविद्यालय से वर्ष 1949 में यशपाल ने भौतिकी में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की और वर्ष 1958 में मैसाच्युसेट्स इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी  से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। प्रो. यशपाल ने एक वैज्ञानिक, एक शिक्षाविद् और एक प्रतिभाशाली शिक्षक के रूप में अपनी अद्वितीय मेधा के बल पर पहचान बनाई। प्रो. यशपाल जी ने अपना कैरियर टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ फण्डामेन्टल रिसर्च से आरम्भ किया था। वे इस इन्स्टीट्यूट के आरम्भिक शोधदल के सदस्यों में से एक थे। प्रो. यशपाल अपने साथी वैज्ञानिकों के साथ टाटा इन्स्टीट्यूट में ‘कॉस्मिक किरणों’ पर शोघ कर रहे  थे। प्रो. यशपाल जी के शोध के प्रति गहरे रुझान की चर्चा करते हुए राजस्थान विश्वविद्यालय के प्रो. के.बी. गर्ग बताते हैं कि भौतिकी में शोध के सिलसिले में प्रो. यशपाल जी अक्सर हमारे विश्वविद्यालय में आया करते थे। प्रो. यशपाल जी ने हमारे संस्थान के भौतिक विज्ञान के विभागाध्यक्ष बी.के. सर्राफ के साथ मिलकर हम लोगों की एक टीम बनाई थी जो अनवरत शोध करती रहती थी।
विलक्षण सम्प्रेषणीयता के
धनी थे : प्रो. यशपाल
सम्प्रेषणीयता एक ऐसा गुण तो है जो  आपको एक अच्छा शिक्षक बनने में सहायता करता ही है, इसके साथ ही वो आपको अपने विषय के प्रतिपादन में भी सहायक होता है। प्रो. यशपाल जी में यह विलक्षण सम्प्रेषणीयता थी। जब दूरदर्शन पर विज्ञान जैसे अपेक्षाकृत दुरुह विषयों पर उन्होंने सुप्रसिद्ध अभिनेता गिरीश कर्नाड के साथ टीवी धारावाहिक- ‘टर्निंग प्वॉइण्ट’ प्रस्तुत किया, टीआरपी का तो पता नहीं, मगर उसको देखने और सराहना  करने वालों की संख्या लाखों में थी। यह उनकी सम्प्रेषणीयता का ही सुफल था कि वह विज्ञान पर किसी भी आयुवर्ग अथवा समझ के स्तर पर उसकी जिज्ञासाओं के समाधान में सक्षम होते थे।
शीर्षस्थ पदों का उनसे
मान बढ़ता था
पार्टिकल फिजिक्स के अध्येता प्रो. यशपाल यूँ तो एक वैज्ञानिक थे, मगर वे एक उत्कृष्ट शिक्षक और दूरदर्शी योजनाकार थे। नीति निर्धारण और योजनाओं को अंतिम रूप देने की जिम्मेदारी वाले अनेक पदों पर वे रहे। इतिहास इस बात का साक्षी है कि उनके उन शीर्षस्थ पदों पर आरूढ़ होने से उन शीर्षस्थ पदों का मान बढ़ा। वर्ष 1972 में भारत सरकार ने अंतरिक्ष विज्ञान का एक पृथक विभाग बनाया। उस विभाग को स्वतन्त्र रूप से अंतरिक्ष कार्यक्रम की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके लिये अहमदाबाद में एक स्पेस एप्लीकेशन सेन्टर बनाया गया। इसके बाद वर्ष 1973 में प्रो. यशपाल को स्पेस एप्लीकेशन सेन्टर का पहला डायरेक्टर बनाया गया। सरकारी स्तर पर और उससे इतर प्रो. यशपाल जी को प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ सौंपने का सिलसिला वर्ष 1981-82 में आरम्भ हुआ। जब बाह्य अंतरिक्ष के शान्तिपूर्ण उपयोग पर संयुक्त राष्ट्र संघ की दूसरी कान्फ्रेंस के लिये उन्हें महासचिव बनाया गया। वर्ष 1983-84 में उन्हें योजना आयोग का मुख्य सलाहकार नियुक्त किया गया। इसके कुछ समय बाद वर्ष 1986 में प्रो. यशपाल जी की शैक्षिक व्यवस्था में सुधार की सोच को पहचान कर भारत सरकार ने उन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का अध्यक्ष बनाया। उन्होंने यूजीसी के वित्तीय सहयोग से न्यूक्लियर साइन्स सेन्टर, नई दिल्ली (जो अब इन्टर यूनिवर्सिटी एक्सीलरेटर सेन्टर के नाम से जाना जाता है) की  तर्ज़ पर इन्टर यूनिवर्सिटी सेन्टर्स की स्थापना की पहल की थी। उनके इसी दृष्टिकोण से इन्टर यूनिवर्सिटी सेन्टर फॉर एस्ट्रॉनामी एण्ड एस्ट्रोफिजिक्स जैसे संस्थानों की स्थापना हुई। प्रो. यशपाल जी संयुक्त राष्ट्रसंघ के विकास के लिये विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी की साइन्टिफिक कौंसिल की  यूएन एडवाइजरी समिति के सदस्य भी रहे। इन्टरनेशनल सेन्टर फॉर थ्योरेटिकल फिजिक्स की एक्जीक्यूटिव कमेटी और यूनाइटेड नेशन्स यूनिवर्सिटी की कार्य परिषद के सदस्य होने का गौरव भी उन्हे प्राप्त हुआ। वे इन्टरनेशनल यूनियन ऑफ प्योर एण्ड एप्लाइड फिजिक्स और नेशनल साइन्स अकादमी के उपाध्यक्ष भी रहे। इसके साथ ही प्रो. यशपाल वर्ष 2007 से 2012 तक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे।
शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण
योगदान रहा उनका
एक वैज्ञानिक ही नहीं एक शिक्षाविद् के रूप में भी प्रो. यशपाल जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में प्रो. यशपाल जी ने होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम से जुड़कर विज्ञान शिक्षण के नवाचार के प्रति अपनी निष्ठा जताई थी। वर्ष 1993 में भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने प्रो. यशपाल जी की अध्यक्षता में स्कूली बच्चों पर शिक्षा के बोझ पर व्यापक विमर्श के लिये एक राष्ट्रीय सलाहकार समिति गठित की। ‘यशपाल समिति’ के रूप में विख्यात इस समिति ने अपनी रिपोर्ट - ‘लर्निंग विदाउट बर्डन’ सरकार को प्रस्तुत की थी, जो भारतीय शिक्षा जगत का एक गूढ़ (सेमीनल) दस्तावेज है। जब राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद ने राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने का निश्चय किया तो उन्हें स्टीयरिंग कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया और तब राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा समिति 2005 की कार्यकारी संक्षेपिका में यह कहा गया कि पाठ्यक्रम की समीक्षा - ‘लर्निंग विदाउट बर्डन’ रिपोर्ट के परिप्रेक्ष्य में की जाये।
प्रो. यशपाल जी की अध्यक्षता में ही वर्ष 2009 में केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने उच्च शिक्षा के लिये एक समिति का गठन भी किया। प्रो. यशपाल जी ने भारत में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सुधार पर अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। प्रतिवेदन में विश्वविद्यालय की गुणवत्ता के विचार पर जोर दिया गया और कई संरचनात्मक परिवर्तन भी सुझाये गये।
यशपाल कमेटी ने सुझाये थे उच्च शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक बदलाव
प्रो. यशपाल की अध्यक्षता में गठित कमेटी ने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक बदलाव के सुझाव दिये थे। यशपाल कमेटी के कुछ प्रमुख सुझाव थे :
   यूजीसी, एसीटीई और एआईसीटीई जैसे संगठनों को भंग कर - ‘राष्ट्रीय उच्च शिक्षा व अनुसंधान आयोग’ गठित किया जाये ।
   मेडिकल काउन्सिल ऑफ इंडिया और बार काउन्सिल ऑफ इंडिया सहित विभिन्न परिषदों की शक्तियों का नियमन किया जाये ।
   आई.आई.टी. और आई.आई.एम. जैसे संस्थानों को विश्वविद्यालय का दर्जा दिया जाये ।
   डीम्ड यूनिवर्सिटी के नाम पर कार्यरत संस्थाओं को नियंत्रण में रखा जाये।
  चुनिन्दा डेढ़ हजार महाविद्यालयों के स्तर को सुधारा जाये।
  देश में स्नातक स्तर की केवल एक परीक्षा हो तथा उसी के आधार पर प्रवेश हो।
   केवल व्यावसायिक हितसाधन के लिये चलाये जा रहे प्रबन्धन संस्थानों और इंजीनियरिंग कॉलेजों पर नियंत्रण हो।
   विश्वविद्यालयों की मान्यता के मानक तय हों, उसका कड़ाई से पालन किया जाए।
केन्द्र सरकार ने इन बदलावों पर विमर्श के लिये कुछ सेमीनार और टॉक शो का आयोजन भी किया था।
विज्ञान से जुड़ी जिज्ञासा के शमन का सुगम साधन था  टर्निंग प्वॉइण्ट
दूरदर्शन के नियमित प्रसारण में स्तरीय प्रसारण का वह स्वर्ण युग था, जब अर्थपूर्ण सीरियल्स के प्रसारण के जरिये दूरदर्शन सबसे अव्वल बना हुआ था। उसी समय विज्ञान से जुड़े विषयों पर प्रो. यशपाल एक ऐसा सीरियल लेकर आये जो बेहद लोकप्रिय हुआ। वर्ष 1991 में दूरदर्शन और वीयेथ (ज्न्र्ड्ढद्यण्) ने संयुक्त रूप से यह सीरियल तैयार किया था। सीरियल की पटकथा और निर्देशन नीलाभ कौल ने किया था। प्रो. यशपाल के साथ इस कार्यक्रम में कुछ बड़े कलाकार जैसे गिरीश कर्नाड, नसीरुद्दीन शाह, मल्लिका साराभाई और महेश भट्ट  भी  शामिल थे। चौबीस मिनट के प्रत्येक एपिसोड में चार से पाँच सेगमेन्ट होते थे। पर्यावरण और खगोल शास्त्र पर प्रस्तुति ‘मदर अर्थ’ शीर्षक से, अद्यतन आविष्कारों की जानकारी ‘माइलस्टोन’ शीर्षक से, स्वास्थ्य और चिकित्सा विज्ञान से सम्बन्धी जानकारी - ‘द बॉडी’ शीर्षक से, प्रोद्यौगिकी सम्बन्धी जानकारी - ‘टाईम टेबल ऑफ टेक्नालॉजी’ शीर्षक से, विज्ञान के संभाव्य अनुप्रयोगों पर ‘फ्यूचर वंच’, शीर्षक से और विज्ञान से जुड़े अनुसन्धानों पर ‘साइन्स अपडेट’ शीर्षक से प्रस्तुति होती थी। इस कार्यक्रम का सबसे लोकप्रिय हिस्सा होता था ‘क्वेश्चन  टाईम’ जिसमें  विज्ञान से जुड़े सवालों के उत्तर प्रो. यशपाल देते थे।
सम्मान और पुरस्कार
थ्   वर्ष 2013 में पद्मविभूषण।
थ्   नेशनल साइन्स अकादमी की फेलोशिप।
थ्   विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिये वर्ष 2000 में इन्दिरा गाँधी सम्मान।
थ्   विज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान के लिये वर्ष 2006 में मेघनाथ साहा सम्मान।
- राजा दुबे
(लेखक जनसम्पर्क विभाग के सेवानिवृत्त संयुक्त संचालक हैं)