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भारत छोड़ो आंदोलन के 75 साल
 

भारत छोड़ो आंदोलन को 75 वर्ष हो रहे हैं। 9 अगस्त 1942 को ‘करो या मरो’ के नारे के साथ ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा दिया गया था। यह वह अवसर था जब भारत की जनता पूरी तरह से आज़ादी के लिये जल उठी थी। यह भारत की स्वातन्त्रय चेतना की अंतिम परिणति थी। सन् 1857 के बाद देश की जनता अंग्रेजों के दमन और अत्याचारों के खिलाफ उठ खड़ी हुई थी। सभी में अंग्रेजों के प्रति विद्रोह भड़क उठा था। यह मान लिया गया था कि भारत के लिये ब्रिटिश शासन का अंत अति आवश्यक है। इसी के ऊपर देश की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की सफलता भी निर्भर दिखाई देती है। भारतीय इतिहास में इसे ‘अगस्त क्रांति’ के नाम से जाना जाता है।

8 अगस्त 1942 को ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पर बोलते हुये राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘‘मैं आपको एक छोटा-सा मंत्र देता हूँ। इसे आप अपने दिलों पर छाप लें। आपकी हर धड़कन से उसकी आवाज़ निकले। वह मंत्र है ‘करो या मरो’। या तो हम भारत को स्वतंत्र कर लेंगे, वरना इस कोशिश में जान दे देंगे। इस घड़ी से हर एक स्त्री-पुरुष अपने आप को आज़ाद समझे और ऐसा व्यवहार करे जैसे आप आज़ाद हैं और इस साम्राज्यवाद के बूटों के तले नहीं हैं।’’

महात्मा गांधी के आव्हान पर पूरा देश आज़ादी के लिये दीवाना हो गया था। गांधी जी का ‘करो या मरो’ का नारा एक तरह से युद्ध घोष बन गया था। सभी लोग आक्रोशित थे, किन्तु अंग्रेजों ने अपनी कुटिल चाल चलते हुए सभी बड़े नेताओं को प्रातःकाल ही गिरफ्तार कर लिया। ऐसी स्थिति में 9 अगस्त को अरुणा आसफ अली ने साहस का परिचय देते हुये राष्ट्रीय ध्वज को फहराकर भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत कर दी। सभी बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद जनता ने आंदोलन की कमान सम्भाली थी। पूरे देश में जनता में जोश था। नौजवान, महिलायें, सभी ‘इंकलाब-ज़िंदाबाद’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे लगा रहे थे। लोगों ने पुलिस और फौज का डटकर मुकाबला किया। जुलूस निकाले, लाठियां खाईं और सीने पर गोलियां भी खाईं। एक हजार से अधिक लोग शहीद हुये। हज़ारों लोगों को नज़रबंद किया गया। यह पूरा आंदोलन सबसे अधिक नौजवानों के हाथों में रहा।

मध्यप्रदेश में भी 1942 का यह आंदोलन नौजवानों के मन में एक जुनून पैदा कर गया था। उज्जैन में युवाओं ने बारिश की बाढ़ में क्षिप्रा नदी को पार करते हुये आंदोलनकारियों द्वारा नियत स्थान उज्जैन-असलौदा के बीच पहुंचकर रेल की पटरियां उखाड़ दी थीं और उनके पास में लाल झंडी लगा दी थी ताकि ट्रेन को इशारा मिल जाये और सभी यात्री सुरक्षित रहें। इसी तरह से पश्चिम निमाड़ के सेंधवा में भी नवयुवकों ने मोर्चा सम्भाला था। वहां सबके मन में था कि वह वहां के किले के ऊपर अपना तिरंगा झण्डा लहरायें। उन्होंने ऐसा ही किया। वहां श्री जमनालाल शाह जी, श्री नागेश्वर गुप्ता जी और श्री किशन काले जी अपने हाथ में तिरंगा लेकर ऊपर पहुंचे। उनके बाकी सभी साथी प्रभात फेरी लेकर आये और सभी ने मिलकर तिरंगा फहराया। इस तरह से मध्यप्रदेश में युवाओं ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

सिर्फ इतना ही नहीं, मण्डला में तो जगन्नाथ हाईस्कूल के छात्रों ने हड़ताल की और 15 अगस्त को जुलूस निकाला। जब पुलिस ने इस जुलूस को रोक लिया तो यह सभा में बदल गया। लोगों ने भाषण देना प्रारंभ किया तो उप जिलाधीश ने गोली चलवा दीं। वहां बलिदान होने के लिये लोगों में प्रतिस्पर्धा हो गई। एक निर्भीक उदयचंद नाम के नौजवान ने तो आगे बढ़कर सीने पर गोली खाई और वह वहीं पर खून से लथपथ होकर गिर गया। इसी तरह सागर के गढ़ाकोटा में तो नौजवान एक कदम आगे निकल गये। वहां पर छात्र जुलूस निकालकर थाने पहुंचे और वहां ‘झण्डा ऊँचा रहे हमारा’ और ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’ के गीत गाते हुये, बाबूलाल जैन ने पुलिस चौकी पर से यूनियन जैक उतार कर वहां तिरंगा झण्डा लहरा दिया। पुलिस ने उसे वहीं पर गोली मार दी।

मध्यप्रदेश की धरती पर नौजवानों के साहस के ऐसे अनेक किस्से हैं, जो उनकी देशभक्ति की मिसाल हमारे सामने रखते हैं। आज 75 वर्ष पूर्ण होने पर हम उनका स्मरण कर रहे हैं। हमें उनके विचारों और बलिदान से प्रेरणा लेनी है। उन्हें नमन करते हुये हमें प्रण करना है कि हम अपने देश के इन बलिदानियों का त्याग बेकार नहीं जाने देंगे। हम उनका सम्मान करते हुये अपने देश को आगे ले जायेंगे।