| اردو خبریں | संस्कृत समाचारः मुख्य पृष्ठ | संपर्क करें | साईट मेप
You Tube

डॉ. विक्रम साराभाई के जन्मदिवस पर विशेष
भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रमों के जनक थे डॉ. विक्रम साराभाई
 

आज इसरो अपने अचंभित करने वाले सफल अभियानों से पूरे विश्व में प्रशंसा पा रहा है। कई देश इसरो से अपने उपग्रह प्रक्षेपित कराना चाह रहे हैं। इन सब सफलताओं का श्रेय उस व्यक्ति को जाता है, जिसने इस संगठन की नींव रखी। उस बहुमुखी प्रतिभा का नाम है - डॉ. विक्रम साराभाई। 12 अगस्त को उनके जन्मदिवस पर उनकी स्मृति में यह संक्षिप्त लेख प्रस्तुत है, ताकि आज के युवा उनके प्रेरणीय जीवन का अनुकरण कर सकें।

डॉ. विक्रम अंबालाल साराभाई का जन्म 12 अगस्त, 1919 को गुजरात के अहमदाबाद में प्रतिष्ठित औद्योगिक परिवार में श्री अंबालाल तथा श्रीमती सरलादेवी के घर हुआ। बचपन से ही प्रतिभावान रहे साराभाई की दिलचस्पी विज्ञान में रही। अपनी अथक मेहनत से उन्होंने आगे चलकर भारतीय विज्ञान जगत को अनोखी उपलब्धियों से भर दिया। उन्होंने अपनी मैट्रिक की परीक्षा गुजरात कॉलेज, अहमदाबाद से की। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड चले गये। जहाँ कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, लंदन के सेन्ट जॉन कॉलेज में अध्ययन किया। इसके बाद जब वे भारत लौटे, तो उस समय द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत हो चुकी थी। भारत लौटकर उनका संपर्क भारत के महान वैज्ञानिक डॉ. सी.वी. रमन तथा डॉ. होमी जहाँगीर भाभा से हुआ। ऐसे प्रतिभावान वैज्ञानिकों का साथ पाकर उनके अंदर भी विज्ञान जगत में सकारात्मक करने की प्रवृत्ति बलवती हुई। उनकी रुचि कॉस्मिक किरणों के अध्ययन में जगी। इसी पर उन्होंने सतत् अनुसंधान कार्य किये। जिसके लिए 1947 में उन्हें कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएच.डी. की उपाधि से विभूषित किया गया।

वस्त्र उद्योग की समस्याओं का अंत करने का श्रेय साराभाई को

उनकी चाह भारत में रहकर विज्ञान कार्यों को बढ़ाना तथा लोगों की उनमें रुचि जगानी थी। इसके लिए 1947 में जब उनकी उम्र मात्र 28 वर्ष थी तब उन्होंने अहमदाबाद के भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला की स्थापना की। उन्होंने अपने कार्यों को पूरे मनोयोग से किया। देश में वस्त्र उद्योग की समस्याओं का अंत करने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है। उन्होंने ही अहमदाबाद में टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज रिसर्च एसोसिएशन की नींव रखी थी, जिससे कपड़ा उद्योग की तकनीकी समस्याओं का हल देश में ही करना संभव हो सका। 1961 में वे परमाणु ऊर्जा आयोग के सदस्य बने थे, जिसके बाद 1966 में डॉ. होमी जहाँगीर भाभा की मृत्यु के बाद परमाणु ऊर्जा संस्थानों का भार उन्हें ही सौंपा गया, जिसे उन्होंने अपने ज्ञान से नई दिशा प्रदान की।

साराभाई को भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक माना जाता है। उनके प्रयासों का ही सुफल रहा कि भारत 1975 में अपना प्रथम सैटेलाइट ‘आर्यभट्ट’ प्रमोचित और अंतरिक्ष में स्थापित कर पाया। आज भारतीय अंतरिक्ष इतिहास कई कामयाबियों से भरा हुआ है। अंतरिक्ष कार्यक्रमों के महत्व के बारे में साराभाई ने प्रारंभिक समय में कहा था कि ‘‘कुछ ऐसे लोग हैं, जो विकासशील राष्ट्रों में अंतरिक्ष गतिविधियों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हैं। हमारे सामने उद्देश्य की कोई अस्पष्टता नहीं है। हम चंद्रमा या ग्रहों की गंवेषणा या मानव सहित अंतरिक्ष उड़ानों में आर्थिक रूप से उन्नत राष्ट्रों के साथ प्रतिस्पर्धा की कोई कल्पना नहीं कर रहे हैं, लेकिन हम आश्वस्त हैं कि यदि हमें राष्ट्रीय स्तर पर और राष्ट्रों के समुदाय में कोई सार्थक भूमिका निभानी है, तो हमें मानव और समाज की वास्तविक समस्याओं के लिए उन्नत प्रौद्योगिकी को लागू करने में किसी से पीछे नहीं रहना चाहिए।’’

डॉ. साराभाई ने ही की थी इसरो की स्थापना : साराभाई द्वारा 1969 में स्थापित भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने अंतरिक्ष में कई उपलब्धियाँ अपने नाम दर्ज कीं। आज ऐसे कई रिकॉर्ड इसरो के नाम हैं, जो दुनिया में किसी और देश की अंतरिक्ष संस्था के नाम नहीं हैं। 104 उपग्रहों का एक साथ प्रमोचन, चन्द्रयान-1 और मंगलयान-1, ये वे मिशन हैं, जिसमें इसरो ने पहले प्रयास में ही सफलता प्राप्त कर ली, जबकि दूसरे देश की अंतरिक्ष संस्थाओं को या तो कई प्रयासों में सफलता मिली या उनके मिशन कामयाब ही नहीं हो पाए। इसरो ने विश्व अंतरिक्ष बाजार में आज अपनी अलग पहचान और जगह बना ली है। कई देश अपने उपग्रहों के प्रमोचन के लिए आज सिर्फ इसरो पर ही भरोसा जता रहे हैं। 

स्थापित संस्थान: साराभाई ने अपने जीवन में कई उत्कृष्ट कार्य किये। इसमें कई वैज्ञानिक संस्थानों की स्थापना प्रमुख है। जैसे -
1.  भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला, अहमदाबाद
2.  इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, अहमदाबाद
3.  विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र, तिरूवनंतपुरम
4.  वेरिएबल एनर्जी साइक्लोट्रॉन प्रोजेक्ट, कोलकाता
5.  यूरेनियम कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, बिहार
6.  सामुदायिक विज्ञान केन्द्र, अहमदाबाद
7.  भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन।
8.  स्पेस एप्लीकेशन सेंटर, अहमदाबाद।
9.  फास्टर ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (एफबीटीआर), कलपक्कम।
10.  इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ईसीआईएल), हैदराबाद।
11.  दर्पण एकेडमी फॉर परफॉर्मिंग ऑर्ट्स, अहमदाबाद।

सम्मान : डॉ. विक्रम साराभाई का जीवन उपलब्धियों से भरा रहा है। उन्होंने विज्ञान के प्रति अपने समर्पण से हर असंभव कार्य को संभव बना दिया। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर इस साधक को कई पुरस्कारों से नवाजा गया। इनमें प्रमुख हैं-

  • 1962 में डॉ. शांतिस्वरूप भटनागर मेमोरियल अवॉर्ड।
  • 1966 में पद्म भूषण।
  • 1972 पद्म विभूषण (मरणोपरांत)।
  • 1966 में इंटरनेशनल कौंसिल ऑफ साइंटिफिक यूनियन के सदस्य।
  • 1968 में संयुक्त राष्ट्र संघ में यूनेस्को के विज्ञान विभाग के अध्यक्ष।
  • 1970 में इंडियन जूलॉजिकल यूनियन के प्रमुख।
  • 1970 में वियना शांति इंटरनेशनल अणु मंच की चौदहवीं परिषद् के प्रमुख।
  • 1971 में संयुक्त राष्ट्रसंघ के ‘परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग’ विषय पर आयोजित चौथे सम्मेलन के उपाध्यक्ष।

साराभाई 30 दिसंबर 1971 को तिरूवनंतपुरम के रॉकेट लॉचिंग स्टेशन, थुंबा में निरीक्षण कार्य के लिए गये हुए थे जहाँ हार्टअटैक से उनका असामयिक निधन हो गया। उस समय उनकी उम्र मात्र 52 वर्ष थी। उन्होंने अपने जीवनकाल में 86 शोध पत्र लिखे और 40 संस्थानों की स्थापना की। उनके द्वारा प्रारंभ किये गये अंतरिक्ष अभियानों के कारण ही गाँवों में शिक्षा, सूचना और मनोरंजन से जुड़े कार्यक्रमों का प्रसारण संभव हो पाया। उनकी उपलब्धियाँ अविस्मरणीय हैं। इसलिये उन्हें इंडियन अकादमी ऑफ साइंसेज, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेस ऑफ इंडिया, फिजिकल सोसाइटी, लन्दन और कैम्ब्रिज फिलोसोफिकल सोसाइटी ने ‘‘फेलो’’ सम्मान से सम्मानित किया। भारतीय विज्ञान के इतिहास में साराभाई ने नव-प्रवर्तक, दूरदृष्टा, वैज्ञानिक और समाज सेवी के रूप में अपनी अमिट पहचान बनाई है, इसके लिए हम भारतीय सदैव उनके ऋणी रहेंगे।