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आधुनिक जीव-विज्ञान के पितामह थे डॉ. भार्गव
 

वैज्ञानिक बिरादरी में कुछ गिने-चुने वैज्ञानिक ही होते हैं, जो वैज्ञानिक शोध-कार्यों के साथ-साथ जनमानस में विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए कार्य करते हैं। डॉ. पुष्पमित्र भार्गव ऐसे ही विलक्षण वैज्ञानिकों में से एक थे। डॉ. पुष्पमित्र भार्गव का 1 अगस्त,  2017 को हैदराबाद में निधन हो गया।

जनमानस इन्हें डॉ. पीएम भार्गव के नाम से जानता था। भारत में आधुनिक जीव-विज्ञान के पितामह कहे जाने वाले वैज्ञानिक डॉ. पीएम भार्गव का निधन वैज्ञानिक जगत के लिए एक अपूर्णीय क्षति है।

डॉ. पीएम भार्गव का जन्म 22 फरवरी, 1928 को राजस्थान के अजमेर में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। इनके पिता रामचंद्र भार्गव जन-स्वास्थ्यकर्मी थे। जब वह 10 वर्ष के थे, तो उनका परिवार उत्तरप्रदेश आ गया। उनकी आरंभिक शिक्षा-दीक्षा उत्तरप्रदेश में हुई।

वर्ष 1944 में डॉ. पीएम भार्गव ने गणित, भौतिकी और रसायन-विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। लखनऊ विश्वविद्यालय से ही उन्होंने सन् 1946 में कार्बनिक रसायन में एम.एससी. की उपाधि प्राप्त की। यहीं से उन्होंने संश्लेषित रसायन विज्ञान में अपनी पीएच.डी. भी पूरी की। इसके बाद वह शैक्षणिक क्षेत्र में आ गए। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय और उस्मानिया विश्वविद्यालय में शिक्षण कार्य किया। 23 वर्ष की उम्र में ही उनके 14 शोधपत्र प्रकाशित हो चुके थे।

इसके बाद उन्होंने हैदराबाद की क्षेत्रीय अनुसंधान प्रयोगशाला में शोध कार्य आरंभ किया। इस संस्थान को आज भारतीय रासायनिक प्रौद्योगिकी संस्थान के नाम से जाना जाता है। इस संस्थान में उन्होंने 1953 तक कार्य किया। विज्ञान के प्रति उनकी रुचि ने उन्हें आगे शोध कार्य करने के लिये प्रेरित किया। जिसके चलते वर्ष 1953 में उन्हें पोस्ट-डॉक्टरेट फेलोशिप के लिए अमेरिका जाना पड़ा।

कैंसर की दवा के विकास में योगदान : अमेरिका में पीएम भार्गव ने कई वैज्ञानिक शोध संस्थानों में कार्य किया। यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कोसिंन में उन्हें वैश्विक स्तर की प्रयोगशाला में कार्य करने का अवसर मिला। यहाँ रहकर उन्होंने कैंसर की दवा के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 1956 से 1957 के दौरान उन्होंने ब्रिटेन के राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान संस्थान में ‘स्पेशल वेलकम ट्रस्ट फेलो’ के रूप में कार्य किया, जहाँ उनके जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ आया। यही वह समय था जब जीव-विज्ञान का क्षेत्र उन्हें आकर्षित करने लगा और उन्होंने जीव-विज्ञान में शोध कार्य आरंभ किया। आनुवांशिक अभियांत्रिकी, तंत्रिका-विज्ञान और जीवन की उत्पत्ति संबंधी वैज्ञानिक कार्यों में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा है। उनके अनेक शोधपत्र राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय शोध-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए।

सीसीएमबी के संस्थापक निदेशक : सन् 1958 में वे वापस भारत लौट आए और हैदराबाद स्थित वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद् की क्षेत्रीय अनुसंधान प्रयोगशाला में कार्य करना आरंभ किया। अपने शोध कार्यों से वैज्ञानिक जगत में ख्याति प्राप्त कर चुके डॉ. पीएम भार्गव का सबसे महत्वपूर्ण योगदान अभी उनकी प्रतीक्षा कर रहा था।

उन्होंने देश में जीवविज्ञान पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अनुसंधान संस्थान की स्थापना की आवश्यकता को रेखांकित किया था। उनके इस विचार को मूर्त रूप होने में अधिक समय नहीं लगा। 1 अप्रैल, 1977 का दिन था, जब उनका सपना पूरा हुआ और देश को जीवविज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान का एक नया केंद्र मिला।  इस संस्थान को नाम दिया गया ‘कोशिकीय एवं आण्विक जीव-विज्ञान केन्द्र’। जिसे ‘सेंटर फॉर सेल्यूलर एंड मोलिक्युलर बॉयोलॉजी’ यानी सीसीएमबी के नाम से भी जाना जाता है।

हैदराबाद में स्थित कोशिकीय एवं आण्विक जीव-विज्ञान केन्द्र की स्थापना में डॉ. पीएम भार्गव ने अग्रणी भूमिका निभाई। डॉ. पीएम भार्गव इस संस्थान के संस्थापक निदेशक थे। उनके समय में इस संस्थान की एक विशेषता यह थी, कि उस दौरान संस्थान की सभी प्रयोगशालाएँ चौबीसों घंटे खुली रहती थीं। शोधार्थी किसी भी समय प्रयोगशालाओं में अपना शोध कार्य कर सकते थे। लड़के हों या लड़कियाँ, प्रत्येक शोधार्थी को सभी उपकरणों के उपयोग की छूट थी। ऐसे वातावरण में यह संस्थान उत्कृष्ट शोध कार्यों के कारण पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हुआ। आज सीसीएमबी आधुनिक जीव-विज्ञान के विभिन्न  क्षेत्रों में शोध करने वाला एक प्रमुख अनुसंधान संगठन है। डॉ. भार्गव फरवरी, 1990 तक सीसीएमबी के निदेशक रहे।

यही वह संस्थान है, जिसे आज भारत में डीएनए फिंगर प्रिंटिंग के जनक संस्थान के रूप में भी जाना जाता है। इसी संस्थान में डीएनए फिंगर प्रिंटिंग तकनीक के उपयोग के द्वारा, कई बड़ी हत्याओं के पीछे के सच को सामने लाया जा सका।

जैव-प्रौद्योगिकी विभाग की स्थापना में अग्रणी भूमिका : डॉ. पीएम भार्गव ने भारत सरकार के जैव-प्रौद्योगिकी विभाग की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने ही विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग से स्वतंत्र, एक जैव-प्रौद्योगिकी विभाग की स्थापना का सुझाव दिया था। उनके इस सुझाव पर तत्कालीन सरकार ने एक समिति का गठन किया और इस प्रकार वर्ष 1986 में जैव-प्रौद्योगिकी विभाग अस्तित्व में आया।

प्रखर विज्ञान संचारक के रूप में डॉ. भार्गव : उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और लोगों को अंधविश्वासों से दूर रहने के लिए कई व्याख्यान दिए। उन्होंने विज्ञान पर आधारित कई लोकप्रिय लेख भी लिखे। विज्ञान संचार से संबंधित अनेक कार्यक्रमों को उनका मार्गदर्शन मिला। वर्ष 2005 सेे 2007 तक डॉ. पीएम भार्गव राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के उपाध्यक्ष भी रहे।

उन्होंने प्रसिद्ध परमाणु वैज्ञानिक राजा रमन्ना के साथ मिलकर सन् 1981 में ‘ए स्टेटमेंट ऑफ साइंटिफिक टेम्पर’ नामक दस्तावेज का लोकार्पण किया था। डॉ. पीएम भार्गव ने सतीश धवन जैसे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के साथ मिलकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रसार के लिए एक राष्ट्रीय संस्था की स्थापना पर भी जोर दिया था। हालाँकि वर्तमान में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत कार्यरत ‘विज्ञान प्रसार’ और वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद् के अंतर्गत कार्यरत राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं स्रोत संस्थान (निस्केयर) वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रचार-प्रसार में लगे हैं।

सरकारी नीतियों के समालोचक : डॉ. पीएम भार्गव सरकारी नीतियों के गुण-दोषों पर भी अक्सर प्रतिक्रिया व्यक्त करते रहते थे। भार्गव सरकारी नीतियों पर समालोचक के रूप में प्रसिद्ध रहे। वह भारत सरकार द्वारा गठित जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रेजल कमेटी में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नामित सदस्य भी रहे।

डॉ. भार्गव की कुछ प्रमुख पुस्तकें : डॉ. पीएम भार्गव ने अनेक पुस्तकें लिखीं। कुछ पुस्तकों का लेखन कार्य उन्होंने अन्य वैज्ञानिकों के साथ मिलकर भी किया। उनकी कुछ प्रमुख पुस्तकों में ‘द टू फेस ऑफ ब्यूटीः साइंस एंड आर्ट’ एवं ‘द सागा ऑफ इंडियन साइंस सिंस इंडिपेंडेंसः इन ए नटशैल’ आदि हैं। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास यानी एनबीटी द्वारा प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘एंजेल, डेविल एंड साइंसः ए कलेक्शन ऑफ आर्टिकल ऑफ साइंटिफिक टेम्पर’ को काफी सराहा गया। 

अनेक पुरस्कारों से सम्मानित : डॉ. भार्गव को अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था। कैंब्रिज की ‘क्लेयर हॉल लाइट फेलोशिप’ से भी उन्हें सम्मानित किया गया था। भारत सरकार द्वारा सन् 1986 में उन्हें पद्मभूषण सम्मान से सम्मानित किया गया था, लेकिन सन् 2015 में उन्होंने सरकार को यह सम्मान वापस लौटा दिया था। भारत के अलावा अनेक देशों ने उन्हें उनके वैज्ञानिक कार्यों के कारण सम्मानित किया। वर्ष 1998 में उन्हें फ्रांस के सर्वोच्च असैनिक सम्मान ‘लीजन डी ऑनर’ से भी सम्मानित किया गया था।