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भारत छोड़ो आंदोलन की 75वीं वर्षगांठ पर विशेष
तुम आये ही क्यों? पहला हवाई जहाज पकड़कर इंग्लैण्ड लौट जाओ
 

9 अगस्त, 1942 को शुरू हुआ ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन, वास्तव में भारतीय जनता का सामूहिक संघर्ष और विद्रोह था, इसलिए इतिहास में यह संघर्ष ‘अगस्त क्रान्ति’ के नाम से विख्यात है। सन् 1857 की महान क्रान्ति के बाद जनता अत्याचारी ब्रिटिश शासन को चुनौती देने के लिए और अपनी खोई हुई आज़ादी वापस पाने के लिए, पूरी शक्ति से उठ खड़ी हुई थी। यह बात अलग है कि सन् 1857 की तरह अगस्त क्रान्ति हथियारों के आधार पर नहीं लड़ी गयी थी। लेकिन यह भी सही है सन् 1920-21 के ‘असहयोग आन्दोलन’ तथा सन् 1930-32 के ‘सविनय अवज्ञा आन्दोलन’ की भांति पूरी तरह अहिंसक भी नहीं थी। अंग्रेजों की क्रूरता, अत्याचार तथा शोषण से त्रस्त जनता के हृदय में दावानल धधक रहा था और अवसर आने पर वह ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा।

पृष्ठभूमि : सन् 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो गया था। स्वाभाविक ही भारत में नेताओं की सहानुभूति और समर्थन उनके लिए था जो फासिस्टवाद और नाज़ीवाद के खिलाफ लड़ रहे थे। लेकिन यह समर्थन एकतरफा नहीं हो सकता था। अंग्रेज सरकार का यह कहना कि ‘‘युद्ध प्रजातांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए लड़ा जा रहा है’’, बेमानी था, यदि वे भारत की जनता को प्रजातांत्रिक अधिकार नहीं सौंपते हैं। ब्रिटेन के लड़ाई में शामिल होते ही, वायसराय लिनलिथगो ने भी भारत को युद्ध में शामिल करने की घोषणा कर दी। इसमें केन्द्रीय असेम्बली और आठ प्रातों की प्रांतीय सरकारों से भी राय नहीं ली गयी। लोकमत की इस अवहेलना से नाराज़ मंत्रिमंडलों ने इस्तीफा दे दिया।

त्रिपुरी कांग्रेस सम्मेलन के अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस ने अध्यक्षीय भाषण में कहा था कि 6 महीने की मोहलत देकर यदि भारतीयों को अधिकार न मिले तो ब्रिटिश सरकार के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया जाये। उधर मंत्रिमंडल के इस्तीफों के बाद दमनचक्र शुरू हो गया।

सरकार की हठधर्मी : उस समय ब्रिटेन का प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल था। वह कट्टर साम्राज्यवादी था। वह भारत को स्वाधीनता देने के एकदम खिलाफ था। उसने कहा, ‘‘मैंने ब्रिटिश साम्राज्य के विघटन के लिए शासन की बागडोर नहीं सम्भाली है।’’ लेकिन जब जापान ने मलेशिया, सिंगापुर, रंगून पर कब्जा कर लिया और लड़ाई भारत के दरवाजे तक आ पहुँची तो ब्रिटेन में खलबली मची। ब्रिटेन के समाचार पत्र तथा लेबर पार्टी के नेता चर्चिल की हठधर्मी से नाराज होकर इस्तीफा मांगने लगे।

क्रिप्स मिशन : तब मजबूरन ब्रिटिश सरकार ने 23 मार्च, 1942 को स्टेफर्ड क्रिप्स प्रस्ताव लेकर भारत आये। 20 दिनों तक चर्चा चलती रही। क्रिप्स के प्रस्ताव में भारतीय संघ के निर्माण, युद्ध के बाद विधान निमात्री सभा के गठन की बात तो थी परंतु साथ ही यह खुराफात भी कि कोई प्रांत चाहे तो भारतीय संघ में शामिल न हो। यानी भारत को खण्डित करने और पाकिस्तान बनाने का ख्याल अंग्रेजों के मन में पहले से ही था। स्वाभाविक है, भारतीयों ने क्रिप्स के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। गांधी जी भी क्रिप्स से मिले परन्तु उसके प्रस्ताव से इतने नाराज हुए कि  उससे कहा, ‘‘तुम आये ही क्यों? पहला हवाई जहाज पकड़ कर इग्लैंड लौट जाओ।’’ गांधी जी ने यह भी कहा कि यह प्रस्ताव ‘दिवालिया बैंक पर बाद की तारीख का चेक है।’

संघर्ष की ओर : क्रिप्स प्रस्ताव को अस्वीकार करने के बाद भारतीयों के सामने संघर्ष के सिवाय कोई रास्ता शेष नहीं बचा था। जब युद्ध में विकट परिस्थिति के बाद भी ब्रिटिश हुक्मरां भारत की बात सुनने को तैयार नहीं थे तो युद्ध समाप्ति के बाद उनसे क्या आशा की जा सकती थी। देश के समाने उम्मीद की किरण शेष नहीं बची थी। अतः 14 जुलाई, 1942 को कार्यकारिणी की बैठक आयोजित की गयी। समिति ने मांग की कि ‘‘भारत से ब्रिटिश राज का तुरंत अंत होना चाहिए।’’ भारत को संयुक्त प्रयत्न में बराबरी की भागीदारी के लिए देश को स्वतंत्र करने की मांग करते हुए समिति ने घोषणा की थी, यदि ब्रिटिश शासन को भारत से तुरंत नहीं हटाया गया तो गांधी जी के नेतृत्व में ‘सविनय अवज्ञा आन्दोलन’ शुरू कर दिया जायेगा।

15 जुलाई 1942 को गांधी जी ने विदेशी पत्रकारों से कहा था कि, ‘‘यदि सत्ता हस्तांतरण तुरंत नहीं किया गया तो  अहिंसात्मक आन्दोलन शुरु कर दिया जायेगा।’’ फिर 19 जुलाई को अपने आने वाले संग्राम का खाका खींचते हुए कहा, इस बार मैं मांगकर जेल नहीं जाने वाला हूँ।

अगस्त प्रस्ताव, भारत छोड़ो : बम्बई में अधिवेशन दिनांक 7 तथा 8 अगस्त, 1942 को ग्वालिया टैंक मैदान पर आयोजित हुआ। दिनांक 8 अगस्त की रात को पं. जवाहरलाल नेहरू ने प्रस्ताव पेश किया और इसका अनुमोदन किया सरदार वल्लभ भाई पटेल ने और अध्यक्ष थे मौलाना अबुल कलाम आज़ाद। प्रस्ताव में कहा गया था कि ‘‘भारत के लिए और मित्र राष्ट्रों के आदर्शों की पूर्ति के लिए भारत में ब्रिटिश शासन का तत्काल अन्त अत्यंत आवश्यक है। इसी के ऊपर युद्ध का भविष्य एवं स्वतंत्रता और लोकतंत्र की सफलता निर्भर है।’’

इस प्रकार गांधी जी के नेतृत्व में अंग्रेजों से मांग की गई कि वे भारत छोड़ें। इसीलिए सन् 1942 का अगस्त आन्दोलन ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। प्रस्ताव की भाषा को स्पष्ट करते हुए नेहरू जी ने कहा, ‘‘यह प्रस्ताव कोई धमकी नहीं है। यह तो एक निमंत्रण है। इसके द्वारा हमने बताया है कि हम क्या चाहते हैं। हमने तो सहयोग का हाथ आगे बढ़ाया है। पर इसके पीछे एक इशारा भी है कि यदि कुछ बाते नहीं हुई तो क्या परिणाम हो सकता है। यह स्वतंत्र भारत के सहयोग का दावतनामा है। किसी दूसरी शर्त पर हमारा सहयोग प्राप्त नहीं हो सकता। उसके अलावा हमारा प्रस्ताव केवल संघर्ष तथा लड़ाई का वादा करता है।’’

महात्मा गांधी ने मंच से ‘करो या मरो’ का नारा दिया। यह नारा जन-जन की आवाज बनके सारे भारत में कोटि-कोटि कंठों से गूँजा। ‘करो या मरो’ युद्ध घोष बन गया। उसकी चिन्गारी ने समूचे अखण्ड भारत को पेशावर से कन्याकुमारी तक तथा करांची से असम तक अपने आगोश में ले लिया।

कार्य समिति ने गांधी जी से आन्दोलन का नेतृत्व करने की प्रार्थना की। गांधी जी ने कहा ‘‘मैं स्वतंत्रता के लिए अब प्रतीक्षा नहीं कर सकता। मैं जिन्ना साहब के हृदय परिवर्तन की भी बाट नहीं देख सकता। यह मेरे जीवन का अंतिम संग्राम है।’’ इसके कुछ समय पहले एक साक्षात्कार में गांधीजी ने कहा था कि प्रस्ताव पास कर लेने से ही आन्दोलन शुरू नहीं हो जायेगा। उनकी मंशा वायसराय को पत्र भेजकर, उनके उत्तर की प्रतीक्षा करने की थी और अधिवेशन की समाप्ति के बाद उन्होंने अपने सचिव महादेव देसाई से कहा था कि, उन्हें नहीं लगता कि सरकार अभी उन्हें गिरफ्तार करेगी। वास्तव में उन्होंने अलग-अलग प्रांतों के नेताओं को, दूसरे दिन मिलने के लिए बुलाया था ताकि उन्हें आगे क्या और कैसे करना है, इसकी हिदायतें दी जा सकें।

नेताओं की गिरफ्तारी : शायद गांधी जी को ब्रिटिश सरकार की कुटिल चाल का अंदाजा नहीं था। जैसे ही अखिल भारतीय कमेटी ने प्रस्ताव पास किया, भारत सरकार के गृह विभाग ने गवर्नरों, चीफ कमिश्नरों, रियासतों के पॉलिटिकल एजेन्टों को तार से गुप्त संदेश भेज दिया था कि अ.भा. कांग्रेस कमेटी, और प्रांतीय कमेटियों को तत्काल गैर-कानूनी घोषित कर उनके दफ्तर और धनराशि कब्जे में ले लिए जायें। उनको यह भी आदेश था कि जिस पर भी आन्दोलन में भाग लेने का अंदेशा हो, उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाये।

बम्बई (मुंबई) में भारत के सभी बड़े नेता प्रातःकाल ही गिरफ्तार कर लिए गये। गांधी जी को पूना (पुणे) के आगा खां महल में रखा गया। जवाहर लाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद आचार्य जे.बी. कृपलानी, आसफ अली, गोविन्द वल्लभ पंत और अन्य नेताओं को रेल से अहमदनगर किला-जेल भेज दिया गया। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, जो किसी कारणवश अधिवेशन में नहीं पहुँच पाये थे, को पटना जेल में बंद कर दिया गया। प्रसिद्ध स्वाधीनता सेनानी अरुणा आसफ अली ने अपने संस्मरण में लिखा है कि जब उनके पति आसिफ अली को गिरफ्तार करने पुलिस आयी तो उन्होंने पूछा, ‘‘मेरे बारे में क्या’’ पुलिस सार्जेन्ट ने कहा, ‘‘मैडम आपके नाम वारण्ट नहीं है।’’ वे निवेदन करके पुलिस की गाड़ी में स्टेशन तक गयीं। प्लेटफार्म पर उन्होंने मौलाना आज़ाद को एक डिब्बे की खिड़की के पास बैठे देखा और उनसे बात की।

मौलाना आज़ाद, 9 अगस्त को सुबह 8 बजे ग्वालिया टैंक मैदान पर, तिरंगा फहराने वाले थे। मौलाना से जानकर, अरुणा आसफ अली ने तत्काल फैसला लिया कि, ‘‘मैं वहाँ जाऊँगी।’’ उनका यह निर्णय था कि मौलाना साहब का अधूरा काम वे पूरा करेंगी, उनके स्वर्णिम क्रांतिकारी जीवन का प्रारंभ था। वे लिखती हैं कि, ‘‘भूलाभाई देसाई के पुत्र धीरुभाई स्टेशन आये थे और वे मुझे मैदान ले गये। सभा गैर-कानूनी घोषित हो गयी। एक  अंग्रेज सार्जेंट ने भीड़ को दो मिनट में चले जाने को कहा। मैं तेजी से मंच पर चढ़ गयी, लोगों को नेताओं की गिरफ्तारी की सूचना दी और रस्सी खींचकर झण्डा फहरा दिया। जैसे ही झण्डा फहराया, पुलिस ने आँसू गैस के गोले छोड़े। स्त्री-पुरुष आँखों से आँसू बहाते हुए यहाँ-वहाँ भागने लगे। उस सुबह के अनुभव से मैंने निर्णय लिया कि सत्याग्रह करके मैं दब्बू तरीके से जेल नहीं जाऊँगी।’’

गिरफ्तारियों का दौर : अरुणा आसफ अली को, दिलेरी के साथ 9 अगस्त को राष्ट्रीय ध्वज को फहराकर भारत-छोड़ो आन्दोलन की शुरुआत करने का श्रेय प्राप्त है। नेताओं की गिरफ्तारी सारे देश में, महानगरों में, शहरों में, कस्बों में 9 अगस्त, 1942 की सुबह ही कर ली गयी थी। कमेटियाँ गैर-कानूनी घोषित कर दी गयीं और कार्यालय सील कर दिये गये। यद्यपि सब प्रमुख नेता गिरफ्तार कर लिए गये थे, फिर भी जनता ने सरकार की चुनौती स्वीकार कर ली थी। सारा  देश युद्ध-स्थल में तब्दील हो गया। हर एक जगह जुलूस निकलते, जोशों-खरोश से ‘इंकलाब जिंदाबाद’, ‘ब्रिटिश-शासन मुर्दाबाद’, ‘भारत माता की जय’ आदि नारे लगाते हुए देश सेवक सड़कों पर निकलते लाठियाँ खाते, सीने पर गोली खाते, खून से लहू-लुहान होते, साहस से पुलिस और फौज का सामना करते आगे बढ़ते जाते।

नेताओं की गिरफ्तारी और पुलिस के क्रूर व्यवहार ने लोगों में क्रोध भर दिया। परिणाम स्वरूप, लोगों ने आवेश में आकर तोड़-फोड़ शुरू कर दी। टेलीफोन और बिजली के तार काटे गये, रेलवे लाइनों और इंजनों को तोड़ा गया, स्टेशनों और पोस्ट ऑफिसों को आग के हवाले कर दिया गया। सरकार ने आंकड़े जारी किये कि 12,000 स्थानों पर टेलीफोन के तार काटे गये, 954 स्टेशनों को क्षति पहुँची, एक हजार डाकखानों में तोड़-फोड़ की गयी।

प्रमुख घटनाएँ : सरकारी अनुमान के अनुसार 1,028 लोग गोलियों से शहीद हुए, 3,200 पुलिस की गोलियों से घायल हुए, कुल 528 स्थानों पर गोलियाँ दागी गयीं, 80,000 गिरफ्तार किये गये और 18,000 लोग नजरबंद किये गये। 80 बार फौजें बुलाई गयीं, हवाई जहाज से छः शहरों पर बमबारी की गयी। पुलिस अत्याचारों की कोई सीमा नहीं थी। नेहरू जी ने ‘भारत एक खोज’ में जानकारी दी है कि गाँव के लोगों को लाठियों से पीटा गया। फौज ने बंगाल के तामलुक में 193 कैम्प और मकान जला दिये। ब्रिटिश विदेश मंत्री ने वक्तव्य दिया कि समूचे गाँवों पर सामूहिक जुर्माना लगाकर 90 लाख रुपयों की राशि वसूली गयी।

‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन की 75वीं वर्षगांठ पर कुछ प्रमुख क्रांतिकारी घटनाओं का स्मरण आवश्यक है।

भूमिगत आन्दोलन : अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष जारी रखने और देश की आज़ादी के लिए अनेक नेता गुप्त रूप से, भूमिगत रहकर कार्यशील रहे। इनमें अरुणा जी, डॉ. राम मनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, अशोक मेहता आदि प्रमुख हैं। यों तो हर जिले की यही तस्वीर थी। अरुणा आसफअली ने तो तीन साल तक दिल्ली, बम्बई, कलकत्ता और जाने कहाँ-कहाँ घूमकर, पुलिस की पकड़ से बचकर संघर्ष को जिन्दा रखा। परंतु उनका प्रमुख केन्द्र दिल्ली ही था। वे भूमिगत जीवन के दौरान भाभीजी, कुसम देवी, विद्यावती जी और अन्य नामों से विचरण करती रहीं। भूमिगत रहकर ही वे गांधी जी से मिलीं और मौलाना आज़ाद की रिहायी के बाद कलकत्ते में मिलीं।

दिल्ली : नेताओं की गिरफ्तारी की जानकारी लाउड स्पीकरों से मिलते ही दिल्ली में उत्तेजना फैल गयी। पूरे शहर में हड़ताल मनायी गयी। एक भी दुकान नहीं खुली। क्वीन्स गार्डन में आम सभा आयोजित की गयी, जिसमें शासकीय कर्मचारी भी बड़ी संख्या में शामिल हुए। अगले दिन 10 अगस्त, 1942 को हड़ताल जारी रही। बड़ा जुलूस निकाला गया। कनॉट प्लेस में खंभों की बिजली काट डाली और पार्क में राष्ट्रीय झण्डा फहरा दिया गया। 11 को टाऊन हॉल आग के हवाले कर दिया गया। सरकार ने कहा कि दिल्ली की उथल-पुथल के लिए अरुणा आसफ अली जिम्मेदार हैं।

बलिया स्वतंत्र : इस संघर्ष में बलिया की घटनाओं ने संघर्ष करती जनता में नया उत्साह भर दिया। छात्रों ने 11 अगस्त को बड़ा जुलूस निकाला। भीषण लाठीचार्ज में अनके जख्मी हुए। उसी रात 40 छात्र गिरफ्तार कर लिए गये। 12 और 13 अगस्त को शहर के सारे तार काट दिये गये, स्टेशन जलाए गये और सरकारी सम्पत्ति को भारी क्षति पहुँचायी। 15 अगस्त को सरकारी इमारतों पर हमला किया गया और दफ्तरों को सरकारी कब्जे से छुड़ा लिया गया। 16 को पुलिस की गोलीबारी में बलिया में 9 लोग शहीद हो गये। जिले के अनेक स्थानों पर खजाने लूट लिए गये, गोली चालन में अनेक शहीद हुए। सारे बलिया जिले पर जनता का कब्जा हो गया। 19 अगस्त को बाजे-गाजे के साथ, बलिया को जनता ने स्वतंत्र घोषित कर दिया। लेकिन तीन दिन ही बलिया स्वतंत्रता की सांस ले सका। 22 को फौज ने शहर को अपने कब्जे में ले लिया।

मेदिनीपुर : बंगाल के मेदिनीपुर में भी जनता ने थानों पर कब्जा कर लिया। पुलिस वालों से हथियार छीन लिए, स्वतंत्रता सेनानी जिले भर में फैल गये, रास्ते बंद कर दिये, तार काट दिये गये। जिले की बागडोर बागियों ने अपने हाथ में ले ली।

मध्यप्रदेश : देश के अन्य क्षेत्रों की तरह मध्यप्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में भारत छोड़ो आन्दोलन का बवंडर उठा। ब्रिटिश शासित महाकौशल क्षेत्र, जिसमें तब वर्तमान छत्तीसगढ़ भी शामिल था, आन्दोलन के प्रमुख क्षेत्र थे। परन्तु मध्यभारत, विन्ध्यप्रदेश तथा भोपाल जो रियासती क्षेत्र थे, यहाँ भी सन् 1942 में तूफान उठा था।

सन् 1942 की अगस्त क्रान्ति आज़ादी के लिए अंतिम संग्राम था। इसीलिए जनता अपने ध्येय की पूर्ति के लिए सब कुछ बलिदान करने के लिए तैयार थी।

राष्ट्रनेताओं को गर्व : महात्मा गाँधी ने कहा, ‘‘मैं कांग्रेस के विद्रोह को स्थगित नहीं कर सकता। यह पूरी तरह अहिंसात्मक है। मुझे इस पर गर्व है।’’ सरदार पटेल ने कहा, ‘‘भारत के ब्रिटिश राज के इतिहास में ऐसा विप्लव कभी नहीं हुआ जैसा पिछले तीन वर्षों में हुआ। जिस उत्साह से लोगों ने कार्य किया उस पर हमें गर्व है।’’ उन्होंने तो यह भी कहा, ‘‘भारत अपनी ‘भारत छोड़ो’ मांग पर तो अटल है ही, ‘उसे एशिया छोड़ो’ की मांग करनी पड़ेगी।’’

इतिहासकार डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा ‘‘अगस्त क्रान्ति अत्याचार और दमन के विरुद्ध भारतीय जनता का विद्रोह था। उसकी तुलना फ्रांसीसी क्रांति में बास्तील दुर्ग के पतन या सोवियत रूस की अक्टूबर क्रान्ति से की जा सकती है। यह क्रान्ति जनता में उत्पन्न नवीन विश्वास तथा गरिमा की सूचक थी।’’