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वन्यप्राणी संरक्षण सप्ताह
वन्यप्राणी की हत्या से बिगड़ रहा प्रकृति का संतुलन
 

वैश्विक समुदाय में प्राणी मात्र की जीविता सहअस्तित्व की अवधारणा पर टिकी है। विश्व में मानव समुदाय और अन्य जीव यथा वन्यजीव, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और दीगर सभी जीव नैसर्गिक कालक्रम एवं जीवन यात्रा के गठजोड़ से जुड़े हैं, वे सभी अन्योन्याश्रित हैं और यही पारस्परिक निर्भरता जैव-विविधता के रूप में संस्थापित होती है। इसी प्राकृतिक व्यवस्था से मानवमात्र और जैविक संसार का अस्तित्व है और किसी भी प्राणी के संख्याबल की कमी इस संतुलन को ध्वस्त कर पर्यावरणीय विध्वंस का कारण बनती है। मौजूदा समय में इस विध्वंस से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं -‘वन्यजीव’।

तेजी से घट रहें है वन्यजीव

आँकड़े बताते हैं कि 1970 से अब तक वन्यजीवों की आबादी में 60ऽ की कमी आई है। ‘वर्ल्ड वाइल्डलाईफ फण्ड’  की रिपोर्ट बताती है कि मानवीय गतिविधियों के कारण ही वन्यजीव की आबादी में कमी आ रही है। जूलॉजिकल सोसायटी ऑफ लंदन के साथ मिलकर डब्ल्यू. डब्ल्यू. एफ. ने इसी दशक में एक अध्ययन करवाया था, जिससे यह पता चलता है कि वर्ष 1970 से 2012 के मध्य 42 सालों में वन्यजीवों की संख्या में 58 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है, जो चिन्ताजनक है। अध्ययन में यह भी बताया गया है कि वन्यजीवों के नष्ट होने का यह क्रम जारी रहा तो वर्ष 2020 तक यह गिरावट 67 प्रतिशत तक पहुँच जायेगी।

अच्छी बात यह है कि हमने उम्मीद नहीं छोड़ी है

इस अध्ययन में मटर के दाने के आकार के मेंढक से लेकर सौ फीट लम्बी व्हेल मछलियों तक 3,700 प्रजातियों के कुल 14,200 जीवों को शामिल किया गया था। अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया कि विश्व में वन्यजीव अप्रत्याशित रूप से घट रहे हैं। इंसान की बढ़ती आबादी वन्य जीव के लिये सबसे बड़ा खतरा है। शहर बसाने और कृषि का रकबा बढ़ाने के लिये हम तेज रफ्तार से जंगल काट रहे हैं। इनके अलावा पर्यावरण प्रदूषण, वन्यजीवों का अवैध शिकार और जलवायु परिवर्तन भी वे कारण हैं, जिससे वन्यजीवों की संख्या तेजी से घट रही है। इस रिपोर्ट में यह आशाजनक टिप्पणी भी की गई है कि वन्यप्राणियों को लेकर यह जो चलन और स्थिति है उसे पलटा जा सकता है। जूलॉजिकल सोसायटी ऑफ लंदन में विज्ञान निदेशक प्रोफेसर केन नोरिस कहते हैं कि - ‘जरूरी बात यह है कि अभी वन्यजीवों की आबादी घट रही है, खत्म नहीं हुई है’। इस बयान में अच्छी बात यह है कि हमने वन्यप्राणियों के संरक्षण की उम्मीद अभी नहीं छोड़ी है।

वन्यप्राणी संरक्षण की भारत की पहल रंग लाई

औपनिवेशिक शासन काल में देश में वन्यप्राणियों के संरक्षण पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता था, बल्कि अधिकांश राजा-महाराजा और ब्रिटिश राज के सैन्य एवं प्रशासनिक अधिकारी शौकिया तौर पर वन्यप्राणियों का शिकार करते थे और इसीलिये उस समय वन्यप्राणी संरक्षण तत्कालीन सरकार की प्राथमिकता में शुमार मुद्दा नहीं होता था। आज़ादी के बाद से वनों और वन्यप्राणियों के संरक्षण पर विमर्श का सिलसिला आरम्भ हुआ। भारत सरकार ने वन्यजीव संरक्षण पर गंभीर विमर्श किया और वन्यजीव संरक्षण के लक्ष्य को ध्यान में रखकर 07 जुलाई 1955 को पहला -‘वन्यप्राणी दिवस’ मनाया और वन्य जीवन को प्रकृति की अमूल्य देन करार देकर, भविष्य में वन्यप्राणियों के जीवन को निरापद बनाने के लिये देश में वर्ष 1956 से प्रतिवर्ष 02 अक्टूबर से 08 अक्टूबर तक वन्यप्राणी संरक्षण सप्ताह मनाने का संकल्प लिया गया, जो तब से अब तक मनाया जा रहा है। समूचे देश में वन्यप्राणी संरक्षण कार्यक्रम की जरूरत को पूरा करने के लिये देश और प्रदेश में एक संस्थागत ढाँचे की रचना भी की गई है।

देश में वन्यप्राणी संरक्षण सप्ताह मनाये जाने के उद्देश्य

1. प्रत्येक समुदाय और परिवार को प्रकृति से जोड़ना, जिससे वे वन्यप्राणियों का महत्व इस परिप्रेक्ष्य में समझ सकें ।

2. प्रत्येक व्यक्ति के मन में वन्यप्राणियों के संरक्षण की भावना पैदा करना ।

3. वन्यजीव और पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति जनसामान्य को जागृत करना ।

इस सप्ताह के आयोजन का समग्र उद्देश्य यह भी होता है कि हम वन्यप्राणियों के साथ-साथ अन्य पशु-पक्षियों, पौधों और पर्यावरण के संरक्षण का भी संकल्प लें। इसी दिशा में केन्द्र सरकार ने कुछ वनक्षेत्रों को वन्यप्राणी अभ्यारण और राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया है। सरकार ने वन्यप्राणी संरक्षण कानून बनाकर वन्यप्राणियों और पक्षियों के शिकार को भी कानूनन रोक लगा दिया है। कानून का उल्लंघन होने पर कड़ी सजा के प्रावधान भी किये गये हैं। प्रकृति के अनुसार मानव, पर्यावरण और वन्यजीव एक दूसरे से किसी न किसी रूप में जुड़े हैं अतः वन्यजीव की रक्षा कर हम अपने अस्तित्व और प्रकृति की रक्षा करते हैं। इसी क्रम में मानव शरीर और मानव मस्तिष्क को स्वस्थ रखने और उन्हें शुद्ध ऊर्जा प्रदान करने के लिये पर्यावरण को शुद्ध और साफ-सुथरा रखना बेहद जरूरी है। पर्यावरण से ही मानव का जीवन सम्भव है और पर्यावरण को यदि स्वच्छ रखना है, तो वन और वन्यजीवों की सुरक्षा करना भी जरूरी है। इस सप्ताह का आयोजन हमें इसी दिशा में सकारात्मक सोच का भी अवसर प्रदान करता है।

वन्य जीवों की सुरक्षा से जैव-विविधता के ह्रास में होगी कमी

वन्यजीव के बिना मानव मात्र का जीवन तो संकट में पड़ता है और अगर अरसे तक यह संकट बना रहा तो इससे मानव के अस्तित्व की विलुप्ति का खतरा भी मंडराने लगेगा। इस आशंका को देखते हुए ही वन्यजीवों के संरक्षण के महत्व को समझाने और इस दिशा में जनजागृति के लिये सम्पूर्ण विश्व में एक जन अभियान के रूप में वन्यप्राणी सप्ताह का आयोजन किया जाता है। हमारे देश में भारतीय वन्यजीव बोर्ड की पहल पर यह वन्यप्राणी संरक्षण सप्ताह मनाया जाता है। यह आयोजन हमें प्रकृति के अवदान पर विचार का अवसर प्रदान करता है।

आज प्रकृति से जो कुछ भी हमें प्राप्त हो रहा है, उन सब की कुछ-न-कुछ महत्ता है। चाहे वो हमारे साथ, हमारे घर अथवा गली-मोहल्ले, गाँव-कस्बों अथवा नगरों में रहने वाले जीव हों, वन्यजीव हों अथवा पेड़-पौधे सभी का अस्तित्व एक दूसरे पर निर्भर है। आज यदि वृक्ष हैं, तो मानव और अन्य प्राणियों का जीवन सम्भव है। इधर मानव के हिंसक और अनैतिक व्यवहार से विश्व में इकतालिस हजार से भी अधिक प्रजातियाँ विलुप्त होने की कगार पर पहुँच गई हैं। इस सबसे जैव-विविधता का सतत ह्रास हो रहा है, प्रकृति का सारा सन्तुलन बिगड़ रहा है। समय रहते यदि हमने ध्यान नहीं दिया तो इसकी बड़ी कीमत हमें चुकानी पड़ेगी।

अति प्राचीनकाल से हमारे महाकाव्यों, हमारे इतिहास, हमारी पौराणिक मान्यताओं और हमारी लोकगाथाओं में भी मनुष्य और वन्यजीवों की निकटता और अन्योन्याश्रिता और सम्बद्धता की बात कही गई है और यह तथ्य भी संस्थापित किया गया है कि वन्यजीवों से ही प्रकृति के सन्तुलन का निर्माण होता है। वन्यजीव संरक्षण वस्तुतः योजनाबद्ध वन्यजीव प्रबन्धन है। जिसमें हम मानव हितों को बिना नुकसान पहुँचाये वन्यजीवों का संरक्षण कर सकते हैं।

इस वर्ष आईये - ‘‘वन्यप्राणी सप्ताह’’ में इसी योजनाबद्ध वन्यजीव प्रबन्धन का संकल्प दोहरायें और मनुष्य एवं वन्यजीवों के सहअस्तित्व की कल्पना को साकार बनायें।