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बलिदान दिवस - 18 सितम्बर विशेष
राजा शंकरशाह और रघुनाथशाह की शहादत ने जलाये रखी विद्रोह की आग
 

शंकरशाह मध्यवर्ती भारत मेंे फैले उस गढ़ा राज्य का अन्तिम वारिस था, जो सोलहवीं सदी से अठारहवीं सदी तक देश के मध्य भाग में फैला था। यह वही गढ़ा राज्य था, जिसमें संग्रामशाह जैसा प्रतापी राजा हुआ और जिसकी यशोगाथा में रानी दुर्गावती के बलिदान की कहानी शामिल है। 1776 में गढ़ा राज्य के अन्तिम यशस्वी शासक निजामशाह की मृत्यु के बाद उसके दो बेटों, सुमेरशाह और नरहरिशाह में खींचतान चलती रही और ये दोनों ही सागर स्थित मराठों से सहायता लेकर एक दूसरे को गिराते रहे। 1784 में गढ़ा राज्य पर सागर के मराठों का अधिकार हो गया। सुमेरशाह को दमोह जिले के जटाशंकर के किले में और नरहरिशाह को सागर जिले के खुरई के किले में कैद कर रखा गया था। शंकरशाह, सुमेरशाह का बेटा था। गढ़ा राज्य खत्म होने के बाद उसके वारिसों को गुजर-बसर के लिये कुछ जागीर दे दी गयी और शंकरशाह को भी जबलपुर के पास एक जागीर दे दी गयी। शंकरशाह के बेटे का नाम था रघुनाथशाह।

1857 के विद्रोह के समय राजा शंकरशाह 70 साल का हो चुका था और उसके पुत्र रघुनाथशाह की आयु 40 साल के करीब थी। राजा शंकरशाह का महल पुरवा (जबलपुर के निकट गढ़ा-पुरवा) में था। राजा के पास जागीर की कुल 947 बीघा जमीन थी और उसकी उपज से उसकी गुजर-बसर होती थी।

1857 का विद्रोह जब शुरू हुआ, तब गढ़ा राज्य को खत्म हुए 73 साल बीत चुके थे पर उसके गौरव की याद अभी भी लोगों को थी। शंकरशाह के मन में भी अपने वंश का खोया हुआ राज्य वापिस पाने की दबी-छुपी आकांक्षा थी। जब 1857 में जबलपुर में विद्रोह हुआ तो राजा शंकर शाह की भावनाएं उद्वेलित हुईं और वह जल्द ही विद्रोही गतिविधियों का केन्द्र बन गया।

दिल्ली और मेरठ क्षेत्र की घटनाओं की खबर जब जबलपुर पहुँची, तो वहाँ 19 और 22 मई 1857 को बहुत उत्तेजना फैली। फिर 8 जून की झांसी की घटनाओं की खबर आई। इसके बाद कुछ सप्ताहों तक जबलपुर जिले में कोई उल्लेखनीय घटना नहीं हुई। लेकिन 16 जून को जब जबलपुर छावनी का एडजुटेन्ट मिलर अपनी रेजिमेन्ट की गारद का निरीक्षण कर रहा था, तो एक सिपाही ने उस पर अपनी बन्दूक से आक्रमण किया, जिससे उसे मामूली खरोंचें आईं। उस सिपाही को पकड़ लिया गया और उसे मानसिक रूप से असामान्य बताकर बनारस ले जाया गया। कुछ दिन बाद उसे वहाँ फांसी दे दी गयी।

ठाकुरों और सैनिकों के विद्रोह को मिला शंकरशाह का नेतृत्व

सितम्बर की शुरुआत में इस बात के प्रमाण उपलब्ध थे कि कुछ सैनिकों और ठाकुरों ने विद्रोह की योजना बनाई थी और उन्हें शंकरशाह का नेतृत्व प्राप्त हुआ। जबलपुर छावनी की 52वीं रेजीमेन्ट के कई सिपाही उसके घर जाया करते थे और सागर, दमोह और अन्य जगहों की घटनाओं के बारे में चर्चा करते थे। इस रेजीमेन्ट के दो सिपाही अक्सर शंकरशाह के पुरवा स्थित निवास स्थान पर आया करते थे। जब ये इकट्ठा होते थे, तो ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बातें होती थीं और ब्रिटिश शासन के खिलाफ योजनाएं बनती थीं। 52वीं रेजीमेन्ट में तो पहले से ही ब्रिटिश विरोधी भावना थी। इस रेजीमेन्ट के 8-10 सैनिकों ने यूरोपियनों को मार डालने का षडयंत्र रचा। इसकी भनक सैनिक अधिकारियों को लगी तो उन्हें 4 सितम्बर 1857 को तोप से उड़ा दिया गया।

उन्हीं दिनों जबलपुर के डिप्टी कमिश्नर को जबलपुर के खुशियाल चन्द सेठ से पता चला कि राजा शंकरशाह और उसका बेटा रघुनाथ शाह, कई जमींदारों, उनके अनुयायियों और 52वीं रेजीमेन्ट के कुछ सिपाहियों के साथ मिलकर मुहर्रम के अन्तिम दिन, यानी 31 अगस्त 1857 को केन्टोनमेन्ट पर आक्रमण करके यूरोपीय लोगों की हत्या करने, केन्टोनमेन्ट को जलाने, खजाने और शहर को लूटने वाले थे। पर दो कारणों से ऐसा नहीं हुआ। एक तो उन्हें यह पक्का पता नहीं था कि कितने सिपाही उनका साथ देंगे और दूसरा विद्रोहियों में से दो जमींदारों ने उनके साथ काम करने से इंकार कर दिया था। अब यह तय हुआ कि दशहरा के समय कोशिश की जाएगी, जो 28 सितम्बर 1857 को था।

शंकरशाह और उनके बेटे को तोप से उड़ा दिया गया

जबलपुर के डिप्टी कमिश्नर ने षडयंत्र के बारे में ज्यादा जानकारी पाने के लिये फकीर के वेष में एक चपरासी को शंकरशाह के घर भेजा। शंकरशाह और उसका बेटा फकीर के वेष में चपरासी को पहचान नहीं पाए और उन्होंने बेझिझक उसे अपनी योजना और उसे पूरा करने के लिये अपनाए जाने वाले तरीकों के बारे में बता दिया। प्राप्त जानकारी के आधार पर दूसरे दिन याने 14 सितम्बर को डिप्टी कमिश्नर और ले. बाल्डविन बिना किसी को अपने मन्तव्य के बारे में बताए 20 सवारों तथा 40 पुलिस के दल के साथ पुरवा गए और राजा शंकरशाह, उसके बेटे रघुनाथ शाह और करीब 14 लोगों को घर में बन्दी बना लिया। राजा के घर की तलाशी लेने पर विद्रोही प्रवृत्ति जाहिर करने वाले कई कागजात मिले। खास तौर पर एक कागज का टुकड़ा मिला, जिसमें राजा ने देवी की प्रार्थना लिखी थी जिसमें ब्रिटिश सरकार को खत्म करने और उसकी खुद की सरकार स्थापित करने के लिये देवी से सहायता की याचना की थी। 

मूंद मुख डंडिन को चुगलौ को चबाई खाई

खूंद डार दुष्टन को शत्रु संघरिका

मार अंगरेज, रेज कर देइ मात चंडी

बचै नहिं बैरी-बालबच्चे संघारका ।।

संकर की रक्षा कर, दास प्रतिपाल कर

दीन की सुन अय मात कालका

खाइले मलेछन को, झैल नहीं करौ अब

भच्छन कर तत्छन घौर मात कालिका।।

राजा शंकरशाह और उसके बेटे के बन्दी बनाए जाने के बाद जबलपुर की स्थिति संकटपूर्ण हो गयी। उन्हें बचाने की कोशिश की गयी, लेकिन उसमें सफलता नहीं मिली। उनके बन्दी बनाए जाने की दूसरी रात को डिप्टी कमिश्नर को खबर मिली कि 52वीं रेजीमेन्ट इन्हें बचाने की योजना बना रही है। यह देखकर मद्रास रेजीमेन्ट को तैयार किया गया और वह पूरी रात सशस्त्र तैयार रही। राजा और उसके बेटे को कमिश्नर के बंगले में रखा गया।

राजा शंकरशाह और उसके बेटे पर ब्रिटिश राज के विरुद्ध साजिश करने का मुकदमा चलाया गया। दूसरे दिन कमिश्नर और अन्य दो अधिकारियों के एक कमीशन ने दूसरे दिन राजा और उसके बेटे पर मुकदमा चलाया। यूरोपियनों को खत्म करने की साजिश में उनका हाथ सिद्ध होने के सबूत में उन्हें तोप से उड़ा दिये जाने का दण्ड दिया गया। इसके लिये 18 सितम्बर 1857 की तारीख तय की गयी।

दोनों तोप के सामने निडर खड़े भगवान से अंग्रेजों के खात्मे की प्रार्थना कर रहे थे

एक ब्रिटिश अधिकारी जो शंकरशाह और रघुनाथशाह को तोप से उड़ाये जाने के समय वहाँ मौजूद था, इस घटना का लोमहर्षक विवरण देता है। वह लिखता है-

‘‘मैं अभी-अभी विद्रोही राजा और उनके पुत्र को तोप से उड़ाये जाने का दृश्य देखकर वापस लौटा हूँ। वह एक भयानक दृश्य था, लेकिन वे इससे भी बहुत अधिक बुरी मौत के योग्य थे। यह पता चला है कि पकड़ लिये जाने पर हम सभी को जिन्दा ही भून दिया जाता। जब उन्हें तोप के मुंह पर बांधा जा रहा था तो उन्होंने प्रार्थना की कि भगवान उनके बच्चों की रक्षा करें ताकि वे अंग्रेजों को खत्म कर सकें। हम नीचे उस जगह पर पहुँचे जहाँ दो तोपें रखी गयी थीं। सहसा आक्रमण को रोकने के लिये पैदल और घुड़सवार सैनिकों की टुकड़ी वहाँ तैनात थी। घुड़सवार सैनिक लोगों को तोपों के सामने से हटाने के लिये इधर-उधर भाग रहे थे। कैदी नितान्त अनासक्त और निःस्पृह दिखाई दे रहे थे, उनकी बेड़ियाँ जमीन से टकरा रही थीं। फिर उन्हें तोपों के मुँह से बांध दिया गया। जब सभी तैयारी हो गयीं तब तोपखाने के अधिकारी ने स्पष्ट आवाज में जोर से आदेश दिया, ‘डिवीजन तैयार, तोप चलाओ’। एक गर्जना हुई, शरीर गिरने जैसी धप की आवाज और सब कुछ खत्म हो गया। वृद्ध पुरुष और साथ ही युवा पुरुष का चेहरा भी शान्त और गंभीर था। उनके पैर और हाथ, जो बांध दिये गये थे, तोप के मुंह के पास पड़े थे और शरीर का ऊपरी भाग सामने की ओर लगभग पचास गज की दूरी पर जा गिरा था। उनके चेहरे को जरा भी क्षति नहीं पहुंची थी और वे बिल्कुल शान्त थे। मृत्यु का सिर्फ यही एक रूप है जो देसी लोगों में आतंक पैदा करता है। यदि उन्हें फांसी पर चढ़ाया जाता है या बन्दूक से गोली मारी जाती है तो उन्हें पता होता है कि उसके मित्र या रिश्तेदारों को उसकी देह दे दी जायेगी और वे लोग उसके धर्म के अनुसार उसका अन्तिम संस्कार करेंगे। यदि वह हिन्दू है तो उसकी देह का उचित तरीके से अग्नि संस्कार कर दिया जायेगा और यदि वह मुसलमान है तो कुरान के निर्देशों के अनुसार उसके अवशेषों को ठीक तरीके से दफना दिया जायेगा। लेकिन यदि मृत्यु इस रूप में होती है, तो उन्हें पता है कि उसके शरीर के हजारों टुकड़े हो जायेंगे और उनके रिश्तेदार उनके लिये चाहे कितने भी समर्पित क्यों न हों, वे उनके शरीर के सभी टुकड़ों को पक्के तौर पर एकत्र नहीं कर सकेंगे। तब यह आशंका रहती है कि कहीं किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति के अंग उसकी देह के अवशेषों के साथ न जला या दफना दिया जाये।’’

इस लोमहर्षक हत्याकांड से लोगों में आतंक तो जरूर फैला लेकिन विद्रोह की आग बुझी नहीं। इस घटना के कुछ रोज बाद ही जबलपुर जिले के गोंड जागीरदारों ने और रामगढ़ की रानी अवंतीबाई लोधी ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर विद्रोह कर दिया।