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अपने काम से दें आलोचनाओं का जवाब

उड़ान’ स्तंभ के पिछले अंक में उल्लेखित होमी भाभा के जीवन से हमें कई प्रेरणाएँ मिलती हैं। उनके जीवन से हमें अपने कामों को नवाचारी तरीकों से करने, अपने ज्ञान के क्षितिज का विस्तार करने, ध्यान से सुनने और समझने, अपनी रुचि के क्षेत्र में प्रवेश करने, समस्याओं को विचार-क्षेत्र में लाने, तर्कपूर्वक आगे बढ़ने, नया सीखने, संबंध बनाने तथा उन्हें निभाने, दिल की सुनने और देश-हित में निर्णय लेने, उत्कृष्ट टीम विकसित करने आदि जैसी कई मार्गदर्शी एवं प्रेरणादायी टिप्स मिलती हैं। एक समर्पित वैज्ञानिक और दृष्टा के रूप में उन्होंने कार्य करते हुए सबको प्रेरित किया। यहाँ मुझे प्रतिभा के धनी भौतिकशास्त्री, गणितज्ञ और खगोलशास्त्री के रूप में विख्यात सुब्रमण्यम चंद्रशेखर (जिन्हें वैज्ञानिक जगत ‘चंद्रा’ के नाम से जानता है) की याद आ रही है।
आइये, ‘उड़ान’ के इस अंक में हम देखते हैं कि किस तरह सुब्रमण्यम चंद्रशेखर हमारी प्रेरणा के स्रोत बनते हैं तथा मार्गदर्शन देते हैं, जो जीवन की नयी उड़ान के लिए हमें तैयार करने में सहायक सिद्ध होते हैं।
निश्चय करना मात्र ही पर्याप्त नहीं, आवश्यक तैयारी जरूरी

सुब्रमण्यम चंद्रशेखर ने पाँच वर्ष की उम्र से हीे अपने घर पर औपचारिक रूप से पढ़ना आरंभ कर दिया था। ‘तमिल’ को अपनी माँ से तथा ‘अंग्रेजी’ और ‘गणित’ को उन्होंने पिता से सीखा। उनके चाचा भौतिकशास्त्री सी.वी. रमन थे, जो उस समय ‘ध्वनिकी’ और ‘स्पेक्ट्रोस्कोपी’ के क्षेत्र में काम कर रहे थे। चंद्रशेखर उनके साथ ही महान गणितज्ञ रामानुजन से भी बेहद प्रभावित थे। वे भी उन्हीं की तरह ‘वैज्ञानिक’ बनना चाहते थे। लेकिन, बच्चे होने के बावजूद वे जानते थे कि मात्र निश्चय कर लेने से बात नहीं बनती है। इसके लिए आवश्यक तैयारी के साथ कदम उठाना पड़ते हैं। अतः ‘वैज्ञानिक’ बनने के लिए उन्होंने अपने घर पर ही ‘कैलकुलस’ तथा ‘भौतिकी’ का अध्ययन करना आरंभ कर दिया। यही हम चंद्रशेखर से सीखते हैं। हम अविलम्ब अपना लक्ष्य तय करें तथा उसे पाने के लिए आवश्यक तैयारी में जुट जाएँ।
अपने समय का बेहतरीन उपयोग करें

हाईस्कूल के बाद चंद्रशेखर ने अपनी विज्ञान की यात्रा मद्रास (चेन्नई) के प्रेसीडेंसी कॉलेज से शुरू की। गणित में स्वाभाविक रुचि के बावजूद अपने ग्रेजुएशन के लिए पिता की इच्छा का सम्मान करते हुए उन्होंने भौतिकी को चुना। लेकिन, इस दौरान भी उन्होंने गणित को अपने नेटवर्क से बाहर नहीं जाने दिया। यहाँ वे गणित का अतिरिक्त अध्ययन करते तथा गणित की कक्षाएँ भी अटेण्ड करते।
शोध में उनकी गहरी रुचि थी। उनका एक शोध पत्र ‘इंडियन जर्नल ऑफ फिजिक्स’ में तब छपा, जब वे मात्र 18 वर्ष के थे। इसके बाद उनका शोध का कभी सिलसिला थमा नहीं। उनके कई और शोधपत्र प्रकाशित होने लगे, जिनमें से एक तो प्रतिष्ठित जर्नल ‘प्रोसिडिंग्स ऑफ रायल सोसायटी’ में भी था। इस तरह अपने कॉलेज के दिनों में मिले समय का उपयोग कर चंद्रशेखर ने जो कर दिखाया वह सचमुच ही प्रेरक है।
पढ़ने का शौक रखें

बचपन से ही उन्हें पढ़ने का शौक था। वे अपनी अध्ययनशील वृत्ति से अपने ज्ञान के भंडार को विस्तारित करने में पूरे दिल से जुटते थे। इस उम्र में जहाँ अधिकतर विद्यार्थी कभी अपने कोर्स से बाहर की पुस्तकों को हाथ नहीं लगाते हैं, वहीं चंद्रशेखर न सिर्फ नियमित पुस्तकालय जाते वरन् जर्नल्स का अध्ययन भी करते थे। उन्हें मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज के पुस्तकालय में आर्थर एडिंग्टन की पुस्तक ‘इंटरनल कॉन्स्टीट्यूशन ऑफ स्टार्स’ को पढ़ने का अवसर मिला। इस पुस्तक ने उनमें ‘श्वेत बौने’ (ज़्ण्त्द्यड्ढ क़्ध्र्ठ्ठद्धढ) नामक तारों  में गहरी रुचि जगाई। नई पुस्तकों को पढ़ने और सीखने के उनके शौक ने उन्हें काम्प्टन और सोमरफेल्ड जैसे महान भौतिकशास्त्रियों की पुस्तकों से परिचित कराया, जिनके माध्यम से वे ‘आधुनिक भौतिकी’ की ओर आकृष्ट हुए। अपनी अध्ययनशील प्रवृत्ति के कारण ही उनमें विज्ञान और वैज्ञानिक शोधों के प्रति लगाव गहराने लगा। उनकी इसी प्रवृत्ति तथा सीखने की आदत ने उनके आत्मविश्वास को भी बहुत बढ़ाया। इस तरह हम उनसे अध्ययनशील प्रवृत्ति तथा सीखने की आदत को विकसित करने का मार्गदर्शन पाते हैं।
सफल होने का पूरा भरोसा रखें

चंद्रशेखर के पिता की इच्छा थी कि वे ‘आई.सी.एस.’ (इंडियन सिविल सर्विस) में जायें, लेकिन उनका मन ‘वैज्ञानिक’ ही बनना चाहता था। उनके लिए बचपन से ही ज्ञान सर्वोपरि था। और, इसीलिए अपने कॉलेज के दिनों में भी मौका मिलने पर वे ‘वैज्ञानिक सम्मेलनों’ में भाग लेतेे। चंद्रशेखर को शोध के क्षेत्र में जाने तथा इसमें सफल होने का पूरा विश्वास था। ‘वैज्ञानिक’ बनने के अपने सपने को साकार करने के लिए उन्हें ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा। सरकार ने उन्हें स्कॉलरशिप प्रदान दी, जिससे वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में उच्च-अध्ययन हेतु इंग्लैण्ड रवाना हो गए। यहाँ उन्हें लिटिलवुड, डिरॉक और एडिंग्टन जैसे महान वैज्ञानिकों से सीखने के अवसर तथा सुप्रसिद्ध खगोलविद् आर.एच. फाउलर के निर्देशन में शोध करने का सौभाग्य मिला। इस तरह हमें उनसे अपने प्रत्येक कार्यों के दौरान सफल होने का पूरा भरोसा रखते हुए कदम उठाना चाहिए।
संबंधों को विकसित करें

चंद्रशेखर का उनके चाचा रमन के साथ काम कर रहे वैज्ञानिकों से सहज ही परिचय हो गया। इसके साथ ही अपने ग्रेजुएशन के दिनों में ही वे ‘खगोल भौतिकविद्’ राल्फ हावर्ड फाउलर के सम्पर्क में आ चुके थे। ‘एटॉमिक स्ट्रक्चर एण्ड स्पेक्ट्रल लाइंस’ नामक पुस्तक के रचयिता अर्नाल्ड सोमरफेल्ड, ‘खगोल भौतिकी’ की पहेली को सुलझाने वाले मेघनाद साहा और ‘क्वांटम यांत्रिकी’ के जन्मदाताओं में से एक वर्नर हैजनबर्ग से उनके संबंध विकसित हो गये थे।
कैम्ब्रिज में रहते हुए चंद्रशेखर ने अपने हर क्षण का उपयोग सीखने में किया। पहले साल के ग्रीष्मावकाश में वे गोटिंगन में मैक्स बॉर्न के साथ काम करने के लिए गये। दूसरे साल की छुट्टियों में कोपेनहेगन गए और अपनी ऊर्जा को ‘भौतिकी’ सीखने में लगाया। इसके बाद एक बार वे चार सप्ताह के लिए रूस गये, जहाँ उनकी मुलाकात लेव डेविडोविच लैण्डाव (जिन्हें, बाद में 1962 के भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया) और अन्य वैज्ञानिकों से हुई। आवश्यक पृष्ठभूमि तैयार होने के बाद वे ‘श्वेत बौनों’ पर शोध-कार्य में जुट गये। इस तरह हम देखते हैं कि ज्ञान की प्यास ने उन्हें कई नये संबंधों को बनाने के लिए प्रेरित किया। हर संबंध ने उनमें ज्ञान की गहराई में जाने की ललक को गहरा किया तथा उनके ज्ञान के क्षितिज को विस्तारित करने में मदद की। चंद्रशेखर की यही बात हमारे लिए सीख है। हम जीवन में अच्छे संबंधों को बनाएँ और उन्हें विकसित करें।  
यात्रा के दौरान मिलने वाले क्षणों को व्यर्थ न जाने दें, जिज्ञासु बनें और चिंतन करें

भारत से इंग्लैण्ड पहुँचने के लिए चंद्रशेखर ने जहाज द्वारा कई महिनों चलने वाली लम्बी यात्रा की। कॉलेज के दिनों में उन्हें ‘श्वेत बौने’ तारों ने आकृष्ट किया था और वे ‘श्वेत बौनों’ के बनने की प्रक्रिया को समझना चाहते थे। अतः यात्रा के दौरान मिले खाली समय में वे इस पर चिंतन करने लगे। वे जहाज की यात्रा के साथ ही आकाश को निहारते हुए ‘तार्किक यात्राएँ’ भी करने लगे। यह चंद्रशेखर के ‘उत्साही’ और ‘जुनूनी’ होने का प्रमाण है। आगे चल कर उनके इस ‘उद्देश्यपूर्ण चिंतन’ ने उन्हें शोध के लिए स्पष्ट दिशा प्रदान की। कई बार हम यात्रा के दौरान बोर होते हैं तथा समय की बरबादी मानते हैं। ऐसे में चंद्रशेखर हमारे सामने एक उदाहरण बन कर सामने आते हैं। हम याद रखें कि समय का सदुपयोग करना हमारे ही हाथ में है।
चिंतन को दिशा देने के लिए तार्किक-यात्राएँ करें

चंद्रशेखर ने तारों पर विचार करना आरंभ किया। तारे लकड़ी के समान तो जलते नहीं हैं, जो अंत में राख छोड़कर सदा के लिए बुझ जाएँ। इसमें ‘ऊर्जा-उत्पादन’ की अलग तरह की प्रक्रिया काम करती है। अपने जन्म के कुछ समय पहले हाइड्रोजन के परमाणु गुरुत्वाकर्षण के कारण पास-पास आते हैं। फिर ये ‘संघनित’ होने लगते हैं तथा इनमें ‘टक्करें’ बढ़ने लगती हैं, जिससे तारे का ‘ताप’ बढ़ने लगता है। जब तारे के केंद्र का ‘ताप’ बहुत बढ़ जाता है, तब तारे के केंद्र में उपस्थित हाइड्रोजन, हीलियम में बदलने लगती है तथा उसका कुछ द्रव्य, ऊर्जा में रूपांतरित होने लगता है। यह ऊर्जा, ‘विकिरणों’ के रूप में होती है। इससे तारे में ‘विकिरण दाब’ बढ़ने लगता है, जिससे तारे का सिकुड़ना रुकने लगता है और शीघ्र ही तारा संतुलन की अवस्था में आ जाता है। इस तार्किक समझ ने उनके लिए एक ‘आधार’ तैयार कर दिया, जहाँ से वे अपनी श्वेत बौने को समझने की दिशा में ठोस कदम उठा सके। इस तरह हम उनसे चिंतन को दिशा देने के लिए तार्किक यात्राएँ करने की प्रेरणा पाते हैं।
तर्क का साथ न छोड़ें

अब चंद्रशेखर ने पुनः तर्क को आगे बढ़ाते हुए विचार करना आरंभ किया। उन्हें समझ में आया कि तारे केंद्र में द्रव्य सर्वाधिक ‘घना’ तथा ‘पृष्ठ’ पर विरल होता है। इससे तारे को ‘कोर’ तथा ‘खोल’ के रूप में बना हुआ माना जा सकता है। तारा संतुलन की अवस्था में तब तक बना रहता है, जब तक कि इसमें हाइड्रोजन समाप्त नहीं हो जाती। हाइड्रोजन के कम होने पर इसके ‘कोर’ में ‘विकिरण दाब’ कम हो जाता है, जिससे ‘कोर’ सिकुड़ने लगता है, लेकिन उसकी ‘खोल’ बाहर की ओर फैलने लगती है। ईंधन की पूर्ण समाप्ति पर ‘कोर’ बहुत छोटा हो जाता है, जिससे तारे की ‘खोल’ का उससे संबंध टूटने लगता है और उसका द्रव्यमान अंतरिक्ष में बिखरने लगता है। अंततः तारे के स्थान पर उसका ‘कोर’ अवशेष के रूप में बचा रहता है।

अब चंद्रशेखर ने तारे के ‘कोर’ पर विचार किया। गुरुत्वाकर्षण के कारण ‘कोर’ का सिकुड़ना जारी रहता है तथा उसका ‘ताप’ बढ़ता जाता है, जिससे ‘कोर’ में उपस्थित हीलियम अन्य तत्त्वों रूपांतरित होते हुए अपने कुछ द्रव्य को ऊर्जा में बदलते हुए ‘विकिरणों’ को उत्पन्न करने लगती है। इस तरह गुरुत्वाकर्षण के विरोध में ‘विकिरण दाब’ के पुनः प्रकट होने से तारे का सिकुड़ना रुकने लगता है तथा कुछ समय बाद संतुलन की अवस्था में आ जाता है।
अब चंद्रशेखर ने सोचा कि जब इस ‘कोर’ में विकिरणों के पैदा होने की सभी संभावना समाप्त हो जाएँगी, तब क्या होगा? अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने सोचा कि ‘विकिरण दाब’ की अनुपस्थिति में ‘कोर’ गुरुत्वाकर्षण के नियंत्रण में आने से पुनः सिकुड़ना आरंभ करेगा, जिससे उसका सारा द्रव्यमान  एक बिंदु पर एकत्रित हो जाएगा। लेकिन ऐसा तो होता नहीं, क्योंकि ‘श्वेत बौने तारों’ का अपना निश्चित आकार होता है। अतः उन्होंने पुनः तर्कपूर्वक आगे सोचना आरंभ किया।

गुरुत्वाकर्षण के कारण ‘कोर’ में ‘दाब’ और ‘ताप’ बढ़ने से वहाँ उपस्थित द्रव्य में उपस्थित ‘ऑयन’ अपने ‘इलेक्ट्रॉनों’ को खोने लगेंगे, जिससे वहाँ इनकी संख्या में तेजी से इज़ाफा होने लगेगा। इसके बाद चंद्रशेखर ने ‘इलेक्ट्रॉनों की भूमिका’ पर विचार करना आरंभ किया। ‘क्वांटम यांत्रिकी’ के अध्ययन से वे जानते थे कि इलेक्ट्रॉन, ‘क्वांटम निकाय’ होते हैं। उनको यह भी ज्ञात था कि किसी भी निकाय में उपस्थित सभी इलेक्ट्रॉन कभी भी एक साथ नहीं रहते, बल्कि वे ‘पॉली के अपवर्जन नियम’ का पालन करते हुए विभिन्न ऊर्जा अवस्थाओं में रहते हैं। इसके कारण ‘कोर’ में इलेक्ट्रॉनों का वितरण मिलता है, जिसमें कम ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन, ‘कोर’ में बाहर की ओर मिलते हैं। इस कारण ‘कोर’ में बाहर की ओर एक ‘नये प्रकार का दाब’ कार्य करने लगता है, जिससेे  ‘गुरुत्वीय प्रभाव’ कम होने लगता है। इससे ‘कोर’ का सिकुड़ना पुनः रुक जाता है और वह ‘श्वेत बौना’ बन जाता है। इस तरह उन्हें ‘श्वेत बोने’ तारों के बनने की प्रक्रिया के साथ ही तारों की जीवन-लीला और उनमें होने वाले संरचनात्मक परिवर्तनों में कार्यरत ‘प्रकृति की अंतर्निहित व्यवस्था’ का पता चल गया। वे यह जान कर चकित रह गये कि इस व्यवस्था को बनाने में ‘अति सूक्ष्म-स्तर पर काम करने वाली भौतिकी’ और ‘अति वृहद-स्तर पर काम करने वाली भौतिकी’ के बीच व्याप्त संबंधों का हाथ होता है। यह एक क्रांतिकारी खोज थी, जो उनकी तर्क को निरंतर आगे बढ़ाने की आदत के कारण संभव हुई थी।
इस तरह हम चंद्रशेखर से अपने प्राथमिक लक्ष्य को हासिल करने के बाद पुनः तर्कपूर्वक आगे बढ़ने की प्रेरणा पाते हैं। तर्क हमें उस ऊँचाई पर पहुँचाता है, जहाँ से अदृश्य चीजें और संबंध भी स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं। इस तरह उनकी तरह हम भी एक सफलता मिलने के बाद रुकें नहीं तथा तर्क के साथ अपनी बात को आगे बढ़ाएँ।
पूर्णाहुति तक काम छोड़ें नहीं

अपनी सफलता से चंद्रशेखर ने संतुष्ट होने की बजाय आगे बढ़ने के लिए स्वयं से प्रति प्रश्न किया कि क्या सभी तारे ‘श्वेत बौने’ बन सकते हैं? इसके लिए उन्होंने ‘इलेक्ट्रॉनों के कारण मिलने वाले विशिष्ट दाब’ (तकनीकी भाषा में ‘अपभ्रंशता’ दाब) पर विचार किया। उनके सामने यह तो स्पष्ट हो गया कि इस दाब का मान ‘इलेक्ट्रॉन’ की संख्या तय करेगा। अतः चंद्रशेखर ने अपने तर्क को आगे बढ़ाया तथा ‘कोर’ के द्रव्यमान पर विचार करना आरंभ किया क्योंकि इसी पर ‘इलेक्ट्रॉनों’ की संख्या निर्भर करती है। इस समझ के विकसित होते ही उन्होंने छोटे-बड़े, सभी तरह के तारों पर विचार कर ‘विकिरण दाब’ की अनुपस्थिति में उनके व्यवहार पर ध्यान दिया। उन्हें पता चला कि जब तारे के ‘कोर’ के द्रव्यमान का मान ‘सूर्य के द्रव्यमान का 1.44 गुना या इससे कम’ होता है, तभी वह ‘श्वेत बौने’ के रूप में रह सकता है। उनके द्वारा खोजी गई इस सीमा को आज ‘चन्द्रशेखर सीमा’ कहते हैं। यह एक क्रांतिकारी खोज थी।
‘श्वेत बौने बनने’ की प्रक्रिया समझने के बाद चन्द्रशेखर आत्मसंतुष्ट होकर नहीं बैठे। अब वे सोचने लगे कि आखिर ‘भारी तारे’ (सूर्य की आकार के 1.44 गुने से अधिक) का अंत किस रूप में होता होगा? अपने तर्क को बढ़ाते हुए उन्होंने सोचा कि ऐसे तारों के ‘कोर’ भी बहुत भारी होंगे तथा बहुत अधिक गुरुत्व के कारण इनके आकार भी छोटे होंगे। ऐसी स्थिति में इन तारों में ‘इलेक्ट्रॉन’ अपने स्वतंत्र अस्तित्व को कायम रख पाने में भी समर्थ नहीं होंगे तथा ‘प्रोटॉनों’ में विलिन होकर उन्हें ‘न्यूट्रॉनों’ में बदल देंगे। ऐसी स्थिति में भारी तारों के ‘कोर’ में सिर्फ ‘न्यूट्रॉन’ ही बचेंगे। इस समय गुरुत्वाकर्षण को रोकने का कार्य ‘न्यूट्रॉन’ करेंगे, क्योंकि ‘न्यूट्रॉन’ भी ‘इलेक्ट्रॉनों’ की ही तरह व्यवहार करते हैं। ‘इलेक्ट्रॉनों’ की ही तरह इन ‘न्यूट्रॉनों’ के कारण भी ‘कोर’ में एक ‘विशिष्ट दाब’ उत्पन्न होता है। इससे ‘गुरुत्वीय प्रभाव’ कम होने लगता है और ‘कोर’ सिकुड़ना बंद कर संतुलन