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चार्ल्स बैबेज स्मृति शेष
दुनिया को नई दिशा देने वाला अन्वेषक
 

चार्ल्स बैबेज को कम्प्यूटर का जनक या पितामह कहा जाता है। उनकी सोच अपने समय से बेहद आगे की रही। बैबेज ने अपने विचार, कल्पना तथा ज्ञान से ऐसे यंत्र की बुनियाद रखी जिसकी अवधारणा से आज सारी दुनिया संचालित हो रही है। इसी अवधारणा पर आज कम्प्यूटर कार्य कर रहे हैं। यहाँ उनके प्रेरक व्यक्तित्व से परिचित कराया जा रहा है -

कम उम्र में ही पढ़ ली थीं श्रेष्ठ गणितीय किताबें

26 दिसंबर 1791 को बैबेज का जन्म लंदन के साउथवर्क में हुआ। उनके पिता बेंजामिन बैबेज बैंकर और माता प्लेमलेह टीप बैबेज गृहिणी थीं। बेंजामिन बैबेज की कुल आठ संतानें हुईं जिनमें से सिर्फ तीन ही कालांतर में जीवित रह सकीं। चार्ल्स बैबेज में बचपन से ही नया करने की ललक रही। बालपन से ही उन्हें गणितीय सिद्धान्तों को समझने और उनकी व्याख्या करने में बहुत आनंद आता था। इसी रुचि के कारण उन्होंने कम उम्र में ही उस समय के श्रेष्ठ गणितीय लेखकों की किताबें पढ़ ली थीं। 1810 में वे जब 19 वर्ष के हुए तब उन्होंने कैम्ब्रिज स्थित ट्रिनटी कॉलेज में दाखिला लिया। लेकिन यहाँ बैबेज को जल्द ही पढ़ाई से ऊब महसूस होने लगी, क्योंकि उन्हें यहाँ, उनकी अपेक्षा के अनुरूप ज्ञान प्राप्त नहीं हो पा रहा था। वे पहले ही उस समय के गणित के स्तरीय लेखक रॉबर्ट वुडहाउस, जोसेफ लुइस, लग्रेंज और मरिया गीताना ऐग्नेसी की पुस्तकें पढ़ चुके थे। इसलिये कॉलेज में पढ़ाये जाने वाले गणितीय पाठ्यक्रम से वे संतुष्ट नहीं थे।

1812 में की एनालिटिकल सोसायटी की स्थापना

गणितीय विषयों के संबंध में कुछ नया करने के उद्देश्य से उन्होंने अपने ही जैसे असंतुष्ट कुछ मित्र जॉन हर्शेल, जार्ज पिकॉक आदि के साथ मिलकर 1812 में एक एनालिटिकल सोसायटी की स्थापना की। प्रारंभ में इस सोसायटी के माध्यम से उन्होंने अनुवाद तथा लेखन संबंधी कार्य किये। उन्हें गणित के अलावा खगोलशास्त्र, राजनीति और अर्थशास्त्र में भी रुचि थी। इन विषयों का भी उन्होंने गहन अध्ययन किया, जो भविष्य में उनके बहुत काम आया।

लॉगरिथम टेबल को देखकर आया संगणक बनाने का विचार

एक दिन एनालिटिकल सोसायटी की स्थापना के बाद वे अपने कमरे में बैठे हुए लॉगरिथम टेबल (कम्प्यूटर और कैलकुलेटर के आने से पहले गणनायें लॉगरिथम के माध्यम से की जाती थीं।) को ध्यान से देख रहे थे, तो उसमें उन्हें कई त्रुटियाँ नजर आईं। क्योंकि उस समय गणनायें स्वयं ही करनी पड़ती थीं, जिस कारण कई गलतियाँ होती थीं या गलतियों की संभावना बनी रहती थी। गणनाओं के लिए कुछ संगणक यंत्र उस समय ईज़ाद हुए थे, किन्तु वे उतने परिष्कृत नहीं थे। अतः बैबेज को ऐसी मशीन बनाने का ख्याल आया जो स्वचालित रूप से गणनायें करने में सक्षम हों, जिसमें गलतियों की संभावना न हो।

डिफरेंस ईंधन बनाने में लगे 10 वर्ष

अपने इसी विचार पर उन्होंने कार्य करने की ठानी। उस समय उपलब्ध साधनों के अनुसार बैबेज ने गणक यंत्र को भाप से चलाने और गियर से नियंत्रित करने के बारे में कल्पना की, किन्तु यह इतना आसान नहीं था। बैबेज को अपने इस विचार को ज़मीनी स्तर पर लाने के लिए 10 वर्ष लग गये और 1822 में वे इस मशीन पर कार्य प्रारंभ कर पाये। अपनी मेहनत और ज्ञान के बूते अंत में वे ऐसा यंत्र बनाने में सफल हुए, जिसमें बुनियादी जोड़-घटाना आसानी से किया जा सकता था। इसे बैबेज ने नाम दिया - ‘डिफरेंस इंजन।’

1823 में जोसेफ क्लीमेन्ट के साथ मिलकर किया काम

इस प्रांरभिक सफलता ने बैबेज को और उत्साहित किया। उन्होंने इस डिफरेंस इंजन को और भी परिष्कृत करने के बारे में सोचा। अपने विचार पर कार्य करते हुए वे सबसे पहले डिफरेंस इंजन के प्रोटोटाइप को 1823 में जोसेफ क्लीमेन्ट की जानकारी में लाये और मिलकर कार्य करना प्रारंभ किया। उन्होंने अपनी घोड़ागाड़ी के गैराज और अस्तबल को दो मंजिला इमारत में बदल दिया, जहाँ प्रशिक्षित इंजीनियर और कामगार बैबेज की कल्पना को साकार करने लगे। यहाँ सभी ने पूरे मनोयोग से चार्ल्स बैबेज के विचार को साकार करने कार्य किया, किन्तु नये इंजन की लागत उनके अनुमान और सीमा से बाहर हो चली। वे उसका भार वहन करने की स्थिति में नहीं थे।

ब्रिटिश सरकार ने रोकी वित्तीय सहायता

अपने सपने को पूरा करने के लिए उनके सामने आर्थिक संकट आ गया। तभी ब्रिटिश सरकार को उनके काम की जानकारी लगी और भविष्य में उस गणक यंत्र की उपयोगिता को समझते हुए सरकार ने उन्हें वित्तीय सहायता देना प्रारंभ कर दिया। इससे बैबेज के कार्य को नई रफ्तार मिल गई। वे फिर से अपने कार्य में एकाग्र होकर जुट गये। पर भाग्य को जैसे कुछ और ही मंजूर था। बड़ी वित्तीय सहायता प्राप्त होने के बाद भी बैबेज के नये गणक यंत्र का कार्य 1842 तक चलता रहा। एक लंबे अंतराल में भी काम पूरा न होता देखकर ब्रिटिश सरकार ने बैबेज को वित्तीय सहायता देना बंद कर दिया। इससे एक बार फिर बैबेज का काम रुक गया।

एनालिटिकल इंजन की की कल्पना

पर बैबेज इन सभी रुकावटों से निराश नहीं हुए। उन्होंने असफलताओं से सीखते हुए भविष्य में और भी अधिक जटिल गणक यंत्र बनाने की कल्पना की। उन्होंने इस यंत्र का नाम दिया ‘एनालिटिकल इंजन’। हालाँकि वे इस इंजन का निर्माण पूरी तरह से नहीं कर पाये। किन्तु इस यंत्र के जितने भी भाग वे निर्मित कर पाये उसी अवधारणा के आधार उन्हें आज कम्प्यूटर का जनक कहा जाता है। उनके इस यंत्र में उपयोग होने वाले नियमों के आधार पर ही आधुनिक कम्प्यूटर कार्य कर रहे हैं। उनके इस यंत्र में वर्तमान कम्प्यूटर के समान मैमोरी और सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट की अवधारणा का इस्तेमाल होता था।

100 से अधिक नक्शे और 500 पेजों के दस्तावेज थे प्रोटोटाइप में

इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर चार्ल्स ने 1843 में बिना किसी सरकारी सहायता के कार्य करना प्रारंभ कर दिया था। इसके लिए उन्होंने ड्रॉफ्टमैन सीजी जार्विस को साथ लिया जो क्लीमेन्ट के साथ पहले ही कार्य कर चुके थे। प्रारंभ में यंत्र के प्रोटोटाइप के लिए नक्शे और दस्तावेज तैयार किये गये। इसमें 100 से अधिक नक्शे और 500 पेजों के दस्तावेज थे, जिसमें यंत्र के कार्य करने की पूर्ण कार्यप्रणाली का विवरण दिया गया। बैबेज ने इसे उस समय महज गणना करने वाला यंत्र ही माना था। उन्हें इसका अंदाजा भी नहीं था कि इस इंजन में प्रयुक्त होने वाली कार्यप्रणाली का भविष्य में कितना व्यापक उपयोग हो सकता था।

विश्व की पहली प्रोग्रामर अगस्ता एडा ने दिया बैवेज का साथ

बैबेज ने एनालिटिकल इंजन पर जितना भी कार्य किया उसका बहुत सारा श्रेय उनकी सहयोगी अगस्ता एडा को भी जाता है। वे प्रख्यात अंग्रेज कवि लॉर्ड वॉयरन की बेटी थीं। अगस्ता, बैबेज के के साथ तब जुड़ीं जब वे एनालिटिकल इंजन के निर्माण कार्य में गंभीरता से जुटे हुए थे। अगस्ता की रुचि भी गणित में थी, इसलिये उन्होंने बैबेज के एनालिटिकल इंजन के ड्राफ्ट में आवश्यक परिवर्तन किये। उन्होंने बैबेज के एनालिटिकल इंजन को इस तरह से व्यवस्थित किया कि वह निर्देश पाकर स्वयं कार्य करने लगे। (इसलिये अगस्ता को विश्व की पहली प्रोग्रामर भी कहा जाता है।) साथ ही उन्होंने एक ऐसा प्रोग्राम भी बनाया, जिससे इंजन निर्देश पाकर संगीत की ध्वनि निकाले। अगस्ता की वजह से ही एनालिटिकल इंजन का बहुत सारा काम पूरा हो पाया। किन्तु इंजन का कार्य पूरा हो पाता इससे पहले ही अगस्ता एडा का 1852 में मात्र 36 वर्ष की अल्पायु में निधन हो गया। अगस्ता के जाने के बाद भी उन्होंने एनालिटिकल इंजन को पूरा करने की कोशिश की, किन्तु यह संभव नहीं हो पाया।

1911 में पुत्र ने पूरा किया एनालिटिकल ईंधन का काम

18 अक्टूबर 1871 को चार्ल्स बैबेज ने अंतिम सांस ली और अपने जुझारु तथा प्रेरक जीवन से मुक्ति प्राप्त की। दुनिया को कुछ बेहतर देने का अधूरा सपना लिये ही वे दुनिया से विदा हो गये। लंबे समय तक उनका कार्य अधूरा ही रहा। बाद में उनके पुत्र हेनरी प्रेवोस्ट ने उनके अधूरे कार्य को पूरा करने का कार्य किया। 1911 में हेनरी ने एनालिटिकल इंजन के शेष कार्य को पूरा करते हुए दुनिया के सामने उसका प्रदर्शन करके दिखाया। एक लंबे अंतराल के बाद आविष्कारक चार्ल्स बैबेज को वह मुकाम हासिल हुआ, जिसके वे असल हकदार थे और आज दुनिया उन्हें कम्प्यूटर के जनक के रूप में जानती है।

आज भी सुरक्षित है बैबेज का दिमाग

ब्रिटिश सरकार द्वारा चार्ल्स बैबेज के दिमाग को सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण कार्य किया गया। उनके आधे दिमाग को लंदन के रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन के हुंटेरियन म्यूजियम में तथा दूसरे आधे दिमाग को लंदन के ही साइंस म्यूजियम में प्रदर्शन के लिए रखा गया है। बैबेज द्वारा बनाया गया डिफरेन्स इंजन का एक हिस्सा आज भी लंदन के विज्ञान संग्रहालय में है, जिसे देखकर नवोन्मेषी प्रेरणा प्राप्त करते रहते हैं।