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कबीर महोत्सव
 

संत कबीर ने अन्याय और आडम्बर  से मुक्त समानता पर आधारित समाज का ताना-बाना बुना था। वे कमजोर वर्ग के उत्थान के पक्षधर थे। जो व्यक्ति अपने समय के विपरीत होता है, उसे अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं। सम्पूर्ण अस्तित्व को मिटा देने वाली कठिनाईयों से जब वह बच जाता है, तो लोग इस अनुमान से उसकी ओर दौड़ते हैं कि उसमें कुछ असाधारण है। विभिन्न कठिनाईयों से निरंतर जूझते हुये व्यक्ति असाधारण होता जाता है और उसे ईश्वर का अवतार मान लिया जाता है। कबीरदास जी इसी तरह के व्यक्ति थे। वे गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी आदि की तरह राजघराने जैसी पृष्ठभूमि से नहीं थे। उनका परिवार उपेक्षित और तिरस्कृत रूप में जीपन यापन कर रहा था। ऐसी परिस्थिति में देश की धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध खड़े होना कबीरदास जी को महान संत की श्रेणी में लाता है।

कबीरदास जी भक्ति और सूफी आंदोलन के प्रमुख लोगों में से एक हैं। इस आंदोलन के जरिये उन्होंने समाज के निम्न वर्ग और स्त्रियों के मुक्त होने का रास्ता बताया। मध्यप्रदेश के लिये यह गर्व का विषय है कि कबीरदास जी मध्यप्रदेश की धरती पर बघेलखंड और माँ नर्मदा के उद्गम क्षेत्र अमरकंटक में आकर रहे और इस भूमि को अपने विचार-दर्शन से संस्कारित किया। इसी का प्रभाव है कि आज पूरे प्रदेश में उनके विचारों से प्रभावित होकर लोगों ने उन्हें अपने जीवन में रचा-बसा लिया है। प्रदेश के बघेलखंड, बुंदेलखंड, निमाड़ और मालवांचल में आज भी कबीर के पदों को गाया जाता है, जिससे सामाजिक एकता एवं समरसता को बढ़ावा मिलता है।

कबीरदास जी जाति से जुलाहे और धार्मिक दृष्टि से मुसलमान थे, लेकिन अपनी सीमाओं को लांघकर उन्होंने गुरु रामानंद से दीक्षा ली। कबीरदास जी का मानना था कि सामाजिक उपेक्षा गरीबी से भी ज्यादा अपमानजनक होती है, इसलिये जात-पात, उच्च वर्ग-निम्न वर्ग और विभिन्न धर्मों में बंटे समाज के बीच बढ़ती कटुता से वे बेचैन थे। वह इन सभी के बीच में मानवता को स्थापित करना चाहते थे, उन्होंने अपने पदों के माध्यम से गरीबों के उत्थान, सम्मान और समाज के उच्च वर्ग के मन में सकारात्मक सोच लाने का काफी प्रयास किया। उनका मानना था कि समाज में सत्य, अहिंसा, श्रद्धा, विनय, कृतज्ञता और प्रेम जैसे मानवीय मूल्यों की स्थापना होनी चाहिये और भेदभाव समाप्त होना चाहिये। इन मूल्यों और विचारों की आवश्यकता देश और समाज के प्रत्येक काल में रही है और आज भी है।

कबीरदास जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचार और दर्शन में एकरूपता दिखाई देती है। देश में दो अलग-अलग कालखंड के विचारक और चिंतक, समय और परिस्थितियों को एक दृष्टि से देखते हैं। यह महत्वपूर्ण है। एक ओर जहाँ कबीरदास जी ने सामाजिक समरसता पर जोर दिया है, वहीं दूसरी ओर पंडित दीनदयाल जी ने एकात्ममानव दर्शन और अंत्योदय के माध्यम से सामाजिक एकता, सौहार्द्र एवं गरीबों के कल्याण की बात की है। मध्यप्रदेश सरकार ने विगत् वर्षों में प्रदेश के कमजोर वर्गों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग, किसानों, महिलाओं और युवाओं के उत्थान के लिये अनेक कार्यक्रम प्रारंभ किये हैं, जिसके परिणाम आज प्रदेश के विकास में परिलक्षित हो रहे हैं।

प्रदेश सरकार द्वारा प्रदेश की धरती पर कबीर महोत्सव का आयोजन करना, जिस पर कभी कबीरदास जी ने सत्य और निडरता का संदेश दिया था, निश्चित रूप से गौरव का विषय है। मध्यप्रदेश सरकार कबीरदास जी की वैचारिक परम्परा को आगे बढ़ाने के लिये साहित्यकारों को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय कबीर सम्मान द्वारा प्रोत्साहित भी करती है। प्रदेश सरकार का यह कदम कबीर के विचारों को सम्पूर्ण प्रदेश एवं देश में प्रसारित करेगा।