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‘ युवा मस्तिष्क बहुत सक्रिय होता है, इसे सृजन में लगायें
 

उड़ान’ स्तंभ के पिछले अंक में उल्लेखित आइजक न्यूटन के जीवन से हमें कई प्रेरणाएं मिलती हैं। उनके जीवन से हमें अपने आसपास हर चीज को ध्यान से देखने, कोई भी अध्ययन बेकार नहीं जाने, अवसर का लाभ उठाने और तार्किक यात्राएं करने, प्रतिकूल परिस्थितियों को फलदायी परिस्थितियों में बदलने, प्रयोग करने और अपने विचारों की प्रायोगिक पुष्टि करने, अवसाद से उबरने, अपने पर भरोसा रखने, किसी का इंतजार न करते हुए अकेले ही आगे बढ़ने, लोगों का मार्गदर्शन करने में समर्थ रचनाओं का सृजन करने, अहंकार से बचने और जन-मानस में विज्ञान के प्रति गहरे विश्वास को पैदा करने जैसी मार्गदर्शी और प्रेरणास्पद टिप्स मिलती हैं। न्यूटन के जीवन का उद्देश्य प्रकृति के रहस्यों को समझने के लिए विज्ञान गढ़ना था। वे सफल हुए, लेकिन प्रकृति के रहस्य स्थूल जगत तक ही सीमित नहीं हैं। सूक्ष्म जगत में व्याप्त प्रकृति के रहस्यों को समझना न्यूटन द्वारा सृजित विज्ञान की सहायता से संभव नहीं हो पा रहा था। इसे समझने के लिए सर्वथा नये विज्ञान की आवश्यकता थी। इसे गढ़ने में वर्नर हैजनबर्ग का महत्वपूर्ण योगदान है तथा अत्यंत प्रेरक भूमिका है। आइये ‘उड़ान’ के इस अंक में हम देखते हैं कि किस तरह वर्नर हैजनबर्ग हमारी प्रेरणा के स्रोत बनते हैं तथा मार्गदर्शन देते हैं, जो जीवन की नयी उड़ान के लिए हमें तैयार करने में सहायक सिद्ध होते हैं।खाली समय में अपनीरुचि की पुस्तकें पढ़ेंसन् 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ गया, जो सन् 1919 तक चला। सन्1918 में जर्मनी में क्रांति हुई। इस कारण म्यूनिक में भी बहुत आपदाएं आईं। वर्नर हैजनबर्ग ने इस क्रांति में भाग लिया। रात को ड्यूटी रहती, लेकिन जब सुबह-सुबह काम नहीं रहता तब उनका पुस्तकें पढ़ने का शौक पूरा होता। एक बार महान दार्शनिक प्लेटो की ग्रीक भाषा में लिखी प्रसिद्ध पुस्तक ‘थिमेअस’ उनके हाथ लग गई। इस पुस्तक में प्राचीन यूनान के परमाणु संबंधी सिद्धांत का वर्णन था। इस पुस्तक ने उनको परमाणु के रहस्यों को गहराई से जानने के लिए उत्सुक बना दिया। अब उनका मन गणित के साथ ही भौतिकी के अध्ययन की ओर भी होने लगा। आगे चल कर उन्होंने परमाणु और नाभिक की दुनिया को समझने का ही अपना लक्ष्य बनाया। इस तरह जब हम अपने खाली समय में अपनी रुचि की पुस्तकें पढ़ते हैं, तो उनसे अनजाने में ही हमें रास्ता मिलने लगता है, जिससे हमें अपना लक्ष्य निर्धारित करने में मदद मिलती है। अपने खाली समय में ज्ञान से भरी पुस्तकों को पढ़ने से बेहतर और क्या विकल्प हो सकता है? मजदूरी जैसे काम को ‘शिक्षा देने वाले काम’ के रूप में लें जर्मनी में क्रांति के दिनों में, जब जर्मनी के हालत बिगड़ने लगे और हैजनबर्ग के परिवार के पास खाने तक का संकट था, तब उनको स्कूल छोड़कर कुछ महिनों के लिये म्यूनिक से करीब 50 मील दूर स्थित खेत पर मजदूरी के लिये जाना पड़ा। खेत पर उन्हें अक्सर साढ़े तीन बजे सुबह उठना पड़ता और फिर रात को करीब दस बजे तक काम करना होता था। कई बार उन्हें दिन में घास काटने जैसा थका देने वाला परिश्रम भी करना पड़ता। लेकिन उन्होंने इस काम को मजबूरी में करने की बजाय ‘शिक्षा देने वाले काम’ के रूप में लिया। बाद में उन्होंने महसूस किया कि इस दौरान उन्हें वह शिक्षा मिली जो स्कूलों में रहकर शायद कभी नहीं मिल सकती थी। इससे हमें जीवन-निर्माण के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण सूत्र मिलता है। हमारे जीवन में भी कई बार ऐसी परिस्थितियाँ आ जाती हैं जब हमें अपने स्वाभाविक रुचि के काम को छोड़कर कुछ और कार्य करना पड़ता है। ऐसे में उस समयावधि में किये जा रहे कार्य को मजबूरी में कर के बोर होने के बजाय हम सोचें कि उसे किस तरह शिक्षा देने वाले रुचिकर कार्य में बदला जा सकता है। प्रतिभाशाली लोगों कीकम्पनी में रहेंअपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद हैजनबर्ग प्रतिष्ठित भौतिकशास्त्री अर्नोल्ड सोमेरफेल्ड के मार्गदर्शन में भौतिकी पढ़ने के लिए म्यूनिक विश्वविद्यालय में आ गये। यहाँ के स्टॉफ में वीन, प्रिंगशेम और रोजेंथल जैसे अन्य प्रतिष्ठित भौतिकविद् भी शामिल थे। म्यूनिक में उनकी मुलाकात प्रखर बुद्धि वाले विद्यार्थी वुल्फगैंग पॉली (जो आगे चल कर सन् 1945 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हुए) से हुई। पॉली शोध करने और इस दौरान प्रस्तुत किये जाने वाले सिद्धांतों में गलतियों को खोजने में माहिर थे। वे पॉली के व्यक्तित्व से बहुत गहराई तक प्रभावित हुए। इस तरह प्रतिभाशाली लोगों के बीच रहते हुए उनकी प्रतिभा मुखरित होने लगी, जिससे उनके मन में कुछ नया और अनूठा करने का सपना पलने लगा। किसी के भी जीवन में सोहबत यानि कम्पनी कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है, यह हमें इससे समझ में आता है। हम यह ध्यान रखें कि जब हम अपने कैरियर बनाने की उम्र में हों तो हमें अपनी कम्पनी ऐसी चुननी चाहिए जो बेहतर और प्रतिभाशाली लोगों की हो। कहते भी हैं कि हम अपने आसपास बसने वाली कम्पनी के ‘औसत’ होते हैं। अतः हम प्रतिभाशाली लोगों की कम्पनी में रहें, जो हमें सतत् प्रेरित करती रहे तथा हमें अपने दीर्घकालीनलक्ष्य को निर्धारित करने में सहायक हो सके। प्रतिभाशाली लोगों को मदद और अवसर मिलने में देर नहीं लगती किसी भी शिक्षक को अपने विद्यार्थियों को पहचानने में देर नहीं लगती है। शीघ्र ही सोमरफेल्ड को पता लग गया कि उनके विद्यार्थी हैजनबर्ग को ‘परमाणु के चितेरे’ नोबेल पुरस्कार से सम्मानित नील्स बोहर के परमाणु भौतिकी के काम में बहुत रुचि है। अतः उन्होंने उनकी इस रुचि को और अधिक विकसित करने में मदद की। एक बार गॉटिंग्जन में ‘बोहर फेस्टिवल’ का आयोजन हुआ, जिसमें बोहर के व्याख्यानों की श्रृंखला भी आयोजित की गई थी। सोमरफेल्ड ने इसमें भाग लेने के लिए अपने साथ उनको भी ले लिया। इसी तरह एक बार वर्नर को अपने पीएच.डी. के कार्य हेतु एक परियोजना पर कार्य करने के लिए गॉटिंग्जन जाना पड़ा। उन दिनों गॉटिंग्जन विश्वविद्यालय मैक्स बॉर्न के नेतृत्व में भौतिकी के बहुत बड़े केन्द्र के रूप में विश्व में अपनी विशिष्ट पहचान रखता था। परियोजना पर कार्य के दौरान हैजनबर्ग बॉर्न से व्यक्तिगत संबंध बनाने में सफल हो गये। इससे पीएच.डी. मिलने के बाद उन्हें उनके सहायक के रूप में कार्य करने का सहज ही अवसर मिल गया। इस तरह हम देखते हैं कि प्रतिभाशाली लोगों को इंतजार नहीं करना पड़ता। उनके कार्य उन्हें अवसर दिलाते रहते हैं। उनका जीवन हमें प्रेरित करता है कि हम जहाँ रहें वहाँ अपनी प्रतिभा का उपयोग करते हुए पूरे मन से काम करते रहें। हमें अवसर इंतजार करते हुए मिलेगा। प्रयास जुनूनी हों तो शारीरिक रूग्णता बाधा नहीं बनती हैजनबर्ग की यह पुख्ता धारणा थी कि किसी भी सिद्धांत को ‘यथार्थ’ पर आधारित होना चाहिये, न कि कल्पनाओं पर आधारित, सत्यापित न किये जा सकने वाले किसी मॉडल पर। वह क्वांटम जगत से मिल रही चुनौतियों को समझने के लिए भी इसी धारणा के आधार पर आगे बढ़ना चाह रहे थे। इसके पूर्व काल्पनिक मॉडल के आधारों पर ही वैज्ञानिक कार्य कर रहे थे। हैजनबर्ग की सोच नई दिशा की ओर आगे बढ़ने का संकेत दे रही थी। लेकिन, सूक्ष्म दुनिया को समझने के लिए आवश्यक विचारों के बीजारोपण के इस दौर में उन्हें ‘हे-फीवर’ हो गया। उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘फिजिक्स एण्ड बीयांड’ में लिखा कि ‘हे-फीवर के कारण जब वे हवा परिवर्तन के लिये हेलीगोलैण्ड गये तब उनकी घंटी बजी।’ बुखार के कारण शारीरिक कमजोरी के बावजूद उनका मस्तिष्क इन विचारों को दिशा देने के लिए बहुत उत्तेजित और सक्रिय था। रात को तीन बजे उनको आइडिया आया, जिससे उनके सामने सब कुछ साफ हो गया। हैजनबर्ग ने इसके बाद मैक्स बॉर्न और पॉस्कल जॉर्डन के साथ मिलकर मात्र 6 महिनों में ही ‘क्वांटम मेकेनिक्स’ का पहला संस्करण ‘मैट्रिक्स मेकेनिक्स’ के रूप में गढ़ कर दुनिया के सामने रख दिया। अतः जब लक्ष्य साफ हो तथा प्रयास जुनूनी हों तो दिमाग हमेशा बहुत सक्रिय रहता है। विचारों के प्रवाह में रूग्णता बाधा नहीं बनती। भौतिक ज्ञान को जाननेकी अपनी सीमा होती हैकोपेनहेगन में एक दिन हैजनबर्ग को स्पष्ट महसूस हुआ कि भौतिक ज्ञान को जानने की हमारी अपनी सीमा है। एक सीमा के नीचे हम कण की ‘वास्तविकता’ को जान ही नहीं सकते, क्योंकि ‘अवलोकन’ की प्रक्रिया देखी जाने वाली ‘वास्तविकता’ को बदल देती है। अवलोकन के पूर्व हम नहीं कह सकते कि ‘वास्तविकता’ क्या है। ‘वास्तविकता’ का संबंध ‘देखने की प्रक्रिया’ से है। इस तरह हैजनबर्ग के उर्वरक मस्तिष्क में ऐसा कुछ चला जिसने प्रकृति के उस गूढ़ रहस्य को उजागर किया। उन्होंने भौतिकी में ‘अनिश्चितता के सिद्धांत’ को प्रतिपादित किया। इस सिद्धांत ने भौतिकी की नींव को ही हिला दिया। इसके भौतिकी में प्रवेश ने न सिर्फ स्थल जगत को समझने के लिए प्रचलित भौतिकी को बदलने के लिए मजबूर कर दिया वरन् इसने विज्ञान की कई अन्य शाखाओं समेत आर्ट और दर्शन को भी अपने प्रभाव में लिया। इस तरह उनकी प्रकृति की समझ तथा लगन से जो क्रांतिकारी कार्य हुआ, वह वैज्ञानिक इतिहास में बेमिसाल है। हम अपनी नैसर्गिक प्रतिभा को पहचानें तथा तार्किक तरीके से प्रकृति के रहस्यों को उजागर करने में जुटें, तो हो सकता है कि हैजनबर्ग के समान हम भी वह कर सकने में सफल हो सकें, जो दुनिया को देखने के लिए नयी रोशनी दे सके। लक्ष्य निर्धारित कर उसे प्राप्त करेंगणित में बेहद रुचि रखने वाले वर्नर हैजनबर्ग भौतिकी की ओर अपने स्कूल के अंतिम दिनों में आकृष्ट हुए और फिर ऐसा कुछ कर गये, जिसने प्रचलित भौतिकी की चूलें हिला दीं। वे कितने प्रतिभाशाली रहे होंगे और उनके कार्य का स्तर क्या रहा होगा, इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि सूक्ष्म दुनिया को समझने के लिए जिस क्वांटम यांत्रिकी को उन्होंने मात्र 23 वर्ष की उम्र में गढ़ा, उसके लिए उन्हें मात्र 31 वर्ष की उम्र में ही नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस तरह हम उनसे प्रेरणा ग्रहण करते हुए अपनी क्षमता पहचानें तथा विश्वास करें कि युवा मस्तिष्क बहुत सक्रिय होता है, अतः इसे सृजन में लगाना है। इसके लिए अपना लक्ष्य निर्धारित करें तथा उसकी प्राप्ति में समर्पित होकर पूरी तन्मयता के साथ जुटें।अपने विचारों को बाँटेंलोगों में रुचि जगाएं1925 में पी.ए.एम. डिराक को कैम्ब्रिज में हैजनबर्ग को सुनने का अवसरमिला। वे इंजीनियरिंग से आये थे। अतः हैजनबर्ग के व्याख्यान के लिए भौतिकी के लिए सर्वथा नये, अनुभवहीन और अनजाने थे। लेकिन उनका व्याख्यान सुनने के बाद उनकी रुचि भौतिकी में जागी और वे क्वांटम दुनिया में प्रवेश कर गये तथा सूक्ष्म जगत से उठ रही चुनौतियों और समस्याओं के हल में जुट गये। वे अप्लाइड गणित के विद्यार्थी थे। अतः भौतिकी को देखने की उनकी दृष्टि सर्वथा नयी थी। उनके सामने आइंस्टीन का ऊर्जा-द्रव्यमान समीकरण आया, जो उन्हें परमाणु में अत्यंत तीव्र वेग से गति कर रहे इलेक्ट्रॉन के संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण लगा, जिसके कारण क्वांटम यांत्रिकी के साथ मिलकर सापेक्षता क्वांटम यांत्रिकी की खोज स्वतः ही हो गई, जिसने प्रकृति में प्रतिकणों के अस्तित्व में होने की भविष्यवाणी की। इस तरह हम उनसे सीखते हैं कि अपने ज्ञान को अपने तक ही सीमित मत रखो। जब हम इसे बाँटते हैं तो हो सकता है कि पाठकों में से कोई उससे प्रभावित हो तथा उसमें अपनी ओर से कुछ जोड़े और हमारी विकास यात्रा आगे बढ़ाने में सफल हो जाए।नम्र रहें तथा श्रेय देंवर्नर हैजनबर्ग ने प्रकृति को समझने के लिए जो सूत्र दिये, निश्चित ही वे उन्हें अत्यंत महान वैज्ञानिक की श्रेणी में खड़ा करते हैं। सफलता मिलने के बाद व्यक्ति सामान्यतः इसका श्रेय किसी और को देने में पीछे रहते हैं, लेकिन वे ऐसे नहीं थे। उन्होंने अपनी आत्मकथा में अपने बारे में लिखा कि उन्होंने सोमरफेल्ड से सकारात्मकता और भौतिकी बोहर से सीखी। लेकिन, जहाँ तक गणित की बात है, वह उन्होंने गॉटिंग्जन में रहते हुए सीखी। यह उनकी विनम्रता को दर्शाती है। यह हमारे लिए उनसे मिलने वाली एक बड़ी सीख भी है। सफलता मिलने के बाद हम विनम्र बनें तथा अपनी सफलता और प्रतिभा विकास में मिले किसी भी योगदान को न भूलें।भौतिक प्रगति के बीच नैतिकताकी निहायत जरूरत है हैजनबर्ग भौतिकी की दुनिया और आध्यात्मिक दुनिया दोनों को ही अहम् मानते थे। वे अक्सर सोचते थे कि आज के वैज्ञानिक दौर में जहाँ कोई दिशा देने वाले आदर्श नहीं बचे हों, मूल्यों का पैमाना लुप्त हो गया हो और इसके साथ ही हमारे ‘कार्यों और दूसरों की तकलीफों’ के अर्थ खो गये हों तथा अंत में आरोपों का खंडन और समाज में निराशा ही शेष बचे हों, वहाँ नैतिकता की निहायत जरूरत है। वे मानते थे कि ‘नैतिकता’ की नींव ‘धर्म’ है। इसीलिये वे विज्ञान से बन रही इस धारणा से सहमत नहीं थे कि ‘धर्म मानवीय चेतना के विकास के उस आरंभिक दौर की सामान्य बात है, जिसका अब समय नहीं है और जिसे अब से छोड़ना जरूरी है।’ उन्होंने नैतिकता को जीवन की अनिवार्यता बताया। उनके विचार के निहितार्थ बहुत गहरे हैं। विज्ञान के साथ नैतिकता आज की आवश्यकता है। नैतिकता के अभाव में हमारी पृथ्वी और हमारा जीवन सुरक्षित नहीं रह सकता। हम गंभीरता से सोचें तथा आत्मावलोकन करें। हमें चाहिए कि हम अपने जीवन में नैतिकता को प्रमुख स्थान देते हुए जीवन के सफर में आगे बढ़ने का संकल्प लें।