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‘दसवें तीर्थंकर भगवान शीतलनाथ की तपोभूमि है ग्यारसपुर
 

विदिशा की गणना भारत के प्राचीनतम और इतिहास प्रसिद्ध नगरों में की जाती है। एक लम्बे समय तक इस नगर को ‘आकर’ याने पूर्वी मालवा की राजधानी होने का गौरव प्राप्त रहा है। पाटलिपुत्र से भारकच्छ अर्थात् आधुनिक भड़ोंच तक का राजपथ तथा उत्तर से दक्षिण जाने वाला राजपथ विदिशा होकर गुजरता था। इसलिये विदिशा की समृद्धि सदा अक्षुण्ण बनी रही। विदिशा के वैभव और स्वर्णिम अतीत की गौरव-गाथा बेसनगर, उदयपुर, ग्यारसपुर और बड़ोह-पठारी के भव्य मन्दिरों और पुरावशेषों में मूर्तिमान है।हिन्दू, जैन तथा बौद्ध मन्दिरों, मठों, गुफाओं तथा मूर्तियों का विदिशा में अद्भुत सह-अस्तित्व है। इस क्षेत्र में हिन्दू धर्म के अनुयायी सम्राटों का शासन रहा है। परन्तु वे इतने उदार थे कि उन्होंने भिन्न धर्मावलम्बियों को आस्था-पालन में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होने दी। मालवा में परमार वंश के शासनकाल में जैन कला तथा स्थापत्य चरमोत्कर्ष पर था। परमार शासक यद्यपि हिन्दू धर्म के अनुयायी थे, तथापि वे अत्यन्त उदार और सहिष्णु थे। उन्होंने 9वीं से 13वीं शताब्दी के बीच जैन धर्म को फलने-फूलने का न केवल अवसर प्रदान किया वरन् उदार-हृदयता से उसमें सहयोग भी दिया।ग्यारसपुरविदिशा के जैन अवशेषों में सबसे प्रमुख स्थान ग्यारसपुर के मालादेवी मन्दिर का है। ग्यारसपुर, विदिशा से करीब 38 किलोमीटर दूर उत्तर-पूर्वी दिशा में, विदिशा-सागर मार्ग पर स्थित है। यहां के अवशेष इसके गौरवशाली अतीत के परिचायक हैं। ग्यारसपुर दो पहाड़ियों के बीच बसा हुआ एक प्राचीन नगर और महत्वपूर्ण कला-तीर्थ है। कुछ विद्वानों का मत है कि यह दसवें तीर्थंकर, भगवान शीतलनाथ की तपोभूमि है इसीलिए इसे कल्याण का क्षेत्र भी माना जाता है। कुछ दैवीय घटनाओं के कारण स्थानीय जैन समाज इसे अतिशय क्षेत्र भी मानता है।ग्यारसपुर में और उसके आसपास जो पुरावशेष बिखरे हुए हैं, उनसे ज्ञात होता है कि यह नगर बौद्ध, जैन तथा हिन्दू धर्मों के प्रभाव में रहा है। मन्दाकिनी ताल के पास, प्राचीन नगर के चिन्ह दिखायी पड़ते हैं। इससे प्रतीत होता है कि यह अतीत में एक महत्वपूर्ण नगर रहा होगा। यहां के प्राचीन स्मारकों में, ग्यारसपुर के बाहर, पश्चिम दिशा में, अठखम्भा और बज्र मठ, ग्यारसपुर के बाहर पहाड़ी पर हिण्डोला तोरण और चारखम्भा और नगर के दक्षिण में, पहाड़ी की चोटी पर मालादेवी मन्दिर है। नगर में कुछ बौद्ध स्तूपों के अवशेष भी हैं।हिण्डोला तोरणग्यारसपुर नगर के बाहर पहाड़ पर हिण्डोला तोरण है। तोरण अत्यन्त अलंकृत है और किसी विशाल मन्दिर का प्रवेश द्वार है। मन्दिर विष्णु अथवा त्रिमूर्ति का रहा होगा, जिसके अवशेष उत्खनन में प्राप्त हुए हैं। यह तोरण हिण्डोले के समान दिखायी देता है, इसलिए इसका ऐसा नाम पड़ा है। तोरण के स्तम्भ चारों ओर अलंकृत हैं और उस पर विष्णु के दशावतार अंकित हैं। इसका निर्माण 8वीं से 10वीं शताब्दी के बीच हुआ प्रतीत होता है।मालादेवी मन्दिरहिण्डोला तोरण से करीब दो फर्लांग की दूरी पर, पहाड़ी की ढलान पर, मालादेवी का नयनाभिराम मन्दिर स्थित है। यह मन्दिर जागर शैली का है, यह शैली मन्दिर के निर्माण में अपने विकास के चरमबिन्दु पर पहुंची है। इस मन्दिर के पीछे की दीवार, पहाड़ को काटकर बनायी गयी है। मालादेवी का यह मन्दिर अपनी भव्यता और कलात्मकता के कारण खजुराहो के मंदिरों के समान ही प्रतीत होता है। यह परम्परागत पंचायतन शैली का मंदिर माना जाता है। इसमें गर्भगृह, अंतराल, महामंडप, अर्धमंडप, प्रदक्षिणापथ है। यह एक विशाल अधिष्ठान अर्थात् चबूतरे पर निर्मित किया गया है। अधिष्ठान के ऊपर जंघा या मंदिर की बाह्य दीवारें हैं, जिनमें गवाक्ष हैं। जंघा पर मूर्तियों की तीन पट्टिकायें हैं।इसकी छतें कोण स्तूपाकार हैं, जो क्रमशः उन्नत होती गयी हैं और गर्भगृह के ऊपर उनकी समाप्ति एक उत्तुंग शिखर में होती है। शिखर अत्यन्त अलंकृत है। यह एक पर्वत श्रृंखला-सी प्रतीत होती है। शिखर की चोटी पर आमलक, उस पर चंद्रिकायें, फिर छोटा आमलक, उस पर कलश और अंततः बीजपूरक हैं। मन्दिर में प्रवेश करने के लिये सोपान पथ है। इसके बाह्य द्वार पर देवी की अंकित मूर्ति और आसपास की मूर्तियों से संकेत मिलता है कि यह मंदिर मूलतः देवी का मंदिर था, जिसे बाद में जैन मंदिर में परिवर्तित किया गया।मंदिर का गर्भगृह काफी बड़ा, करीब चौदह फीट लम्बा और साढ़े पन्द्रह फीट चौड़ा है। इसके बीचों-बीच जैन तीर्थंकर, भगवान शांतिनाथ की 5 फुट 3 इंच ऊंची मूर्ति है, जो पद्मासन में है। सिर के ऊपर तीन छत्र हैं। दोनों शीर्ष कोणों पर गंधर्व हैं, जिनके हाथ में मालाएं हैं। दायीं ओर आजू-बाजू के दोनों गर्भगृहों की छत कोण स्तूपाकार है जो सोपान शैली में उठती हुई शिखर तक जा पहुंची है, जिससे शिखर की शोभा द्विगुणित हो गई है। प्रतीत होता है कि यह मंदिर बहुत विशाल रहा होगा और निश्चय की उसमें महामंडप रहा होगा।मंदिर की बाहरी दीवारों पर अलंकरण पट्टिकायें बनी हैं। उनमें विभिन्न तीर्थंकरों के शासन देवताओं और देवियों, सुर-सुंदरियों और व्यालों की मूर्तियां हैं। इस मंदिर का निर्माण 9वीं-10वीं शताब्दी में हुआ था।गड़रमल मंदिरविदिशा में गड़रमल नामक एक विशाल जैन-मंदिर बड़ोह ग्राम के निकट स्थित है। यह ग्राम कुरवाई से तीस किलोमीटर दूर, दक्षिण पूर्व में तथा भोपाल-बीना रेल लाइन के कुल्हार स्टेशन से करीब 19 किलोमीटर दूर है। प्राचीनकाल में बड़ोह पर्याप्त महत्व का स्थान रहा होगा, क्योंकि यहां स्थित अनेक मंदिरों के अवशेष इसके गौरवशाली अतीत की पुष्टि करते हैं। उस समय संभवतः पठारी का क्षेत्र भी बड़ोह नगर का हिस्सा रहा होगा। यहां के अवशेषों में गड़रमल मंदिर सबसे महत्वपूर्ण है। यह मंदिर एक बड़ी पहाड़ी के दक्षिण-पूर्व में स्थित है और बहुत ऊंचा होने के कारण दूर से दिखायी देता है। मंदिर के चारों ओर चार-दीवारी है। जिसमें एक द्वार बना हुआ है। द्वार के ललाट बिम्ब पर देवी की मूर्ति है। मूर्ति चतुर्भुजी है, जिसकी एक भुजा खण्डित है और शेष तीन में ढाल, तलवार और धनुष हैं। देवी का वाहन भैंसा भी उसमें दिखाया गया है। जैन धर्मावलम्बी इसे आठवें तीर्थंकर, चंद्रप्रभ की शासन सेविका, ज्वालामालिनी मानते हैं। मंदिर में एक स्त्री तथा बालक की मूर्ति है। पहले विद्वान इसे माया देवी तथा बालक को बुद्ध की प्रतिमा मानते थे। परन्तु बाद में कनिंघम ने उसे त्रिशाल और महावीर माना। उसकी पादपीठ पर शेरों की जो आकृतियां हैं, उनसे जैन कला स्पष्ट परिलक्षित होती है। इस मन्दिर के सम्बन्ध में एक किंवदन्ती प्रचलित है। प्राचीन समय में पहाड़ी पर एक मुनि तपस्या करते थे। एक गड़रिया उस पर भेड़ चराता था। एक भेड़ प्रतिदिन गुफा से निकलकर भेड़ों के झुण्ड में शामिल हो जाती थी और शाम तक अंतर्ध्यान हो जाती थी। गड़रिये ने एक दिन भेड़ का पता लगाने का निश्चय किया। गड़रिया भेड़ के पीछे-पीछे गुफा तक गया। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि भेड़ वहां नहीं थी, परन्तु एक ऋषि अवश्य गुफा में तपस्यारत् थे। गड़रिये ने ऋषि से चराई मांगी। मुनि मुस्कुराये। उन्होंने मुट्ठी बंद कर के गड़रिया की झोली में कुछ डाल दिया। घर पहुंचकर उसने स्त्री से सब बात कह सुनाई। परन्तु जब उसने खोलकर देखा तो उसे क्रोध आया कि मुनि ने तो उसे केवल मक्के के दाने दिए हैं। उसने गुस्से में उन्हें कंडे के ढेर पर फेंक दिया। जब गड़रिये की पत्नी रसोई के लिए कंडे लेने गयी तो उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि कंडे सोने के हो गये हैं। इससे पति-पत्नी बहुत खुश हुए। गड़रिये ने बाद में यहां एक मंदिर का निर्माण कराया। गड़रिये के कारण लोग मंदिर को गड़रमल मंदिर कहने लगे। उसने मंदिर के सामने एक तालाब और घाट बनवाये। उस समय जो मंदिर थे, उनका निर्माण दो भिन्न-भिन्न कालों में हुआ है। मंदिर के नीचे का भाग तथा ड्योढ़ी, जो कि मुख्य मंदिर के अवशेष हैं, आठवीं सदी में निर्मित किये गये। मंदिर के नष्ट होने के बाद उसके ऊपरी भाग का निर्माण पहले के हिन्दू तथा जैन मंदिरों के अवशेषों से प्राप्त सामग्री से किया गया है। इसमें सभा मण्डप नहीं है और यह ग्वालियर के तेली के मंदिर के अनुरूप है। मुख्य मंदिर के चारों ओर सात छोटे-छोटे मंदिर हैं, जो कि अब खंडहर हो गये हैं। चबूतरे की दीवारों, जिसपर ये छोटे मंदिर बने थे, अनेक मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। उस मंदिर में अब भी द्वार पर, दीवारों पर और खम्भों में जैन मूर्तियां देखी जा सकती हैं। मंदिर का प्रवेश द्वार, शिल्प का अच्छा चित्र उपस्थित करता है। उस पर अलंकरण के अलावा नवगृह, अष्टमातृका का भव्य अंकन है। मंदिर के सामने, सरोवर के तट पर एक बारादरी है। पास ही पार्वती मंदिर, दशावतार मंदिर और वराह मूर्ति है।गड़रमल मंदिर के उत्तर-पश्चिम में, पहाड़ी की तलहटी में जैन मंदिरों का समूह है। इनका निर्माण, भिन्न-भिन्न समय में नौवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच हुआ है। इनमें तीर्थंकरों की मूर्तियां हैं, जो आठ से बारह फीट ऊंची हैं। मूर्तियां खड़गासन तथा पद्मासन दोनों में हैं।विदिशा जिले में हिन्दू, जैन, गोंड तथा जैन अवशेषों की प्रचुरता इस जिले के पुरातन कला वैभव की अनवरत् गाथा मुखरित करती है।