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विश्व जनसंख्या दिवस
जनसंख्या नियंत्रण के लिये जागरुकता आवश्यक
 

समूचा विश्व वर्तमान में बढ़ती आबादी की समस्या से जूझ रहा है। विश्व में बढ़ती आबादी के साथ बुनियादी सुविधाओं, रोज़गार और पर्यावरण के लिए भी संकट खड़ा हुआ है। तीस साल पहले इस समस्या को विश्व स्तर से देखा गया था। दुनिया में हर साल 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य तेजी से बढ़ती जनसंख्या से सम्बन्धित बिन्दुओं, चिन्ताओं तथा संभावनाओं पर सारी दुनिया का ध्यान आकर्षित करना है। पहली बार यह कार्यक्रम सन् 1987 में प्रारम्भ किया गया था। यह तारीख इतिहास में विशेष स्थान रखती है, क्योंकि इसी दिन दुनिया की जनसंख्या ने 500 करोड़ के आँकड़े को छुआ था। सन् 1987 में मनाए गए विश्व जनसंख्या दिवस की थीम ‘आपात परिस्थितियों से पीड़ित जनसंख्या’ थी। तब से लेकर अब तक हर वर्ष 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस का आयोजन किया जाता है।

11 जुलाई को आयोजित होने वाले इस विशेष जागरुकता कार्यक्रम का उद्देश्य परिवार नियोजन, लैंगिक समानता, माता और बच्चों का स्वास्थ्य, गरीबी, मानव अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार, लैंगिक-शिक्षा और गर्भनिरोधक दवाओं के इस्तेमाल के प्रति लोगों को जागरुक करना है। इस दिन कण्डोम जैसे सुरक्षात्मक उपायों, जननी स्वास्थ्य, नवयुवती-गर्भावस्था, बालिका-शिक्षा, बाल विवाह और यौन रोगों संबंधी आदि गंभीर विषयों पर विचार रखे जाते हैं।

दो सौ से अधिक देश, लोगों को कर रहे जागरुक

संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार दुनिया की कुल आबादी 702.3 करोड़ के आँकड़े को पार कर चुकी है। इस आबादी का 60 प्रतिशत हिस्सा एशिया महाद्वीप में निवास करता है। चीन और भारत की संयुक्त आबादी विश्व की आबादी का लगभग 37 प्रतिशत है। आबादी का सबसे अधिक दबाव चीन और भारत पर है। तीसरी दुनिया की बढ़ती आबादी के सामने अनेक गम्भीर चुनौतियाँ हैं। मौजूदा समय में 200 से अधिक देश, छोटे परिवार तथा सेहतमन्द जीवन के लिये लोगों को जागरुक कर रहे हैं।

सन् 2007 में संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या प्रभाग ने अनुमान लगाया था कि वर्ष 2055 में दुनिया की आबादी 10 अरब के आँकड़े को पार कर जाएगी। उम्मीद है कि, भविष्य में दुनिया की आबादी में वृद्धि, शिखर तक पहुँचेगी और उसके बाद आर्थिक कारणों, स्वास्थ्य चिंताओं, भूमि के अंधाधुंध प्रयोग, उसकी कमी और पर्यावरणीय संकटों के कारण आबादी कम होने लगेगी। इस बात की 85 प्रतिशत संभावना है कि इस सदी के अंत से पहले दुनिया की आबादी बढ़नी बंद हो जायेगी। लगभग 60 प्रतिशत संभावना है कि दुनिया की जनसंख्या वर्ष 2100 से पहले तक 10 अरब लोगों से अधिक नहीं होगी, करीब 15 प्रतिशत संभावना यह है कि सदी के अंत में विश्व की जनसंख्या, आज की तिथि में विश्व की कुल जनसंख्या से कम हो जाएगी।

भारत में प्रतिवर्ष जनसंख्या के बढ़ने के कारण समस्याओं में भी लगातार वृद्धि हो रही है। आने वाले समय में समस्याएं और भी घातक हो जायेंगी, क्योंकि बढ़ती हुई जनसंख्या का प्रभाव सीधे रूप से प्रकृति पर पड़ता है।

गाँवों की तुलना में तेजी से बढ़ी शहरी आबादी

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री माल्थस ने कहा था कि ‘‘यदि संयम और कृत्रिम साधनों से बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित नहीं किया गया तो प्रकृति अपने क्रूर हाथों से इसे नियंत्रित करने का प्रयास करेगी।’’ एक अध्ययन के अनुसार यह अनुमान है कि वर्ष 2025 तक भारत, चीन को पछाड़ते हुये दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जायेगा।

2011 की जनगणना के तदर्थ आँकड़ों के अनुसार देश की आबादी एक अरब 21 करोड़ है। इसमें 83 करोड़ 31 लाख ग्रामीण और 37 करोड़ 71 लाख शहरी हैं। पिछले एक दशक में ग्रामीण आबादी में नौ करोड़ चार लाख 70 हज़ार और शहरी में नौ करोड़ 10 लाख की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार देश की आबादी का 68.84 प्रतिशत हिस्सा ग्रामीण और 31.16 फीसदी हिस्सा शहरी है। सर्वाधिक 89.96 प्रतिशत ग्रामीण आबादी हिमाचल प्रदेश में और सबसे ज़्यादा 97.50 फीसदी शहरी जनसंख्या दिल्ली में है।

देश में पिछले एक दशक में गाँवों की तुलना में शहरी आबादी ढाई गुना से भी अधिक तेज़ी से बढ़ी है। भारत के महापंजीयक और जनगणना आयुक्त के कार्यालय की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले दशक (2001-11) में देश की जनसंख्या में 17.64 प्रतिशत का इजाफ़ा हुआ है। यह वृद्धि गाँवों में 12.18 और शहरी क्षेत्रों में 31.80 प्रतिशत रही है। ग्रामीण आबादी में सबसे ज़्यादा बढ़ोत्तरी की दर बिहार में 23.90 प्रतिशत रही है।

भारत ने हालांकि जनसंख्या नियंत्रण की कई नीतियाँ बनाई हैं। कई परिवार नियोजन और कल्याण के कार्यक्रम प्रारम्भ किये हैं, किन्तु इनसे प्रजनन दर में प्रभावी कमी नहीं आयी है। यह उम्मीद की जा रही है कि भारत में जनसंख्या का वास्तविक स्थिरीकरण वर्ष 2050 तक हो पायेगा।

 भारत में जनसंख्या वृद्धि के प्रमुख कारण

इसमें पहला भारत में जन्म दर अभी भी मृत्यु दर की तुलना में ज्यादा है और दूसरा, जनसंख्या सम्बंधी नीतियों और अन्य उपायों के चलते प्रजनन-दर में कमी तो आई है, किन्तु यह अन्य देशों की तुलना में अभी भी ऊँची है।

देश में जनसंख्या वृद्धि की समस्या से निपटने के लिये विशेषज्ञों ने कई उपाय सुझाये हैं। इनमें से एक है बाल विवाह को रोकना। विशेषज्ञों का मानना है कि अल्प आयु में विवाह करने से बच्चे पैदा करने की अवधि बढ़ जाती है, जो कि जनसंख्या वृद्धि का प्रमुख कारण है। इसका दूसरा बड़ा कारण यह है कि गरीब, साधनहीन परिवार सोचते हैं, कि कमाने वाले हाथ जितने ज्यादा होंगे, परिवार की आय भी उसी अनुपात में बढ़ेगी। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि बच्चे बड़े होकर उनके बुढ़ापे का सहारा बनेंगे।

तीसरा कारण जो कि जनसंख्या नियंत्रण की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है, वह यह है कि भारतीय लोग शिक्षा के अभाव के कारण अभी भी जनसंख्या नियंत्रण और गर्भ निरोधकों के इस्तेमाल को लेकर अधिक जागरुक नहीं हैं। इसके अलावा एक कारण यह भी है कि भारत में पुत्रों को कमाऊ पूत माना जाता है, इसलिए कई परिवार पुत्र पैदा होने तक संतान को जन्म देते रहने में विश्वास रखते हैं। इससे आबादी बढ़ती जाती है।

रोज़गार सृजन में बाधक है जनसंख्या वृद्धि

देश में जनसंख्या वृद्धि के कारण कई समस्यायें उत्पन्न हुई हैं। इसमें बेरोजगारी सबसे प्रमुख है। जनसंख्या वृद्धि से देश में आर्थिक शिथिलता बढ़ी है तथा विकास गति भी धीमी हुई है। इसकी वजह से सुविधाओं और विकास के बीच तालमेल नहीं बैठ पा रहा है।

बढ़ती जनसंख्या के कारण परिवहन, संचार, आवागमन, शिक्षा, स्वास्थ्य की सुविधायें कम पड़ गई हैं। स्लम, भीड़-भाड़ वाले मकान और यातायात जाम बढ़ गये हैं। भूक्षेत्रों, जल संसाधनों और वनों का बढ़ी हुई आबादी द्वारा दोहन किया जा रहा है। जिससे हर जगह संसाधनों की कमी हो गई है। खाद्य-उत्पादन और वितरण बढ़ती आबादी की जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहे हैं, इससे उत्पादन लागत बढ़ गई है। इन सभी के कारण देश में आय का असमान वितरण देखने को मिल रहा है।

इसलिए आज देश के विकास के लिए, विकसित समाज और आमजन की बेहतरी के लिए यह आवश्यक है कि हम जनसंख्या नियंत्रण के प्रति सचेत हो जायें और कारगर एवं प्रभावी कदम उठाते हुए अच्छे परिणाम जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में प्राप्त करने का प्रयास करें। इसके लिए आवश्यक होगा कि सरकार, समाज और विभिन्न सामाजिक स्वैच्छिक संगठन मिलकर काम करें। हमें देश और प्रदेश में शिक्षा का विस्तार करते हुए, लड़कियों और महिलाओं की स्थिति को बेहतर बनाने के प्रयास करने होंगे एवं उनके कल्याण के लिये अधिक से अधिक कार्य करने होंगे। हमें देश और प्रदेश में परिवार नियोजन के तरीकों और गर्भ निरोधकों के उपयोग के लिये जागरुकता लानी होगी। यौन शिक्षा और पुरुष नसबंदी को प्रोत्साहित करना होगा एवं बच्चों के जन्म में अंतर को बढ़ाना होगा। इसके लिए गरीबों में कण्डोम और गर्भ निरोधकों का निःशुल्क वितरण करना होगा। गरीबों के लिये ज्यादा से ज्यादा स्वास्थ्य देखभाल केन्द्र खोलने होंगे।

निष्कर्षतः हम यह कह सकते हैं कि जनसंख्या का विस्फोट विकास में बाधक होता है। अतः दो बच्चे, सदा अच्छे जैसे वाक्यों को हर परिवार को आत्मसात करना होगा। आज साक्षरता प्रतिशत में बढ़ोत्तरी होने के साथ जनसंख्या में भी कमी दिखने लगी है। बढ़ते खर्चों के कारण भी अब जनसंख्या में कमी हो रही है। यही समय है कि, जब हमें जनसंख्या को बढ़ने से रोकने के लिए प्रयास करने चाहिए। इसके लिए गाँव-गली और कस्बों में लोगों को जागरुक करने तथा उनकी शिक्षा पर ध्यान देने की जरूरत है। अगर आने वाला कल सुखमय बनाना है, तो हमें जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए उचित रास्ते चुनने होंगे।