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अपने आसपास हो रहे परिवर्तनों पर नजर रखें और मल्टी-टास्किंग बन अवसरों का लाभ उठाएँ

‘उड़ान’ स्तंभ के पिछले अंक में उल्लेखित वैज्ञानिक रदरफोर्ड के जीवन से हमें कई प्रेरणाएँ मिलती हैं। उनके जीवन से हमें अपनी राह स्वयं बनाने, सीखने की तीव्र इच्छा रखने, कम्फर्ट जोन को छोड़ने, भविष्य को ध्यान में रखते हुए अपने क्षेत्र का चयन करने, अपने वरिष्ठों के प्रति आदर और श्रद्धा का भाव रखने, तर्क का साथ न छोड़ने, मेंटल फ्लेक्सिबिलिटी रखने और प्रेरक बनने जैसी कई मार्गदर्शी और प्रेरणादायी टिप्स मिलती हैं। उन्होंने साबित कर दिया था कि ‘जहाँ चाह होती है, वहाँ राह अवश्य होती है’। यहाँ मुझे उनके विद्यार्थी नील्स बोहर की याद आ रही है, जिन्होंने परमाणु का एक ऐसा मॉडल गढ़ा, जिसने परमाणु से मिल रहे स्पेक्ट्रमों को समझने के लिए एक सर्वथा नया रास्ता बना दिया।

आइये, ‘उड़ान’ के इस अंक में हम देखते हैं कि किस तरह ‘बोहर’ हमारी प्रेरणा के स्रोत बनते हैं तथा मार्गदर्शन देते हैं, जो जीवन की नयी उड़ान के लिए हमें तैयार करने में सहायक सिद्ध होते हैं।
अपनी स्वाभाविक रुचि के क्षेत्र

में विशेष ध्यान दें
‘सख्त अनुशासन’ के लिए प्रसिद्ध गैम्मेल्होल्म ग्रामर स्कूल (GammelholmGrammar School) में ‘बोहर’ ने अपना अध्ययन शुरू किया। लेकिन, अपने पिता से प्रेरणा ग्रहण कर उन्होंने पढ़ाई के संकीर्ण दायरे में ही न रहते हुए फुटबॉल भी खेलना आरंभ किया। वे ‘फुटबॉल’ और ‘पढ़ाई’ दोनों में ही अच्छे नजर आने लगे। लेकिन, ‘अकादमिक’ मामले में वे अन्य विद्यार्थियों से बहुत अलग थे। वे कड़ी मेहनत करते और पाठ्यपुस्तकों की गलतियों को भी पकड़ लेते थे। इसे देखते हुए उनके प्रोफेसर पिता ने उन्हें ‘गणित’ तथा ‘भौतिकी’ पढ़ने के लिये विशेष रूप से प्रेरित किया। वे भी प्रेरित हुए तथा इन विषयों के प्रति जबर्दस्त तरीके से आकृष्ट भी हुए। इस तरह हम बोहर से अपनी स्वाभाविक रुचि से मेल खाते किसी क्षेत्र की ओर आकृष्ट होने तथा ध्यान देने की प्रेरणा पाते हैं।
अनुकूल माहौल का लाभ उठाएँ

सौभाग्य से बोहर को अपने घर में ही तार्किक, प्रेरणास्पद और सुसंस्कृत वातावरण मिल गया, जिसमें रह कर वे पलने-बढ़ने लगे। उनके पिता फिजियोलॉजी के प्रोफेसर थे। लेकिन, उनकी दर्शन और कला में भी गहरी रुचि थी। इसीलिए वे इन विषयों पर चर्चा के लिए कई प्रोफेसरों को अपने घर बुलाते, जिसका सहज लाभ बोहर को मिलने लगा। बोहर उनके वार्तालाप को चुपचाप सुनते तथा सत्य के पक्ष में तर्क के साथ बात रखने वालों के प्रति मन ही मन सम्मान भाव प्रकट करते। इस तरह बोहर से हम माहौल पर ध्यान देने तथा चुपचाप लाभ उठाने की प्रेरणा पाते हैं।

आत्मविश्वास बढ़ाएँ तथा अपनी प्रतिभा को मुखरित होने दें

मैट्रिक के बाद बोहर कोपेनहेगन विश्वविद्यालय आ गये, जहाँ उनके पिता के दोस्त क्रिश्चियन क्रिश्चियनसेन भौतिकी के प्रोफेसर थे। क्रिश्चियनसेन अपने ‘प्रकाश के प्रकीर्णन संबंधी शोध’ के लिए प्रसिद्ध थे। उनके मार्गदर्शन में बोहर का आत्म-विश्वास बढ़ने लगा तथा वैज्ञानिक बनने की उनकी महत्वाकांक्षा तेजी से आकार लेने लगी। इसी कारण उन्होंने ‘रॉयल डेनिश एकेडमी ऑफ साइंसेस’ द्वारा ‘सर्वश्रेष्ठ शोध पत्र’ लिखने के लिए आयोजित प्रतियोगिता में भाग लिया और ‘गोल्ड मेडल’ जीता, जो स्नातक कक्षाओं में पढ़ रहे किसी विद्यार्थी के लिए अत्यंत गर्व की बात थी, लेकिन इसके लिए उन्होंने अपने पिता की प्रयोगशाला में रात-रात जाग कर कार्य किया। इस तरह एक विद्यार्थी के रूप में बोहर का आत्म-विश्वास से भरपूर रहना तथा कठोर परिश्रम के बल पर असंभव लक्ष्य को हासिल कर लेना हमें प्रेरित करने के लिए जबर्दस्त उदाहरण है।

अवसरों का लाभ उठाने के लिए आवश्यक तैयारी करें

‘सापेक्षता’ और ‘क्वांटम सिद्धाँत’ पर आइंस्टीन के ‘क्रांतिकारी’ शोध पत्र उसी साल प्रकाशित हुए थे जिस साल बोहर को ‘गोल्ड मेडल’ मिला था। इन शोध पत्रों से भौतिकी की चूलें ही हिलने लगी थीं। यह वह समय था जब जे.जे. टॉमसन द्वारा की गई ‘इलेक्ट्रॉन’ की खोज से ‘अविभाज्य परमाणु’ की धारणा टूट चुकी थी तथा अर्नेस्ट रदरफोर्ड के ‘रेडियो एक्टिविटी’ के शोध से रसायन शास्त्र के क्षेत्र में शोध के नये रास्ते खुल चुके थे। इसके साथ ही ‘परमाणु’ में ‘इलेक्ट्रॉन’ और ‘नाभिक’ की खोज के बाद उसके ‘मॉडल’ को विकसित करने का सिलसिला भी आरंभ हो चुका था, जिससे भौतिकी नई करवट ले रही थी। ऐसे में बोहर के सामने भौतिकी को आगे बढ़ाने का जबर्दस्त ‘अवसर’ उपस्थित था। बोहर इसमें अपनी भूमिका को ‘इलेक्ट्रॉन’ के माध्यम से देख रहे थे क्योंकि, इसने ‘पदार्थ विज्ञान’ से जुड़े सभी क्षेत्रों को प्रभावित किया था। स्वयं उन्होंने भी उच्च-अध्ययन के दौरान अपना सारा ध्यान धातुओं के लिए ‘इलेक्ट्रॉन सिद्धाँत’ को समझने में लगा कर आगे ‘शोध’ के लिए आवश्यक ‘पृष्ठभूमि’ तैयार कर ली थी। इस तरह, हम बोहर से अवसर को आगे बढ़कर पकड़ने तथा उसका यथोचित लाभ उठाने के लिए आवश्यक तैयारी करने का पाठ सीखते हैं।  

प्रतिकूल परिस्थितियों में आशांवित होकर नये रास्ते को तलाशें

सौभाग्य से बोहर को टॉमसन के साथ अनुसंधान करने के लिए एक फैलोशिप मिल गई। वे बहुत प्रसन्न हुए। अपने स्कूली दिनों से ही उनकी ध्यान से पढ़ने की आदत ने पाठ्यपुस्तकों की गलतियों को ढूँढ़ने और उनकी प्रतिभा ने उन्हें ठीक करने में मदद की थी। अतः यहाँ भी उन्हें पढ़ते समय टॉमसन की पुस्तक में एक गलती मिली, जिसे उन्होंने टॉमसन को बताया। बोहर समझे कि टॉमसन खुश होंगे। लेकिन, अपने निर्देशन में काम के लिए आये बोहर का यह कृत्य टॉमसन को अच्छा नहीं लगा। उनकी बेरुखी नजर आने लगी, जिससे उनका उत्साह ठंडा पड़ने लगा। लेकिन वे निराश नहीं हुए और आशांवित होकर नये सिरे से रास्ते की तलाश में जुट गये। उन दिनों टॉमसन के ही एक छात्र रदरफोर्ड मैनचेस्टर विश्व-विद्यालय में कार्य कर रहे थे, जिन्होंने टॉमसन के ‘तरबूजनुमा मॉडल’ के स्थान पर परमाणु का ‘सौर-मंडलीय मॉडल’ प्रस्तुत किया था। बोहर जानते थे कि टॉमसन के प्रति अगाध श्रृद्धा के बावजूद उन्होंने यह कार्य किया था। रदरफोर्ड से मन ही मन प्रभावित बोहर उनसे मिलने गए तथा उनके साथ काम करने की अपनी इच्छा प्रकट की। टॉमसन की अनापत्ति मिलने के बाद बोहर, रदरफोर्ड से जुड़ गये। यहाँ नये जोश के साथ उन्होंने ‘सौर-मंडलीय मॉडल’ पर अपना ध्यान केंद्रित किया। इस तरह बोहर से हम प्रतिकूल परिस्थितियों में बिना निराश हुए नये रास्तों को तलाशने की प्रेरणा पाते हैं।
जब पारंपरिक सोच साथ न दे, तब सर्वथा नये तरीके से सोचें
‘सौर-मंडलीय मॉडल’ में ऋणावेशित ‘इलेक्ट्रॉन’ धनावेशित ‘नाभिक’ के चारों ओर घूमते हैं। ‘पारम्परिक भौतिकी’ के अनुसार इलेक्ट्रॉन को घूमते तथा अपनी ऊर्जा को क्षय करते हुए नाभिक में गिर जाना चाहिए। ऐसा होने से, यह मॉडल परमाणु के ‘स्थायित्व’ वाले गुण को प्रदर्शित नहीं कर पाता है। अतः अपनी तमाम खूबियों के बावजूद वैज्ञानिक जगत को यह मॉडल स्वीकार्य नहीं हो पा रहा था। लेकिन, इस कमजोरी के बावजूद बोहर इस मॉडल से प्रभावित थे तथा इसे ‘स्वीकार्य मॉडल’ बनाने के तरीकों पर विचार कर रहे थे। इसके लिए उन्हें परमाणु में ‘इलेक्ट्रॉन’ की भूमिका नजर आ रही थी। उनका अंतर्मन कह रहा था कि निश्चित ही परमाणु में ‘इलेक्ट्रॉन’ का ‘व्यवहार’ वैसा नहीं होना चाहिए, जैसा ‘पारम्परिक भौतिकी’ की सहायता से हम समझ रहे हैं। बोहर को अपने कोपेनहेगन के दिनों से ही चालकों में इलेक्ट्रॉन के व्यवहार को समझने में रुचि थी। अतः वे परमाणु में अवस्थित इलेक्ट्रॉन के व्यवहार को गहराई से समझने के लिए ‘पारम्परिक भौतिकी’ से हट कर सोचने लगे, जिससे उनके सामने शोध की एक नयी ‘रूपरेखा’ तैयार होने लगी। इस तरह हमें बोहर से मार्गदर्शन मिलता है कि जब पारम्परिक सोच साथ न दे, तब हमें सर्वथा नये तरीके से सोचने पर विचार करना चाहिए।
रोल मॉडल चुनें

रदरफोर्ड के मॉडल पर काम करने की योजना के साथ अपनी फैलोशिप की अवधि पूरी होने पर बोहर पुनः कोपेनहेगन आ गये। लेकिन, वे रदरफोर्ड की असीम ऊर्जा, जोश और ज्ञान से बहुत प्रभावित थे तथा अपने लिए प्रेरणास्पद मानते थे। वे रदरफोर्ड की ही तरह बनना चाहते थे। वे उनके ‘रोल मॉडल’ बन गये थे। उन्हें रदरफोर्ड के ‘रिसर्च-ग्रुप’ के बौद्धिक माहौल ने भी बहुत लुभाया था। अतः उन्होंने कोपेनहेगन विश्वविद्यालय, जहाँ उन्होंने अपना कैरियर आरंभ किया, में भी इसी प्रकार का उत्कृष्ट ‘रिसर्च-ग्रुप’ बनाना चाहा। लेकिन, इसके पहले उन्होंने मैनचेस्टर में परमाणु के संबंध में जन्म ले रही अपनी योजना को ध्यान में रखते हुए उत्साहपूर्वक आगे बढ़ने का निश्चय किया।
गहराई से अध्ययन करें और साथियों से चर्चा करें

लीक से हट कर सोचते हुए बोहर के सामने ‘क्वांटम सिद्धाँत’ आया। इस सिद्धाँत को मैक्स प्लांक ने गर्म वस्तुओं से प्राप्त स्पेक्ट्रम को समझने के लिए विकसित किया था। इसको विकसित करने के लिए प्लांक ने गर्म वस्तुओं से होने वाले उत्सर्जन को ‘ऊर्जा-पैकेट’ (फोटॉन) यानि क्वांटम के रूप में माना। उन्होंने माना कि फोटॉन की ऊर्जा को एक न्यूनतम मान का पूर्णांकीय गुणांक मानने से ही बात बनती है। और,   ऊर्जा का यह न्यूनतम मान आवृत्ति के समानुपाती होना चाहिए, जहाँ समानुपातिक नियतांक ‘न्यूनतम एक्शन’ के मान को निर्धारित करता है। स्मरणीय है कि भौतिकी में घटनाओं के घटने में ‘न्यूनतम एक्शन का सिद्धाँत’ काम करता है। और, सौभाग्य से प्लांक को इसका मान एक नियतांक (प्लांक नियतांक) के रूप में मिल गया। हालाँकि उन्हें इसका कोई भौतिकीय आधार नजर नहीं आ रहा था, लेकिन उन्होंने देखा कि इसे माने बगैर स्पेक्ट्रम को नहीं समझा जा सकता है। अतः उन्होंने इसे माना तथा स्पेक्ट्रम को समझाते हुए ‘क्वांटम सिद्धाँत’ की खोज कर डाली। शीघ्र इस सिद्धाँत का अनुप्रयोग कर आइंस्टीन ने उस समय अनसुलझे ‘प्रकाश विद्युत प्रभाव सिद्धाँत’ को समझा दिया। और, इसके बाद वैज्ञानिकों ने परमाणु जगत से उठ रही कुछ और समस्याओं को भी सुलझा लिया। इससे उत्साहित बोहर को भी इसमें आशा की एक किरण नजर आने लगी। लेकिन, क्वांटम सिद्धाँत का अनुप्रयोग कैसे हो सकता है, यह बोहर को समझ में नहीं आ रहा था। वे परमाणु के स्थायित्व के लिए एक ऐसी ‘शर्त’ चाहते थे, जो ‘इलेक्ट्रॉन’ को ‘नाभिक’ के चारों ओर, बिना अपनी ऊर्जा का हृास किये, घुमाती रहे।

अब बोहर ने गहराई से अध्ययन करना तथा अपने साथी-वैज्ञानिकों से चर्चा करना आरंभ किया। तभी उनके संज्ञान में हाइड्रोजन के स्पेक्ट्रम में खोजी गई एक ‘स्पेक्ट्रल श्रृंखला’ आई, जिसे बामर ने एक गणितीय सूत्र के रूप में अभिव्यक्त किया था। इस सूत्र में पूर्णांकीय संख्याओं को बदल कर श्रृंखला में उपस्थित सभी स्पेक्ट्रल रेखाओं की तरंगद्धैर्य को प्राप्त किया जा सकता था। लेकिन, बोहर को बामर के इस सूत्र का कोई सैद्धाँतिक आधार नजर नहीं आया। अतः, उन्होंने इसे ‘क्वांटम सिद्धाँत’ के उजाले में  देखना शुरू किया।
अब बोहर की नजर में बामर के सूत्र और प्लांक के ऊर्जा पैकेट में प्रकट होने वाली पूर्णांकीय संख्याएँ आने लगीं। उन्हें दोनों के बीच एक अंतर्संबंध नजर आने लगा।
जब आइडिया परिपक्व हो तो तर्क के साथ आगे बढ़ें

बोहर को यह तो निश्चित लगने लगा था कि ‘परमाणुओं में इलेक्ट्रॉनों’ के व्यवहार को प्रकट करने में प्लांक के ‘क्वांटम सिद्धांत’ का ही हाथ है। शीघ्र ही उनके सामने स्थिति स्पष्ट होने लगी। ऊर्जा की क्वांटम प्रकृति होने के कारण ‘परमाणु’ में घूमने वाले ‘इलेक्ट्रॉन’ अपनी ऊर्जा का क्षय नहीं कर सकेंगे। लेकिन हाँ, वे मौका आने पर ऊर्जा का विनिमय करते हुए एक निश्चित ऊर्जा वाली कक्षा से दूसरी निश्चित ऊर्जा वाली कक्षा में अवश्य कूद सकेंगे। लेकिन ऐसा करने के लिए ‘इलेक्ट्रॉन’ को या तो बाहर से आवश्यक ऊर्जा अर्जित करनी होगी या फिर अपनी अतिरिक्त ऊर्जा को उत्सर्जित करना होगा। इस तरह उन्होंने स्पेक्ट्रम की उत्पत्ति को समझने के लिए ‘क्वांटम जम्प’ का नया विचार दिया। 
अब बोहर के सामने पूरा चित्र उभर कर आ गया तथा तर्क-संगत तरीके से आगे बढ़ते हुए उन्होंने एक ऐसा सामान्यी-कृत सूत्र प्राप्त कर लिया, जिसकी सहायता से वे हाइड्रोजन के पूरे स्पेक्ट्रम को समझाने में सफल हो गये।
बोहर का यह कार्य अत्यंत क्रांतिकारी साबित हुआ, जिसके लिये 1922 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार उन्हें प्रदान किया गया। हालाँकि कुछ ही समय के बाद कुछ और प्रायोगिक नतीजे सामने आये जिन्हें, यह मॉडल नहीं समझा सका। लेकिन, फिर भी इस मॉडल के महत्त्व को कोई नकार नहीं सका। इसने परमाणुओं से मिलने वाले स्पेक्ट्रम को समझने के लिए ‘क्वांटम जम्प’ का एक क्रांतिकारी विचार दिया था।
अड़ें नहीं, अंतर्दृष्टि विकसित करें और सत्य के साथ चलें

बोहर के ‘क्वांटम जम्प’ के आइडिया से युवा वारेन हैजनबर्ग प्रभावित हुए। उन्होंने और अन्य वैज्ञानिकों ने परमाण्विक दुनिया को समझने के लिए ‘क्वांटम यांत्रिकी’ को विकसित किया जिसने, परमाण्विक (क्वांटम) जगत से उठ रही समस्याओं को हल करने में जबर्दस्त सफलता प्राप्त की। इससे परमाणु का ‘क्वांटम मेकेनिकल मॉडल’ उभर कर आया जो, ‘बोहर मॉडल’ की तुलना में बेहतर साबित हो रहा था। धीरे-धीरे बोहर का मॉडल प्रचलन से बाहर हो गया। लेकिन इसके बावजूद यह लोगों के दिलो-दिमाग से बाहर नहीं हो सका। आज भी परमाणु के बारे में आम लोगों के मन में वही चित्र उभरता है जिसे, बोहर ने प्रस्तुत किया था। सच में, जो कुछ जीवन में उन्हें मिला वह भाग्य भरोसे नहीं, बल्कि उनकी गहरी अंतर्दृष्टि तथा कठोर परिश्रम के बल पर मिला था। इस तरह हम उनसे गहरी अंतर्दृष्टि विकसित करने तथा तर्कपूर्वक मेहनत के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा पाते हैं।
रुकें नहीं, व्यापक दृष्टि से सोचें और आगे बढ़ें

भौतिकी सचमुच करवट बदल रही थी और बोहर उससे प्रभावित होते जा रहे थे। वे ‘क्वांटम यांत्रिकी’ के माध्यम से ‘नये सत्य’ को उद्घाटित होते हुए देख रहे थे। पहले उन्होंने ‘पारंपरिक भौतिकी’ और ‘क्वांटम यांत्रिकी’ के बीच ‘पूल’ बनाने के उद्देश्य से ‘संगतता नियम’ प्रतिपादित किया। लेकिन, शीघ्र ही भौतिकी में हो रहे क्रांतिकारी परिवर्तनों को दिल से मान्यता देते हुए उन्होंने ‘क्वांटम यांत्रिकी’ को स्थापित करने की राह में आ रही समस्याओं को सुलझाने के लिए सोचना आरंभ कर दिया।
बोहर ने विचार किया कि अणु,