Department of Public Relation:Government of Madhya Pradesh

कदम उठाने के पूर्व खींचें कार्य-योजना का तार्किक और व्यवहारिक खाका

 ‘उड़ान’ स्तंभ के पिछले अंक में चुनौतियों को स्वीकार कर तर्क, साहस एवं संकल्प से उनका मुकाबला करने वाले न्यूट्रिनो के खोजकर्ता फ्रेडरिक रयेनेस के जीवन से हमें मन को भाने वाले क्षेत्र में अपनी कैरियर की राहें खोजने, चुनौतियों को पहचानने, समस्या की तह तक जाने, अच्छा साथ चुनने, अपने आइडिया पर तर्कपूर्वक आगे बढ़ने, वांछित सफलता न मिलने पर भी न घबराने, असफलताओं का विश्लेषण करने, सोच-समझ कर कदम उठाने, पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाने के लिए आगे आने, प्रेरक बनने और अपने कार्यों से सकारात्मक संदेश देने जैसी कई मार्गदर्शी एवं प्रेरणादायी टिप्स मिलती हैं। यहाँ मुझे एस्ट्रोफिजिसिस्ट (तारा-भौतिकविद) तथा एस्ट्रोनॉमर (खगोलविद) जॉन नॉरिस बेह्काल की याद आ रही है, जिन्होंने ‘सोलर-न्यूट्रिनो’ की प्रमाणिक गणना कर ‘सोलर स्टैंडर्ड (मानक) मॉडल गढ़ा तथा प्रायोगिक मोर्चे पर जुटे वैज्ञानिकों की राह प्रशस्त की। आइये, अब हम देखते हैं कि किस तरह बेह्काल हमारी प्रेरणा के स्रोत बनते हैं तथा मार्गदर्शन देते हैं, जो जीवन की नयी उड़ान के लिए हमें तैयार करने में सहायक सिद्ध होते हैं।
अपने पसंदीदा खेल से सीखें
जीवन निर्माण की कला

बेह्काल की स्कूली पढ़ाई लुसियाना स्थित श्रेवपोर्ट के बायर्ड हाईस्कूल से आरंभ हुई। यहाँ खेल, विशेषकर ‘टेनिस’ के प्रति उनकी दीवानगी बढ़ी। निरंतर अभ्यास से अपने खेल में निखार लाते हुए उन्होंने ‘स्टेट चैम्पियनशिप’ जीती। इस तरह ‘टेनिस’ ने उन्हें चुनौतियों को स्वीकारने तथा साहसपूर्वक उनका सामना करना सिखा दिया। इस दौरान उन्होंने देखा कि कैसे एक ‘प्वाइंट’ से ‘मैच’, एक ‘मैच’ से एक ‘गेम’ तथा एक ‘गेम’ से एक ‘सेट’ जीता जाता है। इस तरह ‘टेनिस’ ने उन्हें ‘एक प्वाइंट’ का महत्व समझा दिया, जो कभी भी भारी उलटफेर कर सकता है। इससे उनमें ‘अंतिम समय तक हार न मानने’ का गुण विकसित हो गया। इतना ही नहीं, ‘टेनिस’ खेलते-खेलते उन्हें यह भी समझ में आ गया कि ‘कठोर परिश्रम, अभ्यास, लगन, समर्पण, आत्मविश्वास और दृढ़ता’ से जीवन में कुछ भी हासिल किया जा सकता है तथा ‘त्वरित निर्णय’ लेने की क्षमता से ‘शर्तिया हार’ को ‘जीत’ में बदला जा सकता है। ‘डबल्स’ खेल के दौरान उन्हें बेहतर ‘तालमेल’ तथा ‘समन्वय’ से टीम को जिताने का मंत्र मिला। इस तरह खेल से मिले इन मंत्रों को जीवन में उतार कर उन्होंने हर काम में सफलता पाने के तरीकों को समझ लिया।

‘टेनिस’ में सफलता के बाद बेह्काल की रुचि ‘वाद-विवाद’ (डिबेट) में जागी। यहाँ भी ‘टेनिस’ के दौरान सीखे गये मंत्र उन्हें बहुत काम आये। ‘त्वरित निर्णय’ लेकर प्रतिपक्ष की बात का जवाब देने की अद्भुत क्षमता ने उनकी टीम को ‘नेशनल चैम्पियन’ बना दिया। इस तरह उन्होंने ‘टेनिस’ के माध्यम से अपने भावी जीवन में सफलताओं को अर्जित करने का एक ठोस आधार तैयार कर लिया। उनसे मिलने वाली यह बहुत बड़ी सीख है। हम चाहे जो भी खेल खेलें, हर खेल में सिखाने के लिए बहुत कुछ होता है। हम अपने हर पसंदीदा खेल से ‘जीवन-निर्माण’ की कला सीख सकते हैं तथा उन्हें आत्मसात कर, किसी भी क्षेत्र में सफल हो सकते हैं। 
उन अवसरों का लाभ उठाएँ, जो हमारे लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हो सकते हैं

बेह्काल अपने स्कूल में ‘कला’ के विद्यार्थी थे और उन्हें ‘विज्ञान’ पढ़ने का अवसर नहीं मिला था, क्योंकि ‘विज्ञान’ की कक्षाएं दोपहर के बाद लगती थीं और इसी समय वे ‘टेनिस’ खेलते थे। हालांकि ‘टेनिस’ खेलने का उनको एक बहुत बड़ा लाभ मिला। ‘टेनिस’ में उनके शानदार प्रदर्शन ने उन्हें एक ‘स्कॉलरशिप’ दिला दी। इसे लेकर वे ‘दर्शनशास्त्र’ में ग्रेजुएशन की डिग्री के लिए ‘बर्केले यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया’ चले गये, लेकिन विश्व-विद्यालय के नियमों के अनुसार उन्हें इस डिग्री के लिए ‘विज्ञान’ का एक सहायक कोर्स भी करना था। इस अनिवार्यता के कारण उन्होंने ‘भौतिकी’ को चुना और इस तरह कला के विद्यार्थी का ‘विज्ञान’ से पहला औपचारिक परिचय हुआ।

जब बेह्काल ‘भौतिकी’ की प्रथम कक्षा में उपस्थित हुए, तो यह जानकर दंग रह गये कि ‘भौतिकी’ के पास तो उन सभी प्रश्नों के उत्तर हैं, जिनके बारे में वे अक्सर सोचा करते थे। उन्हें यह जानकर हैरानी हुई कि ‘वास्तविक चीजों के काम करने से लेकर सूर्योदय, सूर्यास्त, इंद्रधनुष आदि जैसी विविध घटनाओं से जुड़े प्रश्नों’ के उत्तर भी ‘भौतिकी’ को समझ कर प्राप्त किए जा सकते हैं। उन्होंने देखा कि समय-समय पर ‘भौतिकी’ ने मानव-मन में उठती रही कई जिज्ञासाओं के ठोस, तार्किक और सटीक उत्तर देकर लोगों को अपनी रूढ़िगत काल्पनिक धारणाओं को छोड़ने के लिए बाध्य किया है। इस तरह वे ‘भौतिकी’ की इस ‘तर्क-जन्य ताकत’ से चमत्कृत हो गये तथा ‘भौतिकी’ से सहज ही प्रेम करने लगे। अब उनके मन में ब्रह्माण्ड से जुड़े वे प्रश्न तैरने लगे, जिनके उत्तर पाने के लिए मनुष्य आदि-अनादि काल से उत्सुक रहा है और, जो समझ के स्तर पर लगातार कठिन चुनौती प्रस्तुत करते रहे हैं। चुनौतियों को स्वीकार करना उन्हें ‘टेनिस’ ने सिखा ही दिया था। अतः उन्होंने अपने उच्च-अध्ययन तथा अपने भावी कैरियर के लिए ‘दर्शनशास्त्र’ को छोड़कर ‘भौतिकी’ तथा ‘खगोलिकी’ को चुनने का साहस दिखाया। हमें भी जीवन में कई बार ऐसे ही अवसर उपलब्ध होते हैं, जो हमारे लिए ‘टर्निंग प्वाइंट’ साबित हो सकते हैं। लेकिन, ‘साहस’ के अभाव में हम उनका लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं। ऐसे में बेह्काल हमारे सामने प्रेरणा बन कर उपस्थित होते हैं।  
चुनौती प्रस्तुत कर रहे प्रश्नों को चुनें तथा उनके उत्तर खोजें

‘भौतिकी’ तथा ‘खगोलिकी’ के अध्ययन के बाद बेह्काल ने आदि-अनादि काल से मनुष्य के सामने, समझने के स्तर पर चुनौती प्रस्तुत कर रहे प्रश्नों पर ध्यान दिया। ऐसे ही चुनौतीपूर्ण प्रश्नों में से एक ‘सूर्य’ के लगातार चमकने तथा ऊर्जा को विकिरित करने से संबंधित है? अब उन्होंने इस प्रश्न के उत्तर की तलाश में अपनी शोध की दिशा निर्धारित की।

बेह्काल की धारणा थी कि ‘सूर्य’ को लगातार चमकते रहने की शक्ति ‘नाभिकीय अभिक्रियाओं’ से मिलती है, जो उसके केंद्र में अत्यंत उच्च ताप और दाब के कारण होती है। इन अभिक्रियाओं के दौरान ‘द्रव्यमान’, ‘ऊर्जा’ में रूपांतरित होता है। लेकिन ‘सूर्य’ से उत्सर्जित होने वाले विकिरणों के अध्ययन से ‘नाभिकीय अभिक्रियाओं’ का प्रमाण नहीं मिल रहा था। इस अध्ययन से इतना ही स्पष्ट हो रहा था कि सूर्य में ‘हाइड्रोजन’ और ‘हीलियम’ है तथा उसके केंद्र में उच्च ताप और दाब है। किंतु वहाँ उपस्थित ‘हाइड्रोजन’ संलयित होकर ‘हीलियम’ में रूपांतरित होकर द्रव्यमान को ऊर्जा में रूपांतरित कर रही है, इसे जानना संभव नहीं हो पा रहा था। लेकिन, इसे जाने बगैर ‘सूर्य’ के लगातार चमकने का राज उजागर नहीं हो पा रहा था। अतः बेह्काल ने इस पर तर्कपूर्ण विचार करना आरंभ किया। ‘हाइड्रोजन’ के नाभिक में सिर्फ ‘प्रोटॉन’ होता है, जबकि ‘हीलियम’ के नाभिक में ‘प्रोटॉन’ तथा ‘न्यूट्रॉन’ दोनों ही होते हैं। अतः ‘हाइड्रोजन’ से ‘हीलियम’ बनते समय पहले कुछ ‘प्रोटॉनों’ को ‘न्यूट्रॉनों’ में बदलना चाहिए और ‘प्रोटॉन’ से ‘न्यूट्रॉन’ में बदलने की प्रक्रिया के दौरान ‘न्यूट्रिनो’ नामक कण भी जन्म लेते हैं। अतः उन्होंने तर्कजन्य निष्कर्ष निकाला कि सूर्य से उत्सर्जित होकर आने वाले ‘प्रकाश’ के साथ ‘न्यूट्रिनो’ को भी धरती की ओर आना चाहिए। इस तरह उन्हें समझ में आ गया कि सूर्य के लगातार चमकने का उत्तर ‘न्यूट्रिनो’ के पास है न कि विद्युत चुम्बकीय तरंगों के रूप में उपलब्ध ‘प्रकाश’ के पास। अब, समस्या के समाधान के लिए ‘न्यूट्रिनो’ का अध्ययन आवश्यक हो गया।

इस तरह बेह्काल को अपने उस प्रश्न का उत्तर पाने का निश्चित रास्ता मिल गया, जो आदि-अनादि काल से सबके सामने चुनौती प्रस्तुत कर रहा था। लेकिन इस चुनौतीपूर्ण प्रश्न को चयनित करने का ‘साहस’ और इसका उत्तर पाने के लिए रास्ता खोजने में मदद उन्हें ‘टेनिस’ खेलने के दौरान आत्मसात किये गये अपने गुणों से मिली। यही हमें उनसे मिलने वाली बहुत बड़ी सीख है। हम जिस किसी भी क्षेत्र में काम कर रहे हों, हमें चाहिए कि हम चुनौतीपूर्ण प्रश्नों का चयन करें तथा उनके उत्तरों की खोज में तर्कजन्य ठोस कदम उठाएँ।
अपने काम की दिशा तय करें
तथा ठोस कदम उठाएँ

अपने प्रश्न के उत्तर का ‘संकेत’ बेह्काल को ‘न्यूट्रिनो’ के रूप में मिल गया, लेकिन अब पहली समस्या इसके प्रायोगिक स्तर पर सत्यापन की थी और दूसरी सूर्य से मिलने वाले ‘न्यूट्रिनो फ्लक्स’ की सटीक गणना करना, जो सूर्य के केंद्र में हाइड्रोजन से हीलियम में रूपांतरण के दौरान तैयार होता है।
अब बेह्काल ने ‘सूर्य’ के केंद्र में ‘हाइड्रोजन’ से ‘हीलियम’ बनाने वाली सभी संभावित ‘नाभिकीय संलयन अभिक्रियाओं’ का अध्ययन आरंभ किया और जाना कि ‘सूर्य’ से उत्पन्न होने वाले न्यूट्रिनो की उत्सर्जन-दर क्या है तथा फ्लक्स के रूप में कितने न्यूट्रिनो को धरती की ओर आना चाहिये। इसके बाद उन्होंने सूर्य से उत्सर्जित होने वाले न्यूट्रिनो फ्लक्स की सटीक गणना कर ‘सोलर स्टैंडर्ड (मानक) मॉडल’ विकसित किया तथा ठोस आधारों पर खड़े अपने इस मॉडल के आधार पर उन्होंने ‘सोलर न्यूट्रिनो’ के प्रायोगिक अध्ययन का निश्चय किया।
बेह्काल ने ‘ब्रुकहेवन नेशनल लेबोरेटोरी’ के वैज्ञानिक रेमण्ड डेविड (जूनियर) के साथ शोध-कार्य आरंभ किया। ‘न्यूट्रिनो’ के संसूचन के लिए उन्होंने बंद हो चुकी ‘डकोटा स्वर्ण खदान’ में जमीन के बहुत अंदर ‘संसूचक’ स्थापित करने की एक योजना बनाई ताकि बाह्य प्रभावों से मुक्ति पाई जा सके। इस ‘संसूचक’ में उन्होंने ‘क्लोरिन’ का चयन किया, क्योंकि यह ‘न्यूट्रिनो’ से अभिक्रिया कर ‘रेडियोधर्मी’ बन जाने में समर्थ होता है। चूँकि ‘न्यूट्रिनो’, पदार्थ के साथ अत्यंत नगण्य अभिक्रिया करता है, अतः उन्होंने ‘संसूचक’ के आकार को बहुत बड़ा रखने का निर्णय लिया ताकि ‘न्यूट्रिनो-संसूचन’ की प्रायिकता को मापन-योग्य सीमा में लाया जा सके।
परिश्रमपूर्वक आशांवित होकर उन्होंने ‘संसूचक’, जिसे तकनीकी शब्दावली में ‘न्यूट्रिनो टेलिस्कोप’ कहते हैं, को स्थापित किया। योजनानुसार उन्हें सूर्य से उत्सर्जित होने वाले ‘न्यूट्रिनो’ की सूचना मिली और वे ‘सूर्य’ के ‘केंद्र’ में चल रही ‘नाभिकीय अभिक्रिया’ का प्रमाण जुटाने में सफल हो गये। इस तरह हम उनसे एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शन पाते हैं कि हमारी किसी समस्या के हल के लिए अगर कोई तर्क-जन्य रास्ता मिल जाए, तो फिर हमें ठोस कदम उठाने के लिए त्वरित कार्यवाही करना चाहिए।
संतुष्ट होकर बैठें नहीं, आगे बढें
अपने मूल प्रश्न का उत्तर मिलने के बाद अब बेह्काल अपने ‘मॉडल’ के अन्य निष्कर्षों को भी सत्यापित करना चाहते थे। अतः उन्होंने ‘संसूचक’ द्वारा रिकार्ड किए जाने वाले ‘न्यूट्रिनो’ की गणना आरंभ की। वे यह देखकर हैरान रह गये कि उन्हें इनकी संख्या अपेक्षा से दो-तिहाई कम मिल रही थी। इसे उन्होंने एक और संकेत के रूप में लिया। उन्हें लगा कि इसके माध्यम से प्रकृति अपने किसी और रहस्य को उजागर करना चाहती है। उन्हें अपने प्रयोग तथा सैद्धांतिक गणना पर पूरा भरोसा था। अतः उन्होंने इस अंतर को ‘सोलर-न्यूट्रिनो समस्या’ के रूप में प्रस्तुत किया। इस समस्या ने सैद्धांतिक और प्रायोगिक मोर्चे पर काम कर रहे वैज्ञानिकों को शोध के लिए बहुत सामग्री उपलब्ध करा दी।

इस तरह हम देखते हैं कि अपने मूल प्रश्न का उत्तर मिलने के बाद उन्होंने अपने मॉडल के अन्य निष्कर्षों को भी सत्यापित करने की दिशा में कदम उठाए। ऐसा करने के कारण ही प्रकृति से जुड़ी एक समस्या सामने आई तथा वैज्ञानिकों को आगे शोध-कार्य को जारी रखने की राह दिखाई दी। इस तरह हमें उनसे एक सफलता मिलने के बाद संतुष्ट होकर चुप बैठने की बजाय आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।
अपने कार्य-क्षेत्र का विस्तार करें तथा बाधक तत्वों को पहचानें

‘ब्रह्माण्ड’ के रहस्यों को जानने और समझने के उद्देश्य से ही बेह्काल ‘भौतिकी’ और ‘खगोलिकी’ के क्षेत्र में आए थे। अतः सूर्य के चमकने के कारण का पता लगाने के बाद अब बेह्काल अन्य ‘ब्रह्माण्डीय पिण्डों’ के सूक्ष्मतापूर्वक अध्ययन में रुचिशील हुए। लेकिन, इसके लिए इन पिण्डों के सावधानीपूर्वक अध्ययन की जरूरत थी। उन्होंने देखा कि धरती-सतह से इन पिण्डों के अध्ययन में सबसे बड़ी बाधा पृथ्वी का ‘वायुमंडल’ है। क्योंकि यह ‘वायुमंडल’ पृथ्वी तक इन पिण्डों से उत्पन्न होने वाले पूरे विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम में से सिर्फ ‘लाल से लेकर बैंगनी तक के प्रकाश’ की एक छोटी सी ‘पट्टी’ को ही आने देता है, जो इनके अध्ययन की हमारी क्षमता को बहुत सीमित कर देता है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी महसूस किया कि दाब और ताप के परिवर्तनों के कारण पृथ्वी का वायुमंडल विक्षुब्ध अवस्था में ही रहता है, जिससे पृथ्वी-सतह पर स्थापित टेलिस्कोपों की मदद से जो भी प्रतिबिम्ब बनते हैं, वे सभी धुंधले और अस्पष्ट होते हैं। अतः पृथ्वी के वायुमंडल से बाहर निकल कर अध्ययन करना जरूरी है, ताकि सदियों से जिज्ञासु बना रहे प्रकृति, पदार्थ, जीवन और ब्रह्माण्ड से जुड़े प्रश्नों के उत्तर पाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकें। इस विचार के बाद बेह्काल ने ‘अंतरिक्ष’ में ‘टेलिस्कोप’ स्थापित करने की दिशा में सोचना आरंभ किया। इस तरह जिज्ञासु बना रहे प्रश्नों के उत्तरों की तलाश में बाधक बन रहे कारकों को पहचानने तथा उन्हें दूर करने के बारे में प्रयास करने की प्रेरणा हमें उनसे मिलती है।
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अब पृथ्वी के वायुमंडल से बाहर अंतरिक्ष में ‘टेलिस्कोप’ को स्थापित करना बेह्काल का लक्ष्य बन गया। उन्हें पता चला कि ‘प्रिंस्टन इंस्टीटयूट’ के खगोलज्ञ लायमन स्पिट्जर (जूनियर) ‘अंतरिक्ष’ में ‘टेलीस्कोप’ को स्थापित करने के बारे में 1940 के दशक से ही सोच रहे हैं। हालांकि, उस समय उन्नत तकनीकी के अभाव में उनका यह प्रोजेक्ट व्यवहारिक प्रतीत नहीं हो रहा था, लेकिन बेह्काल ने अनुभव किया कि अब समय बदल गया है। रूस ने ‘स्पूतनिक’ उपग्रह छोड़कर और फिर अमेरिका ने ‘अपोलो’ श्रृंखला आरंभ कर ‘अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी’ के क्षेत्र में अकल्पनीय प्रगति की शुरुआत की। नील आर्मस्ट्रांग ने तो ‘चंद्रमा’ पर कदम रखकर समूचे विश्व को चौंका कर ‘अंतरिक्ष-यात्रा’ के रास्ते खोल दिये। इस तरह ‘तकनीकी प्रगति’ से अभिभूत बेह्काल ने स्पिट्जर के साथ मिलकर ‘अंतरिक्ष’ में ‘टेलिस्कोप’ स्थापित करने की योजना बनाई, लेकिन योजना का क्रियान्वयन आसान नहीं था क्योंकि इसके लिए भारी भरकम बजट की आवश्यकता थी। अतः उन्हें समझ में आ गया कि बिना सरकार के सहयोग के उनके इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को पाना संभव नहीं हो सकता है। अतः उन्होंने अंतरिक्ष में टेलिस्कोप स्थापित करने के लिए अभियान चलाया तथा इसके पक्ष में