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महामना पं. मदनमोहन मालवीय जयंती 25 दिसम्बर
सांदीपनि आश्रम की शिक्षा पद्धति से प्रेरित होकर बनाया विश्वविद्यालय
 

परमपूज्य महामना पण्डित मदन मोहन मालवीय जी एक युग महापुरुष के रूप में याद किए जाते हैं। आपका जन्म तीर्थराज प्रयाग में 25 दिसम्बर 1861 को अत्यंत ही साधारण परिवार में हुआ था। आपके पिता का नाम पंडित ब्रजनाथ व्यास तथा माता का नाम श्रीमती मूना देवी था। इनके पूर्वज म.प्र. के मालवा स्थित उज्जैन से करीब 5 कि.मी. दूर कुड़हरा नामक गाँव से आकर प्रयाग में बस गए थे, इसी कारण वे मालवीय उपनाम से जाने जाते थे। आपके पिता संस्कृत के विद्वान तथा श्रीमद्भागवत के सुप्रसिद्ध कथावाचक के साथ-साथ सदाचारयुक्त जीवन यापन करते थे। वह कथा पर कोई दान नहीं लेते थे। यही संस्कार मालवीय जी के जीवन पर पड़ा तथा उन्होंने भी अपने जीवनकाल में व्यक्तिगत कार्य हेतु कभी कोई दान नहीं लिया।

आरम्भिक जीवन

पाँच वर्ष की आयु में बुनियादी शिक्षा स्थानीय धर्मज्ञानोपदेश पाठशाला से ग्रहण कर उन्होंने विद्याधर्म प्रवर्द्धिनी पाठशाला में भी अध्ययन किया। 7 वर्ष की आयु में जिला हाईस्कूल में चौथी कक्षा में भर्ती हुए तथा सन् 1878 में हाईस्कूल शिक्षा उत्तीर्ण कर उच्च शिक्षा हेतु स्थानीय म्योर सेंट्रल कॉलेज इलाहाबाद में प्रवेश लिया। यहाँ से सन् 1880 में इंटरमीडिएट, सन् 1884 में बी.ए. और सन् 1891 में एल.एल.बी. उत्तीर्ण की। मालवीय जी छुट्टियों में संस्कृत पढ़ने के लिये अपने चाचा गदाधर के पास मीरजापुर चले जाते थे। उसी दौरान उनके भाषण से प्रभावित होकर स्थानीय विद्वान पंडित नंदराम ने अपनी पुत्री कुन्दन देवी का विवाह सन् 1878 में मालवीय जी से किया।

156 क्रान्तिकारियों को फाँसी से बचाया

सन् 1885 से 1887 तक जिला हाईस्कूल प्रयाग में अंग्रेजी के अध्यापक रहने के बाद 1891 में जिला कचहरी में प्रैक्टिस की तथा 1892 से 1913 तक इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत की। हालांकि बाद में वकालत त्याग दी, परन्तु 1923 में चौरीचौरा कांड के क्रान्तिकारियों के पक्ष में बहस के लिए हाईकोर्ट में उपस्थित होकर 156 लोगों को फांसी से बचाया। वह वकालत के दौरान गरीबों के केस तथा सार्वजनिक हितों के मामलों में कोई फीस नहीं लेते थे तथा कोई ऐसा केस भी नहीं लड़ते थे, जिसमें उन्हें झूठ बोलना पड़े।

कई महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं के रहे सम्पादक

जुलाई 1887 से जून 1889 तक हिन्दी दैनिक हिन्दुस्थान के मुख्य संपादक, जुलाई 1889 से 1892 तक अंग्रेजी पत्र इंडियन ओपीनियन के सह संपादक और 1907 में साप्ताहिक अभ्युदय, 1909 में अंग्रेजी दैनिक लीडर, 1910 में हिन्दी पाक्षिक मर्यादा तथा 1933 में हिन्दी साप्ताहिक सनातन धर्म के संस्थापक रहे। 1924 से 1940 तक हिन्दुस्तान टाइम्स के चैयरमैन रहे तथा आपके प्रयत्नों से उसका हिन्दी संस्करण हिन्दुस्तान 1931 में निकलना प्रारंभ हुआ। 1908 में अखिल भारतीय संपादक सम्मेलन प्रयाग के अध्यक्ष पद से सरकारी प्रेस एक्ट तथा न्यूज पेपर एक्ट की आलोचना की। 1901 से 1916 तक प्रयाग म्युनिसिपल्टी के सदस्य, उपाध्यक्ष तथा अध्यक्ष के रूप में इलाहाबाद नगर का पहली बार आधुनिकीकरण हुआ।

स्वदेशी का किया प्रचार-प्रसार

सन् 1881 से स्वदेशी का व्रत लेकर देशी उद्योग धंधों के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु देशी तिजारत कंपनी की स्थापना की तथा 1907 में यू.पी. इण्डस्ट्रियल कांफ्रेंस का आयोजन कराकर स्वदेशी आंदोलन को तेज किया। 1907 मे सूरत कांग्रेस अधिवेशन के समय गुजरात में स्वदेशी का व्यापक प्रचार करने वाले महामना के प्रयासों से 1916 में ब्रिटिश सरकार ने टी.एच. हालैण्ड की अध्यक्षता में भारतीय औद्योगिक आयोग का गठन किया, जो देशी उद्योग धंधों की तत्कालीन स्थिति की जाँच एवं रिपोर्ट के लिए अधिकृत था। इससे स्वदेशी का खूब प्रचार-प्रसार हुआ।

मई 1922 में असम में अफीम विरोधी आंदोलन के दौरान भी आपने स्वदेशी एवं खादी वस्तुओं के उत्पादन, उपयोग एवं व्यवसाय को बढ़ावा देने की अपील की। मार्च 1932 मे काशी मे अखिल भारतीय स्वदेशी संघ की स्थापना आपके ही प्रयासों से हुई।

हिन्दी के विकास में उनका योगदान

हिन्दी भाषा-लिपि के संरक्षण व हिन्दी साहित्य के संवर्धन हेतु 1884 में हिन्दी उद्धारिणी प्रतिनिधि सभा का गठन हुआ, जो 1893 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा के गठन का आधार बना, इसमें मालवीय जी की महती भूमिका थी। नागरी प्रचारिणी सभा के माध्यम से आपने सरकारी कामकाज एवं पाठशालाओं/कचहरियों में हिन्दी के प्रयोग के लिए आंदोलन चलाया। इस हेतु तीन साल तक उन्हें वकालत से विरत रहना पड़ा तथा आपके प्रयासों से ही 15 अप्रैल 1900 में नागरी भाषा लिपि के प्रयोग की राजाज्ञा जारी हुई। 1900 में ही देश की सेवा प्रतियोगिता परीक्षाओं में हिन्दी माध्यम से भी परीक्षाएँ ली जाने के लिए मालवीय जी ने प्रयास किए, जो स्वीकृत हुए। अक्टूबर 1910 में प्रथम हिन्दी साहित्य सम्मेलन का आयोजन आपकी अध्यक्षता मे संपन्न हुआ।

लोक हित के लिये स्थापित किया काशी हिन्दू विश्वविद्यालय

मालवीय जी ने संपूर्ण भारत का भ्रमण किया था तथा प्राचीन भारत के गौरवशाली इतिहास का अध्ययन भी किया। इसी कारण सांदीपनि आश्रम में शिक्षा ग्रहण कर रहे श्रीकृष्ण एवं सुदामा का चित्र उनकी आँखों में तैरता रहता था। इसी के चलते भारत को एक सूत्र में बांधने के लिए कटिबद्ध महामना ने भारत की सांस्कृतिक राजधानी काशी में वि.वि. की स्थापना का व्रत लिया। सन् 1904 में काशी के तत्कालीन नरेश की अध्यक्षता में मिंट हाउस में आयोजित सभा में मालवीय जी ने काशी हिन्दू वि.वि. की योजना को विद्वतजनों के समक्ष रखा तथा बिना देर किए भावी वि.वि. का विवरण पत्र तैयार कर अक्टूबर 1905 में भारत के गणमान्य नागरिकों को विचारार्थ भेजा। 31 दिसम्बर 1905 को काशी के टाउन हॉल में आयोजित सभा की अध्यक्षता श्री बी.एन. महाजन ने की तथा वि.वि. कार्ययोजना पर प्रकाश डालते हुए मालवीय जी ने कहा कि भारत के प्राचीन धर्म की शिक्षा है कि प्रत्येक मनुष्य स्वयं को एक बड़ी समष्टि की इकाई समझकर उसके हित के लिए जीवित रहे और काम करे। लोक कल्याण तथा लोक संग्रह को परम पुरुषार्थ समझे। 1905 के बंग विभाजन के कारण मालवीय जी की योजना को तुरंत कार्यान्वित करना संभव नहीं हो सका। तत्पश्चात् सन् 1911 में महामना ने वि.वि. की संशोधित योजना को छपवाकर प्रकाशित किया तथा जनता के नाम से अपील जारी कर देश हित में एक करोड़ रुपये दान की मांग की। सर्वप्रथम आपके पिता ने रु. 101 प्रसाद के रूप में प्रदान किए, जिससे उत्साहित होकर उन्होंने वि.वि. के लिए भिक्षा मांगना प्रारंभ किया। इसी कारण से उन्हें ‘भिक्षु सम्राट’ भी कहा जाता है।

28 नवंबर 1911 को हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी के नाम से संस्था स्थापित हुई, जो काशी हिन्दू वि.वि. की स्थापना में महत्वपूर्ण कदम था। बीएचयू एक्ट 1915, 1 अक्टूबर 1915 को पास होकर 1 अप्रैल 1916 से लागू हुआ। इस तरह बीएचयू अस्तित्व में आया। जिसने करोड़ों लोगों के लिए मोक्ष का मार्ग प्रशस्त किया है।

हिन्दू-मुस्लिम एकता पर सदैव रहा उनका जोर

1910 में कलकत्ता में आयोजित हिन्दू-मुस्लिम एकता सम्मेलन के आयोजन में मुख्य भूमिका निभाने वाले महामना ने जीवन भर हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रयास किए। वे हिन्दू समुदाय की उन्नति के आकांक्षी थे, परन्तु मुस्लिम विरोधी नहीं। सन् 1880 मे प्रयाग मे हिन्दू समाज की स्थापना कर आपने हिन्दू समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं कुप्रथाओं के उन्मूलन का बीड़ा उठाया। इसके अलावा 1887 हरिद्वार में गो, ब्राह्मण तथा गंगा के संरक्षण हेतु गो वर्णाश्रम हितैषिणी गंगा धर्मरक्षा संगठन की स्थापना की तथा भारत धर्म महामंडल की स्थापना भी की। 1905 में हिन्दू जाति के उत्थान एवं कल्याणार्थ अखिल भारतीय सनातन धर्म महासभा की स्थापना की। सन् 1925 में अमृतसर में धर्म यज्ञ कराकर दुर्गयाना मंदिर एवं सरोवर की स्थापना तथा सन् 1928 एवं 1937 में बनारस के घाटों का जीर्णोद्धार, 1931 में बीएचयू परिसर में नवीन विश्वनाथ मंदिर की स्थापना, 1937 में मर्णिकर्णिका घाट का शिलान्यास एवं जीर्णोद्धार, मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि का उद्धार, प्रयाग में पंडों के हितों के संरक्षण हेतु संस्था, गो रक्षा मंडलों की स्थापना एवं अन्त्यजोद्धार कार्यक्रमों का संचालन मालवीय जी का हिन्दू समाज को संगठित एवं जागरूक बनाने के लिये किया। 1922 में गया में आयोजित हिन्दू महासभा की अध्यक्षता की तथा 1935 तक हिन्दू महासभा का नेतृत्व किया। 1914 में गंगा पर नहर बनाने का विरोध किया तथा श्रीगंगा सभा संस्था स्थापित की।

महामना का संपूर्ण जीवन प्रयोगधर्मी रहा। आपने अपने जीवन में सैकड़ों कार्य किए जो बहुत से लोगों के लिए अज्ञात हैं। सामान्यतया सभी की दृष्टि सिर्फ बीएचयू पर पड़ती है जो उनकी अनुपम एवं महान कृति है। आपने कुलपति के रूप में 24 सितम्बर 1939 से 16 जनवरी 1948 तक अवैतनिक सेवाएँ दी तथा वि.वि. के आजीवन रेक्टर के रूप में सुशोभित रहे। 12 नवम्बर 1946 को आपका महाप्रयाण हुआ। 30 मार्च 2015 को भारत माता के इस सपूत को मरणोपरांत देश का सर्वोच्च सम्मान भारतरत्न प्रदान किया गया। आपका आजीवन संकल्प कि मुझे राज्य की कामना नहीं, मुझे स्वर्ग की कामना नहीं, मुझे मोक्ष भी नहीं चाहिए, मेरी एकमात्र भावना बस यही है कि मैं दुखी प्राणियों के दुख दूर करूं, अंधेरी आँखों को रोशनी दूँ, आज भी कोटिशः महामना के मानस पुत्रों के मानस पटल पर अंकित है।