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विश्व होम्योपैथी दिवस 10 अप्रैल
स्थायी इलाज के समर्थक थे डॉ. सैमुअल
 

होम्योपैथी के जनक डॉ. क्रिश्चियन फ्रेडरिक सैमुअल हैनिमन का जन्म मीसेन प्रांत के सेक्सनी नामक स्थान पर 10 अप्रैल 1755 को हुआ था। यह उस समय फ्रांस का भाग था, जो कि वर्तमान में जर्मनी में स्थित है। वे अपने पिता क्रिश्चियन गोटफ्रेईड हैनिमन की तीसरी संतान थे। उनके पिता समय की मशहूर पोर्सलीन पॉटरी के पेंटर थे। उनकी माता का नाम जोहना क्रिस्टिना था, जिन्होंने हैनिमन को घर पर ही पढ़ना-लिखना सिखाया। 20 जुलाई 1767 को हैनिमन को स्कूल में भर्ती किया गया, जहां वे प्राचीन भाषाओं और जर्मन साहित्य के शिक्षक मुलर से बहुत प्रभावित हुये।

विद्यार्थी जीवन

गरीबी के कारण हैनिमन अपनी शिक्षा सुचारु रूप से नहीं ले पाए, क्योंकि उनके पिता चाहते थे कि वे अपने पुश्तैनी धंधे में ध्यान लगायें, किन्तु उनके शिक्षकों ने उन्हें आगे पढ़ने के लिए प्रेरित किया। 20 वर्ष की उम्र में 20 जर्मन थेलर (उस समय की मुद्रा) और अपने पिता की सीख- ‘उन सभी चीजों को सत्य सिद्ध करो, जो अच्छी हो’ को साथ लेकर 1775 में वे उच्च शिक्षा के लिए लिपजिग आ गए, जहां उन्होंने स्वयं का खर्च फ्रेंच और जर्मन भाषा सिखाकर तथा अनुवाद कर चलाया। हैनिमन का लगभग एक दर्जन भाषाओं पर समान अधिकार था, जिनमें-ग्रीक, लैटिन, इंग्लिश, स्पेनिश, फ्रेंच, जर्मन, हिब्रू, सिरिएक, अरबी, चेलेडिक आदि शामिल हैं।

चिकित्सा विज्ञान का अध्ययन करने के उद्देश्य से कुछ समय बाद वे विएना चले गये और उस समय के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. वॉन कुवेरिन से चिकित्सा कार्य सीखा। हैनिमन की प्रतिभा से प्रभावित होकर वहां के गवर्नर बैरन वॉन ने उन्हें अपना मानद चिकित्सक घोषित कर दिया। हैनिमैन ने दो साल के लिए लिपजिग में चिकित्साशास्त्र का अध्ययन किया। लिपजिग में  नैदानिक सुविधाओं की कमी की वजह से वे उस समय के उन्नत चिकित्सा शिक्षा के लिये विएना गये, जहां उन्होंने अध्ययन के साथ एमडी की उपाधि 10 अगस्त 1779 को आरलैंजेन विश्वविद्यालय से विशेष योग्यता सम्मान के साथ प्राप्त की। हो सकता है गरीबी के कारण उन्होंने आरलैंजेन को चुना होगा, क्योंकि वहां स्कूल की फीस कम थी। हैनिमन की थीसिस का शीर्षक- ‘अकड़ने वाले रोगों का उपचार और कारण : एक शोध प्रबंध’ (क्दृदद्मद्रड्ढड़द्यद्वद्म ठ्ठड्डढड्ढड़द्यद्वद्वथ्र् द्मद्रठ्ठद्मथ्र्दृड्डत्-ड़दृद्धद्वथ्र् ठ्ठड्ढद्यत्दृथ्दृढ़त्ड़द्वद्म ड्ढद्य द्यण्ड्ढद्धठ्ठद्रड्ढद्वद्यत्ड़द्वद्म) था।

मेडिकल प्रैक्टिस

 सन् 1781 डेसाउ में मेडिकल प्रैक्टिस की शुरुआत की और 17 नवम्बर 1782 को 27 वर्ष की अवस्था में उनका विवाह हेनरीएट कुछलर से हुआ और उन्हें गोमन का मेडिकल ऑफिसर नियुक्त किया गया। अनुवाद में हैनिमन की रुचि इतनी ज्यादा थी कि दिन में वे चिकित्सा करते और रात को अनुवाद कार्य। यहीं उन्होंने अपनी पहली किताब ‘डेमेसि’ यानी ‘ऑर्ट ऑफ मैन्युफेक्चरिंग केमिकल’ प्रोडक्ट्स का फ्रेंच भाषा में अनुवाद किया।

चिकित्सा अभ्यास का त्याग

अब धीरे-धीरे हैनिमन की रुचि चिकित्सा अभ्यास से खत्म होने लगी थी क्योंकि वे प्रचलित चिकित्सा उपायों जैसे- गोंच लगाना, खून बहाना, उल्टी कराना, विरेचन देना आदि को स्थाई उपचार का साधन नहीं मानते थे। उनका मानना था कि इससे अस्थायी आराम मिलता है, स्थायी नहीं। साथ ही उन्हें लगता था कि वर्तमान सदी का चिकित्सा ज्ञान अभी अधूरा है, अतः वे सब कुछ छोड़कर ज्ञान की तलाश में लग गये।

अब युवा हैनिमन की दिनचर्या एक सच्चे ज्ञान पिपासु की तरह चिकित्सा साहित्य के गहरे सागर में गोते लगाकर, काम के मोती ऊपर लाना और उन पर प्रयोग करना था। उन्हें सत्य या असत्य तथ्यों को साबित करना था, जो कि उनके पिता की सीख भी थी। इसी क्रम में उन्होंने उस समय के प्रसिद्ध मेडिकल जर्नल ‘हुफलेण्ड’ में सम्पादक के नाम पत्र लिखा जिसका शीर्षक था- ‘सभी उच्च चिकित्सकों को सम्बोधित पत्रः चिकित्सा विज्ञान के पुनर्गठन की आवश्यकता’। इस खुले पत्र ने चिकित्सा जगत में तहलका मचा दिया। उन्होंने लिखा था- ‘‘मैं चिकित्सा के वर्तमान प्रचलित तरीकों और मान्यताओं से सहमत नहीं हूं, जिसमें विभिन्न तरह के ड्रग्स का प्रयोग बगैर उनकी रासायनिक प्रतिक्रिया को जाने बड़ी मात्रा में किया जाता है, बगैर इस बात के कि उस ड्रग में कितना एक्टिव सब्सटांस (गतिशील द्रव्यगुण) है। इस तरह मैं अपने ही भाई-बन्धुओं और मानवता का नाश नहीं कर सकता। अतः मैं उस ज्ञान की खोज में रसायन शास्त्र, चिकित्सा विज्ञान और चिकित्सा साहित्य का गहन अध्ययन करूंगा।’’

होम्योपैथी का जन्म

1790 में जब हैनिमन विलियम कुलेन की मटेरिया मेडिका का अंग्रेजी से जर्मन में अनुवाद कर रहे थे, तो उनकी नज़र पेरुवीयन बार्क (कुनेन की छाल) के विवरण पर गई, जहां लिखा था कड़वी और आमाशय संवेदी होने के कारण यह सविराम ज्वर का नाश करती है। तार्किक हैनिमन को यह बात जंची नहीं, उन्होंने अपने ऊपर प्रयोग करने का निर्णय लिया और सिनकोना बार्क का प्रयोग मूलार्क बनाकर अपने ऊपर करने पर उन्होंने पाया कि यह मलेरिया ज्वर जैसे लक्षण पैदा करती है। तब उन्हें लगा कि जो दवा अधिक मात्रा में लेने पर रोग लक्षण पैदा कर सकती है, वही यदि अल्प मात्रा में ली जाए, तो जिस व्यक्ति में वे लक्षण होंगे उसे दूर कर सकती है। कालांतर में उन्होंने कई प्रयोगों के माध्यम से इस अवधारणा में ड्रग पोटेंटाइज़ेशन या ड्रग डाईनामाईजेशन, मिनिमम डोज़, सिंपल सब्सटांस आदि सिद्धान्त भी प्रतिपादित किये।
अपने प्रयोगों के आधार पर हैनिमन ने 1796 में हुफलेण्ड जर्नल अंक-11, भाग-3-4,पेज-391-49 में- ‘ड्रग्स की रोग निवारण शक्तियों को सुनिश्चित करता हुआ नया सिद्धांत और कुछ पुराने सिद्धांतों का पुनरीक्षण’ नामक निबंध लिखा, जिसने होम्योपैथी चिकित्सा विज्ञान की नींव रखी।

होम्योपैथी प्रैक्टिस

समस्त विरोधों के बावजूद जून 1821 में कोथेन के ड्यूक ने हैनिमन को अपनी नई चिकित्सा पद्धति ‘होम्योपैथी’ की प्रैक्टिस करने की इजाजत दे दी। अब हैनिमन के पास बड़े दूर-दूर से जीर्ण और असाध्य रोगी आने लगे, जिनमें कई सुप्रसिद्ध एलोपैथ भी थे, जो रोग मुक्त होने के बाद एलोपैथी छोड़कर होम्योपैथी प्रैक्टिस करने लगे। प्रसिद्धि की चरम सीमा पर हैनिमन के विरोधियों की संख्या बढ़ने लगी, जिसके फलस्वरूप उन्हें 1834 में कोथेन छोड़ फ्रांस जाना पड़ा।  जून 1835 में पेरिस जाने से पहले हैनिमन ने कई वर्षों तक सेक्सोनी के आसपास कई अलग-अलग कस्बों और गांवों, ड्रेस्डन, टॉर्गौ, लिपजिग और कोथन में चिकित्सा कार्य किया।

वहां उन्हें नाम, काम, शोहरत, सम्मान सब कुछ मिला, जिसका हकदार एक शोधकर्ता, आविष्कारक होता है। यहीं 2 जुलाई 1843 को इस चिकित्सा वैज्ञानिक, साहित्यकार, दार्शनिक ने इस नश्वर संसार को अलविदा कहा और ‘समः समै समयति’ या लाइक क्योरस लाइक का नया सिद्धांत होम्योपैथी के नाम से दुनिया को दिया।

क्या है ऑर्गेनॉन ऑफ मेडिसिन

हैनिमन ने पहली बार एक जर्मन-लैंग्वेजिकल जर्नल में होम्योपैथिक दृष्टिकोण के बारे में 1796 में एक लेख प्रकाशित किया। आगे निबंधों की श्रृंखलाओं को सूत्रों के रूप में लिपिबद्ध कर 1810 में  ‘ऑर्गेनॉन ऑफ़ द रेशनल ऑर्ट ऑफ़ हीलिंग’ के नाम से प्रकाशित किया। द ऑर्गेनॉन, होम्योपैथी हीलिंग ऑर्ट का पहला व्यवस्थित ग्रंथ है और इसमें विषय की प्रैक्टिस से सम्बंधित सभी विस्तृत निर्देश शामिल हैं और हैनिमन के जीवन काल में इनमें लगातार सुधार होते रहे। इनके पांच संस्करण प्रकाशित हो चुके थे। ऑर्गेनॉन का छठवां संस्करण उनकी मृत्यु के कई सालों बाद ही प्रकाशित हो पाया था। इसमें पांचवीं ऑर्गेनॉन का व्यापक हस्तलिखित एनोटेशन शामिल था। ऑर्गेनॉन को व्यापक रूप से 1806 में प्रकाशित एक निबंध के रूप में माना जाता है, इसे ‘द मेडिसिन ऑफ़ एक्सपीरियंस’ कहा जाता है। यह ह्यूफ़लैंड के जर्नल में प्रकाशित किया गया था। रॉबर्ट एलिस डज्ज्न का कहना है कि ऑर्गेनॉन ‘उनकी’ अनुभव की चिकित्सा किताब का प्रवर्धन और विस्तार है।

ऑर्गेनॉन के पहले ही पृष्ठ पर एक ध्येय वाक्य लिखा है- ‘डेयर टू बी वाइस’। हैनिमन अपने चिकित्सा पद्धति के अनुयायियों से कहते हैं कि सच (बीमारी) को पहचानो और उसका (तीव्र, सौम्य, स्थायी) उपचार करो।

हैनिमन का प्रमुख लेखन

  • सन् 1805- मेडिसिन ऑफ एक्सपीरियंस
  • सन् 1810- रेशनल ऑर्ट ऑफ हिलिंग
  • सन् 1811-1821- मटेरिया मेडिका प्यूरा
  • सन् 1813- न्यू मेडिकल डॉक्टरिन
  • सन् 1828- क्रोनिक डीसीसेज इट्स टेंडेंसी