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ग्रामीण महिलाओं को आत्म-निर्भर बना रहा आजीविका मिशन
 

अनूपपुर, मध्यप्रदेश के ग्रामीण अंचलों में महिलाओं को ग्रामीण आजीविका मिशन ने आर्थिक तरक्की की नई राह दिखाई है। अनूपपुर जिले के ग्राम नोनघाटी की बिटिया शांति के पिता चलने-फिरने में असमर्थ थे। भाई शादी के बाद अलग रहने लगा था और बड़ी बहिन ससुराल में थी। ऐसे में परिवार के भरण-पोषण के लिये शांति को ग्रामीण आजीविका मिशन ने सही रास्ता दिखाया। शांति अपनी मां के साथ स्व-सहायता समूह से जुड़ गई। शांति ने ग्रामीण स्व-रोज़गार प्रशिक्षण केन्द्र में मुर्गी पालन का प्रशिक्षण प्राप्त किया। इस आधार पर उसे 30 हजार रुपये लोन मंजूर हो गया। उसने एक सिलाई मशीन भी खरीद ली और सिंलाई के काम में जुट गई। लोन से उसकी आर्थिक हालत में सुधार हुआ, तो उसने प्राइवेट पढ़ाई जारी की और स्नातक की परीक्षा पास कर ली। शांति को आजीविका मिशन द्वारा इंदिरा गाँधी आदिवासी विश्वविद्यालय, पोड़की (अमरकंटक) भेजा गया। प्रशिक्षक दल ने शांति की प्रतिभा को परखकर विश्वविद्यालय के जैविक केन्द्र में काम पर रखवा दिया। अब उसे प्रति-माह 12 हजार रुपये मिलने लगे। मुर्गी-पालन और सिलाई कार्य से अलग पांच-छह हजार रुपये की मासिक आमदनी हो जाती है।

सीधी जिले के ग्राम बरिगवां की गुलुआ बानो परिवार की छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए परेशान रहती थी। उसके गांव में आजीविका मिशन परियोजना की शुरुआत हुई तो वह बड़े पीर स्व-सहायता समूह की सदस्य बन गयी। उसे पांच हजार रुपये का लोन मिला, जिससे उसने विसातखाना की दुकान खोल ली। इससे आमदनी बढ़ी तो स्व-सहायता समूह का लोन जल्दी वापस कर दिया। फिर उसे 50 हजार का लोन मिला, तो वह रुई की धुनाई करने वाली मशीन ले आई। अब गुलुआ बानो पति के साथ रजाई, गद्दे और तकिये भराई का काम भी करने लगी। लोन चुकता होते ही बेटे को साइकिल रिपेयरिंग के काम में लगा दिया। अब गुलुआ के परिवार की मासिक आमदनी 15 से 20 हजार रुपये हो गई है। 

छतरपुर जिले के ग्राम नारायणपुरा की महिलाओं ने तेजस्विनी समूह की मदद से अपनी बदहाल जिन्दगी से निजात पाई है। अली तेजस्विनी समूह की महिला सदस्यों ने सूक्ष्म वित्त संस्था से लोन लेकर बेकरी फेक्ट्री लगाई है। इस फेक्ट्री में गाँव की महिलाओं ने ब्रेड, टोस्ट आदि बनाना शुरू कर दिया है। अब ये महिलायें एक हजार पांच सौ से दो हजार रुपये रोजाना कमा रही हैं।

टीकमगढ़ जिला मुख्यालय के समीप डूडा की साहसी महिलाओं ने बैंक से लोन लेकर खुद का व्यवसाय शुरू किया है। आज स्थिति यह है कि ये महिलाएँ अपने परिवार की आजीविका वाहक बन गई हैं। पार्वती स्व-सहायता समूह की सदस्य सुनीता विश्वकर्मा, सुनीता तिवारी, लक्ष्मी रजक एवं दुर्गा स्व-सहायता समूह की सदस्य दुर्गा विश्वकर्मा एवं रिंकी कुशवाह ने बताया कि पहले उन्हें मजदूरी करना पड़ती थी। कभी-कभी मजदूरी भी नहीं मिलती थी। एक दिन समूह की महिलाओं ने गाँव में ही आटा-छन्नी उद्योग लगाने का निर्णय लिया। कुछ समय बाद पार्वती स्व-सहायता समूह को 75 हजार और दुर्गा स्व-सहायता समूह को एक लाख रुपये का लोन मिल गया। समूह के सदस्यों ने स्वयं की बचत राशि और लोन की राशि से इंदौर से आटा छन्नी बनाने की मशीन और कच्चा माल खरीदा। जिला प्रशासन की मदद से इन्हें प्रशिक्षण भी मिला। अब इनका व्यवसाय अच्छा चल पड़ा है।