Department of Public Relation:Government of Madhya Pradesh
social media accounts

पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति दिवस 11 फरवरी
राष्ट्र की आत्मा के प्रतिनिधि थे दीनदयाल जी
 

स्वतंत्रता के पश्चात् भारत जब विदेशी संस्कृति के प्रभाव और उसके दुष्परिणामों से जूझ रहा था तब नेतृत्व के सामने यक्ष प्रश्न खड़ा था कि उसके विकास की दिशा क्या हो? तब नेतृत्व उलझन में था। यह सब समझ से परे था। ऐसे में देश को एक ऐसा राजनीतिक दार्शनिक मिला, जिसने भारत को उसकी शाश्वत व गौरवशाली संस्कृति को समकालीन सूत्र में पिरोने का बीड़ा उठाया। वे थे पंडित दीनदयाल उपाध्याय। जिन्होंने एकात्म मानव दर्शन के माध्यम से देश को उसकी अपनी वैभवशाली संस्कृति का भान कराया और उसे राजनीति की मुख्यधारा का हिस्सा बनाया। आज हम उन्हीं के दर्शन से प्रेरित शासन व्यवस्था का अनुभव कर रहे हैं।

उनकी सादगी, सरलता, दृढ़ता, कर्तव्य एवं विचार देश को सदैव प्रेरणा देते रहेंगे, और परमवैभव के मार्ग पर हमारा मार्गदर्शन करते रहेंगे, ऐसा हमें विश्वास है। इस अवसर पर उनकी पुण्य स्मृति को
शत्-शत् नमन करते हैं।

25 सितम्बर 1916 को हुआ जन्म

दीनदयाल जी सचमुच में राष्ट्र की आत्मा का प्रतिनिधित्व करते थे। उन्होंने देश की इस सामूहिक आत्मा का खूब अध्ययन भी किया और इसे नाम दिया चिति। बहुआयामी प्रतिभा के धनी दीनदयाल जी एक प्रचारक, प्रेरक, संगठक, प्रभावी वक्ता, साहित्यकार, अर्थशास्त्री और दार्शनिक थे।

पंडित जी का जन्म राजस्थान में जयपुर के पास धान्क्या गांव में हुआ।  अश्विन कृष्ण त्रयोदशी संवत् 1973 तदानुसार, 25 सितंबर, 1916 को रामप्यारी के पहले पुत्र का जन्म अपने नाना श्री चुन्नीलाल शुक्ल के घर में हुआ। बालक का नाम रखा गया दीना, जो आगे चलकर दीनदयाल कहलाये।

नाना श्री चुन्नीलाल शुक्ल, धान्क्या रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर थे। उनकी पुत्री रामप्यारी जी का विवाह हुआ था, मथुरा जिले के नगला चन्द्रभान के निवासी पंडित भगवती प्रसाद उपाध्याय के साथ। वे मथुरा के पास जलसेर रोड स्टेशन पर असिस्टेंट स्टेशन मास्टर थे।

लेकिन दीनदयाल जी के जन्म स्थान के रूप में मान्यता मिली नगला चन्द्रभान को। मथुरा जिले में यह दीनदयाल जी का पैतृक गांव है। उनके पासपोर्ट में भी जन्म स्थान के रूप में नगला चंद्रभान ही दर्ज है। वे अपने पैतृक गांव में कम ही रह पाए। पहले वे रहे गंगापुर में अपने मामा के घर और फिर कोटा होते हुए, नौवीं कक्षा पास करने के बाद आगे की शिक्षा के लिए राजगढ़ से सीकर आ गये।

दीनदयाल जी जहां भी गये, उनकी कुशाग्र बुद्धि, लगन और परिश्रम से उनके अध्यापक बहुत प्रभावित हुए। सभी उन्हें बहुत स्नेह करते थे और छोटी सी उम्र में उनका सम्मान भी।

उत्तर पुस्तिका नमूने के रूप में रखी गई

दीनदयाल जी को सीकर के कल्याण हाईस्कूल से मैट्रिक की परीक्षा देनी थी, लेकिन परीक्षा से कुछ माह पूर्व वे बीमार पड़ गए। हाईस्कूल की परीक्षा आरम्भ हो गई। दीनदयाल जी ने बहुत लगन के साथ परीक्षाएं दीं और बीमारी के बावजूद वे न केवल अजमेर बोर्ड में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए, बल्कि कई विषयों में उन्होंने नए रिकार्ड भी बनाए।

उनकी रेखागणित की उत्तर-पुस्तिका कई वर्षों तक नमूने के रूप में रखी गई, ताकि बाकी छात्र प्रेरणा ले सकें। उन्हें बोर्ड ने भी स्वर्ण पदक दिया और विद्यालय ने भी। इसके दो वर्ष बाद उन्होंने पिलानी के बिरला कॉलेज से इंटर की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। यहां उन्हें फिर दो स्वर्ण पदक मिले। एक बोर्ड की तरफ से दूसरा विद्यालय की तरफ से।

गणित में वे हमेशा सर्वोच्च अंक प्राप्त करते थे। जब सीकर के महाराजा को इस मेधावी छात्र के बारे में खबर मिली, तो उन्होंने दीनदयाल जी को पदक के साथ छात्रवृति भी बांध दी। पदक देते हुए उन्होंने दीनदयाल जी से अपनी मनपसंद चीज मांगने को कहा तो दीनदयाल जी ने कहा, बस आपका आशीर्वाद चाहिए।

दीनदयाल जी ने बी.ए. करने के लिए कानपुर के सनातन धर्म कॉलेज में प्रवेश लिया। इस कॉलेज ने बहुत से प्रतिभाशाली छात्रों को गढ़ा था। अटल जी भी यहीं से पढ़े थे। यहां से शिक्षा प्राप्त करके सब अपने-अपने मार्ग पर आगे बढ़ गए, लेकिन दीनदयाल जी के मन में यहां काम करते-करते राष्ट्र प्रेम की अलख जग गई और वे शीघ्र ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संपर्क में आ गए।

ऐसा करते-करते वे अपनी पढ़ाई से छिटके नहीं। मेधावी तो वे शुरू से थे ही। लगनशील भी थे। बस पढ़ाई से मतलब रखते थे। जो विषय कॉलेज में पढ़ाए जाते थे उनका मन लगाकर अध्ययन करते थे। यहीं उनका सम्पर्क श्री सुन्दर सिंह भण्डारी व श्री बलवंत महासिंघे जैसे लोगों से हुआ। पठन-पाठन के अलावा उनके बीच राष्ट्रीय, सामाजिक व राजनीतिक चर्चायें भी चलती थीं। दीनदयाल जी के लिए यह पारिवारिक दुखों के साए से बाहर निकल कर राष्ट्र की समग्रता को देखने का अवसर था।

पांचजन्य व स्वदेश के सम्पादन कार्यों में किया सहयोग

बी.ए. करने के बाद दीनदयाल जी एम.ए. करने के लिए आगरा चले गए। यहां वे श्री नानाजी देशमुख और श्री भाऊराउ जुगादे के साथ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे।

इसी बीच दीनदयाल जी की चचेरी बहन रमा देवी बीमार पड़ गयीं और वे इलाज कराने के लिए आगरा चली आईं। दीनदयाल जी अपनी पढ़ाई छोड़ उनकी सेवा में लग गए, लेकिन वे अपनी बहन को बचा नहीं पाए। इससे वे बहुत निराश हुए। दुख में डूब गए, लेकिन तब तक उनमें सामाजिक जीवन के अंकुर फूट चुके थे। सरकारी नौकरी की पेशकश छोड़कर वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक बन चुके थे।

पालन पोषण करने वाले उनके मामा को लगा था कि अब भांजा पढ़-लिख गया है, परिवार के लिये कुछ करेगा, लेकिन दीनदयाल उपाध्याय का परिवार तो बहुत विशाल था। करोड़ों लोगों से भरपूर। उनके मन में इसका कोई अंतर्द्वंद्व भी नहीं रहा। उन्होंने अपने मामा जी को जो पत्र लिखा, उसमें राष्ट्र के प्रति समर्पण का उनका आग्रह स्पष्ट था। फिर देश, विदेशी शासन से स्वतंत्र हुआ। अब दीनदयाल जी की भूमिका बदल चुकी थी। उनके सामने अब चुनौती थी राष्ट्र के पुनर्निर्माण की। सन् 1947 में ही राष्ट्रधर्म प्रकाशन की स्थापना हुई तथा राष्ट्रधर्म मासिक, पांचजन्य साप्ताहिक व स्वदेश दैनिक का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। पंडित जी पांचजन्य व स्वदेश के सम्पादन कार्य में सहयोग करने लगे। प्रकाशन के प्रबंध निदेशक थे श्री नानाजी देशमुख।

सम्पादन कार्य अटल बिहारी वाजपेई, यादवराव देशमुख जैसे लोगों ने संभाला। इनके अतिरिक्त बहुत से कार्यकर्ता भी राष्ट्रधर्म परिवार में थे, जिनके पालक की भूमिका में दीनदयाल जी थे।

राष्ट्र को समर्पित सार्थक जीवन रेल की पटरी के किनारे समाप्त हुआ

उन्हें एक विशेष परिस्थिति में जौनपुर से चुनाव भी लड़ना पड़ा। वहां ब्राह्मणों का आधिक्य था। कार्यकर्ताओं का आग्रह था कि उन्हें चुनाव जीतने के लिए पंडित शब्द का प्रयोग करना चाहिए। लेकिन उन्होंने कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि अगर कोई भी उनकी जाति के नाम पर वोट मांगेगा तो वे बीच में ही चुनाव छोड़कर चले जाएंगे।

उऩ्होंने स्वयं को संगठन में झोंक दिया था। 1967 में उन्होंने कालीकट अधिवेशन में पार्टी का अखिल भारतीय अध्यक्ष का पद तब स्वीकार किया जब दल की संगठनात्मक नींव डालने का कार्य पूर्ण हो गया। 11 फरवरी 1968 को वज्राघात हुआ, जब सारे देश ने उनकी हत्या का समाचार सुना। रेल की पटरी के किनारे प्रारंभ हुआ राष्ट्र को समर्पित यह सार्थक जीवन रेल की पटरी पर ही समाप्त हो गया। सारा देश शोक में डूब गया। परमपूजनीय गुरुजी जैसा दृढ़ व्यक्तित्व भी इस घटना से बेहद द्रवित हो गया। जनसंघ व राजनीति से इतर लोगों ने भी इस जीवन को भरपूर सराहा।

एकात्म मानव दर्शन का बोध कराया

अपने सार्वजनिक जीवन में उनकी सादगी व सरलता मानो एक किंवदंती बन गई थी। इसका कार्यकर्ताओं पर भी बड़ा असर पड़ता था। वैचारिक दृष्टि से ही नहीं, आचार-व्यवहार में भी कार्यकर्ता उनसे बहुत कुछ सीखते थे। गंभीर से गंभीर विषय भी वे सहजता से अपनी दैनिक व नियमित गतिविधियों के बीच ही निपटा दिया करते थे।

लेकिन जाने से पहले वे देश को दे गए एक ऐसा दर्शन जो देश के मानस-पटल से लुप्त होने लगा था। उन दिनों देश समाजवाद व पूंजीवाद के द्वंद्व से गुज़र रहा था। तब के राजनीतिक नेतृत्व को भारतीय सनातन परंपरा की विशालता और रा़ष्ट्र की अपनी बौद्धिक शक्ति का भान नहीं हो पा रहा था। वह कभी कहीं से और कभी कहीं से अपने विकास के मॉडल ढूंढ रहा था।

ऐसे में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने देश को बोध कराया अपने ही दर्शन का। बस आइना ही तो दिखाना था। उसी में से अंकुरित हुआ एकात्म मानव दर्शन। आज हम इस अंकुर को एक वटवृक्ष के रूप में देख रहे हैं। उस दर्शन का अब पूरी दुनिया लोहा मानने लगी है। उसका पोषण करने की जिम्मेदारी अब हम सब पर है।