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रामकृष्ण परमहंस जयंती 17 फरवरी
मानवीय मूल्यों के आध्यात्मिक संत थे रामकृष्ण परमहंस
 

मानवीय मूल्यों के पोषक, महान आध्यात्मिक संत तथा विश्व को भारत की सही पहचान दिलाने वाले स्वामी विवेकानन्द के गुरू श्री रामकृष्ण परमहंस का जन्म शकाब्द 1757 फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष द्वितीया तदनुसार 17 फरवरी 1836 को बंगाल प्रांत स्थित कामारपुकुर ग्राम में हुआ था। (इस वर्ष यह सुखद संयोग है कि उनकी जयंती भारतीय काल गणना और आंग्ल ईस्वी सन दोनों के अनुसार हम एक ही दिन मना रहे हैं) इनके बचपन का नाम गदाधर था। पिताजी का नाम खुदीराम चट्टोपाध्याय और माताजी का नाम चंद्रमणिदेवी था। उनके भक्तों के अनुसार रामकृष्ण के माता-पिता को उनके जन्म से पहले ही अलौकिक घटनाओं और दृश्यों का अनुभव हुआ था। गया में उनके पिता खुदीराम ने एक स्वप्न देखा था, जिसमें उन्होंने देखा की भगवान गदाधर (विष्णु के अवतार) ने उनसे कहा कि वे उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। उनकी माता चंद्रमणिदेवी को भी ऐसा एक अनुभव हुआ था, उन्होंने शिव मंदिर में अपने गर्भ में रोशनी प्रवेश करते हुए देखी।

बालक गदाधर के परिवार में आ जाने के बाद आदर्श माता-पिता को अतीव आनंद की अनुभूति हुई। उनकी बालसुलभ सरलता और मंत्रमुग्ध मुस्कान से हर कोई सम्मोहित हो जाता था। किन्तु सात वर्ष की अल्पायु में ही गदाधर के सर से पिता का साया उठ गया। ऐसी विपरीत परिस्थिति में पूरे परिवार का भरण-पोषण कठिन होता चला गया।

तमाम आर्थिक कठिनाइयां आईं, किन्तु बालक गदाधर का साहस कम नहीं हुआ। इनके बड़े भाई रामकुमार चट्टोपाध्याय कलकत्ता (कोलकाता) में एक पाठशाला के संचालक थे। वे गदाधर को अपने साथ कोलकाता ले गए। रामकृष्ण का अन्तर्मन संकीर्णताओं से बहुत दूर अत्यंत निश्छल, सहज और विनयशील था, किन्तु पढाई में कम, संत सेवा और ईश्वर भक्ति में अधिक रहता था। भाई के सतत प्रयासों के बाद भी गदाधर का मन विद्या अध्ययन में नहीं लग पाया।

दक्षिणेश्वर में

सन 1855 में रानी रासमणि ने दक्षिणेश्वर में काली मंदिर बनवाया, तो अग्रज रामकुमार चट्टोपाध्याय को उसका पुजारी बनाया गया। गदाधर और उनके भांजे ह्रदय, रामकुमार की पूजापाठ में सहायता करते थे। गदाधर को देवी प्रतिमा को सजाने का दायित्व दिया गया था। 1856 में बड़े भाई रामकुमार की भी मृत्यु हो गई। परिणाम स्वरूप गदाधर को काली मंदिर में पुरोहित के तौर पर नियुक्त किया गया। अब गदाधर रामकृष्ण मंदिर में रहकर माँ काली की सेवा में ज़्यादा ध्यान मग्न रहने लगे। वे माता की मूर्ति को अपनी माता और ब्रह्मांड की माता के रूप में देखने लगे। कहा जाता है कि श्री रामकृष्ण को काली माता के दर्शन ब्रह्मांड की माता के रूप में हुए थे। रामकृष्ण इस अनुभूति का वर्णन करते हुए कहते हैं ‘घर, द्वार, मंदिर और सब कुछ अदृश्य हो गया, जैसे कहीं कुछ भी नहीं था। मैंने एक अनंत तीर विहीन आलोक का सागर देखा, यह चेतना का सागर था। जिस दिशा में भी मैंने दूर-दूर तक जहाँ भी देखा बस उज्ज्वल लहरें दिखाई दे रही थीं, जो एक के बाद एक, मेरी तरफ आ रही थीं।’

काली मंदिर में माँ की पूजा करते हुए गदाधर असमान्य व्यवहार करते पाए जाते, कभी नृत्य करते, तो कभी भजन गाते, तो कभी-कभी वे माँ काली से बतियाते। अफवाह फैलने लगी कि दक्षिणेश्वर में आध्यात्मिक साधना के कारण गदाधर का मानसिक संतुलन खराब हो गया है। माता और उनके बड़े भाई रामेश्वर ने गदाधर का विवाह करवाने का निर्णय लिया। उनका यह मानना था कि शादी होने पर गदाधर का मानसिक संतुलन ठीक हो जायेगा और शादी की ज़िम्मेदारियों के कारण उनका ध्यान आध्यात्मिक साधना से हट जाएगा। गदाधर ने खुद यह कहा कि उनकी जीवन संगिनी, जयरामबाटी (जो कामारपुकुर से 3 मील दूर उत्तर पूर्व की दिशा में हैं) में रामचन्द्र मुख़र्जी के घर उनकी पुत्री के रूप में रहती है। उस समय भारत में बाल विवाह का रिवाज था, किन्तु शादी होने के बाद भी पति-पत्नी के रूप में लड़की की उम्र वयस्क होने पर रहने की अनुमति थी। 1859 में माँ चंद्रमणि देवी ने अपने 23 वर्षीय बेटे की शादी सारदामणि मुखोपाध्याय के साथ करा दी। यह विवाह सामान्य विवाह नहीं था, बल्कि भविष्य की दो आध्यात्मिक शक्तियों का मिलन था। विवाह के बाद सारदा जयरामबाटी में रहीं और 18 वर्ष के होने पर गदाधर के पास दक्षिणेश्वर में आकर रहने लगीं। तब तक गदाधर सन्यासी हो चुके थे, उन्होंने प्रकाण्ड विद्वान और आध्यात्मिक संत तोतापुरी महाराज, जो आदि शंकराचार्य द्वारा प्रवर्तित ‘दस नामी में से एक पुरी सम्प्रदाय’ के सन्यासी थे, से दीक्षा गृहण की, गुरु ने अद्वैत का ज्ञान देकर जीवन मुक्त बनाया, तो नया नाम दिया ‘रामकृष्ण परमहंस’ सारदा देवी ने भी दक्षिणेश्वर मंदिर में आ जाने के बाद स्वयं सन्यासी जीवन जीने का निश्चय किया।

कहा जा सकता है कि सारदा देवी ने एक आदर्श अर्धांगिनी का धर्म पूर्ण मनोयोग से निभाया। अपने सर्वस्व पति को ईश्वर मानकर उनके सुख को ही अपना सुख माना। वे आदर्श जीवन साथी के रूप में उनकी सहायता करने लगीं। श्री रामकृष्ण को तो सारदा देवी और माँ काली में कोई फर्क ही नजर नहीं आता था। इस भाव की चरम प्रस्तुति उस समय हुई जब सारदा देवी ने जगदम्बा ज्ञान का साक्षात्कार षोडशोपचार पूजन किया और रामकृष्ण परमहंस तथा माँ सारदा देवी समाधि में चले गए।

महान हस्तियों के प्रेरणा स्त्रोत

समय जैसे-जैसे व्यतीत होता गया, उनके कठोर आध्यात्मिक अभ्यासों और सिद्धियों के समाचार तेजी से फैलने लगे और दक्षिणेश्वर का मंदिर उद्यान शीघ्र ही भक्तों एवं भ्रमणशील संन्यासियों का प्रिय आश्रयस्थान हो गया। कुछ बड़े-बड़े विद्वान एवं प्रसिद्ध वैष्णव और तांत्रिक साधक जैसे- पं नारायण शास्त्री, पं पद्मलोचन तारकालकार, वैष्णवचरण और गौरीकांत तारकभूषण आदि उनसे आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त करने आते रहे। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के सम्पर्क में आने वालों में तत्कालीन सुविख्यात विचारक प्रमुख थे, जो बंगाल में ख्यात विचारों का नेतृत्व कर रहे थे, जिनमें केशव चन्द्र सेन, विजय कृष्ण गोस्वामी, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के नामोल्लेख आवश्यक हैं। इस बीच उनके आश्रम में नरेंद्र दत्त नामक बालक आया। परमहंस जी ने उसकी अनुपम प्रतिभा और व्यक्तित्व की परख कर उसे राष्ट्र भक्ति, ज्ञान और सन्यास संस्कार दिए, जो बाद में स्वामी विवेकानन्द के रूप में विश्व भर में विख्यात हुआ। इसके अतिरिक्त साधारण भक्तों का एक दूसरा वर्ग भी था, जिसमें रामचंद्र दत्त, गिरीशचंद्र घोष, बलराम बोस, महेंद्र नाथ गुप्त (मास्टर महाशय) और दुर्गाचरण नाग प्रमुख थे।

रामकृष्ण परमहंस जीवन के अंतिम दिनों में समाधि की स्थिति में रहने लगे। अतः तन से शिथिल होने लगे। शिष्यों द्वारा स्वास्थ्य पर ध्यान देने की प्रार्थना पर अज्ञानता जानकर हँस देते थे। इनके शिष्य इन्हें ठाकुर नाम से पुकारते थे।

अनंत में विलीन

रामकृष्ण महान योगी, उच्चकोटि के साधक व विचारक थे। सेवा पथ को ईश्वरीय, प्रशस्त मानकर अनेकता में एकता का दर्शन करते थे। सेवा से समाज की सुरक्षा चाहते थे। गले में सूजन को जब डाक्टरों ने कैंसर बताकर समाधि लेने और वार्तालाप से मना किया तब भी वे मुस्कराये। चिकित्सा कराने से रोकने पर भी विवेकानन्द इलाज कराते रहे। चिकित्सा के वाबजूद उनका स्वास्थ्य बिगड़ता ही गया। रुग्णता की स्थिति में भी ‘ठाकुर’ सतत सक्रिय रहते थे। वे प्राय-प्रवचन नहीं देते थे, बल्कि आसपास जुटे शिष्यों को सहज संवाद में बहुत बड़ी-बड़ी बातें कह दिया करते थे। परमहंस जी न केवल सनातन, शैव, शक्ति उपासना, बल्कि मुस्लिम और इसाई सम्प्रदाय में समन्वय के पक्षधर थे। वे कहा करते थे कि ईश्वर के हजार नाम हो सकते है, उनमें अल्ला और गॉड भी शामिल हैं।

अंत में वह दुख का दिन आ गया। 1886 ई.की 16 अगस्त को सवेरा होने के कुछ ही वक्त पहले आनन्दघन विग्रह श्रीरामकृष्ण इस नश्वर देह को त्याग कर महासमाधि स्व-स्वरूप में लीन हो गये।

रामकृष्ण छोटी कहानियों के माध्यम से लोगों को शिक्षा देते थे। कलकत्ता के बुद्धिजीवियों पर उनके विचारों ने ज़बरदस्त प्रभाव छोड़ा था। उनके आध्यात्मिक आंदोलन ने परोक्ष रूप से देश में राष्ट्रवाद की भावना बढ़ाने का काम किया, क्योंकि उनकी शिक्षा जातिवाद एवं धार्मिक पक्षपात को नकारती है।

रामकृष्ण के अनुसार ही मानव सेवा जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य है। रामकृष्ण कहते थे की काम, क्रोध, लोभ और मोह ईश्वर प्राप्ति के सबसे बड़े बाधक हैं। वे कहा करते थे कि भगवान को सभी पथों और माध्यमों के द्वारा महसूस किया जा सकता है, सभी धर्म सच्चे और सही हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि आप उस तक पहुँच पाते हैं या नहीं। आप वहां तक जानें के लिए कोई भी रास्ता अपना सकते हैं, रास्ता महत्व नहीं रखता।

रामकृष्ण के परम प्रिय शिष्य विवेकानन्द कुछ समय हिमालय के किसी एकान्त स्थान पर तपस्या करना चाहते थे। यही आज्ञा लेने जब वे गुरु के पास गये तो रामकृष्ण ने कहा- ‘वत्स! हमारे आसपास के क्षेत्र के लोग भूख से तड़प रहे हैं। चारों ओर अज्ञान का अंधेरा छाया है। यहां लोग रोते-चिल्लाते रहें और तुम हिमालय की किसी गुफा में समाधि के आनन्द में निमग्न रहो, क्या तुम्हारी आत्मा स्वीकारेगी? इन प्रखर विचारों ने विवेकानन्द की जीवन धारा ही बदल दी। वे दरिद्र नारायण की सेवा में लग गये। रामकृष्ण परमहंस का वाह्य रूप परमहंस का था, कुछ लोग उन्हें पागल, विक्षिप्त या जो चाहें कुछ भी समझते होंगे, किन्तु वे तो एक महान संत और सच्चे समाज सुधारक थे। रामकृष्ण परमहंस के प्रभाव में जो भी लोग आते थे, वे सभी अपने मन की भ्रान्ति को निकालकर समाज कल्याण में जुट जाते थे।

ठाकुर की इहलीला समाप्ति के 11 वर्ष बाद स्वामी विवेकानन्द ने पूरे देश में बिखर गए गुरुभाई सन्यासियों को एकत्रित कर 1 मई सन् 1897 को रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इसका मुख्यालय कोलकाता के निकट बेलूर में है, जिसकी शाखाएं पूरे देश में फैली हुई है। धर्म, अध्यात्म, शिक्षा और संस्कृति का प्रमुख केंद्र रामकृष्ण मिशन दूसरों की सेवा और परोपकार को कर्म योग मानता है, जो कि हिन्दु धर्म का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। रामकृष्ण मिशन का ध्येय वाक्य है - आत्मनो मोक्षार्थं बाद। रामकृष्ण मिशन को 1998 में भारत सरकार द्वारा गाँधी शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

परमहंस के प्रमुख विचार

भगवान हर जगह हैं और कण-कण में हैं, लेकिन वह एक आदमी में ही सबसे अधिक प्रकट होते हैं, इस स्थिति में भगवान के रूप में आदमी की सेवा ही भगवान की सबसे अच्छी पूजा है। भगवान सभी पुरुषों में हैं, लेकिन सभी पुरुषों में भगवान नहीं हैं, इसीलिए हम पीड़ित हैं।

वे कहा करते थे कि सत्य के मार्ग पर चलने के लिए एकाग्रता और नम्रता होनी चाहिए क्योंकि सत्य के माध्यम से भगवान का अहसास किया जा सकता है। अगर तुम पूर्व की ओर जाना चाहते हो, तो पश्चिम की ओर मत जाओ। जब फूल खिलता है, मधुमक्खियाँ बिन बुलाए आ जाती हैं। प्यार के माध्यम से त्याग और विवेक स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो जाते हैं। बिना सत्य बोले तो भगवान को प्राप्त ही नहीं किया जा सकता, क्योंकि सत्य ही भगवान है। भगवान की भक्ति या प्रेम के बिना किये गए कार्य को पूर्ण नहीं किया जा सकता। भगवान की तरफ विशुद्ध प्रेम बेहद जरूरी बात है और बाकी सब असत्य और काल्पनिक है। शुद्ध ज्ञान और शुद्ध प्रेम एक ही चीज है। ज्ञान और प्रेम से जिस लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है, वो एक ही है और इसमें भी प्रेम वाला रास्ता ज्यादा आसान है।

भगवान के अनेकों नाम हैं और उनको अनेक तरीकोंे से प्राप्त किया जा सकता है, आप उसको किस नाम से पुकारते हैं और किस तरह से उसकी पूजा करते हैं, यह कोई महत्व नहीं रखता, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि आप उसको अपने अन्दर कितना महसूस करते हैं।

उन्होंने कहा कि पवित्र पुस्तकों में बहुत सारी अच्छी बातें पढ़ी जा सकती हैं, लेकिन शायद ही कोई ऐसी पुस्तक होगी, जिसे पढ़कर धर्म को बनाया जा सकता है। धर्म पर बात करना बहुत ही आसान है, लेकिन इसको आचरण में लाना उतना ही मुश्किल है। संसार के चारों कोनों में यात्रा कीजिये, लेकिन फिर भी आपको कहीं भी कुछ भी नहीं मिलेगा। जो आप प्राप्त करना चाहते हैं, वह तो यहीं आपके अन्दर विराजमान है।

तुम रात में आकाश में बहुत सारे तारे देख सकते हो, लेकिन सूर्य उदय के बाद नहीं देख सकते, किन्तु ऐसा तो नहीं है कि सूर्य उदय के बाद अर्थात दिन में आकाश में तारें नहीं होते। इसी प्रकार आप यदि अपनी अज्ञानता के कारण भगवान को प्राप्त नहीं कर सके, तो इसका मतलब यह तो नहीं है कि भगवान हैं ही नहीं।

मैं आपको एक सत्य बताता हूँ आप इस दुनिया में हैं, इसमें कुछ भी गलत नहीं है, परन्तु आपको अपना ध्यान भगवान की ओर लगाना चाहिए, नहीं तो आप सफल नहीं हो पाओगे। एक हाथ से अपने कर्तव्य का निर्वाह करो और दूसरे हाथ से भगवान की भक्ति करते रहो, जब आपकी ड्यूटी खत्म हो जाएगी, तो आप अपने दोनों हाथों से भगवान की भक्ति कर पाओगे।

उन्होंने कहा कि वह मनुष्य व्यर्थ ही पैदा होता है, जो बहुत ही कठिनाईयों से प्राप्त होने वाले मनुष्य जन्म को यूँ ही गवां देता है और अपने पूरे जीवन में भगवान का अहसास करने की कोशिश ही नहीं करता है। जिस मनुष्य ने ईश्वर का साक्षात्कार किया हो वो कभी दूसरे के प्रति क्रूर नहीं बन सकता, ऐसी क्रूरता होना, ये उसकी प्रकृति के विरुद्ध की बात है। ऐसे इंसान कभी भी गलत कदम नहीं उठाते और उनके मन में गलत विचार नहीं आते। जिस प्रकार मैले दर्पण में सूरज का प्रतिबिंब नहीं पड़ता, उसी प्रकार मलिन अंतःकरण में ईश्वर के प्रकाश का प्रतिबिंब नहीं पड़ सकता। उन्होंने कहा कि जब हवा चलने लगे तो पंखा चलाना छोड़ देना चाहिए, पर जब ईश्वर की कृपा दृष्टि होने लगे, तो प्रार्थना तपस्या नहीं छोड़नी चाहिए। यदि तुम ईश्वर की दी हुई शक्तियों का सदुपयोग नहीं करोगे, तो वह अधिक नहीं देगा। इसलिए प्रयत्न आवश्यक है। ईश-कृपा के योग्य बनने के लिए भी पुरुषार्थ चाहिए। उन्होंने बताया कि ईश्वर ही विश्व का एकमात्र पथ प्रदर्शक और गुरु है।

वे कहा करते थे कि नाव जल में रहे, लेकिन जल नाव में नहीं रहना चाहिए। इसी प्रकार साधक जग में रहे, लेकिन जग साधक के मन में नहीं रहना चाहिए।

उन्होंने बताया कि राजहंस दूध पी लेता है और पानी छोड़ देता है, लेकिन दूसरे पक्षी ऐसा नहीं कर सकते। इसी प्रकार साधारण पुरुष मोह-माया के जाल में फंसकर परमात्मा को नहीं देख सकता। केवल परमहंस जैसा मनुष्य ही माया को छोड़कर परमात्मा के दर्शन पाकर देवी सुख का अनुभव करते हैं।

उन्होंने कहा -भगवान से प्रार्थना करो कि धन, नाम, आराम जैसी अस्थायी चीजों के प्रति लगाव दिन-दिन अपने आप कम होता चला जाये। अपने विचारों में ईमानदार रहें। समझदार बनें, अपने विचारों के अनुसार कार्य करें, आप निश्चित रूप से सफल होंगे। एक ईमानदार और सरल हृदय के साथ प्रार्थना करो और आपकी प्रार्थना सुनी जाएगी।

एक बार रामकृष्ण परमहंस को दक्षिणेश्वर में पुजारी की नौकरी मिली। उनका 20 रुपए वेतन तय किया गया, जो उस जमाने के समय के लिए पर्याप्त था। लेकिन 15 दिन ही बीते थे कि मंदिर कमेटी के सामने उनकी पेशी हो गई और कैफियत देने के लिए कहा गया। दरअसल एक के बाद एक अनेक शिकायतें उनके विरुद्ध कमेटी तक जा पहुंची थीं। किसी ने कहा कि- यह कैसा पुजारी है, जो खुद चखकर भगवान को भोग लगाता है? तो किसी ने कहा- फूल सूंघ कर भगवान के चरणों में अर्पित करता है। उनके पूजा के इस ढंग पर कमेटी के सदस्यों को बहुत आश्चर्य हुआ था। जब रामकृष्ण कमेटी के सदस्य के सामने पहुंचे, तो एक सदस्य ने पूछा- यह कहां तक सच है कि तुम फूल सूंघ कर देवता पर चढ़ाते हो?

रामकृष्ण परमहंस ने सहज भाव से कहा- मैं बिना सूंघे फूल भगवान पर क्यों चढ़ाऊं? मैं पहले देख लेता हूं कि उस फूल से कुछ सुगंध भी आ रही है या नहीं? तत्पश्चात दूसरी शिकायत रखी गई- हमने सुना है कि तुम भगवान को भोग लगाने से पहले खुद अपना भोग लगा लेते हो? रामकृष्ण ने पुनः सहज भाव से जवाब देते हुए कहा - जी, मैं अपना भोग तो नहीं लगाता पर मुझे अपनी माँ की बात याद है कि वे भी ऐसा ही करती थीं। जब कोई चीज बनाती थी, तो चखकर देख लेती थीं और फिर मुझे खाने को देती थीं। उन्होंने फिर कहा- मैं भी चख कर देखता हूं। पता नहीं जो चीज किसी भक्त ने भोग के लिए लाकर रखी है या मैंने बनाई है वह भगवान को देने योग्य है या नहीं। उनका सीधे-सादे शब्दों में यह जवाब सुनकर कमेटी के सदस्य निरुत्तर हो गए।