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आदि शंकराचार्य ने मध्यप्रदेश की भूमि से दिया सांस्कृतिक एकता का संदेश

भोपाल : रविवार, अप्रैल 30, 2017, 20:12 IST
 

उदया तिथि के अनुसार 1 मई 2017 को आदि शंकराचार्य की 'प्राकटय पंचमी' को हम पूरे प्रदेश में 'आचार्य शंकर प्रकटोत्सव' के रूप में मना रहे हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने भी आदि शंकराचार्य के प्रकटोत्सव को 'राष्ट्रीय दर्शन दिवस' के रूप में घोषित किया है। अद्वैत वेदांत दर्शन के प्रवर्तक, सनातन धर्म के पुर्नरूद्धारक एवं सांस्कृतिक एकता के देवदूत आदि शंकराचार्य का पावन स्मरण हम सांस्कृतिक एकता स्वरूप कर रहे हैं। इस अवसर पर पूरे प्रदेश में सभी संभाग, जिला, विकासखण्ड और ग्राम पंचायत स्तर पर विभिन्न विभागों के समन्वय से संगोष्ठियाँ और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं।

आज से लगभग 1200 वर्ष पूर्व यानि 792 ईस्वी में आदि शंकराचार्य मध्यप्रदेश में नर्मदा तट पर ज्ञान प्राप्ति के लिए आये थे। उन्होंने ओंकारेश्वर के पास गोविन्द पादाचार्य से ज्ञान प्राप्त किया। इस घटना से बहुत कम लोग परिचित हैं। हम इसको एक चमत्कार के रूप में देखते हैं। मध्यप्रदेश को इस पर गर्व है कि आदि शंकराचार्य मध्यप्रदेश की धरती पर 1200 वर्ष पहले एक चमत्कार के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने ही 'नर्मदाष्टक' लिखकर माँ नर्मदा के महत्व को स्थापित किया। एक बार जब माँ नर्मदा की भीषण बाढ़ से लोग आतंकित हो गए तो उन्होंने नर्मदाष्टक लिखकर माँ नर्मदा से प्रार्थना की और वह शांत हो गई।

मध्यप्रदेश से ही उन्होंने 'अद्वैत-सिद्धांत' का प्रतिपादन किया। मध्यप्रदेश में ही शिक्षित होकर उन्होंने अपने सिद्धांतों के प्रतिपादन के लिए सम्पूर्ण भारत वर्ष का भ्रमण किया था और पूरे राष्ट्र को आलोकित किया। उन्होंने देश के भ्रमित समाज को दिशा प्रदान की। उनके कारण ही वेदों एवं उपनिषदों की वाणी पूरे भारत में पुन: गूँजी। समाज में नये जीवन का संचार हुआ तथा मध्यप्रदेश में एक अभिनव युग का सूत्रपात हुआ। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक उनकी सांस्कृतिक एकता यात्रा का मध्य-बिन्दु स्वाभाविक रूप से मध्यप्रदेश रहा है और संभवत: यह उन्हीं के संस्कारों का परिणाम है कि आज भी मध्यप्रदेश में अतिवादी आग्रह नहीं है, न धर्म का, न जाति और न ही संप्रदाय का। आदि शंकराचार्य मात्र 32 वर्ष की आयु में ऐसा कार्य कर गये, जिनके लिए हमारी कई पीढ़ियाँ आभारी रहेगी।

त्रेता युग में भगवान राम ने उत्तर-दक्षिण, द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने पूर्व-पश्चिम को जोड़ा था। कलयुग में यह जिम्मेदारी आचार्य शंकर के ऊपर आ गई। आदि गुरू शंकराचार्य महाराज ने पूरे देश को सांस्कृतिक रूप से जोड़ा। उन्होंने भारत में चारों दिशाओं में चार मठ ही नहीं बनाये, बल्कि देशभर में बहुत से मठ स्थापित किये। राष्ट्र को एकसूत्र में बाँधने का कार्य शंकराचार्य जी ने किया। आज हम रामेश्वर में जल भरकर जाते हैं और बद्रीनाथ में चढ़ाते हैं, फिर बद्रीनाथ में पूजा करके दक्षिण में ब्राह्मण पूजा करते हैं। चारों पीठ में इनकी पूजा का विधान है। इसके पीछे यही सोच है कि भारत एक मजबूत राष्ट्र बने। भारत माता एक बनी रहे। आचार्य शंकर ने हमारे देश में सांस्कृतिक एकता की जो मजबूत नींव रखी थी, उसी के कारण आज हम यह कह पाते हैं कि 'हस्ती मिटती नहीं हमारी'।

आज दुनिया में शांति भंग हो रही है। लोग भाषा, जाति, धर्म, रंग, देश आदि कई आधारों पर बँट रहे हैं। मेरे विचार से सारी दुनिया को जोड़ने का काम 'वेद दर्शन' ही कर सकता है। सभी का देवता एक ही है, वही सबके मन में निवास करता है। सृष्टि के कण-कण में भगवान बसते हैं। हर एक आत्मा में परमात्मा का अंश है, वह हर जगह समाया हुआ है। दूसरे का अस्तित्व कहाँ है? यही सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है, जिसके कारण भारतवासी हजारों साल से यह मानते आए हैं कि 'अयं निज: परो वेत्ति गणनां लघु चेतसां, उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।' हम कहते हैं कि धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सदभावना हो, विश्व का कल्याण हो। कोई छोटा, कोई बड़ा या कोई ऊँच-नीच न हो, ऐसा हम सभी सोचते हैं। सारी दुनिया एक है, जो एक परिवार के रूप में है। प्राणी मात्र में एक चेतना है। यह धरती किसी एक की सम्पत्ति नहीं है।

यह धरती इंसानों के लिए, पशुओं के लिए, कीट पतंगों, सबके लिए हैं। धरती पर किसी एक का हक नहीं है। आचार्य शंकराचार्य के दर्शन ने भारतीय समाज में इन्हीं जड़ों को मजबूत किया। शंकराचार्य के दर्शन में सगुण ब्रह्म तथा निर्गुण ब्रह्म दोनों का दर्शन हम कर सकते हैं। निर्गुण ब्रह्म उनका निराकार ईश्वर है तथा सगुण ब्रह्म साकार ईश्वर है। तत्वमसि तुम ही ब्रह्म हो; अहं ब्रह्मास्मि मैं ही ब्रह्म हूँ, 'अयामात्मा ब्रह्म' यह आत्मा ही ब्रह्म है। इन वाक्यों के द्वारा इस जीवात्मा को निराकार ब्रह्म से अभिन्न स्थापित करने का प्रयत्न शंकराचार्य जी ने किया।

हमने निर्णय लिया है कि मध्यप्रदेश में आदि शंकराचार्य के पाठ शिक्षा की पुस्तकों में जोड़े जायेंगे, उनका प्रकटोत्सव मनाया जायेगा। ओंकारेश्वर में शंकर संग्रहालय, वेदांत प्रतिष्ठान और शंकराचार्य की बहुधातु मूर्ति स्थापित की जायेगी। मूर्ति के लिए प्रदेशभर से धातु संग्रह अभियान चलाकर प्रदेशवासियों को इससे जोड़ा जायेगा। आइये हम सभी संकल्प लें कि हम आदि शंकराचार्य के प्रति मध्यप्रदेश की ओर से अपनी कृतज्ञता की अभिव्यक्ति करेंगे।

 
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