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विक्रमादित्य और उनके नवरत्न

भोपाल : शुक्रवार, फरवरी 5, 2016, 12:27 IST
 

भारत के इतिहास में विक्रमादित्य का स्थान अद्वितीय है। जिस प्रकार राम को अयोध्या से अलग नहीं किया जा सकता उसी प्रकार विक्रमादित्य के बिना उज्जयिनी का स्मरण नहीं किया जा सकता। विगत 2000 वर्ष से अधिक समय से विक्रम का नाम सारे देश में गूँज रहा है। हिन्दू धर्म और संस्कृति तथा ज्ञान-विज्ञान, साहित्य और कला से वह अविभाज्य के रूप से जुड़ा हुआ है। एक ओर जहाँ भारतीय साहित्य में अनेक रूपों में और अनेक प्रकार से विक्रम का उल्लेख किया गया है उसे अदभुत पराक्रमी शासक, धर्म, न्याय और व्यवस्था के संरक्षक गुणीजनों के आश्रयदाता तथा ज्ञान-विज्ञान की अभिवृद्धि के लिए समर्पित विद्याप्रेमी नरेश के रूप में स्मरण किया जाता है। दूसरी ओर इस बात पर भी आधुनिक इतिहासकारों द्वारा शंका उठाई जाती है कि विक्रमादित्य नामक कोई राजा उज्जयिनी में हुआ है या नहीं। वे इस बात को तो स्वीकार करते हैं कि विक्रमादित्य की उपाधि अनेक राजाओं ने धारण की पर उनके मत में ऐतिहासिक आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि उज्जैन में विक्रमादित्य नाम का कोई राजा हुआ भी है या नहीं। इस धारणा का प्रमुख कारण पुरातात्विक प्रमाणों का अभाव ही माना जाता है।

प्राचीन साहित्य में विक्रमादित्य सम्बन्धी तथ्यों की उपर्युक्त आधार पर उपेक्षा नहीं की जा सकती। पुरातात्विक आधार न होने पर क्या हम रामायण, महाभारत तथा विविध पुराणों में वर्णित और परम्परा से मान्यता प्राप्त तथ्यों को भी शंकास्पद मानने के लिए विवश होना पड़ेगा। भारत जैसे देश में जहाँ इतनी उथल-पुथल होती रही, जहाँ इतिहास के प्रति उपेक्षा के साथ ही प्राकृतिक प्रकोपों का ताण्डव-नृत्य सदा होता रहा हो, ठोस ऐतिहासिक प्रमाणों पर ही अंतिम निर्णय लेना संभव नहीं है। हाँ यदि किसी मान्यता के विरुद्ध यदि उत्खनन और शोध के परिणामस्वरूप अनेक महत्वपूर्ण नए तथ्य हमारे सामने आए हैं जिनसे भारत के अतीत पर महत्वपूर्ण प्रकाश पड़ता है। हो सकता है विक्रम के काल-निर्णय पर भी भविष्य में उपयोगी प्रमाण उपलब्ध हो जाये। अत: इतिहास द्वारा पुष्ट प्रमाणों के अभाव में विक्रमादित्य के परम्परागत व्यक्तित्व और उससे जुड़ी हुई ख्याति की उपेक्षा भी उचित नहीं कही जा सकती।

विक्रमादित्य ने नवीन संवत्सर का ही आरम्भ नहीं किया अपितु आदर्श शासन परम्परा की नए सिरे से आधार-शिला रखी। उन्होंने राम-राज्य की कल्पना को नए सिरे से साकार कर आदर्श शासन का मानदण्ड निर्धारित किया।

विक्रम संवत् को कृत संवत् तथा मालव संवत् का पर्याय माना जाता है। पर्याप्त विचार के बाद इतिहासकारों में इसके सम्बन्ध में सहमति भी हो गई है। यह तथ्य हमें यह सोचने के लिए विवश करता है कि विक्रम और मालवे का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। विक्रम मालव जनपद के राजा थे या प्रमुख यह बात भले ही विवादग्रस्त हो पर इसमें संदेह नहीं कि वे मालवगण के सर्वमान्य नेता थे और उनके नेतृत्व में ही मालवों ने शकों को पराजित किया था। ऐसी महत्वपूर्ण घटना को अमरता प्रदान करने के उद्देश्य से नये संवत्सर का आरंभ किया जाना निश्चय ही एक शुभ निर्णय था। विगत 2000 वर्ष से भी अधिक समय से इस संवत् का व्यापक उपयोग इस घटना के महत्व का परिचायक है। इतिहासविदों के समक्ष यह प्रश्न प्राय: उपस्थित होता रहा है कि विक्रमादित्य नाम न होकर एक विरुद मात्र है। इसके साथ सहज ही यह तर्क उपस्थित होता है कि यदि इस नाम को विरुद मान लिया जाय तो फिर कोई न कोई पराक्रमी व्यक्ति इस नाम को धारण करने वाला भी होना चाहिए। चन्द्रगुप्त को इसे विरुद के रूप में धारण करने की आवश्यकता तभी अनुभव हुई होगी जब इस नाम का कोई व्यक्ति अपने पराक्रम से इसे महत्व दे चुका होगा। जनश्रुति एवं साहित्यिक आधार पर हमारे सामने ऐसा व्यक्तित्व विक्रम का ही है। और उसे नाम के रूप में स्वीकार करने में आपत्ति का कारण नहीं दिखाई देता।

साम्राज्यों के बुलडोजर छोटी इकाइयों को, वे प्रजातांत्रिक हों अथवा एक तंत्रीय, गुण-दोषों का विचार किए बिना ही धराशायी करने में संकोच ही नहीं करते। मालव गणतंत्र को या मालव नरेश को साम्राज्य विस्तार की प्रक्रिया में संकट का सामना करना ही पड़ा होगा। किन्तु साम्राज्य की तूफानी लहर से ध्वस्त होकर भी मालवगण की और उसके साथ ही विक्रम की कीर्ति अक्षुण्ण बनी रही। मालवगण और विक्रमादित्य की उपलब्धियाँ भारतीय जनमानस के पटल पर इस प्रकार अंकित है कि काल-प्रवाह उन्हें मिटाने में असमर्थ रहा है।

उज्जैन की भौगोलिक स्थिति कुछ ऐसी रही है कि सहसा उसे अधीनस्थ नहीं किया जा सकता था और अधीनस्थ हो जाने पर भी उसकी उपयोगिता और महत्व की उपेक्षा नहीं की जा सकती थी। आसपास की उपजाऊ भूमि तथा आन्तरिक एवं बाह्य व्यापार के मार्ग पर उसका अवस्थित होना उसके पक्ष में जाता है। यही कारण है कि देश के उन्नत नगरों में उज्जयिनी का विशिष्ट स्थान बना रहा है। मालवगण के शौर्य, नैतिक बल और बौद्धिक प्रखरता ने उसे देश में ही नहीं, विदेशों में भी ख्याति दिलवाई है। विभिन्न कलाओं तथा ज्ञान-विज्ञान की क्रीड़ा-भूमि के रूप में ही नहीं, उन्हें व्यावहारिक और परिष्कृत रूप देकर सार्वभौम उपयोग और प्रशंसा की उपलब्धि करवाने में उज्जयिनी अग्रगण्य रही है। हजारों वर्ष पूर्व महाभारत युग में भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम की शिक्षा उसी नगरी में हुई थी और उसके शासकों ने महाभारत के युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। परिस्थितियों के कारण यह परम्परा कभी क्षीण और कभी स्थूल भले ही होती रही हो, परंतु लुप्त नहीं हुई।

विक्रमादित्य के अस्तित्व तथा काल निर्णय के समान ही उनके साथ जुड़े हुए उनके नवरत्नों की वास्तविकता भी आज प्रमाणों के अभाव में शंकास्पद बन गई है। उनके सम्बन्ध में सबसे बड़ा आक्षेप यह है कि नवरत्नों में सम्मिलित अनेक नवरत्नों का विक्रम का समकालीन होना सिद्ध नहीं होता। विक्रमादित्य की राजसभा के नवरत्नों के विषय में ज्योतिर्विदा भरण का यह श्लोक बहुत
प्रसिद्ध है-

धन्वन्तरि क्षपण का भर सिंह शंकु-

वेतालभट्ट घटखर्पर कालिदासा:।

ख्यातो वराहमिहिरो नृपते: समायां,

रत्नानि वैवररूचिर्नव विक्रमस्य॥

अर्थात् धन्वंतरि क्षपणक, अमरसिंह, शंकु वेताल भट्ट, घटखर्पर, कालिदास सुविख्यात वराहमिहिर तथा वररुचि विक्रम के नवरत्न थे। ज्योतिर्विदा भरण किसी कालिदास नामक विद्वान की रचना है। ये कालिदास रघुवंश और शाकुन्तल के कवि नहीं है। इस ग्रन्थ के प्रणयन का समय लगभग एक हजार वर्ष पूर्व का माना जाता है। इस ग्रन्थ में इन नवरत्नों का उल्लेख तभी संभव हुआ जब इस जनश्रुति के रूप में नवरत्नों की बात को व्यापक रूप से स्वीकार किया जा चुका होगा।

इन नवरत्नों में कालिदास, धन्वन्तरि, अमरसिंह, कालिदास, वराहमिहिर और वररुचि अधिक प्रसिद्ध हैं। शेष तीन क्षपणक, शंकु एवं वेतालभट्ट के विषय में बहुत कम जानकारी प्राप्त है।

(1) धन्वंतरि - विक्रमादित्य के समान ही धन्वन्तरि के सम्बन्ध में अब तक कोई निर्णय नहीं हुआ है। कुछ लोगों के मत में काशी नरेश दिवोदास ही धन्वन्तरि थे। भारतीय आयुर्वेद में धन्वन्तरि का स्थान सर्वोपरि है। इनके अनेक शिष्य थे जिनमें सुश्रुत का प्रमुख स्थान है। इनकी कृतियों में धन्वन्तरि-निघण्टु बहुत प्रसिद्ध है। इनके द्वारा निर्मित अनेक औषधियाँ अचूक मानी जाती हैं।

(2) क्षपणक - क्षपणक सामान्यत: जैन साधुओं को कहा जाता है। कुछ लोगों के मत में सिद्धसेन दिवाकर ही क्षपणक हैं। ये ज्योतिष् के विद्वान थे और वराहमिहिर ने इनका उल्लेख किया है। इन्हें द्वात्रिंशत्युत्तलिका का रचयिता भी माना जाता है।

(3) अमरसिंह - बोधगया के एक शिलालेख के आधार पर इतिहासविद् अमरसिंह को विक्रम का समकालीन मानते हैं। इस शिलालेख में विक्रम और उनके नवरत्नों का उल्लेख है उसमें अमरसिंह के स्थान में अमरदेव शब्द का प्रयोग हुआ है। कनिंघम के मत में अमरदेव ही अमरसिंह हैं। इन्हें अनेक ग्रन्थों का रचयिता माना जाता है जिनमें अमरकोश अत्यन्त लोकप्रिय है। अमरकोश के मंगलाचरण से भी यह सिद्ध होता है कि वे बौद्ध थे।

(4) शंकु - ज्योतिर्विदा भरण के अतिरिक्त एक और सन्दर्भ में शंकु का उल्लेख हुआ है। कहा जाता है कि ये शबर स्वामी के पुत्र थे।

(5) वेतालभट्ट - वेताल पंच विशलिका जैसे कल्पना प्रधान ग्रन्थों के आधार स्वरूप कुछ रचनाएँ वेतालभट्ट द्वारा भले ही लिखी गई हों। परन्तु उनके नाम पर जिस प्रकार अनुश्रुतियों के माध्यम से कथाओं का निर्माण हुआ है उनकी संख्या का पता लगाना कठिन है। अनुमान किया जाता है कि मंत्र-तंत्र की प्रधानता के युग में तंत्र की साधना में लगे रहने के कारण वेताल के साथ अनेक कथाएँ और जन-श्रुतियाँ जुड़ गई होंगी।

(6) घटकर्पर - घटकर्पर की एकमात्र रचना एक लम्बी कविता है। इसमें 22 श्लोक है। यह कविता वियोग श्रंगार की है। हो सकता है कालिदास को मेघदूत लिखने की प्रेरणा इसी कविता से मिली हो। इस कविता में यमक शब्दालंकार के उत्तम उदाहरण मिलते हैं। अभिनवगुप्त, गोवर्द्धन आदि टीकाकारों ने घटकर्पर की टीका करके यह सिद्ध कर दिया है कि उनकी गणना उच्चकोटि के कवियों में थी। कहा जाता है कि उन्होंने नीतिसार नामक एक अन्य ग्रन्थ भी लिखा था। संभव है फिर भी खोज करने पर आगे चलकर इनकी अन्य रचनाएँ भी उपलब्ध हों।

(7) कालिदास - कविकुल गुरू कालिदास के सम्बन्ध में इतना अधिक लिखा गया है कि इस प्रसंग में उन पर कुछ भी लिखा जाना पुनरुक्ति मात्र होगा। फिर भी इस प्रसंग में दो-एक बातों का उल्लेख करना अप्रासंगिक न होगा। अभिज्ञान शाकुन्तल महाकवि का अदभुत नाटक है जिस पर विश्वभर के विद्वान मुग्ध हैं। उक्त नाटक के आरंभ में सूत्रधार द्वारा यह कथन कि - 'सभी रसों और भावों के दीक्षागुरू महाराज विक्रमादित्य की विद्वानों से भरी हुई इस सभा के समक्ष हमें कवि कालिदास द्वारा विरचित अभिज्ञान शाकुन्तल नामक नवीन नाटक प्रस्तुत करना है।' इस बात की ओर संकेत करता है कि कालिदास विक्रम के नवरत्नों में थे और उनके अभिज्ञान शाकुन्तल का प्रयोग विक्रम और उनके नवरत्नों के समक्ष किया गया था। अभिज्ञान शाकुन्तल, विक्रमोर्वशीय तथा मालविकाग्निमित्र उनके सुविख्यात नाटक ग्रन्थ हैं तथा मेघदूत, कुमार संभव, रघुवंश और ऋतुसंहार उनके काव्य ग्रन्थ। अनेक प्राचीन ग्रन्थों में कालिदास सम्बन्धी ऐसे अकाट्य सन्दर्भ मिलते हैं जिनसे इनका विक्रम के समय में होना असंदिग्ध हो जाता है। काव्य मीमांसा में राजशेखर द्वारा कालिदास की काव्य परीक्षा का उल्लेख इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। रघुवंश और मेघदूत में कालिदास द्वारा उज्जयिनी का उल्लेख भी उनके उज्जयिनी प्रेम का प्रमाण है। उन्होंने उज्जयिनी का जो सजीव वर्णन मेघदूत में किया है वह एक अभिनव प्रयोग है और उसके अनुकरण में न जाने कितने लोगों ने अपनी रचनाएँ करके अपने को धन्य माना है। कालिदास ने उज्जयिनी के साथ ही मालव प्रदेश की सुषमा का सुन्दर वर्णन किया है जिससे यह सिद्ध होता है कि वे यहीं के निवासी थे।

कालिदास शीर्षस्थ कवि ही नहीं थे। उनकी रचनाओं के विशद अध्ययन से यह पता चलता है कि वे अपने समय के शीर्षस्थ विद्वान भी थे। वेद, पुराण, उपनिषद्, दर्शन, धर्मशास्त्र, भूगोल, इतिहास, ज्योतिष आदि विषयों में उनके पाण्डित्य की झलक उनकी रचनाओं में कदम-कदम पर परिलक्षित होती है।

(8) वराहमिहिर - वराहमिहिर अपने समय के प्रकाण्ड ज्योतिषी थे। इनके विषय में यह ज्ञात है कि वे अवन्ति प्रदेश के ही निवासी थे और इनके पिता का नाम आदित्यदास था। वराह मिहिर का फलिज्योतिष् पर प्रमुख ग्रंथ वृहज्जातक है। इसकी टक्कर का दूसरा ज्योतिष का ग्रन्थ मिलना दुर्लभ है। राजाओं के लिए ज्योतिष की उपादेयता पर उन्होंने कहा है - 'कृत्ष्नागंगोपांगकुशलं, होरागणित नैष्टिकम् योन पूजयते राजा सनाशमुय गच्छति, अर्थात् जो राजा ज्योतिष के अंगों और उपांगों में प्रवीण तथा होरागणित का व्यावहारिक सम्यक् ज्ञान रखने वाले ज्योतिषी का आदर नहीं करता, वह नष्ट हो जाता है। उनके ग्रन्थ वृहत्संहिता में ग्रहों की स्थिति तथा उसके प्रभाव का विशद वर्णन किया गया है तथा उससे उत्पन्न विषम स्थिति से बचने के उपाय भी दिखाए गए हैं। ज्योतिष् में अपनी अप्रतिहत और सूक्ष्म गति के कारण वे देश-विदेश सर्वत्र सम्मान के पात्र हैं। यूनानी ज्योतिषियों से इनका सम्पर्क था और उनके अनेक पारिभाषिक शब्दों और सिद्धांतों को इन्होंने अपनाया है। ज्ञान के क्षेत्र में कोई पूर्वाग्रह उनके लिए बाधक नहीं था। ग्रहों की स्थिति व्यक्तियों पर ही नहीं विस्तृत भू-खण्डों और समस्त विश्व पर व्यापक प्रभाव की स्थिति के सम्बन्ध में उनके सिद्धान्त अनेक विपत्तियों का सामना करने एवं शासकों को तैयार होने के लिए प्रेरित कर सकती हैं। ज्योतिष के अतिरिक्त उन्हें, रत्नों, औषधियों, रसायनों और पशुओं के शास्त्र का व्यापक और गंभीर ज्ञान था।

(9) वररुचि - वररूचि कृत पत्र कौमुदी में लेखक ने स्वयं ही अपने को विक्रम का समकालीन बताया है और कहा है कि विक्रम के निर्देश पर ही उन्होंने उस ग्रन्थ की रचना की है। वासवदत्ता के रचयिता सुबन्धु को वररुचि का भान्जा बताया गया है। उनके द्वारा निर्मित एक ग्रन्थ 'विद्या सुन्दर' भी है जिसकी रचना उन्होंने विक्रम के निर्देश पर की थी। कुछ लोगों के मत में वैयाकरण कात्यायन ही वररुचि हैं पर बेवर के अनुसार कात्यायन का समय ई.पू. 25 माना जाता है। यदि यह मत स्वीकार किया जाय तो वररुचि का समय लगभग वही है जो विक्रम संवत् को प्रमाण मानने पर विक्रमादित्य का निर्धारित होता है। विक्रमादित्य की सभा में वररुचि के होने का उल्लेख अन्य अनेक स्थलों पर पाया जाता है। अमरकोश के कर्ता अमरसिंह ने भी उनका उल्लेख किया है

 
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