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सिहंस्थ-लेख/संदर्भ

  

महाकवि कालिदास

भोपाल : शनिवार, मार्च 12, 2016, 21:16 IST

महाकवि कालिदास विश्व कवि हैं। प्राचीन भारत के सर्वश्रेष्ठ कवि-नाटककार के रूप में उनकी ख्याति विश्वव्यापी है। विश्व के इने-गिने साहित्यकारों में उनकी गणना होती है। वस्तुत: कालिदास की रचनाओं के माध्यम से न केवल देश में, अपितु समस्त सभ्य संसार में भारतीय संस्कृति का उत्कृष्ट स्वरूप प्रस्तुत हुआ है। जो भी विद्वान मनीषी एवं विचारक उनके साहित्य के सम्पर्क में आया वह उनसे पूर्ण रूप से प्रभावित हुए बिना नहीं रहा। कालिदास देश और काल से ऊपर उठकर भारतीय संस्कृति के राजदूत के रूप में विश्व भर में भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं।

भारत में तो विद्वानों ने सदा कालिदास को कवियों में सर्वोपरि स्थान दिया है। संस्कृत के पंडित-मंडल में निम्नलिखित सुभाषित बहुत ही प्रचलित है :-

पुरा कवीनां गणना प्रसंगे कनिष्किधिष्ठित कालिदासा।
अद्यापि ततुल्य कवेरभावादनामिका सार्थवती बभूव॥

अर्थात् प्राचीन काल में कवियों की गणना प्रारंभ होने पर कनिष्ठा या छोटी ऊँगली पर ही गणना रुक गई, दूसरी ऊँगली के लिए उनका समकक्ष कोई नाम नहीं लिया जा सका। आज भी उनके समानधर्मा कवि के अभाव में दूसरी ऊँगली का अनामिका नाम सार्थक होकर रह गया।

कादम्बरीकार बाणभट्ट का संस्कृत साहित्य में बहुत ऊँचा स्थान है। गद्य-लेखकों में वे अग्रणी हैं। पद्य रचना कौशल में भी अपना अपूर्व स्थान रखते हैं। महाकवि कालिदास के संबंध में उनका यह उदगार बहुत ही युक्तियुक्त है :

निर्गतासु न वा कस्य कालिदासस्य सूक्तिषु।
प्रीर्तिमधुर सार्द्रासु मंजरीष्विव जायते॥

अर्थात् कालिदास की आम मंजरी के समान मधुर ओर सरस सूक्तियों के प्रवाहित होने पर ऐसा कौन है जिसके हृदय में उनके प्रति प्रेम का आविर्भाव नहीं होता।

'स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते।' इस उक्ति के अनुसार कालिदास अपनी प्रतिभा के कारण स्वदेश के बाहर भी विद्वानों की अगाध श्रद्धा और आदर के पात्र बन गये हैं। सर विलियम जोन्स का अभिज्ञान शाकुन्तल का अंग्रेजी भाषा अनुवाद जब यूरोप में पहुँचा तो वहाँ की विद्वमण्डली में हलचल-सी मच गयी। सुप्रसिद्ध जर्मनी कवि गेटे के उदगार कितने सहज और भावनाओं से ओत-प्रोत हैं। उन्होंने शकुन्तला को सम्बोधित करते हुए कहा था :

'यदि नये वर्ष की कलियाँ और वर्षान्त के फल, वे सभी तत्व जिनसे आत्मा मुग्ध, प्रफुल्ल, आनन्दविभोर और तृप्त होती और इनके साथ ही स्वयं पृथ्वी और स्वर्ग आपस में मिलकर एक रूप धारण करें तो हे शकुन्तला मैं उन्हें तुम्हारे नाम से पुकारूँगा और मेरा कथन सार्थक हो जायेगा।''

कालिदास के व्यापक प्रभाव की ओर संकेत करते हुए सुप्रसिद्ध विद्वान हम्बोल्ट कहते हैं :

'प्रेमियों के मन पर प्रकृति के प्रभाव का वर्णन कालिदास ने अत्यन्त कुशलतापूर्वक किया है। कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति और रचनात्मक कल्पना को रूप देने की कुशलता ने कालिदास को विश्व के प्रमुख कवियों में अत्यन्त ऊँचा स्थान प्रदान किया है।'

अपनी काव्य-प्रतिभा से कालिदास ने देश और विदेश में सर्वत्र विद्वानों तथा काव्य-प्रेमियों को व्यापक रूप से प्रभावित किया है और उनके लिये प्रेरणा के स्त्रोत बने हुए हैं।

संस्कृत साहित्य के गौरव स्वरूप इस अत्यन्त लोकप्रिय और मूर्धन्य कवि के कुल, जन्म स्थान और जन्म-तिथि के संबंध में हमारा इतिहास मौन है। अनुश्रुति के अनुसार विक्रमादित्य की राजसभा के नव-रत्नों में वे एक प्रमुख रत्न थे। ज्योतिर्विदाभरण नामक एक ग्रंथ में जिसे कालिदास विरचित कहा जाता है विक्रम के नवरत्नों के विषय में इस प्रकार उल्लेख है :

धन्वन्तरि क्षपणकाभरसिंह शंकु वेतालभट्ट धटखर्पर कालिदास: ।
ख्यातो वराहमिहिरो नृपतेस्सभायां रत्नानि वैवररुचिर्नव विक्रमस्य॥

अर्थात् राजा विक्रमादित्य की सभा में धन्वन्तरि, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, वेतालभट्ट, घटखर्पर, कालिदास, वराहमिहिर और वररूचि नामक नव-विद्वान ऐसे थे, जिन्हें राजसभा का नवरत्न कहा जाता था।

विक्रम की राज सभा के इन नव रत्नों को लेकर इतिहासकारों में काफी मतभेद हैं। इनमें से अनेक समकालीन भी नहीं हैं। अत: इस श्लोक को प्रामाणिक मानना कठिन है किन्तु इससे एक बात की अवश्य पुष्टि होती है और वह यह कि यदि कालिदास को राज्याश्रय मिला था तो वह विक्रम का ही था। वह विक्रमादित्य कौन था ? अनुश्रुति के अनुसार उज्जयिनी का शासक संवत्सर संस्थापक विक्रमादित्य अथवा चन्द्रगुप्त-विक्रमादित्य। इस प्रश्न को लेकर प्राचीन इतिहास के विद्वानों में काफी मतभेद हैं किन्तु कालिदास के अस्तित्व के संबंध में इससे कोई अन्तर नहीं आता। उनके विश्व विश्रुत ग्रंथ और उनके अंत: साक्ष्य ही कवि के काल निर्धारण में सहायक हैं। अभिज्ञान शाकुन्तल की कुछ प्राचीन प्रतियों में नन्दी के अनन्तर इस प्रकार उल्लेख है :'...इयं हि रसभाव विशेष दीक्षा गुरो: विक्रमादित्यस्य परिषद् अस्यां च कालिदास प्रयुक्तेनाभिज्ञान शाकुन्तलनवेन नाटकेन उपस्थातव्यमस्या मि:।' इससे यह विदित होता है कि कालिदास कृत अभिज्ञान शाकुन्तल नाटक का प्रथम मंचन विक्रमादित्य की सभा में हुआ था। विक्रम संवत् के संस्थापक विक्रमादित्य के काल को ही कालिदास का समय और विक्रम की राजधानी उज्जयिनी को ही कालिदास की नगरी मानने की विद्वानों की परम्परा अभी अक्षुण्ण बनी हुई है और प्रबल तथा अकाट्य विरोधी प्रमाण उपलब्ध होने पर ही उसकी मान्यता समाप्त हो सकती है।

जो स्थिति कालिदास के समय के संबंध में है वही स्थिति प्राय: उनके जन्म-स्थान के संबंध में भी है। कालिदास किस स्थान में उत्पन्न हुए, कहाँ बड़े हुए, कहाँ रहकर उन्होंने अपने विश्व विश्रुत साहित्य का निर्माण किया, इसके निश्चित प्रमाण कहीं भी उपलब्ध नहीं हैं। कश्मीर और बंगाल के विद्वान उनके हिमालय वर्णन और प्रकृति वर्णन को लक्ष्य करके उन्हें अपने क्षेत्रों का निवासी बताने का यत्न करते हैं किन्तु यदि मान्यता अन्त: प्रमाण को ही दिया जाना है तो इस संबंध में निश्चय ही मालवा प्रदेश का दावा अधिक युक्तियुक्त है। कालिदास ने निश्चय ही देश के विभिन्न भागों का सुंदर वर्णन अपने ग्रन्थों में, विशेषकर कुमारसंभव, रघुवंश और मेघदूत में किया है। कुमारसंभव का हिमालय वर्णन अद्वितीय है। वह केवल वर्णन नहीं है। वह नगाधिराज की स्तुति है, वह पार्वती की जन्म-भूमि है। वहाँ देवता निवास करते हैं। वास्तव में वह पृथ्वी का मानदण्ड है। भूतल पर उससे बढ़कर सौंदर्य, समृद्धि और सुख तथा शांति की कल्पना नहीं की जा सकती।

रघुवंश में रघु की दिग्विजय के माध्यम से तथा इन्दुमति-स्वयंवर में उपस्थित राजाओं के वर्णन से महाकवि ने भारत के प्रशस्त भूखण्ड के विविध प्रदेशों का जो वर्णन किया है वह उनकी पर्यटन वृत्ति का परिचायक है। निश्चय ही कालिदास ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों का पर्यटन किया था और वे उन क्षेत्रों के निवासियों के रहन-सहन तथा प्रवृत्तियों से भली-भाँति परिचित थे। किन्तु लंका-विजय के उपरांत पुष्पक विमान द्वारा सीता को लेकर अयोध्या लौटते हुए राम के द्वारा भारत की सुषमा का जो वर्णन किया गया है वह विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर है। समुद्र की ओर संकेत करते हुए राम सीता से कहते हैं 'मलय पर्वत तक दो भागों में मेरे द्वारा बाँधे गये पुल से विभक्त इस नीले समुद्र को देखो यह ऐसा लग रहा है मानो छायापथ से विभक्त शरद ऋतु में चमकते हुए तारों वाला आकाश हो।'' कुमार संभव में जिस प्रकार हिमालय का वर्णन अद्वितीय है, उसी प्रकार रघुवंश में समुद्र का वर्णन। आगे चलकर गंगा-यमुना के संगम का केवल चार श्लोकों में किया गया वर्णन भी अद्वितीय है। यमुना का जल गंगा के जल में मिलने से गंगा के जल की अपूर्व शोभा हो गयी है। गंगा का जल कहीं प्रभा बिखेरने वाली नीलम से जड़ी हुई मोतियों की लड़ी के समान, कहीं बीच-बीच में नील कमलों से सुशोभित श्वेत कमल की माला के समान, कहीं काले हंसों से युक्त राजहंसों की पंक्ति के समान, कहीं काले अगर की पत्रावली में चन्दन से बनी हुई पृष्ठभूमि के समान, कहीं छाया में छिपे अन्धकार द्वारा चितकबरी बनाई गई चाँदनी के समान, कहीं बीच-बीच में दिखाई देने वाले नीले आकाश से युक्त शरद ऋतु के उजले बादल की पंक्ति के समान और कहीं काले सर्पों से सुशोभित विभूति रमाये शंकरजी के शरीर के समान सुशोभित हो रहा है। किन्तु मेघदूत में मेघ के मार्ग का वर्णन करते हुए उज्जयिनी जाने के लिये मेघ से आग्रह करना और फिर उज्जयिनी के पार्श्ववर्ती क्षेत्र का उज्जयिनी नगरी का तथा महाकाल का जो वर्णन महाकवि ने प्रस्तुत किया है, उससे यह अनुमान दृढ़ हो जाता है कि उनके जीवन का बहुत बड़ा भाग वहीं बीता होगा और वहीं उनकी जन्म-भूमि भी होगी। उज्जयिनी नगरी में पहुँचने से पहले ही अवन्ति क्षेत्र में लोकप्रिय उदयन की कथा से सुपरिचित गाँवों के वृद्धजनों का उल्लेख करना और उज्जयिनी महानगरी को विशाला के नाम से पुकारकर संतुष्ट न होते हुए उसे श्री विशाला अर्थात् अत्यंत समृद्धशाली बताना विशेष अर्थ का द्योतक है। उज्जयिनी को स्वर्गोपण न कहकर उसे स्वर्ग का ही एक जगमगाता हुआ भाग कहते हैं। उज्जयिनी के नागरिकों का परिचय वे यह कहकर देते हैं कि स्वर्ग में रहते हुए अपने पुण्यों का फल समाप्त हो जाने पर वे स्वर्ग से ही आये हुए हैं और अपने साथ स्वर्ग के एक भाग को पृथ्वी पर उतार लाये हैं। उन्होंने धरती पर स्वर्ग उतारने के मुहावरे को ही कविता में निबद्ध कर दिया है। लोगों को यह बता दिया है कि उज्जयिनी के निवासी स्वर्ग में निवास करने वाले देवताओं से किसी प्रकार कम नहीं हैं। पुण्य कम हो गया तो वे स्वर्ग का भाग ही अपने साथ लेते आये हैं। पुण्य-अर्जित करने की उनकी क्षमता उनमें है। वे पुण्यात्मा हैं अत: वे सब कुछ प्राप्त करने में समर्थ हैं। उनका आशय यही है कि उज्जयिनी में वह सब कुछ है जो स्वर्ग में उपलब्ध हो सकता है और उसके निवासी देवतुल्य हैं। अपनी इस मान्यता की पुष्टि वे उज्जयिनी के प्राकृतिक और मानवीय सौन्दर्य, अपूर्व समृद्धि और उससे भी बढ़कर महाकाल की निवास भूमि के वर्णन द्वारा करते हैं। इस संबंध में यह बात ध्यान में रखने की है कि कालिदास का यह वर्णन कल्पना पर आधारित नहीं है अपितु अन्य अनेक स्रोतों में से इसकी पुष्टि होती है।

कालिदास का उज्जयिनी के प्रति अगाध प्रेम मात्र इसलिये नहीं है कि उज्जयिनी एक सांस्कृतिक नगरी है, वह महाकाल का धाम है, उसके भवन अत्यंत मनोरम और गगनचुम्बी हैं, उसके वन उपवन नंदन वन को भी लज्जित करते हैं, उसके बाजार रत्नों और मणियों से पटे पड़े हैं, उसकी सुन्दरियाँ अत्यंत सुसंस्कृत और सह्रदय हैं। इन सबके पीछे जो आत्मीयता की भावना विद्यमान है वही कालिदास को उज्जयिनी का निवासी घोषित करती है। ऐसा विदित होता है कि मेघदूत की रचना करते हुए उनके अन्त:मन में अलका नहीं उज्जयिनी छाई हुई थी। उज्जयिनी के प्रति उनके समर्पित तन, मन, प्राण और प्रतिभा ने अन्योक्ति के बहाने ही मानों अलका को सामने रखा था और अपनी रचना को अलका तक पहुँचाया था। ऐसा लगता है मेघ नहीं मेघ के माध्यम से कवि स्वयं उज्जयिनी पहुँचकर बाहर नहीं जाना चाहता। अपनी जन्म-भूमि में पहुँचकर कौन बाहर जाना चाहता है।

तीन नाटक- अभिज्ञान शाकुन्तल, विक्रमोर्वशीय और मालविकाग्नि मित्र तथा तीन काव्य ग्रन्थ- मेघदूत, कुमार संभव और रघुवंश के संबंध में विद्वानों का मत है कि ये सभी ग्रन्थ कालिदास निर्मित हैं। कुमार संभव के 9वें से 17वें सर्गों के संबंध में विद्वान एकमत नहीं हैं। ऋतु संहार के विषय में भी विद्वानों में मतभेद हैं किन्तु अधिकांश विद्वान ऋतुसंहार को कालिदास कृत ही मानते हैं। उपर्युक्त ग्रन्थों के अतिरिक्त अन्य अनेक ग्रन्थों को कालिदास विरचित माना जाता है। निश्चय ही ये ग्रन्थ शाकुन्तल और रघुवंश जैसे ग्रन्थों के रचयिता कालिदास की कृतियाँ नहीं हैं। हो सकता है कालिदास नाम के एक या अधिक कवियों द्वारा उनकी रचना की गई हो।

काव्य ग्रन्थों में प्रमुख रघुवंश में दिलीप से अग्निवर्ण तक 28 राजा का वर्णन है, जिनमें दिलीप, रघु, अज, दशरथ, रामचन्द्र और कुश का विस्तार से वर्णन है। अन्तिम राजा अग्निवर्ण को असमय में अन्य विलासी जीवन के परिणाम के रूप में प्रस्तुत किया गया है। रघुवंश के आदर्श नरेशों की तुलना में अग्निवर्ण का जीवन इस बात की ओर संकेत करता है कि शासक के लिये विषयोन्मुख होना उनके लिये ही नहीं समस्त राज्य के लिये विपत्ति का कारण बन जाता है। वास्तव में रघुवंश आदर्श शासन का स्वरूप समाज के सम्मुख प्रस्तुत करता है। काव्य के रूप में शासकों को लोक सेवा के लिये प्रेरित करने वाला ऐसा कोई दूसरा ग्रन्थ विश्व साहित्य में उपलब्ध नहीं है।

कुमार संभव में यद्यपि ग्रन्थ का लक्ष्य तारकासुर का वध करने के लिये कुमार जन्म की भूमिका के रूप में शिव-पार्वती के परिणय की प्रस्तुति की गई है परन्तु पार्वती की तपस्या और मदन-दहन के प्रसंग अत्यंत महत्वपूर्ण बनकर सामने आते हैं। वास्तव में इस ग्रन्थ में आदर्श प्रेम और प्रिय विरह का ऐसा मार्मिक चित्र उपस्थित हुआ है, जिसका दूसरा उदाहरण मिलना कठिन है।

मेघदूत का विश्व साहित्य में अद्वितीय स्थान है। इसमें अपने कर्त्तव्य के पालन में प्रमाद करने के कारण वर्षभर के लिये निर्वासित यक्ष के विरह तथा मेघ को अपना दूत बनाकर अपनी प्रेयसी के पास सन्देश भेजने की कथा का अत्यंत मनोहर रूप में वर्णन किया है वास्तव में मेघदूत के द्वारा कवि ने जहाँ मानव ह्रदय की कोमल भावना का अनुपम वर्णन किया है वहीं उसने रामगिरि से अलका के मध्य आने वाले मार्ग के पर्वत, नदियों और नगरों का अत्यंत स्वाभाविक और ह्रदयकारी चित्र प्रस्तुत किया है। उज्जयिनी का वर्णन करके कवि ने उज्जयिनी को और उज्जयिनी ने कवि को साहित्य के इतिहास में सर्वोपरि स्थान प्रदान किया है।

ऋतु संहार में कालिदास ने प्रकृति को ऋतु के अनुसार छ: रूप में प्रस्तुत करके प्रकृति की रमणीयता को इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि यह कहना कठिन हो जाता है कि कौन-सी ऋतु उत्कृष्ट है। प्रकृति नित्य नवीन बनी रहती है।

नाटककार के रूप में कालिदास ने अपना अलग मानदण्ड स्थापित किया है। शताब्दियों के बाद भी वह मानदण्ड अक्षुण्ण रूप में प्रतिष्ठित हैं। चरित्र-चित्रण में कालिदास बहुत सफल रहे हैं। उनके नारी पात्र मानव ह्रदय को अत्यंत प्रभावित करते हैं।

उनके नाटकों में अभिज्ञान शाकुन्तल सर्वश्रेष्ठ है। अभिज्ञान शाकुन्तल मात्र प्रेम कथा नहीं है। शकुन्तला के रूप में महाकवि ने यह तथ्य सामने रखने की चेष्टा की है कि किस प्रकार शुद्ध हृदय निश्छल व्यक्ति आत्मनिष्ठ होने पर उपेक्षित और संकटग्रस्त हो जाता है और धैर्य तथा प्रायश्चित्त के द्वारा ही उसका उद्धार होता है। इस नाटक के माध्यम से महाकवि ने महाभारत की कथा को ऐसा सुन्दर रूप दिया है जिसमें प्रेम का महत्व सर्वोपरि हो गया है। कण्व का आश्रय पशु-पक्षी, पेड़ पौधे, सभी मानव के साथ इस प्रकार घुल-मिल जाते हैं कि उनमें और मानव में कोई अलगाव नहीं दिखाई देता। सारा विश्व एक परिवार के रूप में उभरकर सामने आता है। यह स्वर्गीय प्रेम त्याग पर आश्रित है। जान पड़ता है यही बताने के लिये इस ग्रंथ की रचना हुई हो।

मालविकाग्नि मित्र एक ऐतिहासिक कथा पर आधारित नाटक है। कालिदास के लिये कथावस्तु कभी महत्वपूर्ण नहीं रहा। राज महल के वातावरण में रानीतिक उथल-पुथल के परिणाम स्वरूप उपस्थित समस्या ही कथावस्तु है किन्तु कलाकार कालिदास की लेखनी में उसे उत्कृष्ट नाटक के रूप में परिणत कर दिया है।

विक्रमोर्वशीय भी एक संयोग परक घटना का बढ़ा हुआ रूप है। अभिज्ञान शाकुन्तल के समान ही प्रथम दर्शन में उर्वश्री और पुरुरवा अपनी-अपनी बाजी हार जाते हैं। भौतिक प्रेम की विकलता त्यागमय उदात्त प्रेम में परिणत हो जाती है। नाटक में कथा का विकास बड़े रोचक ढंग से होता है और दर्शक की उत्सुकता भावी घटनाओं के प्रति निरन्तर बनी रहती है।

कालिदास के तीनों नाटक का आधार प्रेम है और उनका निर्वाह अत्यन्त सफलतापूर्वक हुआ है। प्रेम के अंकुरित होने, उसके विकसित होने और वियोग की स्थिति उत्पन्न होने पर उसे संभालने की प्रक्रिया अलग-अलग है। उसमें कहीं भी शैथिल्य या भारीपन नहीं लक्षित होता।

कालिदास ने कथावस्तु के निर्वाह में जहाँ विलक्षण प्रतिभा का परिचय दिया है वहीं पात्रों के चरित्र-चित्रण में उन्हें अदभुत सफलता मिली है। मंच पर कम आवें या अधिक उनके पात्र देदीप्यमान नक्षत्रों के समान नाटक को पृष्ठभूमि बनाकर जगमगाते रहते हैं। उनकी ओर से उदासीन होना असंभव है। मानव ही नहीं साधारण मृग शावक और छप्पर पर बैठा मयूर, आकाश में अस्ताचलगामी चन्द्रमा, पत्ते गिराते हुए वृक्ष सभी अत्यन्त स्पष्ट रूप में दर्शक के मन पर अंकित हो जाते हैं।

कालिदास के साहित्य पर विचार करने पर मन में बारम्बार यही बात गूँजती रहती है कि कविकुल गुरु नितान्त मानवीय होकर अतिमानव कैसे हो गये। भारत का जो स्वरूप उन्होंने भौगोलिक रूप में प्रस्तुत किया है उससे भी अधिक अच्छा रूप उसके इतिहास को मिला है। उसके भौगोलिक रूप पर दृष्टि डालने पर दृष्टि जहाँ गड़ जाती है वहाँ से अलग होना नहीं चाहती। इतिहास के जिस बिन्दु पर मन रुक जाता है वहाँ से आगे बढ़ने में असमर्थ हो जाता है। दिलीप, रघु, अज, दशरथ, राम जैसे चरित्र वाले पुरुष, सुदक्षिणा, सीता, इन्दुमती, उर्वशी, मालविका और शकुन्तला जैसी नारियाँ और वशिष्ठ, कण्व तथा कश्यप जैसे ऋषियों को दैनंदिन जीवन के जीवित पात्रों के रूप में प्रस्तुत कर राष्ट्र निर्माण की दिशा में महाकवि ने अदभुत मार्ग दर्शन किया है।

मानव की ऐहिक जीवन की उपलब्धियों और सुख-दुख तक ही महाकवि का साहित्य सीमित नहीं है। सारे समाज की सुख-सुविधा का ही नहीं समस्त सृष्टि की व्यवस्था में सुख और शांति की कामना उनके संगीत की टेक है। किन्तु मानव को वे यह बताना भी नहीं भूले कि यह समस्त दृश्य जगत अपने तक ही सीमित नहीं है। सृष्टि की इस लीला का सूत्रधार भी है और उसके साथ एकाकार होने में ही उसकी सार्थकता है। अभिज्ञान शाकुन्तल के अंत में राजा दुष्यन्त द्वारा भरत वाक्य के रूप में प्रकट किये गये उदगार उसी की ओर संकेत करते हैं :

प्रवर्ततां प्रकृति हिताय पार्थिव:
सरस्वती श्रुतिमहती महीयताम् ॥
ममापि च क्षपयतु नील लोहित:
पुनर्भवं परिगत शक्ति एत्यम्: ।

अर्थात्

जन हित में नित निरत रहें नृप
सरस्वती का हो सम्मान ।

लोहित नील साम्बशिव मेरे

करे पुनर्भव का सम्मान

 
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