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भर्तृहरि-सिद्ध और सत्र

भोपाल : शुक्रवार, मार्च 18, 2016, 20:31 IST
 

एक कवि के रूप में भर्तृहरि को संस्कृत साहित्य में विशेष स्थान प्राप्त है। अपने तीन शतक के द्वारा उन्होंने संस्कृत साहित्य में जो स्थान प्राप्त किया है वह अद्वितीय है। नीति शतक, वैराग्‍य शतक और श्रंगार शतक, तीनों का अलग-अलग विशिष्ट स्थान है। नीति शतक में 110, वैराग्य शतक में 116 तथा श्रंगार में 100 श्लोक हैं। जैसा कि उनके नाम से ही स्पष्ट है नीति शतक में नीति संबंधी, वैराग्य शतक में जीवन की असारता, क्षणभंगुरता आदि का उल्लेख करते हुए भगवदभक्ति की ओर उन्मुख होकर विरक्त जीवन व्यतीत करने का महत्व बताया गया है। श्रंगार शतक में श्रंगार रस की रचनाएँ हैं किन्तु उनके श्रंगार की अपनी विशेषता है। उसमें अनैतिकता के लिए कोई स्थान नहीं है।

वास्तव में भर्तृहरि के ये तीन शतक--क्रमश: मानव जीवन में विवेकपूर्ण व्यवहार, अत्यधिक भोगवाद का विरोध और जीवन को सरस और सुखमय बनाने की दिशा में पथ-प्रदर्शन का काम करते हैं। यही कारण है कि संस्कृत भाषा का शायद ही कोई ऐसा जानकार होगा, जो इन रचनाओं से परिचित और उनका प्रशंसक न हो।

अनुश्रुति के अनुसार भर्तृहरि विक्रमादित्य के बड़े भाई थे। अपनी पत्नी के चरित्र पर सन्देह के फलस्वरूप उन्होंने अपने छोटे भाई को राज्य सौंप दिया और विरक्त हो गये। अपने विरक्त जीवन में उन्होंने सिद्धि प्राप्त की तथा हठयोग, रससिद्धि एवं मंत्र विद्या में पारंगत हो गये।

भर्तृहरि को लोग नाथ सम्प्रदाय का अनुयायी बताते हैं किन्तु उनकी रचनाओं में विष्णु और शिव दोनों का महत्व बताया गया है। अत: यह कहना कठिन है कि वे किस मत के अनुयायी थे। उनकी स्पष्ट रूप से 'एकोदेव: केशवो वा शिवो वा' की घोषणा यह सिद्ध करती है कि विष्णु और शिव दोनों के प्रति उनका समान आदर था।

तीन शतकों विशेषकर नीति शतक की विचार पद्धति और विषय के प्रतिपादन से यह स्पष्ट रूप में दिखाई देता है कि जीवन की वास्तविकताओं से, भर्तृहरि भली-भाँति परिचित हैं। उनके अनुभव गहरे हैं उनकी दृष्टि प्रखर है और उनके विचार सुलझे हुए हैं। ऐसा विदित होता है मानो उन्होंने मानव जीवन को आदर्श रूप देने के लिए ही अपने ग्रंथों की रचना की है।

भर्तृहरि की रचनाओं से लगता है कि उन्होंने व्यक्तित्व से ऊपर उठ कर सत्य स्वरूप नित्य सिद्ध वस्तु का साक्षात्कार कर लिया था एवं अपरोक्ष की उपलब्धि के फल-स्वरूप अखण्ड सत्य में प्रतिष्ठित हो गये थे। उन्होंने आत्मोन्नति सहित परमात्मा के मिलन भाव को साध्य मान कर लोक मंगल की कामना स्पष्ट रूप से अपने नीति-शतक एवं वैराग्य-शतक में की है। वे निवृत्ति मार्ग के अनुयायी थे। वे लिखते हैं--

भोगा न भुक्ता वयमेवभुक्तास्तपो न तप्तं वयमेव तप्ता:।

कालो न यातो वयमेव यातास्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णा:॥

विषयों को हमने नहीं भोगा किन्तु विषयों ने ही हम को भोग लिया। यही नहीं विषयों के भोगने में हम ही असमर्थ हो गये। हमने तप नहीं किया किन्तु तप ने ही हमको तपा डाला। काल व्यतीत नहीं हुआ अपितु हम ही व्यतीत हो गये। हमारी ही अवस्था समाप्त हो गई और तृष्णा जीर्ण नहीं हुई लेकिन हम ही जीर्ण हो गये।

अपने दु:खों का अनुभव और दूसरों की आपत्ति का दृश्य बहुधा वह वैराग्य उत्पन्न करता है, जो सत्संग, अध्ययन और मन की प्रवृत्ति से भी संभव नहीं है। भर्तृहरि ने नीति शतक के आरंभ में ही उस घटना का संकेत दिया है, जिसके कारण उन्होंने राजपाट, धन-दौलत सब त्याग दिये। वे कहते हैं--

यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता।

साप्यन्नमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्त:॥

अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या।

घिक्चा\च प्र\च मदन\च इमा\च मा\च॥

जिसके संबंध में, मैं निरन्तर सोचा करता हूँ, वह मुझसे विरक्त होकर अन्य पुरुष की इच्छा करती है और वह अन्य पुरुष दूसरी स्त्री पर आसक्त है और वह अन्य स्त्री मुझसे प्रसन्न है, इसलिए मेरी प्रिया को जो अन्य पुरुष से प्रीति रखती है धिक्कार है, उस अन्य को जो उस पर आसक्त है धिक्कार है, उस अन्य स्त्री को जो मुझ से प्रसन्न है धिक्कार है तथा मुझको और इस कामदेव को भी धिक्कार है।

इस घटना से भर्तृहरि को यह स्पष्ट रूप से अनुभव हो गया कि यह संसार बाह्य रूप में जितना मनमोहक लगता है, भीतर से कितना घिनौना और भयानक है। उन्हें विषय भोगों से घृणा हो गई। संसार उन्हें मिथ्या जाल दिखाई पड़ने लगा। उनका जीवन वैराग्य में रम गया। वैराग्य व्यक्ति को स्वत: संत बना देता है। भर्तृहरि की वैराग्य भावना बेजोड़ है--

महीरम्या शय्या विपुलमुपधानं भुजलता

वितानंचाकाशं व्यजनमनुकूलोऽयमनिल:।

स्फुरद्दीपश्चन्द्रो विरति वनिता सड्;गमुदित:

सुखं शान्त शेते मुनिरतनुभूतिर्नृप इव॥

-(वैराग्य शतक)

पृथ्वी ही जिसकी उत्तम शय्या है, भुजा ही जिसका उत्तम तकिया है, आकाश ही जिसका चंदोबा है, अनुकूल हवा ही जिसका उत्तम पंखा है, चन्द्रमा ही जिसका प्रकाशमान दीपक है, विरति ही जिसकी स्त्री है, ऐसे प्रसन्नचित्त मुनि समृद्ध राजाओं के समान सुखपूर्वक शयन करते हैं।

भर्तृहरि ने जीवन के यथार्थ धरातल पर वैराग्य चित्रण में इतने आयाम विस्तृत कर दिये हैं कि सर्वत्र अलौकिक सुख-शान्ति की अनुभूति होती है। भोग पद्धति का ऐसा चित्र अन्यत्र दुर्लभ है। वे कहते हैं:-

भोग रोग भयं कुलेच्युति भयं वित्ते नृपालाद्भयं।

मौने देन्यभयं बलेरिपुभयं रूपे जराया भयम्॥

शास्त्रेवादिभयं गुणे खल भयं काये ऋतान्ताद्भयं।

सर्व वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां शम्भो: पदं निर्भयम्॥

-भोगी को रोग का भय है, कुल में दोष होने का डर है, चुप रहने में दीनता का भय है, धन में हानि का डर है, बल में शत्रुओं का डर है, सौन्दर्य में बुढ़ापे का डर है, गुणों में दुष्टों का डर है, शरीर को मृत्यु का डर है, इस प्रकार संसार में सभी चीजों में व्यक्ति को भय है- केवल शिव के चरणों में किसी प्रकार का भय नहीं है।

भर्तृहरि का यह 'वैराग्य मेवाभयम्'' (केवल वैराग्य में ही भय नहीं है) का सन्देश आज की यांत्रिक सभ्यता के प्रभाव में जीने वाले मनुष्य की चेतना को प्रभावित एवं संवेदित करता है।

भर्तृहरि का बहु-आयामी व्यक्तित्व था। सच तो यह है कि लोकाचार और शास्त्र निर्देश की युगीन विसंगतियों की खाई पाटने तथा वास्तविक सुखमय जीवन को गत्यात्मक और सबल रूप देने के लिये वे नीतिशतक के माध्यम से शास्त्र को लोक तक ले गये। वे सिद्ध और सन्त पहिले थे, तदुपरान्त कवि। कविता तो उनकी भावाभिव्यक्ति का सहज साधन थी। वे चिंतन के समान धरातल को स्वीकार करते हुए समाज दर्शन करते हैं- जिसमें आत्म-दर्शन निहित है- वैराग्य के प्रति भर्तृहरि की उत्कटता दृष्टव्य है:-

एकाकी निस्पृह: शान्त: पाणिपात्रो दिगम्बर:।

कदा शम्भो भविष्यामि कर्मनिर्मूलनक्षम:॥

-(वैराग्य शतक)

हे शम्भो! मैं कब एकाचारी इच्छा शून्य शान्त दिगम्बर और अपने हाथों को ही पात्र बनाने वाला एवं कर्म आसक्ति की जड़ उखाड़ने में समर्थ हो सकूँगा। वे अपने आराध्य से बार-बार यही कामना करते हैं। इसमें भर्तृहरि की मूल भाव-धारा के दर्शन होते हैं।

भर्तृहरि ने उपदेशों की नीरस चर्चा नहीं की। उनकी रचनाओं में व्यवस्थित दार्शनिक विचार समाहित है।

प्राप्ता: श्रिय: सकलकामदुधास्तत: किं।

दत्तं पदं शिरसि विद्वषतां तत: किम्॥

सम्मानिता: प्रणयिनो विभवैस्तत: किम्।

कल्पस्थितं तनुभृतातनुभिस्तत: किम्॥

यदि सर्व कामनाओं को देने वाली लक्ष्मी पाई तो इससे क्या? शत्रुओं के शिर पर पग धरा तो इससे क्या? यदि इस देह से कल्प पर्यन्त जिये तो क्या? वस्तुत: जब तक मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होने का प्रयास नहीं करता तब तक उसके लिये सब व्यर्थ है।

नीति शतक में कर्म प्रशंसा। श्रंगार-शतक में दुर्विरक्त वर्णन एवं वैराग्य शतक में नि:स्पृहत्व श्रेष्ठता के उद्देश्य से लिखे श्लोक भर्तृहरि को सर्वोच्च कोटि के सन्तों के बीच लाकर खड़ा कर देते हैं।

भर्तृहरि के काव्य में एक पवित्रता है। श्रंगार-शतक में लौकिक श्रंगार होते हुए भी एक अलौकिक प्रभाव है। उनकी वाणी उनके सिद्ध और सन्त ह्रदय की गूँज है। उन्होंने अपनी शतक त्रयी के माध्यम से विविध आदर्शों की स्थापना की है। ये उनकी अन्यतम कृतियाँ हैं। भर्तृहरि की तुलना निर्विकल्पक समाधि में अवस्थित सिद्ध और सन्त से की जा सकती है। इनकी रचनाओं में अनुभूत सत्य और मौलिक चिन्तन है। वे एक सारग्राही सन्त थे। उनकी कीर्ति सदैव अक्षुण्ण बनी रहेगी।

 
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