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अवन्ति साम्राज्य का संस्थापक - सम्राट चण्डप्रद्योत

भोपाल : शनिवार, मार्च 26, 2016, 20:58 IST
 

भारत में तीर्थंकर महावीर और तथागत गौतम बुद्ध के अवतरण के समय निम्नलिखित सोलह जनपद अस्तित्व में आ चुके थे:- (1) अंग) (2) मगध (3) काशी (4) कौशल (5) वृज्जि (6) मल्ल (7) चेदि (8) वत्स (9) कुरु (10) पांचाल (11) मत्स्य (12) शूरसेन (13) अश्भक (14) अवन्ति (15) गान्धार और (16) कम्बोज।

जन एवं जनपदों से बने हुए ये महा-जनपद भावी साम्राज्यों की स्थापना के बीज थे। इन महा-जनपदों का इतिहास एक-दूसरे से इतना गुँथा हुआ है कि उसमें से किसी एक प्रदेश का इतिहास अलग निकालकर रख देना कठिन है। अवन्ति महा-जनपद इस युग में प्रधानत: पूर्व मध्य भारत राज्य की सीमाओं को घेरे हुए था तथा पूर्व, पश्चिम और उत्तर में संभवत: उसके बाहर भी जाता था। हम यह कह सकते हैं कि मध्य भारत का इस युग का इतिहास वास्तव में अवन्ति महा-जनपद और उसके साम्राज्य बन जाने का इतिहास है।

पुराणों के आधार पर उज्जयिनी के इतिहास पर दृष्टिपात करने पर यह तथ्य निर्विवाद रूप से सामने आता है कि बार्हद्रथ रिपुंजय को मारकर उसके अमात्य पुलिक ने अपने पुत्र प्रद्योत को अवन्ति के राजसिंहासन पर अधिष्ठित किया था। यही प्रद्योत वंश का संस्थापक हुआ और चंदु प्रद्योत के नाम से विख्यात हुआ। बौद्ध तथा संस्कृत साहित्य में उदयन की लोक-कथाओं में इसी को महासेन के नाम से संबोधित किया गया है।

पुराणों की ख्यातों के अनुसार प्रद्योत पुलिक का पुत्र था। परन्तु तिब्बत की बौद्ध अनुश्रुति में वह अनन्तनेमि का पुत्र कहा गया है। उसका जन्म उसी दिन माना गया है जिस दिन गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था। उसका नाम पज्जोत (प्रद्योत) इस कारण पड़ा, क्योंकि उसके जन्म लेते ही संसार में दीपक की ज्योति के समान प्रकाश हो गया था। इस अनुश्रुति का यह भी मत है कि प्रद्योत उसी समय राज्य सिंहासन पर बैठा था जब गौतम बुद्ध ने बुद्धत्व प्राप्त किया। कथा-सरित्सागर एक तीसरी ही कहानी कहता है। उसके अनुसार महेन्द्र वर्मा नामक उज्जयिनी का राजा था, उसका पुत्र जयसेन और जयसेन का महासेन, जिसने चण्डी की घोर आराधना करके अजेय खड्ग तथा 'चण्ड' नाम पाया और वह महाचण्ड कहलाने लगा था। बुद्धघोष ने प्रद्योत के जन्म के विषय में लिखा है कि वह किसी ऋषि के नियोग से उत्पन्न हुआ था। पुराणों में राजवंशों का विवरण अधिक विश्वसनीय है, क्योंकि उसमें वे वंशावलियाँ दी गयी हैं जो इसी कार्य में दक्ष सूतों द्वारा रखी जाती थीं। अतएव उसका पुलिक का पुत्र होना ही इतिहास में सही माना गया है।

चण्डप्रद्योत का परिवार तथा स्वभाव

कथा-सरित्सागर के अनुसार प्रद्योत का विवाह अंगारक नामक दैत्य की पुत्री अंगारवती से हुआ था। इसके दो पुत्र गोपालक तथा पालक और एक कन्या वासवदत्ता थी। भास के नाटकों में भी प्रद्योत के यही पुत्र-पुत्री बताये गये हैं। हर्षचरित में उसके एक पुत्र कुमारसेन का और उल्लेख है। बौद्ध अनुश्रुति के अनुसार गोपालक एक वैश्य की पुत्री से उत्पन्न हुआ था, जिसके रूप और गुण पर मुग्ध होकर प्रद्योत ने उससे विवाह कर लिया था।

पुराण तथा बौद्ध अनुश्रुतियाँ चण्डप्रद्योत को अत्यन्त उग्र तथा क्रूर स्वभाव का बतलाती हैं। पुराण उसे 'नयवर्जित'' कहता है और चीनी बौद्ध अनुश्रुतियाँ अवन्ति को बोधिसत्व की भूमि इसीलिये मानने को तैयार नहीं; क्योंकि प्रद्योत किसी नियम को नहीं मानता था तथा कर्म-फल पर विश्वास नहीं करता था। ज्ञात होता है कि महान् सेनावाला यह महासेन सैनिक बहुत क्रोधी और उद्घत स्वभाव का था।

वत्स का शतानीक और उदयन

प्रद्योत के यौवन काल में उसकी सीमा से लगे हुए वत्स महा-जनपद में शतानीक राज्य कर रहा था। यमुना के किनारे कौशाम्बी उसकी राजधानी थी। शतानीक का विवाह वृज्जि संघ के सदस्य लिच्छवियों के नायक चेटक की कन्या मृगावती से हुआ था। जैन अनुश्रुति तथा बुद्धघोष की धम्मपद की टीका के अनुसार जब मृगावती गर्भवती थी उस समय उसे कोई पक्षी उठा ले गया। कथा-सरित्सागर के अनुसार वह उदयाचल में जमदग्नि के वंशज किसी ऋषि के आश्रम में पहुँची, जहाँ उसके उदयन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह बालक चौदह वर्ष तक आश्रम में रहा। आश्रम के पास ही वहीं नागों की बस्ती थी। उदयन की मैत्री नाग कुमार वसुनेमि से हो गयी। वह उसे अपने यहाँ ले गया। 'वह नगरी अत्यंत रमणीक थी, जहाँ नाना प्रकार के नाटक हो रहे थे, अप्सराएँ नृत्य-गायन कर रही थीं।'' वहाँ उदयन ने वह वीणावादन सीखा, जिसकी ख्याति बहुत अधिक है। भारतीय ललित कलाओं के विकास में भारत के इन आदिम निवासियों ने बहुत अधिक योग दिया है। चौदह वर्ष पश्चात शतानीक को उसके पुत्र और पत्नी मिले।

चण्डप्रद्योत और मृगावती

जैन अनुश्रुति के अनुसार मृगावती के सौंदर्य की ख्याति से आकर्षित होकर उज्जयिनी के चण्डप्रद्योत ने कौशाम्बी पर आक्रमण किया था। आक्रमण करने का कारण तो उस युग की राज्य सीमाएँ बढ़ाने की लिप्सा ही थी। यह अवश्य है कि जब चण्डप्रद्योत ने कौशाम्बी को घेर लिया तब मृगावती के सौन्दर्य-जाल ने इस दुर्दमनीय सैनिक को मूर्ख बना दिया। इस समय शतानीक वृद्ध और बीमार थे तथा कौशाम्बी के घिरे रहने की दशा में ही उनका शरीरान्त हो गया। उदयन तथा उसकी माता ने नगर की रक्षा का भार सम्हाला। मृगावती ने चण्डप्रद्योत के पास संदेश भेजा 'अब मेरा पति मर गया है, मैं आपके ही अधीन हूँ, आपके साथ युद्ध करने में कौन समर्थ है? किन्तु अभी उदयन बालक है। मेरी इच्छा है कि कुमार के लिये आप एक अच्छा गढ़ बनवा दीजिये और उसके लिये सेना संगठित कर दीजिये। मैं आपके साथ उज्जयिनी चली जाऊँगी तब उसकी रक्षा यहाँ कैसे होगी; अत: यह आवश्यक है।'' इस अनुश्रुति के अनुसार चण्डप्रद्योत ने नया विशाल गढ़ बनवा दिया और कौशाम्बी का सैन्य संगठन भी कर दिया। यह सब हो जाने पर जब प्रद्योत ने मृगावती से प्रणय-याचना की तो उसने उत्तर भिजवा दिया कि यह सब तो समय टालने के लिये था। विवश चण्डप्रद्योत को संधि करनी पड़ी। उदयन का धूमधाम से राज्याभिषेक किया गया। इसी समय महावीर वर्द्धमान भी कौशाम्बी आ गये और मृगावती उनके साथ जैन अनुश्रुति के अनुसार, चण्डप्रद्योत की आज्ञा लेकर जैन संघ में दीक्षित हो गयी तथा चन्दनबाला की शिष्या हुई। चण्डप्रद्योत उज्जयिनी लौट आये। मृगावती जैन अनुश्रुति की 24 महासतियों में प्रख्यात हुई।

 उदयन और चण्डप्रद्योत

चण्डप्रद्योत वत्स राज्य को अपने साम्राज्य में मिलाने में विफल हुआ, परन्तु वह उदयन के साथ अपनी कन्या वासवदत्ता का विवाह करना चाहता था और उदयन भी अवन्ति के राज्य से संबंध रखने के लिये इच्छुक था। परन्तु वैमनस्य तो था ही और यह भी आशंका थी कि कौन किसको हड़प जाये। वत्सराज और अवन्ति राज के बीच दशीर्ण का वह जंगल था, जहाँ के हाथी बहुत प्रसिद्ध थे। उदयन को हाथियों की बहुत चाह थी। अत: वह इसी वन में मृगया के लिये आता था। अवन्ति राज्य और उसकी सुंदरी वासवदत्ता की ओर भी उसकी दृष्टि थी ही। चण्डप्रद्योत भी सतर्क था। उसने अपना राज्य सीमा पर एक लकड़ी का हाथी बनवाकर छोड़ दिया, जिसमें सैनिक छिपा दिये गये थे। उदयन भ्रम में आ गया और उस हाथी का पीछा करता हुआ अवन्ति राज्य की सीमा में चला आया तथा बन्दी बनाकर उज्जयिनी लाया गया।

उदयन और वासवदत्ता

बन्दी उदयन का चण्डप्रद्योत ने सत्कार किया और उससे वासवदत्ता को वीणा-वादन की शिक्षा देने का आग्रह किया। चण्डप्रद्योत सम्भवत: उसे उज्जयिनी ही रखना चाहता था ताकि उसे दामाद और राज्य दोनों मिल सकें। बौद्ध अनुश्रुति में वासवदत्ता और उदयन के इस गुरु-शिष्य सम्बन्ध के विषय में अत्यंत रोचक कथा दी गयी है। परन्तु वह केवल कहानी ज्ञात होती है। कथा-सरित्सागर में लिखा है कि उदयन नित्य वासवदत्ता को गायन सिखाते और वहीं गन्धर्व शाला में पड़े रहते। गोद में वीणा, कण्ठ में गीत तथा सामने वासवदत्ता उन्हें और चाहिये ही क्या था। वासवदत्ता भी उनकी सेवा-टहल लक्ष्मी के समान करती, परन्तु उन्हें छुड़ाने में असमर्थ थी।

इधर कौशाम्बी में उदयन को छुड़ाने के लिये व्यग्रता बढ़ रही थी। उसके मंत्री वसन्तक, रूमण्वान तथा यौगन्धरायण चण्डप्रद्योत की शक्ति से परिचित थे। अतएव उन्होंने भी युक्ति से काम लिया। रुमण्वान कौशाम्बी का राजकाज देखता रहा और यौगन्धरायण तथा वसन्तक उज्जयिनी की ओर चल दिये। मार्ग में विन्ध्याटवी के पुलिन्दक नामक भील-सरदार से मैत्री की और उसके पास अपनी सेना छोड़ दी। वे उज्जयिनी पहुँचे और वहाँ आषाढ़क नामक हाथीवान को मिला लिया। एक रात उदयन और वासवदत्ता भद्रावती नामक हथिनी पर बैठकर वत्स की ओर भाग गये। सेना को स्वर्ण मुद्राएँ बिखेरकर वसन्तक ने बहला दिया। युवराज पालक को हाथी पर बैठाकर उनके पीछे दौड़ाया गया, साथ में गोपालक भी गया। पालक और उदयन में युद्ध हुआ, परन्तु गोपालक ने बीच-बचाव कर दिया। कौशाम्बी पहुँचकर गोपालक ने उदयन और वासवदत्ता का विवाह कर दिया। चण्डप्रद्योत ने भी विवाह पर बहुमूल्य उपहार भेजे। इस प्रकार अवन्ति और वत्स विवाह -सम्बन्ध में बँधकर निकट आये। उदयन और वासवदत्ता के उज्जयिनी से भागने की यह कथा कौशाम्बी की खुदाई में मिले एक मिट्टी के ठीकरे पर बड़े सुंदर रूप में अंकित की गयी है। इसमें उदयन और वासवदत्ता हथिनी पर भाग रहे हैं। पीछे वासन्तक बैठा है, जो स्वर्ण मुद्राएँ बिखेर रहा है, जिन्हें पीछा करने वाले सैनिक बीन रहे हैं। यह ठीकरा ई.पू. दूसरी शताब्दी का कहा जाता है।

वत्स और अवन्ति की सीमाएँ

ज्ञात यह होता है कि उत्तरी मध्य भारत में उस समय वन्य प्रदेश था और ग्वालियर, नरवर तथा भेलसा के मध्य चम्बल, सिन्ध और बेतवा के बीच जो विन्ध्य श्रंखलाएँ हैं, वे 'विन्ध्याटवी' कही जाती थीं। आगे दशार्ण प्रदेश आता था, जो दशार्ण नदी (वर्तमान धसान) से सिंचित था। कौशाम्बी से ग्वालियर होकर जो मार्ग उज्जयिनी को जाता था उसके उत्तर में पद्मावती (पवाया) के बाद विन्ध्याटवी प्रारम्भ होती थी, जिसके एक किनारे पर विदिशा थी तथा दक्षिण में सीहोर पर जाकर यह पहाड़ी क्षेत्र नीचा हो जाता है और दूसरी ओर देवास तक जाता है। यह पर्वत्य प्रदेश प्राचीन निषध, वत्स और अवन्ति महा-जनपदों की अपरिभाषित सीमा थी।

शूरसेन

चण्डप्रद्योत ने शूरसेन पर भी अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था। उसका नाती अवन्तिपुत्र मथुरा में राज कर रहा था।

मगध और अवन्ति-जीवक

चण्डप्रद्योत और मगध के श्रेणिक बिम्बसार के संबंध अच्छे थे। जब चण्डप्रद्योत बीमार हुआ तो बिम्बिसार ने जीवक नामक अपने वैद्य को उसके इलाज के लिये भेजा था। जीवक अपने समय का अत्यन्त प्रख्यात वैद्य था। उसने तक्षशिला में सात वर्ष तक उस समय के महान वैद्य आत्रेय से वैद्यक शास्त्र की शिक्षा ली थी। जीवक जब उज्जयिनी आया तब चण्डप्रद्योत के चण्डप्रभाव से भयभीत हुआ। जिस औषधि से उसका रोग अच्छा हो सकता था, उसमें घृत मिलना आवश्यक था और उससे चण्डप्रद्योत को घृणा थी।

जीवक ने औषधि खोजने के बहाने राज्य की सबसे द्रुतगामी सवारियों के उपयोग तथा कभी भी नगर के बाहर जाने की आज्ञा प्राप्त कर ली। उसने चण्डप्रद्योत को दवा पिला दी और स्वयं बहुत तेज चलने वाली हथिनी पर बैठकर कौशाम्बी की ओर भागा। चण्डप्रद्योत को जब उस औषधि से वमन हुआ और ज्ञात हुआ कि उसमें घृत था, तब उसने जीवक का पता लगवाया और उसके न मिलने पर उसका पीछा करने के लिये अपना उप्पनिका नामक रथ भेजा। जीवक न लौटा, परन्तु इस बीच राजा स्वस्थ हो गया और प्रसन्न होकर उसने जीवक के पास बहुत से वस्त्राभूषण तथा उपहार भेजे। इनमें शिवि-जनपद के बने हुए 'शिवेय्यक'' नामक वस्त्र भी थे।

गान्धार और मत्स्य

गान्धार में उस समय पुक्कुसमति अथवा पुष्करमति राजा राज कर रहा था। वह भी अत्यंत महत्वाकांक्षी और प्रतापी था। उसने बिम्बिसार से मैत्री करने का भी प्रयत्न किया और उसकी राजसभा में राजदूत और पत्र भेजे थे। मत्स्य को अपने वशवर्ती कर लेने के पश्चात् चण्डप्रद्योत ने इस पर भी आक्रमण किया, परंतु वहाँ वह सफल न हो सका।

बिम्बिसार को मारकर जब उसका पुत्र अजातशत्रु सिंहासन पर बैठा तब चण्डप्रद्योत अपने मित्र के वध के कारण उस पर बहुत कुपित हुआ और सेना लेकर मगध पर आक्रमण करने के लिए चल पड़ा। अजातशत्रु ने अपनी राजधानी राजगृह की रक्षा का प्रबंध प्रारंभ कर दिया। ज्ञात यह होता है कि मार्ग में ही कहीं चण्डप्रद्योत की मृत्यु हो गयी और यह अभियान पूर्ण न हो सका, क्योंकि इसके पश्चात् चण्डप्रद्योत का कोई हाल अनुश्रुतियों में नहीं मिलता।

चण्डप्रद्योत के वाहन

पाली उदेनवत्थु में चण्डप्रद्योत के पाँच द्रुतगामी वाहनों का उल्लेख है। इनके वर्णन से उस काल की सवारियों और उनकी गति पर प्रकाश पड़ता है। उप्पनिका रथ को उप्पनिका नामक सारथी चलाता था और वह एक दिन में साठ योजन जाकर लौट आता था, नलगिरि हाथी एक दिन में 100 योजन जाकर लौट आता था, मूड़केशी (मंजुकेशी) तथा तेलकर्णिका घोड़ियाँ 120 योजन जाकर लौट आती थीं।

चण्डप्रद्योत की राज्य सीमा

प्रद्योत के समय में अवन्ति की सीमा पश्चिम में कहाँ तक थी यह ज्ञात नहीं। परंतु मत्स्य का राजा उसकी धाक मानता था, यह निश्चित है। उसने अपने अनेक पड़ोसी सामन्तों को वशवर्ती किया था, ऐसा पुराणों में उल्लेख है। उत्तर में शूरसेन (मथुरा) तक उसका राज्य था ही। वत्स, काशी और कौशल उसकी अधीनता स्वीकार करते होंगे, अन्यथा वह अपने अंतिम दिनों में मगध पर आक्रमण करने की कल्पना नहीं कर सकता था।

चण्डप्रद्योत का धर्म-कात्यायन

चण्डप्रद्योत के स्वाभाव की पुराण, जैन और बौद्ध अनुश्रुति सभी ने निन्दा की है। उसे धर्म और नीति से हीन बतलाया है। ज्ञात यह होता है कि यह उद्धत सैनिक धर्म और सम्प्रदाय की अधिक चिन्ता नहीं करता था। कौशाम्बी में वर्द्धमान महावीर से उसकी भेंट हुई, परंतु वह जैन धर्म से प्रभावित न हुआ। उसका मित्र बिम्बिसार गौतम का परम भक्त था, परंतु ज्ञात होता है वह भी उसे बौद्ध नहीं बना सका। बौद्ध अनुश्रुतियों के अनुसार चण्डप्रद्योत ने अपने राजगुरु के पुत्र कात्यायन को गौतम बुद्ध को उज्जयिनी लाने के लिए भेजा था, परंतु वे न आए और कौशाम्बी होते हुए वेत्रवती के किनारे एरछ से ही लौट गये। कात्यायन ने अवश्य बौद्ध धर्म की दीक्षा ले ली तथा गौतम बुद्ध का अत्यन्त प्रिय शिष्य हुआ तथा कात्यायन से महाकात्यायन बन गया। इसके द्वारा शूरसेन एवं अवन्ति में बौद्ध धर्म का प्रचार हुआ।

पालक

चण्डप्रद्योत के पश्चात् अवन्ति का शासक संभवत: गोपालक हुआ। चण्डप्रद्योत के तीसरे पुत्र का वध वेताल नामक तालजंघ ने महाकाल के मंदिर में कर दिया था। पालक ने गोपालक को राज्यच्युत कर स्वयं राज्य ग्रहण कर लिया। पालक भी अपने पिता के समान महत्वाकांक्षी सैनिक था। यद्यपि कौशाम्बी से अवन्ति के विवाह-संबंध स्थापित हो गये थे, तथापि इसके समय में पुन: कटुता उत्पन्न हो गयी थी। उदयन ने मगध की राजकुमारी पद्मावती से विवाह कर अवन्ति के शत्रु मगध से संबंध स्थापित किया था। अत: सम्भवत: पालक ने ही वत्स को अवन्ति में मिलाया।

पालक और मगध

अब अवन्ति और मगध की सीधी टक्करें होने लगीं। मगध में इस समय अजातशत्रु मारा जा चुका था और उदायीभद्र या उदयभद्र राज्य कर रहा था। अवन्ति से प्रतिरोध करने के आशय से ही उसने नयी राजधानी कुसुमपुर या पाटलीपुत्र बसाई थी। उदायीभद्र ने पालक को अनेक बार हराया। समर-भूमि में असफल होने पर पालक ने दूसरा मार्ग अपनाया। उसने उदायीभद्र की हत्या करा दी। इस प्रकार पालक का प्रभाव मगध पर भी हो गया और समस्त उत्तर भारत पर अवन्ति का साम्राज्य स्थापित हो गया होगा।

विशाखयूप और अजक

बालक अपने पिता से भी अधिक क्रूर स्वभाव का था। उसके विरुद्ध विप्लव हुआ और विशाखयूप को इस साम्राज्य का स्वामी बनाया गया। इसके पश्चात् अजक इस साम्राज्य का उत्तराधिकारी हुआ।

 सम्राट नन्दिवर्धन

पुराणों के अनुसार प्रद्योत वंश में अजक के पश्चात नन्दिवर्धन हुआ, इसने भी 20 वर्ष राज किया। मत्स्य-पुराण में अजक और नन्दिवर्धन को पाटलीपुत्र का भी राजा लिखा है। ज्ञात होता है कि अजक अथवा नन्दिवर्धन ने पाटलिपुत्र को अपनी राजधानी बना लिया था, जिससे कि पूर्व में अंग तक फैले हुए विशाल साम्राज्य का प्रबंध अच्छी तरह हो सके। पटना में जो दो विशालकाय मूर्तियाँ मिली हैं उनमें से एक पर नन्दिवर्धन का नाम पढ़ा गया है।

नन्दिवर्धन की कलिंग-विजय

कलिंग में इस समय कोई जैन धर्मावलम्बी राजा शासन कर रहा था अथवा वहाँ जैन धर्म का पूर्ण प्रचार था। खारवेल संबंधी हाथीगुफा के शिलालेख से विदित होता है कि नन्दिवर्धन ने कलिंग-विजय की थी और वहाँ से 'कलिंग-जिन' नामक जैन मूर्ति पाटलिपुत्र ले आया था। इस प्रकार नन्दिवर्धन अपने समय का सार्वभौम सम्राट था, जिसकी राज्य सीमा में लगभग सभी उत्तर भारत, अवन्ति से कलिंग तक सम्मिलित हो गये थे।

नन्द संवत्

नन्दिवर्धन ने एक नन्द संवत् का प्रवर्तन भी किया था। खारवेल की हाथीगुफा प्रशस्ति में नंद संवत् 103 में खुदवाई गयी एक नहर का उल्लेख है। अलबेरुनी ने मथुरा में नन्द संवत का चलन पाया था। चालुक्य विक्रमादित्य प्रथम ने ई. सन् 1070 के अपने एक शिलालेख में नन्द संवत् का उल्लेख किया है। अलबेरुनी ने लिखा है कि विक्रम संवत् में 400 जोड़ से नन्द संवत् निकल आता है। इस प्रकार ईसा पूर्व (400-458) में नन्दिवर्धन ने अपने नन्द संवत् का प्रारंभ किया होगा।

नन्दिवर्धन के समय शिशुनाग नामक प्रतापी व्यक्ति का उदय हुआ, जिसने पुराणों के अनुसार प्रद्योतों की शक्ति का उन्मूलन कर इस विशाल साम्राज्य की बागडोर संभाली।

अवन्ति और मगध

इस संबंध में यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि यद्यपि विद्वानों ने यह माना है कि पालक ने ही उदायीभद्र की हत्या करवाई थी, शिशुनाग के प्रद्योतों का उन्मूलन करके ही मगध का राज्य प्राप्त किया था तथा प्रद्योतों का राज्य मगध पर भी रहा था, परंतु वे इस परिणाम पर नहीं पहुँचे हैं कि अवन्ति के प्रद्योतों का राज्य मगध पर हो गया था। उपर्युक्त तीन बातों को मान लेने पर तथा पाटलिपुत्र में नन्दिवर्धन की प्रतिमा प्राप्त होने के पश्चात हम किसी अन्य परिणाम पर पहुँचने में असमर्थ हैं।

 
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