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सिहंस्थ-लेख/संदर्भ

  

पुण्य-सलिला क्षिप्रा नदी

भोपाल : मंगलवार, अप्रैल 19, 2016, 21:04 IST
 

मालवा के पठार में जो अनेक उत्तर वाहिनी नदियाँ हैं उनमें यद्यपि चम्बल, पार्वती तथा बेतवा सबमें बड़ी हैं परंतु सांस्कृतिक द्रष्टया अवंति प्रदेश की क्षिप्रा ही सर्वोपरि मानी जाती है। अवंति महात्म्य में कहा है-

नास्ति बस्त न ही पृष्ठे क्षिप्राया सदृशी नदी

यस्यातीरे क्षणामुक्ति किंचिरास्ते बिलेन वै

इस महात्म्य प्राप्ति का एक लंबा इतिहास है जो उसके तटवर्ती प्रदेश की पुरा वस्तुओं के आधार पर स्थिर है। यह नदी महू नगर से दक्षिण पूर्व में विंध्याचल पहाड़ियों से निकलती है तथा देवास जिले से होती हुई उज्जैन-महिदपुर होती हुई रतलाम जिले में चम्बल नदी से सिपावरा के निकट मिलती है। इस 120 मील की लंबी यात्रा में यद्यपि आज निर्मित बाँधों के कारण तथा विंध्य श्रेणी के वन-विहीन होने के कारण इसका वह शिप्र प्रवाह आज वैदिक सरस्वती के समान अंत:सलिला हो गया है और भूतकाल की यह अक्षुण्ण धारा मात्र आज अपने घुमावों पर या डोह स्थानों पर सरस वान हो गयी है पर यह कथा तो मालवा की अधिकांश नदियों से संबद्ध है तथा कल तक जहाँ डग-डग रोटी पग-पग नीर यह कहावत चरितार्थ होती थी, वहीं आज पशु मीलों तक इसके मूल प्रवाह मार्ग पर जल की खोज में लपलपाती धूप में करूणरव के साथ घूमते रहते हैं और पार्वती नदी के विषय में कही गयी कालिदासीय उक्ति इस नदी के लिये अब चरितार्थ हो गयी है।

यह नदी कैसे प्रारंभ हुई इसके विषय में एक महत्वपूर्ण पौराणिक आख्यान है। एक बार भगवान महाकाल क्षुधातुर हो विष्णु के पास पहुँचे। उन्होंने एक दिशा में तर्जनी निर्देश किया। शंकर ने देखा कि विंध्य क्षेत्र में जिस पर्वत श्रेणी से वह बँधा था, वहाँ एक छिद्र कर दिया और उससे वह बँधा जल सोपानाश्म (डेक्कन ट्रॅप) की क्षरित लाल मिट्टी से प्रवाहित हुआ अत: रक्त वर्ण था। उन्होंने उसे अपने कमण्डल में धारण किया। अत: उसे क्षिप्रा कहते हैं। दूसरी कथा में शिव ने विष्णु तर्जनी को ही छेद दिया। अत: जो रक्त प्रवाह हुआ वही क्षिप्रा रूप में बदल गया। इसका लाक्षणिक अर्थ तो यही है कि लेटराइटिक मिट्टी के कारण उसका प्रवाह रक्त वर्ण हुआ।

पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि मनुष्य अस्तित्व इस क्षेत्र में आद्य पुराश्मीय (Early Stoneagc) काल से ही होता है। उज्जयिनी के पास पहाड़ियों से गोलाश्म उपकरण (Pebble Tools) मिले हैं, जिनका अनुमानित काल 10 से 20 लाख वर्ष पूर्व माना गया है। तब से लेकर आधुनिक काल के अवशेष इस नदी के किनारे बसी प्राची बस्तियों से मिलते हैं। इस नदी के तट पर आज से करीब 3800 वर्ष पूर्व ताम्राश्मीय सभ्यता का आगमन हुआ। इस सभ्यता के अवशेष मेरे सर्वेक्षण में अन्यत्र 100 से अधिक स्थान पर मिले हैं, किन्तु क्षिप्रा तट पर मुझे उज्जैन, महिदपुर और सिपावरा में मिले हैं। इनका क्रम निम्नानुसार है-

1. कायथा सभ्यता के अवशेष इन तीनों स्थानों पर नहीं मिले।

2. महिदपुर और सिपावरा में लाल काले विभिन्न पात्रों का प्रथम निवासीय तल मिला है, जिन्हें आयड़ सभ्यता से जोड़ा गया है।

3. इनके ऊपर मालव ताम्राश्मीय पात्रावशेष मिलते हैं। उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में इस काल के कतिपय पात्र मिले हैं तथा उनके ऊपर चित्रित धूसर, धूसर तथा चमकीले काले (एन.बी.पी.) पात्र पाये गये हैं। ताम्राश्मीय लोग वृषभों के मृतिका चित्रों की पूजा करते थे तथा मातृ देवी की भी पूजा करते थे।

4. महिदपुर में ताम्र परशु उपलब्ध हुए हैं।

5. यहाँ पर ताम्राश्मीय आहत मुद्राएँ भी मिली हैं।

6. ढली उज्जयिनी मुद्राएँ तथा मुसलमानी-मराठा काल के मोटे ताँबे के सिक्के पाये गये हैं।

उज्जयिनी में विभिन्न धूसर सादे धूसर महीन लाल पात्र चमकीले उत्तरी राजित पात्र बड़े पैमाने पर मिले हैं। उज्जयिनी में काचित ईंट (ग्लोज्ड टाइल्स) विक्रम वर्ष 450 वर्ष पहले प्राप्त हुई है।

शताब्दियों से भारत का यह प्रमुख व्यापारिक केन्द्र रहा है तथा कालिदास ने उज्जयिनी का जो वर्णन 'हारास्तारां तरल गुटिका कोटिश: शंख शुक्तीम्'' किया है वह केन्द्रीय पुरातत्व विभाग के डॉ. नीलरतन बैनर्जी के उत्खनन से सिद्ध हो गया है। क्षिप्रा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का केन्द्र था। यहाँ गढ़कालिका टीले से ग्रीको रोमन मृत्तिका मुद्राएँ तथा रोमन शराब के एम्फोरा पात्र पर्याप्त मात्रा में मिले हैं। एक ऐसे पात्र के हत्थे पर अक्टावियों पाझ नामक रोमन व्यापारी की मुद्रा अंकित थी। क्षिप्रा के तट पर बसी यह नगरी मिस्र से भी संबंधित थी। इंदौर के श्री शर्मा एडव्होकेट को यहाँ मिस्री मुद्रा मिली है तथा मुझे मिस्री उत्कीर्ण चित्र का एक नमूना भी मिला है। क्षिप्रा वात: प्रियतमइव प्रार्थना चाटुकार:। पूर्वमेध 3311 इस चाटुकार प्रियतम इव क्षिप्रावात का आभास आज का मनुष्य भी करता है, भले ही आज अपने प्रियतमों से मिलने जाने वाली स्त्रियाँ नरपति पथ पर न दिखाई दें। पर आज भी क्षिप्रा तटवर्ती खेतों में, पुष्प वाटिकाओं में, पुष्पशैया का आभास देने वाले खेत दिखाई देंगे और लोगों का संरक्षण (अबन) करने वाली अवंति आज भी औद्योगिक प्रदूषणों से दूर शैक्षणिक क्षेत्र में सांदीपनि की परम्परा चला रही है।

क्षिप्रा का आसमंत प्रदेश अपनी उपजाऊ काली मिट्टी के लिये, उत्तम जलवायु के लिये विगत 3500 वर्ष से चावल व गेहूँ उत्पादन के लिये प्रसिद्ध रहा है। क्षिप्रा के तट पर ही प्राचीन खगोल विज्ञान के ज्ञाता खगोल गणित का अभ्यास करते रहे और मिर्जा राजा जयसिंह ने क्षिप्रा तट पर ही अपनी वैधशाला बनवाई, जहाँ आज भी ज्योतिष वैध लिये जाते हैं, पंचांग बनाये जाते हैं। क्षिप्रा के पावन तट पर ही शक्ति उपासना की केन्द्र हरसिद्धि देवी का मंदिर है। यहीं कापालकों के केन्द्र भैरवनाथ का मंदिर है। जैनों के श्रेष्ठ तीर्थंकर महावीर ने औखलेश्वर के श्मशान में तपस्या कर उसे अतिशय तीर्थ बनाया था। यहाँ न केवल हिन्दुओं के ही तीर्थ रहे अपितु सूफी संत की भी यहाँ समाधि है, मुसलमान फकीरों में मौलाना रूसी भी आये थे। मुगल काल में क्षिप्रा निकटवर्ती गुहा केन्द्र में महात्मा जदरूप जी से साक्षात्कार करने स्वयं बादशाह जहाँगीर मिलने आये थे। क्षिप्रा के दोनों तटों पर धर्मवरुदा, रणजीत हनुमान, सोढंग, कानिपुरा विजासिनी टेकरी पर बौद्ध स्तूपों के अवशेष, बौद्ध मत का प्रबल प्रादुर्भाव बताते हैं। तो दूसरी ओर बौद्धानुयायी चंडाशोक द्वारा भैरवगढ़ क्षेत्र में बनाये गये नरकागार का मृत्तिका प्रकार उसके विपरीत आचरण का साक्षी है। विक्रम के दरबार में नवरत्नों से लेकर पं. सूर्यनारायण व्यास तक यहाँ विद्वत् परम्परा रही। 'रसभाव विशेष दीक्षा गुरु' विक्रम के दरबार में कवि गोष्ठी होती रहती थी। यह परम्परा परमार राजा भोज के समय तक चलने वाली ज्ञानाभिज्ञ सभा ने कवि वेणु को पदवी सेवित की थी उसी परम्परा में परमार हरीशचन्द्र और गुप्त राजा चंद्रगुप्त को बुद्धि का साक्षात्कार देना पड़ा।

सांस्कृतिक परम्परा का केन्द्र इसके स्वनाम धन्य कवि कुलगुरु कालिदास के कारण जैसा प्रसिद्ध था, वैसे ही मातंग के कारण भी विश्वविख्यात था, जिसने बौद्ध धर्म की पताका का ध्वजोत्तोलन चीन की राजधानी पीकिंग से पहुँचकर किया था। क्षिप्रावत, क्षिप्रा जल और महाकाल वन यह सांस्कृतिक जागरण का केन्द्र रहा है और यहाँ भी मालवी कला जब भित्ति चित्रों से मुखर हो उठती है, सावन माण्डवों से मण्डित हो उठता है और जब कार्तिक पूर्णिमा व एकादशी के मध्य विद्वतसभा, संस्कृत काव्य-गायन, देश-विदेश के नाट्य कलाकारों का भावगम्य अभिनय, नृत्यांगनाओं के भाव मधुर तालबद्ध अंग विक्षेप, चित्रकारों की तूलिकाओं से मण्डित कालिदास काव्य-कथा का चित्रण, सब कुछ क्षिप्रा तट पर एक सांस्कृतिक जागरण करता है जो भारत ही नहीं विश्व में अनूठा है। मंदिरों की अट्टालिकाओं से गूँजते भक्तिगान सहस्रों ग्रामवासियों के कंठ से निनादित जय महाकाल जय काली के उदघोष भारत की सांस्कृतिक सुषमा को शाश्वत रूप में जीवित रखे हुए हैं।

औद्योगिक धुम्र वलय, लोहयानों के अखण्ड चलित चक्रों की ध्वनि और विद्वजनों के साथ यहाँ के पक्षी भी किसी गंभीर चिंतना का कलरव निनादित करते हैं। वे क्षिप्रा की शांत तरल तरंगों के समान भारतीय संस्कृति का आलोड़न कर विश्व चेतना का शाश्वत संदेश देते रहते हैं। यही है इस पुण्य-सलिला क्षिप्रा की मालव भूमि को देन, जो भूत, वर्तमान और भविष्य को आलोकित करती रही है और रहेगी। क्षिप्रा मइया की जय ध्वनि से मालवजनों की श्रद्धा, मातृवत् प्रेम और आत्मीय भाव को सदा-सदा विश्व कल्याणार्थ बहुजन हिताय, बहुजन दीप शिखा के सम्मान आत्म-बलिदान से जीवन देती रहेगी।

 
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