आलेख
मध्यप्रदेश - स्थापना दिवस पर विशेष

प्रदेश में पुरा-सम्पदा के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए तेजी से हो रहे कार्य

भोपाल : शुक्रवार, अक्टूबर 28, 2016, 20:13 IST
 

प्रदेश में फैली अटूट पुरा-सम्पदा के संरक्षण, संवर्धन और शोध कार्य तेजी से किया जा रहा है। पुरातत्व एवं अभिलेखागार एवं संग्रहालय,भोपाल एवं अधीनस्थ इकाइयों द्वारा प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने एवं प्रकाश में लाने की दृष्टि से उत्खनन एवं सर्वेक्षण कार्य करवाया जा रहा है।

भिण्ड जिले के ग्राम कोषण में प्राचीन टीले के उत्खनन से गुप्तकालीन मंदिर की अधोसंरचना एवं र्मार्यकाल तक की संस्कृति के अवशेष एवं पात्रावशेष प्राप्त हुए हैं। इससे यहाँ की सांस्कृतिक कड़ियों को जोड़ने में मदद मिलेगी। भोपाल जिले के ग्राम अरलिया में कराये गये मलवा-सफाई से परमारकालीन मंदिर की अधोसंरचना एवं वास्तु-खण्ड प्रकाश में आये हैं। वर्ष 2016 में करवाये गये सर्वेक्षण में सीहोर जिले के देवबढ़ला में दो परमारकालीन मंदिर प्राप्त हुए हैं। इन मंदिरों की पुनर्संरचना करवाई जा रही हैं। इन स्थान पर 10-11 मंदिर के समूह प्राप्त होने की संभावना बताई जा रही है। इसमें से कुछ अवशेष ऊपर तथा कुछ जमीन में दबे हुए हैं।

पुरा-सम्पदा के रासायनिक संरक्षण में महाराज इन्द्रजीत सिंह की छत्री दतिया, महाराज परीक्षित की छत्री के मुख्य द्वार के भित्तिचित्र, शिवमंदिर, वैद्यनाथ मंदिर तहसील हुजूर जिला रीवा, शिवमंदिर की गुफाएँ लखवरिया, बुढ़ार जिला शहडोल एवं 508 पुरावशेषों यथा गूजरी महल संग्रहालय ग्वालियर के 500 चांदी के सिक्के, महाराज छत्रसाल संग्रहालय, धुबेला में संग्रहीत 4 पाषाण प्रतिमा एवं पन्ना संग्रहालय में संग्रहीत 4 पाषाण प्रतिमा का रासायनिक संरक्षण कार्य करवाया गया हैं।

492 स्मारक/स्थल संरक्षित

प्रदेश में अब तक 492 स्मारक/स्थल संरक्षित किये जा चुके हैं । सर्वाधिक 47 नये राज्य संरक्षित स्मारक वर्ष 2015 में घोषित हुए। इन स्मारक/स्थलों की चौकसी के लिये 444 सुरक्षा गार्ड तैनात हैं। प्रदेश में विभिन्न स्थान पर 35 संग्रहालय हैं। इनमें 7 राज्य स्तरीय संग्रहालय भोपाल, जबलपुर, इंदौर, धुबेला (छतरपुर), ग्वालियर, उज्जैन एवं रामवन (सतना) में हैं। जिला स्तरीय 14 संग्रहालय हैं। इनमें शहडोल, रीवा, पन्ना, ओरछा (टीकमगढ़), विदिशा, राजगढ़, होशंगाबाद, देवास, धार, मंदसौर, मण्डला, भिण्ड, सागर एवं दमोह के संग्रहालय शामिल हैं। इसके अलावा 9 स्थानीय संग्रहालय महेश्वर, आशापुरी, भानपुरा, पिछौर, गन्धर्वपरी, चंदेरी, कसरावद, गोलघर (भोपाल) एवं राजबाड़ा (इंदौर) स्थापित हैं। स्थल संग्रहालय के रूप में 5 संग्रहालय हिंगलाजगढ़, कुण्डेश्वर, ओंकारेश्वर, मोहन्द्रा एवं सलकनपुर में हैं।

मॉडलिंग खण्ड

पुरातत्वीय धरोहर के प्रति जन-सामान्य में अभिरूचि तथा विरासत को सहेजने के लिए महत्वपूर्ण प्रतिमाओं के निर्माण की गतिविधियाँ संचालित की जाती हैं। गत वर्ष में 860 प्रतिकृति तैयार करने के साथ ही एक नयी प्रतिमा का मोल्ड तैयार किया गया।

प्रदर्शनी

सांस्कृतिक विरासत में रूचि रखने वाले शोधार्थियों/ विद्यार्थियों को पुरा-सम्पदा की धरोहर से रू-ब-रू कराने के लिए वर्ष 2016 में राजगढ़, पन्ना, धुबेला, धार, रीवा, रामवन, जबलपुर, भिण्ड, ग्वालियर एवं शहडोल जिले में प्रदर्शनी लगाई गई। स्वतंत्रता दिवस पर 70 वीं वर्षगांठ पर प्रदेश के संग्रहालयों में प्रदर्शनी के साथ ही चित्रकला की प्रतियोगिता करवाई गई।

डॉ. वाकणकर पुरातत्व शोध संस्थान

प्रदेश में स्थित डॉ. वाकणकर पुरातत्व शोध संस्थान द्वारा जिला सतना में मनोरा, अनूपपुर जिला के ग्राम गंभीरवाटोला-दारा सागर में करवाये गये उत्खनन से मनोरा में गुप्तकालीन मंदिरों की संरचना ,प्रतिमाएँ, मृद भांड, औजार एवं अन्य उपकरण मिले। गंभीरवाटोला में उत्खनन से दो हजार वर्ष पहले की प्राचीन ताम्राश्म युगीन संस्कृति से मृद भांड, औजार एवं उपकरण मिले। वर्ष 2016 में भोपाल में कोलार रोड स्थित भोजनगर में मलवा-सफाई के दौरान परमारकालीन शिवमंदिर,15 शैव एवं वैष्णव प्रतिमाएँ प्राप्त हुईं।

शोध संस्थान द्वारा मध्यप्रदेश के पुरातत्व में शोध के लिए इस वर्ष से दो वर्ष तक के लिए 2 कनिष्ठ एवं 2 वरिष्ठ अनुसंधान अध्येतावृत्तियों को आकस्मिक अनुदान उपलब्ध करवाया जाता है।

डाँ. विष्णु श्रीधर वाकणकर’ राष्ट्रीय सम्मान

पुरातत्व के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान देने वाले मनीषी के लिए डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर’ राष्ट्रीय सम्मान वर्ष 2015-2006 से प्रारंभ हुआ है। इसमें सम्मानस्वरूप दो लाख रूपये की राशि एवं प्रशस्ति-पत्र दिया जाता है। अभी तक 8 विद्धानों को इस सम्मान से नवाजा जा चुका है। इनमें डॉ.स्वराज प्रकाश गुप्त (नई दिल्ली), डॉ.ली.एन. मिश्र (पुणे), डॉ. ठाकुरदास वर्मा (वाराणसी), प्रो.पी.सी.लाल (दिल्ली), प्रो. ए. सुन्दरा (मैसूर), डॉ. के.एन. दीक्षित (दिल्ली), डॉ.एम.के. धौलीकर (पुणे), डॉ. डी.पी.अग्रवाल (अल्मोड़ा) के नाम शामिल हैं। वर्ष 2013-2014 का सम्मान डॉ. दिलीप चक्रवर्ती (दिल्ली), केंब्रिज यूनिवर्सिटी, यू.के. को दिया जाना तय हुआ है।

320 स्मारक का अनुरक्षण

प्रदेश में पहली बार व्यापक तौर पर 320 स्मारक का अनुरक्षण कार्य करवाया जा रहा है। अभी तक 145 स्मारक का अनुरक्षण करवाया जा चुका है तथा 29 स्मारक का काम पूर्णता की ओर हैं। साथ ही 68 स्मारकों की निविदा कार्यवाही प्रचलन में तथा 30 स्मारक के डीपीआर तैयार होने के साथ ही 48 स्मारक के डीपीआर तैयार किये जा रहे हैं। इनमें से 63 स्मारक के अनुरक्षण का कार्य वर्ल्ड मान्यूमेंट फण्ड की सहभागिता से उनसे हुए करार-नामा अनुसार किया जा रहा है। इसके अलावा विरासत भवनों में स्थापित 9 संग्रहालय का उन्नयन एवं विकास कार्य में से 8 संग्रहालय में कार्य पूर्ण किये जा चुके हैं। प्रदेश की प्राचीन बावड़ियों को उनका मूल स्वरूप देने की दृष्टि से 28 प्राचीन बावड़ियों का अनुरक्षण कार्य पूरा करवाया गया।

इतिहास,संस्कृति एवं पुरातत्व की अनियतकालीन शोध पर केन्द्रित ‘पुरातन’ विषय पर वर्ष 1984 से पत्रिका का प्रकाशन भी हो रहा है। इस वर्ष उज्जयिनी इतिहास एवं संस्कृति, रीवा एवं डिन्डोरी जिले का पुरातत्व, संबंधी पुस्तक प्रकाशित हो चुकी हैं।


ऋषभ जैन
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