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आलेख
जन-कल्याण के 11 वर्ष

मछली-पालन बना रोजगार का सशक्त जरिया

भोपाल : सोमवार, नवम्बर 28, 2016, 16:35 IST
 

पिछले 11 साल में मध्यप्रदेश में मछली-पालन रोजगार का सशक्त जरिया बनकर उभरा है। यहाँ जल-क्षेत्र बढ़ने के साथ मत्स्य और मत्स्य-बीज उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। मत्स्य-पालकों को विभिन्न रोजगारमूलक गतिविधियों में वर्ष 2005-06 तक 96 लाख 75 हजार मानव-दिवस का रोजगार उपलब्ध करवाया जा रहा था, जो वर्ष 2015-16 में 118 प्रतिशत से ज्यादा बढ़कर 211 लाख 18 हजार मानव-दिवस रोजगार हो गया। निजी क्षेत्र में पेरीफेरल एवं मत्स्य बीज संवर्धन क्षेत्र के विकास में मत्स्य-कृषकों को प्रोत्साहित कर रोजगार प्रदान किया जा रहा है। इसमें मत्स्य कृषकों को प्रति हेक्टेयर सवा दो लाख रुपये से ज्यादा की दर से अनुदान दिया जाता है।

राज्य में वर्ष 2005-06 में मत्स्य-पालन के लिये 3 लाख हेक्टेयर जल-क्षेत्र उपलब्ध था, जो वर्ष 2015-16 में 34.66 प्रतिशत बढ़कर 4 लाख 04 हजार हेक्टेयर हो गया है। इसमें से 3 लाख 96 हजार हेक्टेयर में मत्स्य-पालन किया जा रहा है। जल-क्षेत्र बढ़ने से जहाँ कृषि उत्पादकता में बढ़ोत्तरी हुई, प्रदेश ने लगातार कृषि कर्मण अवार्ड हासिल किया वहीं किसानों को अतिरिक्त आय के रूप में मछली-पालन भी फला-फूला। मत्स्य-उत्पादन में भी 88 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोत्तरी हुई। वर्ष 2005-06 में प्रदेश का कुल मत्स्योत्पादन 61 हजार टन था, जो वर्ष 2015-16 में बढ़कर 11 लाख 5 हजार टन से ज्यादा हो गया है।

मत्स्य-बीज उत्पादन में आत्म-निर्भर हुआ प्रदेश

मत्स्य-बीज उत्पादन में तो प्रदेश ने भारी सफलता हासिल की है। पहले यहाँ मत्स्य-बीज की आवश्यकता की पूर्ति नदियों में संग्रह कर और अन्य राज्यों से आयात कर करना होती थी। पर्याप्त मत्स्य-बीज उपलब्ध न होने से मत्स्य-उत्पादन में बढ़ोत्तरी संभव भी नहीं है। आज प्रदेश मत्स्य-बीज उत्पादन में आत्म-निर्भर हो चुका है। विभाग एवं निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित कर अच्छे किस्म का मत्स्य बीज तैयार किया जा रहा है। वर्ष 2005-06 में 4386 लाख स्टेण्डर्ड फ्राई मत्स्य-बीज का उत्पादन किया गया था, जो वर्ष 2015-16 में बढ़कर 9521 लाख हो गया। यह वृद्धि 117 प्रतिशत से अधिक है।

मछुआ दुर्घटना बीमा में मध्यप्रदेश प्रथम

मध्यप्रदेश मछुआ दुर्घटना बीमा में अंतर्देशीय-स्तर पर देश में प्रथम है। मत्स्य-पालकों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के लिये उनका नि:शुल्क दुर्घटना बीमा किया जाता है। इसमें विकलांगता पर 50 हजार, स्थायी विकलांगता पर एक लाख और मृत्यु होने पर 2 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाती है। वर्ष 2005-06 में 64 हजार 290 मछुओं का दुर्घटना बीमा किया गया। इसकी तुलना में वर्ष 2015-16 में एक लाख 80 हजार 988 मछुओं को लाभान्वित किया गया। यह वृद्धि करीब 182 प्रतिशत है।

मछुआ सहकारी समिति

सहकारिता को बढ़ावा देते हुए पंजीकृत मछुआ सहकारी समितियों को विभाग की नीति के अनुसार प्राथमिकता के आधार पर मत्स्य-पालन के लिये तालाब पट्टे पर आवंटित किये जाते हैं। वर्ष 2005-06 में प्रदेश में पंजीकृत मछुआ समितियों की संख्या 1573 थी, जिनमें 56 हजार 535 सदस्य थे। वर्ष 2015-16 में समिति संख्या बढ़कर 2185 हो गयी, जिन 81 हजार 783 सदस्य लाभान्वित हो रहे हैं। यह वृद्धि लगभग 39 प्रतिशत है।

मछुआ सहकारिता में पंजीकृत मछुआ सहकारी समितियों को उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिये अंश-पूँजी, मत्स्य-बीज एवं नाव-जाल के लिये अनुदान उपलब्ध करवाया जाता है। वर्ष 2005-06 में 191 मछुआ सहकारी समितियों को जहाँ 22 लाख से ज्यादा का अनुदान उपलब्ध करवाया गया, वहीं वर्ष 2015-16 में 483 समिति को 101 से ज्यादा लाख का अनुदान दिया गया। यह वृद्धि करीब 354 प्रतिशत है।

राज्य शासन पंजीकृत मछुआ समितियों के अलावा मत्स्य-पालकों के समूह को भी मछली-पालन के लिये तालाब पट्टे पर देता है। समितियों के समान मत्स्य-पालकों को अनुदान के रूप में आर्थिक सहायता दी जाती है। वर्ष 2005-06 में 906 मत्स्य-पालकों को करीब 16 लाख का अनुदान दिया गया, जो वर्ष 2015-16 में बढ़कर 73 लाख से ज्यादा हो गया। यह वृद्धि 358 प्रतिशत से अधिक है।

मछुआ प्रशिक्षण में 178 प्रतिशत की वृद्धि

मत्स्य-पालकों को मत्स्य-पालन के उन्नत तकनीकी ज्ञान से अवगत करवाने के लिये 15 दिन का नि:शुल्क प्रशिक्षण उपलब्ध करवाया जा रहा है। प्रशिक्षण में भाग लेने वाले मछुआरों को प्रशिक्षण-स्थल तक आने-जाने का किराया और धागा भी दिया जाता है। वर्ष 2005-06 में 2070 और वर्ष 2015-16 में 5776 मछुआरों को प्रशिक्षण दिया गया। इस वर्ष से प्रति मछुआ प्रशिक्षण 1250 रुपये के प्रावधान को बढ़ाकर 2775 रुपये कर दिया गया है।

बचत-सह-राहत

मत्स्य प्रजनन-काल रहने से हर साल 16 जून से 15 अगस्त तक प्रदेश में मत्स्याखेट प्रतिबंधित रहता है। ऐसे में मछुआरों की सहायता के लिये वर्ष 2002-03 से केन्द्र प्रवर्तित बचत-सह-राहत योजना चलायी जा रही है। वर्ष 2005-06 की तुलना में इसमें भी लाभान्वित हितग्राहियों की प्रगति 181 प्रतिशत से अधिक रही है। वर्ष 2010-11 से हितग्राही द्वारा बचत राशि 400 रुपये पर केन्द्रांश एवं राज्यांश 800 रुपये, कुल 1200 तथा वर्ष 2015-16 एवं 2016-17 में हितग्राहियों की बचत राशि 900 तथा केन्द्रांश एवं राज्यांश 1800 रुपये, कुल 2700 रुपये हितग्राही के बैंक खाते में जमा किये जाते हैं।

2162 मछुआ आवास बने

मछुआरों को बेहतर आवास सुविधा उपलब्ध करवाने के लिये वर्ष 2007-08 से आरंभ की गयी मछुआ आवास योजना में आवासहीन मछुआ को आवास निर्माण या कच्चे आवास के निर्माण-सुधार के लिये 75 हजार रुपये का अनुदान किस्त में देने का प्रावधान है। अब तक 2162 मछुआ आवास का निर्माण किया जा चुका है।

आदर्श मत्स्य-आहार योजना

ग्रामीण तालाबों से मत्स्य-उत्पादन बढ़ाने के लिये वर्ष 2012-13 से लागू की गयी आदर्श मत्स्य आहार योजना में 90 प्रतिशत अनुदान पर 50 हजार रुपये का मत्स्य-आहार हितग्राहियों को उपलब्ध करवाया जाता है। अब तक इसमें 50 लाख रुपये का मत्स्य-आहार प्रतिवर्ष उपलब्ध करवाये जाने का प्रावधान था, जिसे अगले वित्तीय वर्ष से 100 लाख करने का प्रावधान किया जा रहा है।

ब्याज दर 3 प्रतिशत से घटकर हुई शून्य

किसानों के समान ही मत्स्य-पालकों को भी वर्ष 2009-10 से 3 प्रतिशत ब्याज दर पर फिशरमेन क्रेडिट-कार्ड योजना आरंभ की गयी थी। वर्ष 2011-12 में एक प्रतिशत तथा वर्ष 2012-13 से शून्य प्रतिशत ब्याज पर मत्स्य-पालकों को क्रेडिट-कार्ड उपलब्ध करवाये जा रहे हैं। अब तक 49 हजार 613 कार्ड हितग्राहियों को वितरित किये जा चुके हैं।

मत्स्य-कृषक विकास अभिकरण

आर्थिक रूप से कमजोर मत्स्य-कृषकों को दस वर्षीय पट्टे पर तालाब देकर उनकी आर्थिक-सामाजिक उन्नति की पहल की जाती है। इसमें तालाबों की मरम्मत तथा मत्स्य-पालन व्यवसाय प्रारंभ करने के लिये बैंक से लम्बी अवधि का ऋण तथा शासकीय अनुदान उपलब्ध करवाया जाता है। मत्स्य-पालकों को मत्स्य-बीज, आहार, खाद, मत्स्य रोगों के उपचार के लिये औषधि के लिये अनुदान मिलता है। वर्ष 2005-06 में स्वयं की भूमि पर 1867 तालाब, जिनका जल-क्षेत्र 2036 हेक्टेयर था का निर्माण किया गया। वर्ष 2015-16 में 4518.47 हेक्टेयर जल-क्षेत्र के 3931 तालाब बनाये गये जो करीब 122 प्रतिशत अधिक है।

केज कल्चर

बड़े जलाशयों में अतिरिक्त रूप से मछली उत्पादन के लिये मत्स्य-कृषकों को केज कल्चर के लिये प्रोत्साहित किया जा रहा है। विभाग चार गुना छह मीटर के केज स्थापित करने के लिये प्रति केज डेढ़ लाख रूपये की दर से अनुदान देता है।


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