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जन-कल्याण के 11 वर्ष

मध्यप्रदेश में रोजाना बढ़ रहा है सिंचाई रकबा

'पर ड्राप मोर क्रॉप' के लक्ष्य की पूर्ति के लिए मध्यप्रदेश में अब गंभीर प्रयास

भोपाल : सोमवार, नवम्बर 28, 2016, 16:17 IST
 

देश के हृदय प्रदेश मध्यप्रदेश में वर्ष 2003 में जहाँ सिर्फ सात लाख हेक्टेयर के आसपास संचित क्षेत्र था। वहीं जल संसाधन विभाग की ओर से इसे तीस लाख हेक्टेयर तक लाने की अहम उपलब्धि बीते दशक की खास घटना है। नर्मदा घाटी विकास, पंचायत और अन्य विभाग की योजनाओं से बढ़े सिंचाई रकबे की गणना अलग है। आने वाले वर्षों में मध्यप्रदेश में साठ लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षमता देखने को मिलेगी। यह उपलब्धि वर्ष 2017 से दिखना प्रारंभ भी होने लगेगी। मध्यप्रदेश में प्रतिदिन सिंचाई क्षेत्र में वृद्धि हो रही है। इस दिन प्रतिदिन मिलती उपलब्धि से किसानों की आर्थिक दशा में तो सुधार हो ही रहा है, ग्रामीण और शहरी अर्थ-व्यवस्था में भी सकारात्मक बदलाव दिखाई देने लगा है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के 'पर ड्राप मोर क्रॉप' के लक्ष्य को प्राप्त करने में मध्यप्रदेश अग्रणी भूमिका निभा रहा है। इस वर्ष से जल संसाधन विभाग के अमले ने नई ऊर्जा के साथ राज्य में कार्य प्रारंभ किया है।

यह निर्विवाद तथ्य है कि मध्यप्रदेश सरकार ने विकास के जिन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया है उनमें सिंचाई प्रमुख है। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने किसान वर्ग के लिए जहाँ बिना ब्याज के ऋण की व्यवस्था कर उन्हें आर्थिक बोझ से राहत प्रदान की वहीं प्रदेश में सिंचाई की सुविधाएँ बढ़ाकर किसानों को संपन्न बनाने का लक्ष्य भी तय किया गया। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जो कार्य बीते 11 वर्ष में शुरू हुए उससे किसान सीधे लाभान्वित हुए हैं। यही वजह है कि मध्यप्रदेश को लगातार चार साल कृषि कर्मण अवार्ड से भी नवाजा गया है। इन निरंतर मिले पुरस्कारों का प्रमुख आधार मध्यप्रदेश में सिंचाई क्षेत्र में लगातार की गई वृद्धि ही है। जल संसाधन विभाग का दायित्व है कि एकीकृत जल संसाधनों के विकास और प्रबंधन की व्यापक योजना बनाई जाए, नीति निर्धारित की जाए और जल के समन्वित उपयोग की व्यवस्था की जाए। इन सभी मोर्चों पर जल संसाधन महकमे ने कामयाबी प्राप्त की है। जहाँ पुरानी योजनाओं के कायाकल्प की आवश्यकता है वहाँ वैसी व्यवस्था करना और सहभागिता सिंचाई प्रबंधन के जरिये कृषकों की भागीदारी को बढ़ाने के लिए प्रयास करना प्राथमिकता रहा है।

बीते 11 वर्ष की उपलब्धियों की चर्चा की जाए तो इस अवधि में 7 वृहद, 12 मध्यम और 1618 लद्यु योजनाएँ पूरी की गई हैं। चम्बल मुख्य नहर प्रणाली विश्व बैंक की सहायता से किए गए लाईनिंग वर्क से इस वर्ष सिंचाई क्षमता 3 लाख5 हजार हेक्टेयर हो गई है। बाण सागर परियोजना से 1लाख 60 हजार हेक्टेयर और धार, झाबुआ जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में माही परियोजना से 20 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में सिंचाई हो रही हैं। वास्तविक सिंचाई का प्रतिशत नहरों के विस्तारीकरण, संधारण और जल वितरण के अच्छे प्रबंधन से 37 से बढ़कर 80 प्रतिशत हो गया है।

विश्व बैंक की सहायता से मध्यप्रदेश वाटर सेक्टर रीस्ट्रक्चरिंग प्रोजेक्ट में कार्य होने से एक दशक में ढाई लाख के स्थान पर करीब 6 लाख हेक्टेयर में सिंचाई हो रही हैं। प्रोजेक्ट से तीस जिलों की करीब सवा दौ सौ परियोजना को नई शक्ल मिली। उदाहरण के लिए ग्वालियर में चंबल परियोजना और हरसी नहर से किसान लाभान्वित होने लगे है। रबी फसलों की बात करें तो 13 वर्ष पहले निर्मित सैंच्य क्षेत्र 12 लाख 70 हजार हेक्टयर था, जो इस वर्ष बढ़कर 29 लाख 58 हजार हेक्टेयर हो चुका है। इस अवधि में वास्तविक सिंचाई का क्षेत्र भी 10 लाख 7 हजार से बढ़कर 27 लाख 50 हजार हेक्टेयर हो चुका है। नाबार्ड की सहायता से योजनाओं को पूरा करने के लिए निरंतर प्रयास हुए है। वर्ष 1995-2004 की अवधि में 1000.53 करोड़ लागत की 534 योजनाओं की मंजूरी हुई थी। यह दशक प्रगति की दृष्टि से आशाजनक नहीं था। लेकिन इसके बाद का दशक अर्थात वर्ष 2004 से 2015 के मध्य 2188 करोड़ रूपये के निवेश से 10 वृहद और मध्यम परियोजनाओं के कार्य तेजी से पूर्ण करने के प्रयास किए गए। यही वजह है कि इस कार्यों से 4 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा किसानों के चेहरे पर मुस्कान लाने का कार्य करेगी।

केन्द्रीय जल आयोग ने विश्व बैंक के सहयोग से 4 राज्य के 223 बाँध को सृद्ढ़ बनाने की योजना बनाई थी। इसमें मध्यप्रदेश के 50 बाँध का चयन किया गया। वर्तमान में 12 बाँध के जीर्णोद्वार पर ध्यान दिया जा रहा है। मध्यप्रदेश में सूचना प्रौद्योगिकी साधनों को उपयोग भी जलाश्यों के जल स्तर की मानीटरिंग के लिए किया जा रहा है। एसएमएस बेस्ड व्यवस्था में विभागीय वेबसाइट पर जलाशयों में जल उपलब्धता को एक क्लिक के माध्यम से जाना जा सकता है। वर्ष 2003 के सिंचाई राजस्व वसूली के 33 करोड़ 07 लाख के आंकड़े को इस वर्ष 290 करोड़ 83 लाख तक पहुँचा दिया गया है। राजस्व वसूली के लक्ष्य को प्राप्त करने के प्रयास भी बढ़ाए गए हैं। गत दशक में जल उपभोक्ताओं की संख्या भी बढ़ी है। पहले जहाँ 1470 संथाएँ थी वहीं इनकी संख्या 2067 हो गई है। समस्त शासकीय और निजी स्त्रोतों से सिंचाई रकबे की बात करें तो इसमें भी प्रगति काफी उल्लेखनीय है। समस्त स्त्रोतों से राज्य में वर्ष 2003 में 48 लाख 99 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई होती थी जो आज 99 लाख 19 हजार हेक्टेयर में हो रही है। राज्य में शुद्ध बोए गये क्षेत्र में कुल सिंचित निर्मित क्षमता का प्रतिशत 6.33 से बढ़कर 17.95 हो गया है। परियोजनाओं पर 621 करोड़ के मुकाबले 5217 करोड़ रूपये की राशि खर्च की गई। कमांड क्षेत्र के विकास पर वर्ष 2003 में सिर्फ 6 करोड़ 21 लाख रूपये खर्च हुए थे। मार्च 2016 में यह खर्च 147 करोड़ तक पहुँचा है।

प्रदेश में जल संसाधन विभाग के माध्यम से गत पाँच वर्ष में तीन वृहद क्रमश: सिंध प्रथम चरण, राजघाट नगर परियोजना एवं राजीव सागर परियोजना, पाँच मध्यम तथा 700 से अधिक लघु सिंचाई परियोजनाएँ पूर्ण करते हुए कुल सिंचाई 9 लाख 76 हजार हेक्टेयर से बढ़ाकर 27 लाख 50 हजार हेक्टेयर की गई है। अगले एक वर्ष में तीन वृहद जलाशयों क्रमश: पेंच, पंचमनगर एवं हरसी उच्च स्तरीय नहर प्रणाली (द्वितीय चरण), तीन मध्यम परियोजनाओं एवं लगभग 100 से अधिक अतिरिक्त लघु सिंचाई परियोजनाओं से सिंचाई कर कुल सिंचाई में डेढ़ लाख से अधिक बढ़ोत्तरी कर विभाग का कुल सिंचाई क्षेत्र 30 लाख हेक्टेयर करने का लक्ष्य है। मध्यप्रदेश के अनेक क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ करीब तीन दशक बाद सिंचाई की सुविधा मिली है। अनेक सिंचाई परियोजनाओं का कायाकल्प किया गया। इससे पुरानी परियोजनाएँ भी सार्थक बन गई।

वर्ष 2016 में हुई अच्छी बारिश से प्रमुख बाँधों और जलाशयों के जल-स्तर में आशातीत वृद्धि हुई है। स्वाभाविक रूप से अच्छे जल भराव का फायदा कृषि क्षेत्र को प्राप्त होगा। जहाँ तक आयोजन व्यय का सवाल है वर्ष 2016-17 में वृहद परियोजना के लिए 3051 करोड़ खर्च करने का लक्ष्य है। इस वित्त वर्ष में मध्यम परियोजना में 971 करोड़ और लघु परियोजना में 962 करोड़ के वार्षिक प्रावधान से बेहतर सिंचाई सुविधा मिल सकेगी। कमांड क्षेत्र विकास के लिए 342 करोड़ रुपए खर्च करने का सालाना लक्ष्य है।

जल संसाधन विभाग राजस्व वसूली पर भी ध्यान दे रहा है। हाल ही में हुई समीक्षा बैठक में राजस्व वसूली के लिए किसान वर्ग के साथ ही उद्योग क्षेत्र, विद्युत कंपनियों, एनटीपीसी, पॉवर प्लांट और पेयजल के लिए निकायों से वसूली पर ध्यान देने के निर्देश दिए गए हैं। विभाग का जिम्मा संभालने के बाद मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने भू-अर्जन के मामलों में भी विलंब की स्थिति खत्म करने की हिदायत दी है ताकि किसानों को समय पर लाभ मिल सकें। निर्माणाधीन परियोजनाओं के कामों को भी जल्द पूरा करने के लिए कहा गया है।

प्रदेश में किसानों को बेहतर सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने के लिए अक्टूबर माह में राज्य में सम्पन्न विशेष बैठकों से जल संसाधन विभाग के अभियंताओं और किसानों के बीच सार्थक संवाद की स्थिति बनी । बैठकों में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, एक ग्राम-एक योजना के आधार पर जल संरचनाओं के निर्माण पर भी चर्चा हुई। जल संसाधन मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने रबी की फसलों के लिए किसानों को पर्याप्त जल उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से इन बैठकों के निर्देश दिए थे। राज्य में करीब सवा दो हजार जल उपभोक्ता संस्थाएँ हैं। इनके अध्यक्षों के साथ कार्यपालन यांत्रियों, अधीक्षण यंत्रियों और मुख्य अभियंताओं द्वारा सीधा संवाद किया गया। इसके फलस्वरूप आवश्यकतानुसार नहरों से संबंधित कार्यों को अंजाम दिया जाएगा। इसके साथ ही सिंचाई संबंधी विभिन्न समस्याओं की जानकारी भी अधिकारियों को प्राप्त हो जाने से उनके निराकरण में आसानी होगी। सम्पूर्ण राज्य में अभियंताओं ने क्षेत्र का भ्रमण कर किसानों से बातचीत की। प्रदेश के सिंचाई परिदृश्य को और अधिक किसान हितैषी बनाने में संवाद का यह सिलसिला उपयोगी सिद्ध होगा।

 
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