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जन-कल्याण के 11 वर्ष

नव स्वास्थ्य की भोर

भोपाल : सोमवार, नवम्बर 28, 2016, 17:02 IST
 

आम आदमी का स्वास्थ्य मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है। गरीबों विशेषकर गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य की जैसी परवाह पिछले 11 वर्षों में हुई वैसी पहले कभी नहीं हुई। कमजोर तबकों की बीमारी सहायता में आज मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान राशि का सैकड़ों गुना अधिक भाग खर्च हो रहा है। राज्य बीमारी सहायता निधि में गंभीर बीमारी से ग्रसित कमजोर तबके के लोग देश के किसी भी अस्पताल में अपना इलाज करा सकते हैं। अधोसंरचना सुदृढ़ होने के साथ साफ-सफाई में भी शासकीय अस्पताल निजी अस्पतालों को टक्कर देने लगे हैं। भावी पीढ़ी बीमार ही न पड़े, उसका बेहतर मानसिक और शारीरिक विकास हो, इसके लिये मुख्यमंत्री श्री चौहान द्वारा आरंभ किया गया सूर्य नमस्कार छात्रों में एक संस्कार बन चुका है।

मातृ मृत्यु दर में कमी

प्रदेश में लगातार किये गये प्रयासों के फलस्वरूप मातृ-शिशु मृत्यु दर में कमी आई है। राष्ट्रीय औसत प्रति हजार पर 56 के विरुद्ध मध्यप्रदेश में यह घटकर 45 हो गया है। सर्वाधिक गिरावट वाले राज्यों में मध्यप्रदेश दूसरे स्थान पर है। मातृ मृत्यु दर वर्ष 2003 में 379 प्रति लाख जीवित जन्म से घटकर वर्ष 2011-12 में 221 हो गई है। जुलाई 2011 से जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम संचालित है। इसमें हर साल शासकीय अस्पतालों में प्रसव कराने वाली लगभग 11 लाख महिलाओं को लाभान्वित किया जा रहा है। संस्थागत प्रसव 28.3 से बढ़कर 73.3 हो गया है। गर्भवती महिलाओं की पहले तीन प्रसव पूर्व जाँच मात्र 34 प्रतिशत थी, जो करीब 72 प्रतिशत प्रतिवर्ष हो गई है। भोपाल, ग्वालियर, इंदौर एवं रीवा जिलों में स्किल लेब की स्थापना कर मातृ-शिशु दर कम करने के लिये 2818 सेवा प्रदाताओं को प्रशिक्षित किया गया।

शिशु मृत्यु दर में गिरावट

शिशु मृत्यु दर में भी गिरावट आई है। वर्ष 2004 में यह दर 79 प्रति हजार जीवित जन्म थी, जो 2013 में 54 औ 2015-16 में पुन:घटकर 51 प्रतिशत हो गई। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में 16 राज्यों की रिपोर्ट जारी हुई है जिनमें मध्यप्रदेश में सर्वाधिक सुधार हुआ है। प्रत्येक जिले में नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई की स्थापना कर लगभग 5 लाख शिशुओं का उपचार किया गया। साथ ही समुचित देखभाल के 1364 न्यूबोर्न कार्नर भी स्थापित हैं। बच्चों में निमोनिया, दस्त रोगों को रोकने के विशेष प्रयास किये गये हैं। जुलाई 2015 में प्रदेश को न्यूबोर्न सर्वाइवल राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।

गंभीर कुपोषण दर में भी कमी

राष्ट्रीय परिवार एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार वर्ष 2005-06 में गंभीर कुपोषण की दर 12.6 प्रतिशत थी, जो वर्ष 2015-16 में घटकर 9.2 प्रतिशत हो गई। बाल मृत्यु दर में 28 अंकों की गिरावट दर्ज की गई। सर्वेक्षण-3 में यह दर वर्ष 2005-06 में 93 प्रति हजार जीवित जन्म थी, जो सर्वेक्षण-4 में 65 रह गई। प्रदेश के 315 पोषण पुनर्वास केन्द्रों में अब तक साढ़े 4 लाख से अधिक बच्चों को उपचारित किया जा चुका है। सभी जिला अस्पतालों को शिशु हितैषी अस्पताल बनाया गया है। बच्चों में सूक्ष्म पोषक तत्वों के लिये हर साल दो बार बाल सुरक्षा माह आयोजित कर 9 माह से 5 वर्ष तक के बच्चों को विटामिन 'ए' का घोल पिलाया जाता है। वर्ष 2016-17 के प्रथम चरण में 77 लाख 46 हजार बच्चों को विटामिन 'ए' का घोल पिलाया गया। बच्चों में रक्त अल्पता का दोष न हो इसके लिये 70 हजार 669 माध्यमिक, उच्चतर माध्यमिक 85 हजार और 113 प्राथमिक विद्यालय और 92 हजार 195 आँगनबाड़ी केन्द्रों के माध्यम से छ: माह से 19 वर्ष तक के बालक-बालिकाओं के लिये नेशनल आयरन प्लस इनिशेटिव कार्यक्रम संचालित है। दिसम्बर 2013 से जीरो से 18 वर्ष के बच्चों के स्वास्थ्य परीक्षण का कार्यक्रम भी चालू है। जिसमें मोबाइल हैल्थ टीम द्वारा अब तक सवा तीन करोड़ से अधिक बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण किया गया। इनमें 17 लाख से अधिक बच्चों को नि:शुल्क दवाइयाँ एवं 22 हजार से अधिक बच्चों की नि:शुल्क सर्जरी शामिल है। प्रदेश में विकास खण्ड स्तर पर 595 मोबाइल हैल्थ टीम कार्यरत हैं।

सभी जिलों में किशोर स्वास्थ्य क्लनिक

प्रदेश में अप्रैल 2014 से आरंभ राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम में सभी जिला अस्पताल में किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक स्थापित किये जाकर किशोरों को नि:शुल्क परामर्श सेवा शुरू की गई। ग्यारह जिलों के 77 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में भी यह क्लीनिक स्थापित हैं। वर्ष 2012-13 में 8 जिलों श्योपुर, शिवपुरी, भिण्ड, मुरैना, दतिया, विदिश, गुना एवं सागर में आरंभ माहवारी स्वच्छता योजना में आशा कार्यकर्ताओं ने किशोरियों को साढ़े 28 लाख से अधिक सेनेटरी नेपकिन उपलब्ध करवायें। किशोरों को नि:शुल्क स्वास्थ्य जानकारी देने के लिये टोल फ्री नं. 18002331250 हेल्पलाइन वर्ष 2014 में आरंभ की गई। वर्ष 2015 में सभी 51 जिला अस्पतालों में स्वास्थ संवाद केन्द्र और 11 जिले अलीराजपुर, बड़वानी, झाबुआ, पन्ना, छतरपुर, डिण्डोरी, मण्डला, सतना, सिंगरोली एवं शहडोल में किशोरों के लिये समुदाय आधारित सेवाएँ आरंभ की गई। किशोरों को स्वास्थ्य संबंधी जानकारी देने के लिये 'साथिया' नाम का एप बनाया गया।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का सफल क्रियान्वयन

प्रदेश में वर्ष 2013-14 से प्रारंभ राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में 136 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के जरिये साढ़े 25 लाख से अधिक मरीजों को स्वास्थ्य सेवाएँ दी गई है। मिशन को बेसलाइन कार्य पूर्ण करने के लिये वर्ष 2015-16 में राजस्थान सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर के उत्कृष्टता अवार्ड से नवाजा गया है।

सकल प्रजनन दर घटी

परिवार कल्याण के समेकित प्रयासों से सकल प्रजजन दर 3.3 (वर्ष 2005) से घटकर 2.8 (वर्ष 2016) हो गई है। इस वर्ष पुरूष नसबंदी और पीपीपीआईयूसीडी सेवा प्रदान करने में उल्लेखनीय सफलता के लिये भारत सरकार द्वारा राज्य को प्रथम राष्ट्रीय पुरस्कार भी दिया गया है।

दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में रोगियों को प्राथमिक उपचार उपलब्ध करवाने के लिये मई 2006 से आरंभ 84 दीनदयाल चलित अस्पताल के जरिये अब तक 198 लाख 71 हजार से अधिक मरीजों को स्वास्थ्य सेवाएँ दी जा चुकी हैं।

वर्ष 2009 से आरंभ संजीवनी 108 सेवा में 606 एम्बुलेंस के माध्यम से अब तक तकरीबन 35 लाख हितग्राहियों को लाभान्वित किया जा चुका है। नम्बर 108 डायल कर कोई भी व्यक्ति इस सेवा का उपयोग कर सकता है।

वर्ष 2006-07 से प्रसूता महिलाओं और बीमार बच्चों के लिये शुरू की गई जननी एक्सप्रेस सेवा से अब तक 62 लाख से अधिक जरूरतमंदों को लाभान्वित किया जा चुका है। इसमें सभी 313 विकासखण्डों में 974 वाहन लोक निजी भागीदारी से संचालित हैं।

ग्रामीण एवं सामुदायिक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं में सहयोग के लिये प्रदेश में लगभग 59 हजार आशाएँ एएनएम, एमपीडब्ल्यू और आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ काम कर रही है।

शिशु टीकाकरण दर में वृद्धि

प्रदेश में वर्ष 2004-05 में पूर्ण शिशु टीकाकरण दर 30.6 प्रतिशत थी, जो 2015-16 में बढ़कर 74 प्रतिशत हो गई। सशक्त प्रयासों के चलते वर्ष 2008 से पोलियों का कोई नया प्रकरण सामने नहीं आया। वर्ष 2010 से 2013 तक खसरा रक्षक अभियान में 9 माह से 10 वर्ष आयु समूहों के एक करोड़ 65 लाख बच्चों का टीकाकरण किया गया।

माता और नवजात शिशु टिटनेस बीमारी से मुक्ति

मध्यप्रदेश में आज माता एवं नवजात शिशु टिटनेस बीमारी से मुक्त हैं। भारत सरकार, विश्व स्वाथ्य संगठन और यूनीसेफ ने जून 2014 में मध्यप्रदेश में माता एवं नवजात शिशु को टिटनेस मुक्त सत्यापित किया। शिशु एवं बाल मृत्यु दर को कम करने के लिये अक्टूबर 2014 से मध्यप्रदेश पहला राज्य है जिसने पेन्टावेलेन्ट वैक्सीन का प्रयोग प्रारंभ किया। भारत सरकार द्वारा वर्ष 2013 में यूनीसेफ के माध्यम से कराये गये विश्लेषण में संभागीय कोल्ड चेन जबलपुर, ग्वालियर तथा मुरैना जिले के वैक्सीन एवं कोल्ड चेन के भण्डारण को गुड प्रेक्टिस के लिये सर्वश्रेष्ठ पाया गया। राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम की सघन मैदानी मॉनीटरिंग के लिये प्रतिमाह राज्य स्तर से अधिकारियों को भ्रमण पर भेजा जाता है और प्रत्येक सप्ताह उच्च-स्तरीय समीक्षा होती है।

मिशन इन्द्रधनुष पर अमल की सराहना

वर्ष 2015-16 में मिशन इन्द्रधुष में 38 जिलों में दो वर्ष तक की आयु के 17 लाख 21 हजार बच्चें और 5 लाख से अधिक गर्भवती महिलाओं का टीकाकरण किया गया। प्रधानमंत्री की उपस्थिति में स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा की गई समीक्षा में मध्यप्रदेश की उपलब्धियों की सराहना की गई। अगस्त 2016 तक करीब 8 लाख बच्चें आईवीपी वैक्सीन से लाभान्वित हुए।

डिप्थीरिया, काली-खाँसी एवं टिटनेस जैसी बीमारियों को नियंत्रित करने के लिये जुलाई-अगस्त 2016 प्रदेश में शालेय/आँगनवाड़ी टीकाकरण केचअप अभियान में साढ़े 24 लाख बच्चों का टीकाकरण किया गया। राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार यह इंजेक्टिबल अभियान सफल हुआ।

प्रदेश में किया गया नवाचार प्रयोग eVIN के माध्यम से प्रदेश के 12 फोल्ड चेन फोकल प्वांइट की ऑनलाइन स्टाक मेनेजमेंट एवं तापमान मानीटरिंग शुरू की गई। इसकी न केवल राष्ट्रीय स्तर की 'गुड प्रेक्टिसेस' कार्यशाला में प्रशंसा की गई, बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय ट्रेड फेयर में सर्वश्रेष्ठ नवाचार के लिये चयनित भी किया गया।

घरेलू एवं यौन हिंसा से पीड़ित महिलाओं को चिकित्सकीय, मनोवैज्ञानिक और कानूनी परामर्श देने के लिए देश के पहले 'गौरवी' सेन्टर की स्थापना जयप्रकाश चिकित्सालय में जून 2014 को की गई। सेंटर में अब तक 25 हजार से अधिक महिलाओं को फोन पर और साढ़े 4 हजार महिलाओं को सीधे सम्पर्क करने पर परामर्श और सहायता उपलब्ध करवाई गई है। केन्द्र का टोल फ्री नं. 1800 233 2244 है।

सरदार पटेल नि:शुल्क औषधि वितरण योजना

सरदार वल्लभ भाई पटेल नि:शुल्क औषधि वितरण योजना नवम्बर 2012 में राज्य की सभी चिकित्सा संस्थाओं में सभी रोगियों को न्यूनतम आवश्यक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए आरंभ की गई। दवा एवं सामग्री खरीदने के लिये मध्यप्रदेश पब्लिक हेल्थ सर्विसेज कार्पोरेशन की भी स्थापना हुई। जिला अस्पतालों में 300 प्रकार की, सिविल अस्पतालों में 131, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में 107, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में 71 और उप-स्वास्थ्य केन्द्र पर 24 प्रकार की औषधियाँ उपलब्ध करवायी जा रही हैं। मध्यप्रदेश देश का एकमात्र राज्य है जहाँ सभी दवाइयाँ WHO और GMP सर्टीफाइट निर्माताओं से खरीदी जा रही हैं।

शासकीय अस्पतालों पर भरोसा बढ़ा

प्रदेश में लोगों का शासकीय अस्पतालों पर भरोसा बढ़ा है। वर्ष 2012-13 में आईपीडी संख्या 26 लाख 98 हजार से बढ़कर वर्ष 2014-15 में 37 लाख 7 हजार और ओपीडी संख्या वर्ष 2012-13 में दो करोड़ 6 लाख से बढ़कर वर्ष 2014-15 में 4 करोड़ 29 लाख हो गई। शासकीय अस्पतालों में ओपीडी के समय और भर्ती रोगियों को जेनेरिक औषधियाँ नि:शुल्क दी जा रही हैं।

नि:शुल्क भोजन सुविधा

प्रदेश के सभी 48 जिला चिकित्सालय, 32 सिविल अस्पताल, 28 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, 16 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र और 5 उप-स्वास्थ्य केन्द्र में एक फरवरी 2013 से नि:शुल्क जाँच सुविधा लागू है। प्रतिदिन लगभग 50 हजार मरीजों की नि:शुल्क जॉच हो रही हैं।

प्रदेश के सभी शासकीय चिकित्सालयों में नि:शुल्क भोजन सुविधा भी है। प्रति मरीज 44 रुपये तक भोजन और जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम में प्रसूता महिलाओं को 80 रुपये तक का नि:शुल्क पौष्टिक भोजन दिया जा रहा है। प्रतिदिन लगभग 25 हजार रोगियों को नि:शुल्क भोजन का लाभ मिल रहा है। वर्ष 2015-16 में बेस्ट प्रेक्टिसेस एवं इनोवेशन की राष्ट्रीय कार्यशाला में आउट ऑफ पॉकेट एक्सपेन्डीचर के लिये प्रदेश को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में वर्ष 2005 से 2010 के दौरान उत्कृष्ट उपलब्धियों के लिये भी भारत सरकार ने वर्ष 2010-11 में प्रदेश को द्वितीय पुरस्कार दिया।

 
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