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जन-कल्याण के 11 वर्ष

खेती-किसानी में समृद्ध होता मध्यप्रदेश - गौरीशंकर बिसेन

भोपाल : सोमवार, नवम्बर 28, 2016, 18:55 IST
 

देश और प्रदेश की समृद्धि के लिये यह जरूरी है कि खेती-किसानी लाभप्रद हो। मध्यप्रदेश की एक बड़ी आबादी गाँवों में है और जो किसी न किसी रूप में कृषि कार्य से जुड़ी है। मैं खुद भी किसान हूँ और मुझे पता है कि आज से ग्यारह वर्ष पूर्व किसानों का दर्द क्या था। सिंचाई सुविधा नहीं थी, उत्पादन और लागत में बड़ा अंतर था। ऋण की ब्याज दर 13-14 प्रतिशत थी, बिजली नहीं थी और इस पर अगर प्राकृतिक आपदा आ गयी, तो किसान की तो कमर ही टूट जाती थी। खेती से जुड़े मजदूरों के सामने रोजी-रोटी की विकट समस्या हो जाती थी।

प्रदेश में वर्ष 2003 में सत्ता परिवर्तन से प्रदेश के खेती-किसानी में एक नया इतिहास रचने की शुरूआत हुई। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान जो खुद एक किसान हैं, ने ग्यारह वर्ष पूर्व 29 नवम्बर, 2005 में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता वाले एजेंडे में रखा। उनका प्रण था कि हर हालत में खेती को लाभ का व्यवसाय तो बनाना ही है, इसके लिये जो आवश्यक और अनुकूल वातावरण चाहिये था, वह भी निर्मित करना है, इसमें मुख्यमंत्री सफल भी रहे। उन्होंने कभी न मिलने वाली बिजली दस घंटे किसानों को मिले, यह सुनिश्चित किया। सिंचाई का रकबा साढ़े सात लाख हेक्टेयर ही था, वर्ष 2005 में, आज 36 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिचाई उपलब्ध है। किसानों को जीरो प्रतिशत ब्याज पर ऋण दिया गया। एक कदम आगे बढ़ते हुए यह निर्णय लिया गया एक लाख का ऋण लेने पर किसानों को 90 हजार ही लौटाने होंगे। यही नहीं प्राकृतिक आपदा आने पर किसानों को इतना मुआवजा मिले कि उसकी क्षतिपूर्ति हो सके, इस दिशा में ठोस कदम उठाये गये। मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के लक्ष्य 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने के संकल्प को साकार करने के लिये देश में सबसे पहले रोड-मेप तैयार किया।

खेती-किसानी पर आने वाली आपदा से पीड़ित किसानों को राहत देने में भी सरकार ने पिछले 11 साल में किसानों की हमदर्द बनने की जो मिसाल कायम की है, वह बेमिसाल है। वर्ष 2005-06 से वर्ष 2015-16 तक किसानों को 11 हजार 262 करोड़ 16 लाख 90 हजार रुपये की राशि वितरित की गयी। यह एक इतिहास है। इससे प्रभावितों को न केवल राहत मिली, बल्कि वे आपदा का भी सामना कर पाये।

कृषि क्षेत्र को उन्नत बनाने, उत्पादन बढ़ाने के जो प्रयास सरकार ने पिछले 11 वर्ष में किये, उसके परिणामों पर अगर नजर डालें, तो लगेगा कि यह प्रयास अगर पूर्व में किये जाते तो शायद आज हमारे प्रदेश के हालात और ज्यादा बेहतर होते।

कृषि विकास दर

मध्यप्रदेश में खेती-किसानी में सरकार द्वारा उठाये गये कदमों का सबसे अनुकूल प्रभाव कृषि विकास दर पर पड़ा। पिछले चार वर्ष में हमारी कृषि विकास दर 18 प्रतिशत प्रतिवर्ष है। यह दर प्राप्त करने वाला मध्यप्रदेश देश का एकमात्र राज्य है। यही नहीं प्रदेश का सकल घरेलू उत्पाद, जो 10.5 प्रतिशत है, में कृषि का योगदान 5 प्रतिशत है, यह भी देश में सर्वाधिक है।

कृषि उत्पादन में वृद्धि

वर्ष 2004-05 के उत्पादन पर हम नजर डालें, तो हमारा कुल कृषि उत्पादन 2.14 करोड़ मीट्रिक टन था। पिछले 11 वर्ष में हुए प्रयासों के बाद यह उत्पादन दोगुना होकर 4.23 करोड़ मीट्रिक टन हो गया। यह वृद्धि 97.66 प्रतिशत है।

खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि

खाद्यान्न उत्पादन में भी प्रदेश ने वर्ष 2004-05 की तुलना में एक लम्बी छलांग लगायी है। प्रदेश का कुल खाद्यान्न उत्पादन 11 वर्ष पूर्व 1.43 करोड़ मीट्रिक टन था। वर्ष 2015-16 में यह 3.46 करोड़ मीट्रिक टन है। प्रतिवर्ष 12 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी है और पिछले 11 वर्ष के मुकाबले यह वृद्धि 142 प्रतिशत है। यह एक अप्रत्याशित उपलब्धि है। सम्पूर्ण खाद्यान्न उत्पादन में मध्यप्रदेश अब तीसरे स्थान पर है, गेहूँ उत्पादन में दूसरे स्थान पर है और मक्का में पाँचवें स्थान पर है।

दलहन उत्पादन में वृद्धि

दलहन फसलों के उत्पादन में भी मध्यप्रदेश ने पिछले ग्यारह वर्ष में अपार वृद्धि की है। वर्ष 2004-05 में प्रदेश का दलहन फसलों का उत्पादन 33.51 लाख मीट्रिक टन था, जो वर्ष 2015-16 में बढ़कर 58.15 लाख मीट्रिक टन हो गया। यह वृद्धि 73.53 प्रतिशत है। आज हमारा प्रदेश देश के कुल दलहन उत्पादन का 28 प्रतिशत उत्पादन करता है।

तिलहन फसलों के उत्पादन में वृद्धि

तिलहन फसलों का उत्पादन वर्ष 2004-05 में कुल 39.08 लाख मीट्रिक टन था, जो आज बढ़कर 57.69 लाख मीट्रिक टन हो गया है। आज हमारे प्रदेश का तिलहन उत्पादन में पूरे देश में 30 प्रतिशत का योगदान है।

मुख्य फसलों की उत्पादकता में वृद्धि

पिछले ग्यारह वर्ष में गेहूँ, धान, मक्का और सरसों की औसत उत्पादकता में भी रिकार्ड बढ़ोत्तरी हुई है। वर्ष 2004-05 में 18.21 क्विंटल प्रति हेक्टेयर गेहूँ का उत्पादन था, जो आज बढ़कर 31.31 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गया है। धान की औसत पैदावार वर्ष 2004-05 में 8.18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर थी, जो बढ़कर 27.74 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गयी है, यह तीन गुना से अधिक है। मक्का की औसत पैदावार 14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर थी, जो बढ़कर 29.33 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गयी है। पिछले ग्यारह वर्ष में यह वृद्धि 109.50 प्रतिशत दर्ज की गयी है। सरसों की औसत पैदावार भी बढ़ी है। प्रति हेक्टेयर 9.54 क्विंटल सरसों अब 11.35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादित हो रही है।

कृषि क्षेत्र में वृद्धि

सरकार के प्रयासों से प्रदेश के कृषि क्षेत्र में भी पिछले ग्यारह वर्ष में वृद्धि हुई है। वर्ष 2004-05 में 1 करोड़ 92 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र था, जो अब बढ़कर 2 करोड़ 37 लाख हेक्टेयर हो गया है। कृषि के क्षेत्र में इस दौरान 45 लाख हेक्टेयर की बढ़ोत्तरी हुई है। वर्तमान में हमारी कृषि सघनता 153 प्रतिशत है।

 सिंचित क्षेत्रफल भी बढ़ा

नहरों, कुंओं, तालाबों से की जाने वाली सिंचाई के क्षेत्रफल में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। वर्ष 2004-05 में सिंचित रकबा 40 लाख 31 हजार हेक्टेयर था। वर्ष 2015-16 में यह बढ़कर 110 लाख हेक्टेयर होने का अनुमान है, जो दोगुना से अधिक है। प्रदेश में नहरों से सिंचित क्षेत्र 90 लाख 75 हजार हेक्टेयर था। अब यह बढ़कर 36 लाख हेक्टेयर तक पहुँच गया है।

जैविक खेती का विकास और प्रसार

जैविक खेती में भी प्रदेश में जो प्रयास हुए, उसके परिणाम स्वरूप आज हम पूरे देश का 40 प्रतिशत से अधिक जैविक खेती का उत्पादन करते हैं। आज हमारे प्रदेश में करीब दो लाख हेक्टेयर क्षेत्र में जैविक खेती की जा रही है। दुनिया का एक तिहाई जैविक कपास भी हमारे प्रदेश में पैदा होता है।

बीजों की पैदावार में अव्वल

प्रमाणीकृत बीजों की पैदावार में भी आज हमारा प्रदेश देश के अग्रणी राज्यों में शुमार हुआ है। वर्ष 2004-05 में मात्र 14 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज पैदा होता था, जो अब बढ़कर 40 लाख क्विंटल हो गया है।

कृषि यंत्रों का विस्तार

मध्यप्रदेश में खेती-किसानी को उन्नत बनाने के लिये सरकार के प्रयासों के बेहतर परिणाम मिले हैं। किसानों ने बड़े पैमाने पर कृषि यंत्रों को अपनाया है। यही कारण है कि हमारी खेती के उत्पादन में समृद्धता आयी है। आज हमारे प्रदेश में 87 हजार 143 ट्रेक्टर का पंजीयन हुआ है। इसके कारण हमारी फार्म पॉवर उपलब्धता जो 0.80 किलोवॉट प्रति हेक्टेयर थी, वह बढ़कर 1.85 किलोवॉट प्रति हेक्टेयर हो गयी है।

धान की रोपाई में एसआरआई पद्धति का महत्वपूर्ण योगदान है। प्रदेश में 40 हजार कोनोवीडर एवं 20 हजार मार्कर यंत्र किसानों को 90 प्रतिशत अनुदान पर उपलब्ध करवाया गया है। जिससे एसआरआई पद्धति से धान की रोपाई के रकबे में वृद्धि हुई है। रिज एण्ड फरो पद्धति से सोयाबीन की बोनी का व्यापक प्रचार-प्रसार किया गया है। एक लाख सीड ड्रिलों को रिज-फरो सीड ड्रिल के अटेचमेंट 90 प्रतिशत अनुदान पर कृषकों को उपलब्ध करवाये गये हैं। इस पद्धति को किसान व्यापक रूप से अपना रहे हैं, जिसके अच्छे परिणाम प्राप्त हुए हैं।

प्रदेश में वर्ष 2009-10 से लागू की गयी हलधर योजना में जो भी किसान अपनी खेती की गहरी जुताई करवाता है, उसे पचास प्रतिशत अधिकतम 2000 रुपये तक का अनुदान दिया जाता है। इस योजना से किसानों की खेत की मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार हुआ है और फसल की उत्पादकता में भी वृद्धि हुई है। इस योजना में अभी तक 3 लाख 65 हजार हेक्टेयर में गहरी जुताई की गयी है।

कृषि शक्ति योजना वर्ष 2011 से शुरू की गयी है। योजना में यंत्र-दूत ग्रामों का चयन कर उन्हें तकनीकी रूप से विकसित करने का कार्यक्रम लिया गया है। यंत्र-दूत में अभी तक कुल 600 ग्राम विकसित किये जा चुके हैं। चुने हुए ग्रामों के कृषकों को कृषि यंत्र को अपनाने के लिये प्रोत्साहित किया जाता है। कृषकों को प्रदर्शन, प्रशिक्षण, संगोष्ठी, भ्रमण आदि के जरिये यंत्रीकरण के लाभों के बारे में बताया जाकर वास्तविक रूप से अपनाये जाने के लिये तकनीकी सहयोग भी दिया जाता है। इस कार्यक्रम से चयनित ग्रामों में किसानों की उत्पादकता में काफी वृद्धि पायी गयी है एवं किसान आर्थिक रूप से सुदृढ़ हुए हैं।

कस्टम हायरिंग सेंटर

प्रदेश में निजी क्षेत्र में 1250 कस्टम हायरिंग सेंटर की स्थापना की गयी हैं। इस वर्ष 2016-17 में 612 नये कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित किये जा रहे हैं, जिसमें अनुदान की राशि अधिकतम 10 लाख रुपये है। इसी वर्ष 50 हाईटेक कस्टम हब की स्थापना भी होने जा रही है, जिनकी लागत 40 लाख से लेकर 2 करोड़ रुपये तक है।

बीमा योजना का सफल क्रियान्वयन

आपदा के बाद किसानों को राहत मिले, उनकी क्षति ग्रस्त फसलों का मुआवजा मिले, इस दिशा में भी सरकार के प्रयास महत्वपूर्ण रहे हैं। इसी के तहत वर्ष 1999-2000 रबी से लेकर वर्ष 2014-15 की रबी फसलों तक कुल 80 लाख 54 हजार किसान को 5452 करोड़ 87 लाख रुपये की बीमा दावा राशि बाँटी गयी है। वर्ष 2014-15 में लगभग 2 लाख किसान को 150 करोड़ 84 लाख की बीमा दावा राशि वितरित की गयी, वहीं खरीफ-2015 के लिये 20 लाख 46 हजार किसान को 4416 करोड़ 89 लाख की दावा राशि का वितरण कार्य शुरू किया गया है। यह राशि देश में अब तक सबसे अधिक बाँटी जाने वाली दावा राशि है।

मृदा स्वास्थ्य-कार्ड

कृषि के लिये मिट्टी उपजाऊ बने, इसका निरंतर परीक्षण हो, इसके लिये मृदा स्वास्थ्य-कार्ड बनाये जा रहे हैं। सभी 313 विकासखण्ड में मृदा परीक्षण प्रयोगशाला तथा सभी 10 संभागीय मुख्यालय पर बीज और उर्वरक परीक्षण प्रयोगशालाएँ स्थापित की जा रही हैं। अभी तक प्रदेश में 45 लाख से अधिक किसान के स्वाइल हेल्थ-कार्ड बनाये जा चुके हैं।

तीसरी फसल के क्षेत्र का विस्तार

किसानों की आय में वृद्धि हो, इसके लिये सरकार ने तीसरी फसल लेने के लिये किसानों को प्रोत्साहित किया। पिछले वित्त वर्ष में करीब तीन लाख हेक्टेयर क्षेत्र में तीसरी फसल ली गयी है।

मध्यप्रदेश ने कृषि क्षेत्र में जो उपलब्धि हासिल की है उसे राष्ट्रीय स्वीकार्यता भी मिली है। प्रदेश को मिले सम्मान से जहाँ प्रदेश का गौरव बढ़ा है वहीं किसानों का हौसला भी बढ़ा है। देश में मध्यप्रदेश अकेला है जिसे लगातार चार बार कृषि कर्मण अवार्ड मिला है। वर्ष 2011-12 और 2012-13 में कुल खाद्यान्न उत्पादन में प्रथम, वर्ष 2013-14 में कुल गेहूँ उत्पादन में प्रथम और वर्ष 2014-15 में कुल खाद्यान्न उत्पादन में मध्यप्रदेश को कृषि कर्मण अवार्ड मिला है।

 
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