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जन-कल्याण के 11 वर्ष

धरती का श्रंगार ही नहीं रोजगार का साधन भी हैं मध्य प्रदेश के वन

भोपाल : सोमवार, नवम्बर 28, 2016, 16:29 IST
 

मध्यप्रदेश की धरती का श्रंगार करने वाले वन उनके आस-पास रहने वाले गाँव वालों के आर्थिक एवं सामाजिक विकास का भी बहुत बड़ा साधन हैं। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिये प्रदेश के वनावरण को संरक्षित रखते हुए वन विभाग इन्हें रोजगार सम्पन्न बनाने के लिये विभिन्न योजनाएँ संचालित कर रहा है। वन संरक्षण, पुन: उत्पादन, पुन: स्थापना और पौधरोपण आदि कार्यों पर पिछले 11 वर्ष में 2672 करोड़ से ज्यादा राशि व्यय की गयी। अकेले पिछले वित्त वर्ष में 2 करोड़ 90 लाख मानव दिवस का रोजगार वनों के जरिये उपलब्ध करवाया गया। रोजगार के अलावा वन से फल, फूल, जड़, औषधि, लकड़ी, रेशम, ईंधन, उर्वरक आदि अनेक उत्पाद प्राप्त होते हैं। वनों के संधारण से अप्रत्यक्ष रूप से ऑक्सीजन मिलती है। जल एवं मिट्टी संरक्षण होता है, जिसका खेती, जनता और पशुओं को सीधा लाभ मिलता है।

बाँस और काष्ठ का लाभांश वितरण

प्रदेश में बाँस कटाई में लगे श्रमिकों को बाँस विदोहन से प्राप्त शुद्ध लाभ शत-प्रतिशत बाँटा जाता है। सितम्बर, 2016 से काष्ठ लाभांश भी 10 से बढ़ाकर 20 प्रतिशत कर दिया गया है। पिछले ग्यारह साल में काष्ठ का करीब 212 करोड़ और बाँस का 66 करोड़ से ज्यादा का लाभांश दिया गया।

निजी भूमि पर वृक्ष लगाने को प्रोत्साहन देने के लिये वर्ष 2013-14 से प्रारंभ योजना में खेत की मेढ़ अथवा कृषि फसल के बीच में कम से कम सौ पौधे लगाने पर पहले एवं दूसरे वर्ष में तीन रुपये प्रति पौधा और तीसरे वर्ष में चार रुपये प्रति पौधा दिया जाता है। योजना में वनदूत के जरिये पौध-रोपण होने पर उसे पहले वर्ष दो रुपये और तीसरे वर्ष एक रुपये प्रति पौधा दिया जाता है। योजना में अब तक 3,338 भूमि-स्वामियों को अनुदान और 290 वनदूत को करीब 23 लाख रुपये का अनुदान मंजूर किया जा चुका है। प्रदेश की नई कृषि वानिकी नीति बनायी जा रही है, जिसमें प्रोत्साहन राशि बढ़ाकर 25 रुपये और वनदूतों की राशि बढ़ाकर 7 रुपये की जाना प्रस्तावित है।

दीनदयाल वनांचल सेवा

मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा 20 अक्टूबर, 2016 से शुरू इस योजना में वनों की सुरक्षा के साथ-साथ वनवासी कल्याण एवं सेवा की अभिनव पहल की गयी है। इसमें सुदूर वनांचलों में पदस्थ वन कर्मचारी, विशेषकर महिला वन-रक्षक द्वारा आँगनवाड़ी, स्वास्थ्य केन्द्र, स्कूल आदि में चल रही लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, महिला-बाल विकास, स्कूल शिक्षा एवं आदिम-जाति कल्याण विभाग के कार्यक्रमों में सहयोग कर वनवासियों के स्वास्थ्य एवं शिक्षा स्तर में सुधार लाया जायेगा। योजना के जरिये वन-रक्षक मातृ-शिशु मृत्यु दर कम करने, प्रजनन दर में सुधार, नवजात शिशुओं एवं बच्चों का टीकाकरण, मलेरिया उन्मूलन, महामारियों की सूचना स्वास्थ्य केन्द्र को उपलब्ध करवाना, ओआरएस, क्लोरीन टेबलेट्स, ब्लीचिंग पावडर के भण्डारण एवं उपयोग, कुपोषण दूर करने, स्कूलों में आवश्यकता पड़ने पर अध्यापन कार्य और शाला-त्यागी बच्चों में कमी लाने आदि में सहयोग कर रहे हैं।

वन्य-प्राणियों द्वारा जन-पशु-हानि पर मुआवजा

राज्य शासन ने वन्य-प्राणियों द्वारा जन-हानि होने पर डेढ़ लाख रुपये के मुआवजे को बढ़ाकर चार लाख कर दिया है। इसी तरह स्थायी रूप से अपंगता की स्थिति में एक लाख रुपये को बढ़ाकर दो लाख रुपये, अपंगता/जन-घायल होने की स्थिति में इलाज पर हुए वास्तविक व्यय के अतिरिक्त अस्पताल में भर्ती होने की अवधि में अतिरिक्त रूप से 500 रुपये प्रतिदिन देने का भी प्रावधान है। ग्यारह वर्ष पहले वन्य-प्राणियों द्वारा फसल हानि किये जाने पर कोई क्षतिपूर्ति नहीं दी जाती थी। वर्ष 2008-09 से इसका भी प्रावधान किया गया है। इसके बाद से वर्ष 2016 के मध्य तक 366 हितग्राही को जन-हानि के लिये 4 करोड़ 46 लाख, जन-घायल 15 हजार 251 हितग्राही को 5 करोड़ 46 लाख, पशु-हानि के 29 हजार 717 हितग्राही को 16 करोड़ 62 लाख और फसल हानि के 3707 हितग्राही को 2 करोड़ 49 लाख रुपये की राशि मुआवजे के रूप में वितरित की गयी।

विस्थापित ग्रामीणों को 1022 करोड़ का मुआवजा

संरक्षित क्षेत्रों में रहने वाले ग्रामीणों को विकास की मुख्य धारा से जोड़ने के लिये वर्ष 2009 से वर्ष 2016 की अवधि में 4105 ग्रामीण को 1022 करोड़ से ज्यादा की राशि उपलब्ध करवायी गयी।

तेन्दूपत्ता संग्राहकों को लगभग 837 करोड़ का बोनस

प्रदेश में राष्ट्रीयकृत लघु वनोपज के व्यापार से होने वाली शुद्ध आय पूरी तरह से तेन्दूपत्ता संग्राहकों पर ही व्यय की जाती है। शुद्ध आय का 70 प्रतिशत भाग तेन्दूपत्ता संग्राहकों को प्रोत्साहन पारिश्रमिक के रूप में, 15 प्रतिशत वन विभाग की देखरेख में वन विकास एवं प्रशिक्षण आदि पर और शेष 15 प्रतिशत संग्राहकों के गाँव की मूलभूत सुविधाओं एवं कल्याणकारी योजनाओं पर अमल में व्यय किया जाता है। वर्ष 2004 से संग्राहकों की अधिक आय के लिये तेन्दूपत्ता की अग्रिम निवर्तन पद्धति शुरू की गयी।

संग्रहण दर में निरंतर वृद्धि

प्रदेश में वर्ष 2004 में तेन्दूपत्ता संग्रहण दर 400 रुपये प्रति मानक बोरा थी, जो वर्ष 2010 में 650 रुपये, वर्ष 2012 में बढ़ाकर 750 रुपये और वर्ष 2016 में बढ़ाकर 950 रुपये की गयी। इस वर्ष संग्राहकों को 1250 रुपये प्रति मानक बोरा की दर से 232 करोड़ रुपये के पारिश्रमिक का भुगतान किया गया है।

संग्राहकों के लिये बीमा योजना

सामाजिक सुरक्षा समूह बीमा योजना में तेन्दूपत्ता संग्राहकों की सामान्य मृत्यु होने की स्थिति में परिजनों को 5000 रुपये, दुर्घटना मृत्यु में 26 हजार 500, दुर्घटना में आंशिक विकलांगता पर 12 हजार 500 और पूर्ण विकलांग होने पर 25 हजार रुपये की राशि दी जाती है। राज्य वनोपज संघ 18 से 60 वर्ष की आयु वाले सभी तेन्दूपत्ता संग्राहकों का बीमा करवाता है। पिछले 10 साल में 73 हजार 981 संग्राहक को 36 करोड़ 32 लाख की राशि वितरित की गयी है।

एकलव्य शिक्षा विकास योजना

तेन्दूपत्ता संग्राहकों के बच्चों की शिक्षा के लिये नवम्बर, 2010 से प्रारंभ इस योजना में अब तक 4129 विद्यार्थी को 250 लाख रुपये वितरित किये जा चुके हैं। तेन्दूपत्ता संग्राहकों, फड़ मुंशी एवं वनोपज समिति के प्रबंधकों के बच्चों को अच्छी शिक्षा उपलब्ध करवाने के लिये उत्कृष्ट शिक्षण संस्थानों में प्रवेश एवं शिक्षा का व्यय वनोपज संघ द्वारा वहन किया जाता है।

ईको-पर्यटन से सतत आजीविका

ईको-पर्यटन बोर्ड पर्यटन-स्थलों के निकट रहने वाले ग्रामीण युवकों को गाइड, बोट-मेन, केम्प प्रबंधन, साहसिक क्रीड़ा आदि का उत्कृष्ट संस्थानों में प्रशिक्षण देकर उन्हें उन्हीं के क्षेत्र में सतत रोजगार दिला रहा है। बोर्ड अब तक 360 ग्रामीण युवकों को गाइड का, 45 को नाविक, 102 को केम्प प्रबंधन और 74 को वन विश्राम-गृह के चौकीदार का प्रशिक्षण देकर रोजगार दिलवा चुका है।

लोक-वानिकी

निजी वानिकी को प्रोत्साहन देते हुए उसे लाभदायक व्यवसाय बनाने के लिये लागू की गयी लोक-वानिकी योजना से अब तक 10 हेक्टेयर से कम क्षेत्र की 2846 और 10 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रों की 31 प्रबंध योजनाएँ स्वीकृत हुई हैं।

निस्तार के लिये रियायती दर पर लकड़ी

ग्रामीणों को घरेलू उपयोग के लिये बाँस, छोटी इमारती लकड़ी, बल्ली, हल-बक्खर बनाने की और जलाऊ लकड़ी रियायती दर पर उपलब्ध करवाने के लिये प्रदेश में 1814 निस्तार डिपो स्थापित हैं। इसके अलावा सिरबोझ द्वारा गिरी-पड़ी मरी-सूखी जलाऊ लकड़ी लाने की भी सुविधा दी जा रही है।

प्रदेश में 24 हजार 58 बँसोड़ परिवार पंजीकृत हैं, जिन्हें रॉयल्टी मुक्त दर पर बाँस उपलब्ध करवाया जाता है। बाँस का सामान बनाकर जीवन चलाने वाले बैगा आदिवासियों को भी निस्तार दरों पर बाँस उपलब्ध करवाया जाता है। हर वर्ष प्रदेश में लगभग 60 लाख बाँस 24 हजार बँसोड़ परिवार को, एक लाख 90 हजार बल्ली 19 हजार परिवार को और 90 हजार जलाऊ चट्टे 45 हजार हितग्राही परिवार को निस्तार के लिये दिये जाते हैं। ग्रामीणों को हर साल निस्तार नीति में 15 करोड़ रुपये की रियायत दी जाती है।

 
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