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जन-कल्याण के 11 वर्ष

रंग ला रही है वनवासी कल्याण की दीनदयाल वनांचल सेवा

भोपाल : गुरूवार, दिसम्बर 22, 2016, 18:07 IST
 

मध्यप्रदेश में अब सुदूर वनांचलों में पदस्थ वन कर्मचारी विशेषकर महिला वन-रक्षक आँगनवाड़ी, स्वास्थ्य केन्द्र, स्कूल आदि में संचालित स्वास्थ्य, महिला-बाल विकास, स्कूल शिक्षा और आदिम-जाति कल्याण विभाग के कार्यक्रमों में सहयोग कर वनवासियों के सर्वांगीण विकास में सहभागी बन रहे हैं। यह बड़ा काम मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह की प्रेरणा से लागू की गई 'दीनदयाल वनांचल सेवा'' के माध्यम से हो रहा है। सेवा की शुरूआत 20 अक्टूबर 2016 से हुई है। धीरे-धीरे यह सेवा वनवासी कल्याण के क्षेत्र में रंग ला रही है।

लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग

महिला वन-रक्षकों को आशा कार्यकर्ता के समान प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षित महिला वनकर्मी गर्भवती महिलाओं को चिन्हित कर उनकी सही देखरेख, स्वास्थ्य परीक्षण और जरूरत पड़ने पर स्वास्थ्य संस्थाओं तक पहुँचाने में मदद कर रही है। सुदूर वन अंचलों में लगने वाले स्वास्थ्य शिविरों में भी वन-रक्षक सहयोग कर रहे हैं। स्वास्थ्य शिविरों में वनवासी महिलाओं की स्वास्थ्य हिस्ट्री तैयार की जा रही है। इस हिस्ट्री में हीमोग्लोबिन, यूरीन, ब्लड ग्रुप, वजन, ऊँचाई के साथ उनके स्वास्थ्य की पूर्ण जानकारी दर्ज होगी। महिला वन-रक्षक की सहायता से स्वास्थ्य शिविर में संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने और हाई रिस्क प्रेगनेंसी प्रकरणों को चिन्हित कर बड़े अस्पताल में रिफर किये जाने का काम भी हो रहा है।

वन-रक्षक, नवजात शिशु एवं शिशुओं के परीक्षण के लिये महिलाओं को प्रेरित करेंगे। साथ ही जरूरत होने पर उन्हें स्वास्थ्य संस्थाओं तक भी पहुँचायेंगे। वनकर्मी, स्वास्थ्य कार्यकर्ता को सौ फीसदी टीकाकरण लक्ष्य हासिल करने में भी मदद करेंगे। होशंगाबाद एवं बैतूल जिले में प्रयोग के तौर पर हुए टीकाकरण कार्यक्रम में सौ फीसदी लक्ष्य की ओर ले जाने में वन-कर्मियों का बड़ा योगदान रहा है।

वन क्षेत्रों के आसपास के गाँव में मलेरिया रोग बहुतायत से होता है। इसकी रोकथाम के लिये पुरुष एवं महिला वन-रक्षकों को मलेरिया कार्यकर्ताओं की तरह मलेरिया-किट उपयोग के लिये जरूरी प्रशिक्षण दिया जा रहा है। दूर के वन अंचलों में रहने वाले वनवासी इलाज के बजाय झाड़-फूँक में विश्वास रखते हैं। वन-रक्षक, वनवासियों को इस संबंध में उचित उपचार की समझाइश दे रहे हैं और जरूरत होने पर वाहन उपलब्ध करवाकर अस्पताल तक पहुँचाने में मदद कर रहे हैं। प्रयोग के तौर पर हरदा जिले के राजा बरारी में वनकर्मियों के सहयोग से मलेरिया नियंत्रण पर अच्छा काम किया गया है।

वनकर्मियों को वन ग्रामों में निमोनिया, डायरिया, मीजल्स, टी.बी. आदि के प्रकोप की सूचना समीप के स्वास्थ्य केन्द्रों को देने को कहा गया है। इसके अलावा वे ओआरएस, क्लोरीन टेबलेट्स, ब्लीचिंग पावडर आदि को सुरक्षित स्थान पर रखने और उसके उपयोग में भी स्वास्थ्य विभाग का सहयोग करेंगे।

महिला-बाल विकास

दीनदयाल वनांचल सेवा के अंतर्गत महिला वन-रक्षक को आँगनवाड़ी कार्यकर्ता का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इससे वे आँगनवाड़ी कार्यकर्ता की अनुपस्थिति में टीकाकरण और सुदूर वनांचलों में बच्चों को पौष्टिक आहार का भली-भाँति वितरण करवाने में सहयोग कर सकें। जहाँ आँगनवाड़ी केन्द्र नहीं हैं, वहाँ आँगनवाड़ी भवनों का निर्माण किया जाकर उनके संचालन में भी वन विभाग सहयोग कर रहा है। सुदूर वनांचलों की 14 से 18 वर्ष आयु की किशोरी बालिकाओं को स्वास्थ्य और पोषण के प्रति जागरूक करने के लिये महिला वन परिक्षेत्राधिकारियों को भी प्रशिक्षित करने की योजना है।

स्कूल शिक्षा विभाग

इस सेवा में सुदूर वनांचलों की शालाओं में शिक्षकों की अनुपलब्धता होने पर वनकर्मी द्वारा मानसेवी अतिथि शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएँ देने का प्रावधान किया गया है। वनकर्मी, शाला-त्यागी बच्चों, विशेषकर लड़कियों को शालाओं में प्रवेश के लिये प्रेरित करेंगे। साथ ही छात्रवृत्ति आदि शिक्षा योजनाओं से ग्रामीणों को अवगत करवाने के साथ शालाओं और गाँव में स्वच्छता और हरियाली के प्रति भी जागरूक कर रहे हैं।

आदिम-जाति कल्याण विभाग

वनरक्षक, शिक्षक की अनुपलब्धता पर वनकर्मी आदिम-जाति कल्याण विभाग द्वारा संचालित शालाओं में मानसेवी अतिथि के रूप में कुछ दिन अपनी सेवाएँ दे सकेंगे। इसके अलावा आदिवासी बालक-बालिकाओं को शिक्षा, स्वच्छता, हरियाली के प्रति जागरूक करेंगे। वन विभाग पिछले कई दशक से वनवासी कल्याण की विभिन्न गतिविधियों में सहयोग करता रहा है। दीनदयाल वनांचल सेवा के जरिये वनवासी यदि स्वास्थ्य एवं विकास के प्रति जागरूक होंगे तो उनके कार्य, सामाजिक-आर्थिक क्षमता में वृद्धि के साथ वानिकी कार्यों को भी और बेहतर ढंग से किया जा सकेगा।

मध्यप्रदेश में करीब 94 हजार वर्ग किलोमीटर वन हैं। वनों के प्रबंधन एवं सुरक्षा में स्थानीय समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिये शासन द्वारा संयुक्त वन प्रबंधन समितियाँ गठित हैं। वन क्षेत्र से पाँच किलोमीटर दूरी तक के गाँवों में 15 हजार से ज्यादा वन समिति कार्यरत हैं। वनों की सुरक्षा एवं विकास में सहयोग करने की दृष्टि से स्थानीय लोगों की यह समितियाँ दूर-दराज के वन क्षेत्रों में हैं, जहाँ शासन के अन्य विभागों की पहुँच कम है। इन समितियों के माध्यम से ग्रामीणों से वन विभाग के कर्मचारियों का सतत सम्पर्क बना रहता है।


सुनीता दुबे
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