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पश्चिमी मध्‍यप्रदेश में उभरता नया टूरिस्‍ट सर्किट

हनुवंतिया, सेलानी, महेश्‍वर से माण्‍डू और फिर उज्‍जैन

भोपाल : शुक्रवार, जुलाई 7, 2017, 16:14 IST
 

सैलानियों की सहूलियत के लिये मध्‍यप्रदेश के पश्चिमी भाग में एक उपयुक्‍त टूरिस्‍ट सर्किट उभरकर सामने आया है। हनुवंतिया वॉटर स्‍पोर्टस कॉम्‍प्‍लेक्‍स से तकरीबन 85 किलोमीटर पहले सेलानी रिसॉर्ट विकसित होने से यह संभावना जल्‍द साकार हुई है। यह जगह प्रसिद्ध ज्‍योतिर्लिंग ओंकारेश्‍वर के नजदीक ही स्थित है। सेलानी टापू पर रिसॉर्ट बन जाने से अब पर्यटक हनुवंतिया से सेलानी आकर ओंकारेश्‍वर, महेश्‍वर और मांडव तक के इस टूरिस्‍ट सर्किट की यात्रा का आनंद ले सकेंगे। इसके साथ ही वे इंदौर और प्रसिद्ध तीर्थ-स्‍थली उज्‍जैन को इसमें शामिल कर धार्मिक पर्यटन का भी लाभ ले सकते हैं। इस सर्किट पर पर्यटक बारहों महीने भ्रमण पर सकते हैं लेकिन श्रावण मास में यहाँ आने पर वे भगवान महाकालेश्‍वर की सवारी के दर्शन का लाभ लेकर ‘एक पंथ दोउ काज’ की उक्ति को चरितार्थ कर सकेंगे।

भूतभावन महाकाल की सवारी उज्‍जैन में इस बार श्रावण मास में 10 जुलाई, 2017 को प्रथम और 21 अगस्‍त, 2017 को सातवीं सवारी निकलेगी।

पर्यटक इस सर्किट पर जहाँ द्वादश ज्‍योतिर्लिंग में से दो मुख्‍य-उज्‍जैन और ओंकारेश्‍वर के दर्शन कर सकेंगे वहीं हनुवंतिया के साथ सेलानी टापू पर पानी में सैर, वॉटर स्‍पोर्टस और रोमांचक गतिविधियों का लुत्‍फ उठा सकेंगे। श्रावण मास में महाकालेश्‍वर और ओंकारेश्‍वर के दर्शन और जल चढ़ाना अत्‍यंत पुण्‍यदायी माना जाता है। उधर बारिश के मौसम में माण्‍डू की हरीतिमा और प्राकृतिक सौन्‍दर्य देखने लायक होता है। रानी रूपमती और बाज-बहादुर की प्रणय-गाथा की अनुगूँज आज भी यहाँ के इतिहास से जुड़ी है। रि‍मझिम बारिश के दौर में जब बादल उमड़-घुमड़कर प्राचीन महलों के बहुत करीब से गुजरते हैं तब वहाँ मौजूद पर्यटकों का मन-मयूर भी जैसे नाच उठता है। माण्‍डू के प्राकृतिक सौन्‍दर्य का जितना भी वर्णन किया जाये कम है लेकिन निश्चित ही बारिश में यहाँ की सुंदरता को चार चाँद लग जाते हैं।

इस टूरिस्‍ट सर्किट पर प्राचीन माहिष्‍मती नगरी महेश्‍वर एक ऐतिहासिक पर्यटन स्‍थल है जहाँ माँ नर्मदा शांत स्‍वरूप में प्रवाहित हैं। महेश्‍वर ऐतिहासिक महत्‍व के साथ मंदिरों की नगरी भी है। होलकर राजवंश के इतिहास को समेटे हुए देवी अहिल्‍या बाई होलकर के पुण्‍य-प्रताप से सराबोर है महेश्‍वर। इतने बरसों बाद भी देवी अहिल्‍या की स्‍मृति में हरेक सोमवार को यहाँ पालकी निकाली जाती है जो राज-राजेश्‍वर मंदिर तक जाती है। इस मंदिर में आज भी 11 अखंड नंदा दीपक प्रज्‍जवलित हैं। महेश्‍वर के ऐतिहासिक किले और राजवाड़ा परिसर में देवी अहिल्‍या की प्रतिमा, गादी और उसके निकट पालकी तथा होलकर राज्‍य चिन्‍ह बड़े जतन से संरक्षित और सुरक्षित रखे गये हैं। देव पूजा घर भी है। यहाँ सोने की पालकी में लड्डू गोपाल विराजित हैं। देवी अहिल्‍या बाई होलकर चेरिटी ट्रस्‍ट भी संचालित है। तत्‍कालीन समय में प्रयुक्‍त शस्‍त्र भी प्रदर्शित हैं। होलकर राजवंश के शासकों की सूची और उनके फोटो भी यहाँ लगे हैं। देवी अहिल्‍या ने यहाँ राजवाड़ा का निर्माण करवाकर 1766 में महेश्‍वर को राजधानी घोषित किया था। उनके पति खांडेराव होलकर के युद्ध में वीरगति को प्राप्‍त हो जाने से अहिल्‍या बाई को राज-काज संभालना पड़ा। उन्‍होंने वर्ष 1767 से 1795 तक लगभग तीस वर्ष तक शासन किया। रहन-सहन में सरल और सादगी पसंद देवी अहिल्‍या शिव भक्‍त और उपासक भी थीं। राजवाड़ा में अंकित ‘महल नहीं छोटा सा घर है’ से यह तथ्‍य स्‍वत: रेखांकित होता है। उनकी स्‍मृति में यहाँ वट वृक्ष भी लगा है। अहिल्‍या के राज-काज में ‘सुशासन’ पर उनके अपने विचार और उस पर अमल आज भी प्रेरणा के रूप में यहाँ उत्‍कीर्ण हैं। देवी अहिल्‍या ने केवल महेश्‍वर को सँवारा, मंदिर बनवाए बल्कि काशी विश्‍वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार भी करवाया था।

‘‘ईश्‍वर ने मुझ पर जो उत्‍तरदायित्‍व रखा है, उसे मुझे निभाना है।

मेरा काम प्रजा को सुखी रखना है।

मैं अपने प्रत्‍येक काम के लिये जिम्‍मेदार हूँ।

सामर्थ्‍य सत्‍ता के बल पर मैं यहाँ जो भी कर रही हूँ उसका ईश्‍वर के यहाँ मुझे जवाब देना है।

मेरा यह सब कुछ नहीं है, जिसका है उसी के पास भेजती हूँ।

जो कुछ लेती हूँ, वह मेरे ऊपर ऋण (कर्ज) है।

जाने उसे कैसे चुका पाउँगी।

{महेश्‍वर स्थित राजवाड़ा में अहिल्‍या देवी होलकर की कचहरी (जहाँ न्‍याय व्‍यवस्‍था संचालित थी) के बाहर बोर्ड पर अंकित}

मशहूर महेश्‍वरी साड़ियाँ

जिक्र महेश्‍वर का हो और यहाँ की मशहूर साड़ियों की चर्चा हो, यह संभव ही नहीं है। देवी अहिल्‍या ने अपने शासनकाल में हैदराबाद/कलकत्‍ता से बुनकरों को यहाँ बुलवाकर जिस काम की शुरूआत की थी वह आज महेश्‍वरी साड़ी के ‘ब्राण्‍ड नेम’ से देश-विदेश तक जानी-पहचानी और पहनी जाती है। अनेक परिवारों के रोजगार का जरिया भी यही साड़ी उद्योग है। बुनकरों की रेवा सोसाइटी से तकरीबन साढ़े तीन सौ बुनकर जुड़े हुए हैं। होलकर वंश के रिचर्ड होलकर इस संस्‍था से जुड़े हैं। महेश्‍वर स्थित मोमिनपुरा बुनकरों के लिये जाना जाता है लेकिन इसके अलावा अन्‍य लोग भी साड़ी उद्योग से जुड़कर आजीविका कमा रहे हैं। महेश्‍वर के मुख्‍य बाजार के साथ छोटे सँकरे रास्‍तों-चौराहों पर भी महेश्‍वरी साडि़याँ बिक्री के लिये उपलब्‍ध हैं। महेश्‍वर का ब्‍लॉक प्रिन्‍ट भी उतना ही मशहूर है। अब इस परम्‍परागत साड़ी उद्योग के आधुनिकीकरण की भी चर्चा सुनाई देती है।

महेश्‍वर में नर्मदा का चौड़ा पाट भले ही शांत स्‍वरूप में है किंतु सहस्‍त्रधारा नाम के स्‍थान पर नर्मदा का जल-प्रपात है। चट्टानों से होकर पानी का नीचे की ओर गिरना रोमांचित करता है। यह मनोरम स्‍थल महेश्‍वर से मात्र 10 किलोमीटर की दूरी पर है।

महेश्‍वर वाकई मंदिरों की नगरी है। नर्मदा के पवित्र तट पर स्थित काशी विश्‍वनाथ मंदिर के साथ श्री राज-राजेश्‍वर का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है जहाँ बरसों से 11 अखण्‍ड नंदा दीपक प्रज्‍जवलित हैं। शिव कोटि मंदिर भी हैं। सुदामा कुटी, राम-जानकी मंदिर, पंढरनाथ आश्रम, जय श्रीराम कुटी, श्रीराम कुटी और संकट मोचन हनुमान मंदिर में मौनी बाबा का आश्रम है। प्रदेश के साथ ही दूर-दूर से श्रद्धालु यहाँ पहुँचते हैं। इस आश्रम पर वर्ष भर अन्‍न क्षेत्र संचालित रहता है। नर्मदा परिक्रमा यात्रियों एवं श्रद्धालुओं के लिये ठहरने की समुचित व्‍यवस्‍था भी है। इसके लिये आस-पास के गाँवों के लोग यथा-सामर्थ्‍य सहयोग देते हैं। मौनी बाबा आश्रम की एक अन्‍य विशेषता यहाँ प्रतिदिन प्रात: 6 बजे से रात 12 बजे तक अनवरत चलने वाला ‘सीताराम धुन’ का अखण्‍ड पाठ है। यह पिछले 6 साल से निरंतर चल रहा है। अपनी आयु के सौ साल पूरे कर चुके मौनी बाबा के आश्रम में हमारी भेंट बाबा से तो नहीं, पर हनुमान दास से हुई। उन्‍होंने बताया कि महेश्‍वर नर्मदा परिक्रमा मार्ग में शामिल है इसीलिये नर्मदा परिक्रमा यात्रियों की सुविधा के लिये यहाँ अन्‍न क्षेत्र चलाया जा रहा है। महेश्‍वर में अनेक संत-महात्‍मा हैं, जो भाव-भक्ति में लीन रहते हैं।

जिसका नहीं है कोई सानी वही है सेलानी

मध्यप्रदेश पर्यटन द्वारा राज्‍य में वॉटर टूरिज्‍म को बढ़ावा देने की दिशा में निरंतर सार्थक प्रयास किये जा रहे हैं। इस कड़ी में प्रसिद्ध पर्यटन एवं धार्मिक स्थल ओंकारेश्वर के नजदीक सेलानी नामक स्थल पर एक और जल पर्यटन-स्‍थल ने पिछले 24 मई को आकार ले लिया है। खण्‍डवा जिले के हनुवंतिया में विकसित वॉटर टूरिज्‍म कॉम्‍प्‍लेक्‍स की तर्ज पर निर्मित इस जल-पर्यटन केन्‍द्र पर बोट क्‍लब सहित क्रूज, जलपरी, मोटर बोट और वॉटर स्‍पोर्टस आदि की सुविधाएँ उपलब्‍ध करवायी जायेगी। इस प्रकार एक निर्जन एवं पहुँच से दूर इस स्‍थान पर पर्यटकों को ठहरने एवं जल-क्रीड़ा गतिविधियों का लुत्‍फ उठाने सहित कोलाहल से दूर एक शांत और निर्मल नीर से भरे मनोरम स्‍थल पर अपना कुछ वक्‍त बिताने की सहूलियत मिलने लगी है।

महेश्‍वर और फिल्‍में

महेश्‍वर का फिल्‍मों से भी पुराना नाता है। बहुत पहले ‘तुलसी’ फिल्‍म का फिल्‍मांकन यहाँ हुआ था। फिर ‘अशोका दि ग्रेट’, ‘यमला पगला दीवाना’, ‘तेवर’, ‘बाजीराव मस्‍तानी’, ‘मोहन जो दारो’ फिल्‍म अभिनेत्री हेमा मालिनी अभिनीत मराठी फिल्‍म की शूटिंग भी यहाँ हुई। फिल्‍म अभिनेता अक्षय कुमार की हालिया फिल्‍म पेडमेन की शूटिंग भी महेश्‍वर में हुई है।

पर्यटन विकास निगम द्वारा लगभग तीन एकड़ क्षेत्र पर यह पर्यटन केन्द्र विकसित करने की योजना तैयार कर उसे मूर्त स्वरूप दिया गया है। सेलानी लगभग चहुँओर पानी से घिरे एक टापू के रूप में स्थित है। नजदीक ही ओंकारेश्वर बाँध परियोजना है। परियोजना के समीप होने से इस स्थान पर भरे जल का स्तर वर्षा काल में भी तो बढ़ता है और ही उसके बाद कभी कम होता है। यह टापू चारों ओर से ढलाननुमा बसा हुआ है और यहाँ पर जंगली पेड़ कस्टार, काड़ाकूड़ा, मोहिनी, बियालकड़ी, दही-कड़ी और धावड़ा तथा सागौन की दुर्लभ प्रजाति के पेड़ हैं। छोटी कावेरी एवं पुण्य सलिला नर्मदा का संगम-स्थल भी पास में ही है।

तकरीबन 15 करोड़ रुपये लागत से यहाँ सर्व-सुविधायुक्त कॉटेज, प्रथम तल पर स्थित कॉटेज पर जाने के लिये पाथ-वे, केम्प फायर, मुख्य प्रवेश द्वार, रिसेप्शन, रेस्टॉरेंट, बोट-क्लब, कॉन्फ्रेंस हॉल, नेचुरल ट्रेल, बर्ड-वाचिंग तथा वॉच-टॉवर आदि का निर्माण किया गया है। यहाँ चार अलग-अलग ब्लॉक में 22 कॉटेज एवं एक सर्व-सुविधायुक्त सुईट बनाया गया है। हरेक कॉटेज के पास मिनी गार्डन भी है। कॉटेज की डिजाइन इस प्रकार बनायी गयी है जिससे यहाँ बैठकर ही दूर तलक भरे हुए निर्मल नीर का आनंद उठाया जा सकता है। कॉटेज की बालकनी में बैठकर पर्यटक घने जंगल, पानी और दुर्लभ प्रजाति के पक्षियों को निहार सकेंगे। आस-पास के जंगल में मुख्य रूप से हिरण, जंगली सुअर, तेंदुआ आदि वन्य-प्राणी भी स्वच्छंद विचरण करते हैं। कॉटेज के निर्माण में सागौन की लकड़ी का उपयोग किया गया है। परिसर में लैण्ड-स्केपिंग का काम किया जाकर फर्श पर सेंड स्टोन लगायी गयी है।

अनूठा है उज्‍जैन का त्रिवेणी संग्रहालय

भारतीय प्राचीन कला, संस्‍कृति और पुरातात्विक वैभव को समेटे उज्‍जैन में स्‍थापित त्रिवेणी संग्रहालय अपने आपमें अदभुत और अनूठा है। पिछले साल सिंहस्‍थ महापर्व के दौरान उज्‍जैन को मिली यह ऐसी अनुपम सौगात है जो चिरस्‍थायी महत्‍व की है। त्रिवेणी संग्रहालय की परिकल्‍पना को जिस सुनियोजित कोशिश के साथ साकार रूप दिया गया है वह अत्‍यंत सराहनीय है। इसके जरिये केवल उज्‍जैन और मालवा अंचल बल्कि सम्‍पूर्ण मध्‍यप्रदेश को अनूठी धरोहर मिली है। उज्‍जैन स्थित रूद्र तालाब, जयसिंहपुरा के नजदीक विकसित त्रिवेणी संग्रहालय उज्‍जैन आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिये राज्‍य शासन की अनुपम भेंट है। इसमें भारतीय संस्‍कृति और पुरातत्‍व का एक साथ संयोजन और समावेश बखूबी किया गया है।

त्रिवेणी संग्रहालय में भारतीय परम्‍परा की तीन प्रमुख शाश्वत धारा - शैवायन, कृष्‍णायन और दुर्गायन के रूप में भगवान शिव, कृष्‍ण और शक्ति की प्रतीक माँ भगवती के सभी रूपों को दर्शाया गया है। प्रदर्शनी खण्‍ड में माँ भगवती के 108 रूप दर्शाये गये हैं जिन्‍हें कलाकारों द्वारा देवियों की प्रचलित कथाओं के आधार पर साकार रूप दिया गया है। यह सभी दुर्लभ संग्रह हैं। संग्रहालय में शैव, शाक्‍त एवं वैष्‍णव दर्शन की प्राचीनतम प्रतिमाएँ संग्रहीत की गई हैं। ईश्‍वरीय शक्तियों के इन तीन प्रतीकों को संग्रहालय में अदभुत ढंग से प्रस्‍तुत किया गया है। संग्रहालय में लगभग 21 सौ वर्ष पुरानी प्रतिमा संग्रहीत की गई है। इस प्रतिमा के सहित अन्‍य प्राचीन प्रतिमाएँ खास तौर पर मध्‍यप्रदेश की उन्‍नत और वैभवशाली स्‍थापत्‍य-कला का परिचय करवाती है।

संग्रहालय में एक स्‍थान पर सुदामा जी को सिंहासन पर बैठा दिखाया गया है और भगवान श्रीकृष्‍ण नीचे बैठे हुए हैं। इसके जरिये यह दर्शाने की कोशिश की गई है कि पहले आप सुदामा बनें तभी आप कृष्‍ण को पा सकते हैं। इस प्रकार के अनेक चित्रण प्रदर्शनी गैलरी में प्रदर्शित किये गये हैं, जो अदभुत हैं और वर्तमान युग के लिये प्रेरणा-स्‍त्रोत हैं।

त्रिवेणी संग्रहालय को उसकी मूल अवधारणा और परिकल्‍पना के साथ साकार रूप देने में देश के विश्‍व ख्‍यातिप्राप्‍त आधुनिक और पारम्‍परिक शिल्‍पकारों, आकल्‍पकों, चित्रकारों और परिकल्‍पनाकारों की असाधारण भूमिका और उनका उल्‍लेखनीय योगदान रहा है। प्रदेश के ओरछा में स्‍थापित रामायण संग्रहालय के बाद त्रिवेणी संग्रहालय की उज्‍जैन में स्‍थापना एक सफल कोशिश है।

भारतीय पुरा-वैभव और संस्‍कृति में रुचि-रुझान रखने वाले पर्यटकों और श्रृद्धालुओं के लिये उज्‍जैन में अन्‍य दर्शनीय स्‍थलों और मंदिरों के साथ त्रिवेणी संग्रहालय भी एक अनुपम दर्शनीय स्‍थल के रूप में है।

 
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