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मध्यप्रदेश को देश में जैविक प्रदेश के रूप में मिली पहचान

भोपाल : शनिवार, अगस्त 12, 2017, 19:12 IST
 

मध्यप्रदेश को देश में सर्वाधिक प्रमाणित जैविक कृषि क्षेत्र होने का गौरव प्राप्त है। प्रदेश जैविक खेती की असीमित संभावनाओं से भरा राज्य है। राज्य की अर्थ-व्यवस्था के विकास में कृषि के महत्व को केन्द्र में रखते हुए मध्यप्रदेश सरकार ने अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाये हैं। राज्य की कृषि व्यवस्था कृषि के साथ-साथ और गैर-कृषि गतिविधियों का भी मिला-जुला मिश्रण है, जो उस पर निर्भर विभिन्न संस्थाओं एवं व्यक्तियों की जीविका का आधार है। मध्यप्रदेश सरकार खेती को लाभकारी व्यवसाय बनाने के लिये वचनबद्ध है। इसके अन्तर्गत बेहतर प्रबंधन, कृषि तकनीकी का विकास और राज्य में उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग कर कृषि विकास दर को और अधिक बढ़ाये जाने के प्रयास किये जा रहे हैं। इसी श्रंखला में मध्यप्रदेश में जैविक कृषि की रणनीति तैयार की गई है।

जैविक खेती के क्षेत्र में प्रदेश में जो भी प्रयास हुए हैं, उसके अच्छे परिणाम सामने आये हैं। मध्यप्रदेश देश के 40 प्रतिशत से अधिक जैविक कृषि उत्पाद का उत्पादन करता है। मध्यप्रदेश आर्गेनिक फार्मिंग के क्षेत्र में देशभर में सबसे आगे है। भारत में अनुमानित रूप से लगभग 44 हजार हेक्टेयर प्रमाणित क्षेत्रफल में जैविक खेती हो रही है। इसमें मध्यप्रदेश का क्षेत्रफल करीब 20 हजार हेक्टेयर है। जबकि एग्रीकल्चर एण्ड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट एक्सपोर्ट डेव्हलपमेंट अथॉरिटी (एपीडा) के अनुसार मध्यप्रदेश में लगभग 5 लाख 60 हजार हेक्टेयर में जैविक खेती की जा रही है।

हरित क्रांति के बाद देश के साथ-साथ मध्यप्रदेश में नवीन तकनीकों के प्रयोग पर केन्द्रित कृषि उत्पादन के माध्यम से बढ़ती जनसंख्या की भोजन आवश्यकताओं को पूरा करने की चुनौती का सामना सफलतापूर्वक किया गया है। कृषि उत्पादन वृद्धि की इस होड़ में कृषि के क्षेत्र में प्रकृति की व्यवस्थाओं की भी भरपूर उपेक्षा हुई है। प्राकृतिक बीज, खाद, प्राकृतिक कृषि मित्र, जीव-जन्तु, भूमि की संरचना, जल और मृदा संरक्षण जैसी कई उपलब्धताओं को नष्ट कर फसल उत्पादन में कीर्तिमान तो स्थापित किये गये, लेकिन इसके साथ ही मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी नष्ट हुई है। अनाज, फल, दूध में घुलता कृषि रसायन का जहर मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम कर स्वास्थ्य के लिये चुनौती बन गया। खेतों के बंजर हो जाने से कृषि लागत में भी बढ़ोत्तरी हुई है। मध्यप्रदेश में इन सब दिक्कतों का एक ही उपाय सामने आया, वह है जैविक खेती।

प्रदेश सरकार ने भी जैविक खेती को प्रोत्साहित करने का फैसला किया। इस बात को ध्यान में रखते हुए प्रदेश में वर्ष 2011 में जैविक कृषि नीति लागू की गई। नीति का मूल विजन यह था कि प्रदेश जैविक खेती के क्षेत्र में एक विकसित और अग्रणी राज्य के रूप में स्थापित हो। प्रदेश के 313 विकास खंडों में 1565 ग्रामों में जैविक खेती को प्राथमिकता पर अपनाया गया। व्यवसायिक संगठन एसोचैम ने मध्यप्रदेश में जैविक कृषि पर आधारित सर्वे वर्ष 2011-12 में किया। सर्वे में जैविक कृषि से अगले 5 वर्षों में 23 हजार करोड़ रुपये का सम्पदा संग्रहण, 600 करोड़ की निर्यात की संभावनाएँ और 60 लाख नवीन रोजगार सृजन के अवसर को प्रमुखता से रेखांकित किया गया। एसोचैम ने सर्वे में देश के वैश्विक जैविक कृषि व्यवसाय को जो वर्तमान में एक प्रतिशत से कम है, को बढ़ाकर 2.5 प्रतिशत की करने के लिये प्रदेश को सक्षम बताया है। मध्यप्रदेश के विदिशा, सागर एवं सीहोर जिलों में उगाये जा रहे शरबती गेहूँ, मालवा क्षेत्र का ड्यूरम गेहूँ, नर्मदा पठार के होशंगाबाद और नरसिंहपुर जिलों में उगायी जा रही अरहर दाल, मंडला और डिण्डोरी जिलों के कोदो, कुटकी, बैगानी दाल, बेगा चक एवं अन्य आदिवासी क्षेत्र में उगाये जा रहे चावल, रायसेन, भोपाल, जबलपुर एवं मंडला क्षेत्र का बासमती चावल एवं निमाड़ एवं मालवा के जैविक कपास की माँग न केवल भारत में है, बल्कि विदेशों में भी इन उपजों के चाहने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

साथ ही नीमच तथा मंदसौर की औषधीय फसलें भी हैं। गुना का धनिया, खरगोन की मिर्च, बालाघाट का चिन्नौर धान, सीहोर का शर्बती गेहूँ, धार, झाबुआ और बड़वानी की मक्का और कुक्कुट, मालवा की सोयाबीन, छिन्दवाड़ा की चिरौंजी, पचमढ़ी की खैर और धावड़ा, साथ ही गांधीसागर तथा तवा बाँध की मछली उच्च श्रेणी का जैविक उत्पाद है। यह सब जैविक कृषि उत्पाद आशातीत निर्यात की संभावना के द्वार खोलेंगे। जैविक खेती में हो रहे नये-नये अनुसंधान की जानकारी देने के लिये मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की घोषणा के अनुरूप मण्डला में जैविक खेती अनुसंधान केन्द्र की स्थापना की जा रही है।

प्रदेश में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिये प्रचार-प्रसार पर भी ध्यान दिया गया है। मंडला, जबलपुर से करीब 93 किलोमीटर दूर आदिवासी बहुल जिला है। यहाँ पर राष्ट्रीय जैविक कृषि मेला किया जा चुका है। जैविक मेले में करीब दो लाख किसानों की भागीदारी रही है। राज्य सरकार ने प्रदेश में 10 सर्वश्रेष्ठ जैविक ग्रामों को पुरस्कृत किये जाने का भी फैसला किया है। शत-प्रतिशत जैविक खेती वाले ग्रामों को राज्य-स्तर पर मुख्यमंत्री खेत-तीर्थ के रूप में शामिल किये जाने का भी फैसला किया है। प्रदेश की चयनित कृषि उपज मंडियों में जैविक उत्पादों के विक्रय की भी अलग व्यवस्था की गई है। जैविक खेती के प्रमाणीकरण के लिये व्यापक प्रयास किये गये हैं। राष्ट्रीय जैविक खेती केन्द्र पार्टिसिपेटरी गारंटी स्कीम इण्डिया (पीजीएस) के माध्यम से प्रमाणीकरण का कार्य सभी 51 जिलों में किया जा रहा है। इस कार्य के लिये पीजीएस इण्डिया ने परियोजना संचालक आत्मा को अधिकृत एजेंसी बनाया है।

एपीडा का अनुमान है कि प्रतिवर्ष भारत से 6792 टन जैविक उत्पादों का वार्षिक निर्यात किया जा रहा है, जिसकी कीमत 72 मिलियन यूएस डालर है। इसमें जैविक कपास की भागीदारी सर्वाधिक है। जैविक उत्पादों का विश्व बाजार लगभग 100 बिलियन डालर से अधिक का है।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी वर्ष 2014 में ग्लोबल इन्वेस्टर समिट इंदौर में आये थे। उन्होंने कहा था कि मध्यप्रदेश एक ऐसा प्रदेश है जो हिन्दुस्तान के कुल आर्गेनिक फार्मिंग उत्पादन में 40 प्रतिशत योगदान कर रहा है। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने जैविक कृषि को, खेती को लाभ का व्यवसाय बनाने के लिये बेहतर उपाय बताया है। उन्होंने कहा कि संतुलित पर्यावरण एवं बेहतर जन-स्वास्थ्य का लक्ष्य पाने के उद्देश्य से प्रदेश जैविक खेती एवं उद्यानिकी के अधिकतम उत्पादन के लिये प्रतिबद्ध है। राज्य सरकार जैविक खेती के क्षेत्रफल को और अधिक बढ़ाने के लिये संकल्पित है। कृषि, उद्यानिकी और पशुपालन के योगदान से ही प्रदेश 24.99 प्रतिशत कृषि विकास दर हासिल कर पाया है।

 
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