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अपने लिये नहीं अपनों के लिये करें सुरक्षित ड्राइव

भोपाल : सोमवार, सितम्बर 4, 2017, 16:50 IST

रोजमर्रा की भाग दौड़ भरी जिन्दगी में जीने के लिये लोगों ने रफ्तार का सहारा ले रखा है। इसमें वे यह भूल जाते हैं कि हमारे पीछे भी कोई है। हम बात कर रहे हैं उन लोगों की जो तेज गति से वाहन चलाकर काल के गाल में समा जाते हैं और अपने पीछे हँसते-खेलते परिवार को जिन्दगी से लड़ने के लिये अकेला बेबस छोड़ जाते हैं।

सड़क दुर्घटनाएँ आज के समय एक बड़ी समस्या बनती जा रही हैं। इसमें मरने वालों की संख्या में भी इजाफा हो रहा है। इसीलिये यातायात प्रबंधन आज की आवश्यकता बनता जा रहा है। सड़क दुर्घटनाओं को कम करना एक बड़ी चुनौती है। मध्यप्रदेश में सड़क दुर्घटनाओं और इनसे होने वाली मृत्यु के आकड़ें चिंता का विषय है। इसके लिए जन-जागरूकता जरूरी है।

दुर्घटना पीड़ित व्यक्ति को अस्पताल पहुँचाने पर नहीं होगी पूछताछ

किसी दुर्घटना पीड़ित व्यक्ति को अस्पताल लाने वाले बाईस्टेंडर (मूक दर्शक) या गुड सेमेरिटन (अच्छा नेक व्यक्ति) से कोई प्रश्न नहीं पूछा जाता है एवं उन्हें रोका नहीं जाता है। यह बात ारभसभी पब्लिक एवं प्राइवेट चिकित्सालय के आकस्मिक/ इमरजेंसी विभाग, रोगी प्रतीक्षालय में हिन्दी एवं अंग्रेजी भाषा में अनिवार्य रूप से प्रदर्शित करने के निर्देश हैं। साथ ही बाईस्टेंडर या गुड सेमेरिटन से पंजीयन एवं भर्ती शुल्क नहीं लिया जाता। यह बात भी हिन्दी एवं अंग्रेजी भाषा में अस्पतालों में लिखी हुई होना चाहिये।

उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर संचालनालय स्वास्थ्य सेवाएँ द्वारा सभी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी एवं सिविल सर्जन-सह-मुख्य अस्पताल अधीक्षक को कहा गया हैं कि सभी पब्लिक एवं प्राइवेट अस्पतालों में इन निर्देशों का पालन सुनिश्चित करें।

आँकड़ों के हिसाब से सड़क दुर्घटना में 18 से 35 आयु वर्ग के लोगों की मृत्यु सबसे ज्यादा हुई है। युवा वर्ग को नियमों का ज्ञान और उन्हें जागरूक कर सड़क दुर्घटना से बचाया जा सकता है। सड़क दुर्घटनाओं के अन्य कारण भी है। उसमें सड़क की तकनीकी के लिए ट्रैफिक इंजीनियर की महत्‍वपूर्ण भूमिका हो सकती है। पैदल चालक भी बड़ी समस्या है, जो ग्रीन लाइट के समय सड़क में बीचो-बीच आ जाते हैं। साथ ही वाहनों का लेन क्रास करना, नियमों का उल्लंघन है। रात में अपेक्षाकृत तेज गति से वाहन चालन भी सड़क दुर्घटना का कारण बनता है।

मोबाइल और ओवर-लोडिंग

दो पहिया वाहनों पर ओवर लोडिंग और मोबाइल पर बात करना सड़क दुर्घटना को आमंत्रित करता है। चार पहिया वाहनों में नियमानुसार तो सभी को सीट बेल्ट लगाना चाहिए। कम से कम आगे के दोनों व्यक्तियों को सीट बेल्ट पहनने से दुघर्टनाओं में होने वाली मृत्यु से बचा जा सकता है। सड़क दुर्घटना का एक कारण कंस्ट्रक्शन वर्क भी है। इसके लिए निर्माण एजेंसी को जरूरी साइन बोर्ड का उपयोग सतर्कता के लिए करना चाहिए। शहरों में रात के समय हाई बीम (अपर लाइट) का उपयोग कर 40 प्रतिशत लोग वाहन चलाते हैं। यह भी दुर्घटना का कारण बनता है। इसका लोगों को ज्ञान होना आवश्यक है। सड़क पर साइनेज और सिग्नल विजिबल होना चाहिए। इसके जरिये लोगों को पहले से मार्ग के खतरे का आभास होगा और वह सावधानी से ड्राइव करेंगे।

 चालक को स्वयं सावधानी से करना होगा वाहन का उपयोग

सड़क शहर की धमनी होती है, इसे क्लीयर रखना बहुत जरूरी है। सड़क जाम होने से शहर थम जाता है। व्यक्ति को दूसरे लोगों को अज्ञानी समझकर गाड़ी चलानी चाहिये। वाहन चालक को स्वयं सावधानी से वाहन का उपयोग करना चाहिये, इससे सड़क दुर्घटना में कमी आयेगी।

गुड सेमेरिटन के बचाव संबंधी आवश्यक दिशा-निर्देश

यदि कोई बाईस्टेंडर या गुड सेमेरिटन, जो सड़क पर पड़े घायल व्यक्ति के लिये आपातकालीन चिकित्सा सेवाएँ उपलब्ध करवाने के लिये फोन कॉल करता है, तो उसे फोन पर अथवा व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपना नाम और व्यक्तिगत विवरण देने के लिये बाध्य नहीं किया जाये। सड़क दुर्घटनाओं से संबंधित आपातकालीन स्थिति में चिकित्सक द्वारा चिकित्सकीय देखभाल न किये जाने पर भारतीय चिकित्सा परिषद् (व्यवसायिक आचार, शिष्टाचार और नैतिक) विनियम 2002 के अध्याय-7 'व्यवसायिक कदाचरण' में अनुशासनात्मक कार्यवाही की जायेगी। बाईस्टेंडर या गुड सेमेरिटन के चाहने पर अस्पताल उसे घायल व्यक्ति को अस्पताल में लाने तथा समय और स्थान संबंधी पावती उपलब्ध करवायेगा।

मेडीको लीगल के केस में गुड सेमेरिटन की व्यक्तिगत जानकारी जैसे नाम एवं सम्पर्क जानकारी देना स्वैच्छिक एवं वैकल्पिक है। सिवाय सिर्फ प्रत्यक्षदर्शी के जिसे पता बताने के बाद जाने दिया जायें। सभी कर्मचारियों का भर्ती के समय राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना संबंधी जानकारी का उन्मुखीकरण किया जाये। साथ ही समय-समय पर नियमित पुन:श्चर्या प्रशिक्षण दिया जाये।

वाहन का हेल्थ चेक-अप समय-समय पर करवाना अति-आवश्यक है। कई बार गाड़ी की सर्विसिंग नहीं करवाना भी दुर्घटना का कारण बनता है। वाहनों की संख्या पर नियंत्रण भी आवश्यक है। सिंगापुर में अगर घर में पार्किंग की जगह नहीं है तो वाहन खरीदने की परमिशन नहीं मिलती। ट्रेफिक मैनेजमेंट के लिये नया कानून लाना होगा। इसमें पैदल चलने वाले व्यक्ति, रिक्शा-चालक आदि को भी कानून के दायरे में लाना होगा।

मोटर वाहन के कारण 25 से 30 प्रतिशत क्राइम होता है। इसमें गाड़ी चोरी, दुर्घटना और पार्किंग के कारण लड़ाई-झगड़ा होना आदि शामिल है। दूसरे मुल्कों में सड़क का उपयोग व्यक्ति और वाहन द्वारा किया जाता है। हमारे यहाँ इसका विभिन्न कार्यों में उपयोग किया जाता है, जैसे पार्किंग, सामान बेचने वाले ठेले आदि। जल्द ही नया एक्ट आने वाला है। इसमें 4 साल के बच्चों और महिलाओं को भी हेलमेट अनिवार्य किया गया है। एक्ट में कड़े प्रावधान किये जायेंगे। ट्रेफिक सिग्नल तोड़ने, स्टॉप-लाइन के बाहर जाने आदि पर भी चालान होगा। नियम तोड़ने वालों का लायसेंस 3 माह के लिये सस्पेंड किया जायेगा।

शराब भी एक कारण

सड़क दुर्घटनाओं के विभिन्न कारणों में से एक शराब पीकर वाहन चलाना भी है। आने वाले समय में टेक्नालॉजी का उपयोग इतना बढ़ेगा कि ड्रिंक कर वाहन में बैठने पर सेंसर के जरिये अल्कोहल की स्मेल से वाहन स्टार्ट ही नहीं होगा। जब तक चालक सीट बेल्ट का उपयोग नहीं करेगा, उस समय भी गाड़ी स्टार्ट नहीं होगी।

यातायात नियमों का पालन करवाना और नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई का दायित्व पुलिस का है। आम आदमी को नियम को धर्मग्रंथ के रूप में लेना चाहिये। नागरिक नियमों का ज्ञान नहीं होने पर भी कानून तोड़ते हैं। चौराहे पर मोटर व्हीकल एक्ट सभी के लिये है।

जुलूस, जलसा, व्हीआईपी भ्रमण के समय बंद होने वाले रास्ते और परिवर्तित मार्ग का व्यापक प्रचार-प्रसार पहले से ही किया जाना चाहिये। इससे आम आदमी खुद-ब-खुद असुविधा से बचने के लिये उस जगह से नहीं जायेगा। कम से कम ट्रेफिक को रोका जाये, जिससे जाम की स्थिति न बने और व्हीआईपी के चौराहे से निकलने के तुरंत बाद ट्रेफिक को छोड़ा जाये।

सड़क दुर्घटना की जाँच करते समय पुलिस को जाँच के स्तर के विभिन्न घटक की जानकारी होना चाहिये। पुलिस को सबूत के तौर पर टॉयर मार्क्स, फिंगर प्रिंट्स आदि पर भी ध्यान देना चाहिये। सड़क दुर्घटना के समय 72 प्रतिशत प्रकरण में हेवी व्हीकल के ड्रायवर की गलती मानी जाती है।

यातायात के प्रति जागरूकता के लिये उत्तर प्रदेश के नोएडा की एक स्कूली छात्रा स्नेहा माखीजानी ने अकेले ही सड़क पर लोगों को ट्रेफिक रूल्स के बारे में समझाने का अभियान शुरू किया। यह एक सराहनीय पहल है। इसी प्रकार बैतूल में सीजेएम कोर्ट के न्यायाधीश श्री कमलेश सिरोठिया, श्री पंकज यादव सहित अन्य न्यायाधीशों ने कॉलेज चौक पर दो-पहिया वाहनों द्वारा यातायात नियमों का उल्लंघन करने वाले चालकों के खिलाफ कार्यवाही की। यह दोनों प्रकरण दैनिक अखबारों में देखने को मिले। सोचने की बात है कि एक तरफ न्यायाधीश और दूसरी ओर एक कम उम्र की छात्रा, सबको चिन्ता है यातायात की और उसे सुधारने की। यह बात हम जैसे आम लोग भी समझ जायें, तो हमारे घर-परिवार के सदस्य सड़क दुर्घटना में घायल न हों।

अभी हाल में ही देश में लागू हुए बीएस-4 मानकों के तहत अब दुपहिया वाहन बनाने वाली कम्पनियों ने अपने सभी मॉडल से हेड लाइट ऑन-ऑफ का सिस्टम भी खत्म कर दिया है। अब सभी दुपहिया वाहनों को एएचओ यानि ऑटोमेटिक हेड लाइट ऑन सिस्टम से लैस कर दिया गया है। इसमें जब तक इंजन स्टार्ट रहेगा, हेड लाइट ऑन ही रहेगी और लोग चाहकर भी हेड लाइट को बंद नहीं कर पायेंगे। दिन में हेड लाइट सिर्फ नये मॉडल की ही ऑन नहीं रहेगी, पुराने मॉडल के वाहनों की भी मेन्युअल लाइट ऑन रखनी पड़ेगी। ऐसा नहीं करने पर ट्रेफिक नियमों के विपरीत माना जायेगा और वाहन चालक को जुर्माना भरना पड़ेगा। देश में सड़क दुर्घटनाओं के बढ़ते ग्राफ को कम करने के उद्देश्य से यह बदलाव किया गया है। सड़क पर कोहरे, धूल, बरसात और भारी ट्रेफिक में दुपहिया वाहनों की विजिबिलिटी कम हो जाती है। इस उद्देश्य से वाहनों में यह बदलाव किया गया है।

इसी प्रकार देश की हर कार निर्माता कम्पनी को अपनी कारों में ड्यूल फ्रंड एयर बैग्स, स्पीड वॉर्निग अलर्ट और रिवर्स पार्किंग असिस्ट देना ही होगा। एआईएस यानि ऑटो मोटिव इंडस्ट्री स्टेण्डर्ड 145 इन फीचर को मैंडेटरी कर दिये जायेंगे। भारत सरकार की तरफ से यह कदम रोड एक्सीडेन्ट और केजुअल्टीज में कमी लाने के लिये है। इन सेफ्टी फीचर्स के हर कार में होने से हादसों की आशंका कम होने के आसार है। सरकार जल्द ही भारत एनसीएपी यानि न्यू कार असेसमेंट प्रोग्राम भी लांच करेगी। इन सेफ्टी फीचर्स के आ जाने से वाहनों की कीमत में इजाफा होगा, लेकिन हम सुरक्षित रहेंगे।

सुप्रीम कोर्ट हो या सरकार सभी को चिंता है तो आम आदमी की सुरक्षा की। सड़क दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाने की, जिससे हमारा परिवार अपनों से न बिछड़े। बस जरूरत है हमें समझने की, हम समझ गये, तो हमारा परिवार जिन्दगी भर अपनों के खोने का दुख नहीं झेलेगा।

(लेखक सहायक संचालक जनसंपर्क और मध्यप्रदेश राज्य सड़क सुरक्षा क्रियान्वयन समिति में नोडल अधिकारी हैं)

 
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