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ताना-बाना से मशहूर चंदेरी में बहुत कुछ है साड़ी के सिवाय

भोपाल : शुक्रवार, सितम्बर 8, 2017, 15:21 IST
 

चंदेरी की साड़ी कहीं से भी किसी शो रूम या एम्‍पोरियम से भी खरीदी जा सकती है फिर कोई भी व्‍यक्ति चंदेरी तक क्‍यों आये? इस प्रश्‍न का जवाब भी उतना ही सटीक मिलता है – ‘सिर्फ साडि़यों के लिए नहीं बल्कि दिल से जुड़ने के लिए और यह साड़ी कितने परिश्रम से बनती है यह देखने के लिए लोग चंदेरी आयें।’ चंदेरी सिर्फ साड़ी उद्योग के लिए ही नहीं यहाँ के इतिहास, पुरा-वैभव, हेरिटेज और अनूठी पाषाणकला से परिचित होने लोगों को कम से कम एक बार जरूर यहाँ आना चाहिए। दरअसल, इतिहास धर्म, संस्‍कृति, पुरा‍तात्विक वैभव का अद्भुत संगम है चंदेरी। चहुँओर से पहाड़ों से घिरी चंदेरी में ‘बादल महल दरवाजा’ यहाँ की शान और पहचान है लेकिन तकरीबन दो दर्जन से ज्‍यादा स्‍थान सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए यहाँ मौजूद हैं।

चंदेरी में 30 करोड. 69 लाख रुपए की लागत से निर्मित चंदेरी हेंडलूम पार्क का लोकार्पण हाल ही में मुख्‍यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा किया गया है। मुख्‍यमंत्री श्री चौहान ने इस मौके पर चंदेरी को पर्यटक स्‍थल का दर्जा दिये जाने, 3 करोड़ रुपए की राशि मंजूर करने और चंदेरी को पर्यटन सर्किट से जोड़े जाने की घोषणा भी की।

चंदेरी के मशहूर किले के पेनारॉमिक व्‍यू से आगे बढ़ते हुए हम जौहर स्‍मारक पहुँचते हैं। यहाँ प्रदर्शित जानकारी हिन्‍दी के साथ अंग्रेजी और संस्‍कृत में भी उत्‍कीर्ण है, जो हमें तत्‍कालीन शासनकाल की दूरदर्शिता और भाषाओं के प्रति सम्‍मान का अहसास करवाता है। नजदीक ही सोलहवीं सदी के संगीत सम्राट ‘बैजू-बावरा’ की समाधि बनी हुई है। उनका वास्‍तविक नाम प‍ंडित बैजनाथ प्रसाद था। उनकी प्रेमिका के रूप में ‘कला’ का नाम प्रचलित है। किले में स्थित ‘खूनी दरवाजा’ जाने के मार्ग में बंदरों का झुण्‍ड बाधक बन जाता है। उनमें से एक-दो बंदर आक्रामक तरीके से हमारी ओर छलांग भरते हैं। उनसे किसी तरह बचकर हम वापस लौटते हैं।

चंदेरी फोर्ट स्थित कोठी को मध्‍यप्रदेश पर्यटन द्वारा हेरिटेज होटल के रूप में विकसित कर 4 सुईट बनवाये जा रहे हैं। तैयार होते ही इनकी ऑनलाइन बुकिंग शुरू हो जायेगी। फिलहाल पर्यटकों के लिये पर्यटन निगम की प्रसिद्ध होटल ताना-बाना समेत अन्‍य निजी होटल भी यहाँ हैं।

‘बाबरनामा’ में बाबर ने स्‍वयं चंदेरी का विस्‍तार से जिक्र किया है। यहाँ राजा भारत शाह बुंदेला की छत्री विशाल स्‍मारक के रूप में बुंदेला स्‍थापत्‍य कला का अद्वितीय नमूना है। परिसर में स्थित लक्ष्‍मण मंदिर, परमेश्‍वर तालाब और शहजादी का रोजा अन्‍य देखने लायक स्‍थल है। पौराणिक आख्‍यान में श्रीमद्भागवत कथा में श्री कृष्‍ण चरित्र के रुक्‍मणि मंगल प्रसंग में चंदेरी के राजा शिशुपाल का उल्‍लेख मिलता है। चंदेरी के नजदीक ‘खंदार गिर’ में जैन तीर्थंकर की 30 से अधिक प्रतिमाएँ एक ही चट्टान में निर्मित हैं। यहाँ गुफाएँ भी हैं।

चंदेरी के प्राचीन किले के अतिरिक्‍त यहाँ बादल महल दरवाजा, दिल्‍ली दरवाजा, राजा-रानी महल, कटी घाटी, बड़ा मदरसा, बत्‍तीसी बावड़ी, सिंहपुर महल, रामनगर महल, जामा मस्जिद, श्री जागेश्‍वरी मंदिर, चौबीसी जैन मंदिर, हजरत मकदूम शाह की दरगाह, शाही शिकारगाह, सिटी वॉल तथा बारिश के मौसम में बहते झरने सहित रॉक पेंटिंग की लगभग 11 साइट्स हैं।

हम एक साफ-सुथरी एकता बुनकर कालोनी में फितर मियाँ के घर पर उन्‍हें लूम चलाते हुए देख रहे हैं। कॉलोनी में लगभग 50 परिवार रहते हैं जो सभी साड़ी बुनाई के उद्योग में लगे हैं। इससे हरेक परिवार में चार-पाँच लोगों को काम मिल जाता है। पास में ही अब्‍दुल अमीन की दुकान पर 1500 रुपए से लेकर 15 हजार रुपए तक कीमत की साडि़याँ बिक्री के लिए करीने से सजाकर रखी हैं। चंदेरी साड़ी की खासियत यह है कि यह शत-प्रतिशत हाथ से बुनी हुई और प्राकृतिक धागे से निर्मित साड़ी होती है। ‘एक नाल बूटी’ की साड़ी और परंपरागत बूटी और बॉर्डर की साडि़याँ ज्‍यादा पसंद की जाती है। हमारी मुलाकात यहाँ अता मोहम्‍मद से होती है जिन्‍हें राज्‍य शासन द्वारा कबीर बुनकर पुरस्‍कार से नवाजा गया है। साथ ही उनके द्वारा तैयार झाँकी को 26 जनवरी गणतंत्र दिवस समारोह में द्वितीय पुरस्‍कार मिला था।

चंदेरी के जानकार श्री मुजफ्फर कल्‍ले भाई ने बड़े मार्के की बात कही। उनके मुताबिक चंदेरी की बाकी सारी खूबियों में यहाँ का आपसी सद्भाव और भाईचारे का वातावरण है। पहले मुस्लिम अंसारी जुलाहे ही यह काम करते थे। अब कोली, जैन, ब्राह्मण और आदिवासी समुदाय के बुनकर भी साड़ी उद्योग के कारोबार में लगे हुए हैं। ‘हिन्‍दू बाना है तो मुस्लिम ताना’ है। इसी तरह ‘ताने में सिल्‍क है तो बाने में कॉटन’ है। लगभग असंगठित क्षेत्र के चंदेरी साड़ी उद्योग का वार्षिक टर्न ओवर अनुमानित 500 करोड़ रुपए है। रोजाना 300 से लेकर 800 रुपए तक की कमाई इस उद्योग से जुड़े बुनकर घर बैठे कर लेते हैं। इससे बुनकरों का जीवन स्‍तर भी सुधरा है। साड़ी में प्रयुक्‍त धागा महीन होता है और बहुत बारीक नजर इस पर रखना होती है।

माना जाता है कि 1304 में ढाका (लखनावती) से बुनकर यहाँ आए थे। पन्‍द्रहवीं सदी में चंदेरी तत्‍कालीन समय में प्रचलित पगड़ी और साफे के लिये भी मशहूर था। सन् 1911 तक शाही लिबास यहीं तैयार होते थे। बाद में लंदन से डिजाइनर बुलवाकर चंदेरी में प्रशिक्षण केन्‍द्र खोला गया था ताकि इस कला का व्‍यापक प्रसार हो सके और यह लोगों तक पहुँच सके। मैनचेस्‍टर से सबसे पहले 1944 में मील का कॉटन यहाँ मँगवाया गया था। इसके बाद हरेक दशक में इस उद्योग में उतार-चढ़ाव आता रहा जो अभी तक जारी है। स्‍व-सहायता समूह के जरिये भी साड़ी बुनाई का कार्य किया गया जो सफल रहा। तकरीबन 35 हजार से ज्‍यादा की आबादी वाले चंदेरी में साड़ी उद्योग में तकरीबन 60 फीसदी लोग प्रत्‍यक्ष और अप्रत्‍यक्ष रूप से जुटे हुए हैं। शासन की ओर से इसे बढ़ावा देने के लिये विभिन्‍न स्‍थानों पर होने वाले प्रदर्शनी-सह-बिक्री आयोजन के मौकों पर यहाँ के बुनकरों को भी बुलवाया जाता है। सन् 2010 के कॉमन वेल्‍थ गेम में प्रयुक्‍त स्‍टोल्‍स यहीं के बुने हुए थे।

चंदेरी के साड़ी उद्योग के आधुनिकीकरण की दिशा में भी प्रयास किये जा रहे हैं। मूल स्‍वरूप को यथावत रखते हुए निफ्ट के जरिये डिजाइन में तब्‍दीली की जा रही है। डिजिटल एम्‍पॉवरमेंट फाउण्‍डेशन की मदद से चंदेरी साड़ी की तकरीबन 20 हजार डिजाइन का डिजिटाइजेशन किया गया है। राजा-रानी महल में संचालित चंदेरिया संस्‍था में ये डिजाइन उपलब्‍ध है। परम्‍परागत बुनकर परिवारों के नई जनरेशन के युवा भी इस उद्योग में लगे हैं। इनमें से किसी ने तालीम हासिल की तो किसी ने डिप्‍लोमा कोर्स किया।

आधुनिकीकरण की एक अन्‍य कोशिश के रूप में चंदेरी में 30 करोड. 69 लाख रुपए की लागत से निर्मित चंदेरी हेंडलूम पार्क का लोकार्पण हाल ही में मुख्‍यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा किया गया है। मुख्‍यमंत्री श्री चौहान ने इस मौके पर चंदेरी को पर्यटक स्‍थल का दर्जा दिये जाने, 3 करोड़ रुपए की राशि मंजूर करने और चंदेरी को पर्यटन सर्किट से जोड़े जाने की घोषणा भी की। निश्चित ही चंदेरी के विकास को इससे और गति मिलेगी। इस मौके पर प्रदेश के लोक सेवा प्रबंधन एवं जन शिकायत निवारण मंत्री श्री जयभान सिंह पवैया, कृषि विकास एवं किसान कल्‍याण मंत्री श्री गौरी शंकर बिसेन और सांसद श्री प्रभात झा मौजूद थे। भारत सरकार के ऊर्जा मंत्रालय द्वारा चंदेरी में बुनकरों के घरों में बड़ी संख्‍या में सोलर पेनल भी स्‍थापित किये गये हैं।

चंदेरी साड़ी हमारे देश के अलावा अमेरिका,जर्मनी, फ्रांस, इटली, इंडोनेशिया, मलेशिया, यू.ए.ई., इंग्‍लैण्‍ड, फिलिपीन्‍स, बांगलादेश, पाकिस्‍तान, नेपाल आदि देशों तक बिक्री के लिये भेजी जाती हैं। साडि़यों के अलावा चंदेरी में सलवार सूट, दुपट्टे, स्‍टोल, पर्दे और फर्निशिंग की सामग्री भी तैयार की जाती है। फेब इंडिया का प्रोडक्‍शन केन्‍द्र यहाँ है। चंदेरी हेण्‍डलूम का सामान बनकर यहीं से सप्‍लाई किया जाता है। जरी सूरत से, कॉटन कोयंबटूर से और सिल्‍क बैंगलुरू और वाराणसी से मँगवाया जाता है। यहाँ के बुनकरों की यही ख्‍वाहिश है कि चंदेरी की यह दुर्लभ कला ज्‍यादा से ज्‍यादा कद्रदां तक पहुँचे। यह उद्योग और अधिक फले-फूले और आगे बढ़े।

 
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